Vinaya Patrika
149
अध्याय 149 / 279

पद १४९

7 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ7 श्लोक

अध्याय 149

श्लोक 1

कहाँ जाउँ, कासों कहौं, और ठौर न मेरे ।जनम गँवायो तेरे ही द्वार किंकर तेरे

kahā~ jāu~, kāsoṃ kahauṃ, aura ṭhaura na mere | janama ga~vāyo tere hī dvāra kiṃkara tere

अध्याय 149

श्लोक 2

मैं तो बिगारी नाथ सों आरतिके लीन्हें ।तोहि कृपानिधि क्यों बनै मेरी-सी कीन्हें

maiṃ to bigārī nātha soṃ āratike līnheṃ | tohi kṛpānidhi kyoṃ banai merī-sī kīnheṃ

अध्याय 149

श्लोक 3

दिन-दुरदिन दिन-दुरदसा, दिन-दुख दिन-दूषन ।जब लौं तू न बिलोकिहै रघुबंस-बिभूषन

dina-duradina dina-duradasā, dina-dukha dina-dūṣana | jaba lauṃ tū na bilokihai raghubaṃsa-bibhūṣana

अध्याय 149

श्लोक 4

दइ पीठ बिनु डीठ मैं तुम बिस्व-बिलोचन ।तो सों तुही न दूसरो नत-सोच-बिमोचन

dai pīṭha binu ḍīṭha maiṃ tuma bisva-bilocana | to soṃ tuhī na dūsaro nata-soca-bimocana

अध्याय 149

श्लोक 5

पराधीन देव दीन हौं, स्वाधीन गुसाईं ।बोलनिहारे सों करै बलि बिनयकी झाईं

parādhīna deva dīna hauṃ, svādhīna gusāīṃ | bolanihāre soṃ karai bali binayakī jhāīṃ

अध्याय 149

श्लोक 6

आपु देखि मोहि देखिये जन मानिय साँचो ।बड़ी ओट रामनामकी जेहि लई सो बाँचो

āpu dekhi mohi dekhiye jana māniya sā~co | baḍa़ī oṭa rāmanāmakī jehi laī so bā~co

अध्याय 149

श्लोक 7

रहनि रीति राम रावरी नित हिय हुलसी है ।ज्यों भावै त्यों करु कृपा तेरो तुलसी है

rahani rīti rāma rāvarī nita hiya hulasī hai | jyoṃ bhāvai tyoṃ karu kṛpā tero tulasī hai

स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.