अध्याय 145
श्लोक 1
कृपासिंधु! जन दीन दुवारे दादि न पावत काहे ।जब जहँ तुमहिं पुकारत आरत, तहँ तिन्हके दुख दाहे
kṛpāsiṃdhu! jana dīna duvāre dādi na pāvata kāhe | jaba jaha~ tumahiṃ pukārata ārata, taha~ tinhake dukha dāhe
अध्याय 145
कृपासिंधु! जन दीन दुवारे दादि न पावत काहे ।जब जहँ तुमहिं पुकारत आरत, तहँ तिन्हके दुख दाहे
kṛpāsiṃdhu! jana dīna duvāre dādi na pāvata kāhe | jaba jaha~ tumahiṃ pukārata ārata, taha~ tinhake dukha dāhe
अध्याय 145
गज, प्रहलाद, पांडुसुत, कपि सबको रिपु-संकट मेट्यो ।प्रनत, बंधु-भय-बिकल, बिभीषन, उठि सो भरत ज्यों भेट्यो
gaja, prahalāda, pāṃḍusuta, kapi sabako ripu-saṃkaṭa meṭyo | pranata, baṃdhu-bhaya-bikala, bibhīṣana, uṭhi so bharata jyoṃ bheṭyo
अध्याय 145
मैं तुम्हरो लेइ नाम ग्राम इक उर आपने बसावौं ।भजन, बिबेक, बिराग, लोग भले, मैं क्रम-क्रम करि ल्यावौं
maiṃ tumharo lei nāma grāma ika ura āpane basāvauṃ | bhajana, bibeka, birāga, loga bhale, maiṃ krama-krama kari lyāvauṃ
अध्याय 145
सुनि रिस भरे कुटिल कामादिक, करहिं जोर बरिआईं ।तिन्हहिं उजारि नारि-अरि-धन पुर राखहिं राम गुसाईं
suni risa bhare kuṭila kāmādika, karahiṃ jora bariāīṃ | tinhahiṃ ujāri nāri-ari-dhana pura rākhahiṃ rāma gusāīṃ
अध्याय 145
सम-सेवा-छल-दान-दंड हौं, रचि उपाय पचि हार्यो ।बिनु कारनको कलह बड़ो दुख, प्रभुसों प्रगटि पुकार्यो
sama-sevā-chala-dāna-daṃḍa hauṃ, raci upāya paci hāryo | binu kāranako kalaha baḍa़o dukha, prabhusoṃ pragaṭi pukāryo
अध्याय 145
सुर स्वारथी, अनीस, अलायक, निठुर, दया चित नाहीं ।जाउँ कहाँ, को बिपति-निवारक, भवतारक जग माहीं
sura svārathī, anīsa, alāyaka, niṭhura, dayā cita nāhīṃ | jāu~ kahā~, ko bipati-nivāraka, bhavatāraka jaga māhīṃ
अध्याय 145
तुलसी जदपि पोच, तउ तुम्हरो, और न काहू केरो ।दीजै भगति-बाँह बारक, ज्यों सुबस बसै अब खेरो
tulasī jadapi poca, tau tumharo, aura na kāhū kero | dījai bhagati-bā~ha bāraka, jyoṃ subasa basai aba khero
पाठ सेटिंग्स · Reading settings
भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026
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अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
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भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
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समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
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पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.