Vayu Purana
225
अध्याय 225 / 232

Adhyaya 225

22 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ22 श्लोक

अध्याय 225

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे कोटीश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय २२५ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततः क्रोशान्तरे गच्छेद् अलिकातीर्थमुत्तमम् ।अलिका नाम गान्धर्वी कुशीला कुटिलाशया

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe koṭīśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma caturviṃśatyadhikadviśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 225 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tataḥ krośāntare gacched alikātīrthamuttamam / alikā nāma gāndharvī kuśīlā kuṭilāśayā

हिन्दी अर्थ

तस्यां ये तु गुणा ह्यासंस्ते तिष्ठन्ति जगत्त्रये । धर्मो धर्मत्रतायास्तु त्रिषु लोकेषु सार्गयन् नानुरूप वर लेभे धर्मोड्थ चरसिद्धये । तपः कुर वरार्थ त्वं तथेत्युकल्वा वनं ययौ ..

English

"O Brahmanas even when everything had been given by me, you coveted for more. Hence you will always be burdened with debts. The river shall flow with water only (and not milk). The mountains of foodstuffs will turn into those of rocks. All the rivers shall flow with water and your houses will be of mud. Kamadhenu and the Kalpa-tree will come back to my own region." Cursed thus by Brahma all those Brahmanas imploringly said to the Unborn deity:

अध्याय 225

श्लोक 2

चित्रसेनस्य दौहित्री विद्यानन्दमृषिं गता ।वव्रे ते स्वीकृता तेन दशवर्षाणि तं श्रिता

citrasenasya dauhitrī vidyānandamṛṣiṃ gatā / vavre te svīkṛtā tena daśavarṣāṇi taṃ śritā

हिन्दी अर्थ

कन्या सा च तपस्तेपे सर्वेषां दुष्करं व यत् । वायुभक्षा श्वेतकल्पे युगानामयुत॑ं पुरा ३६

English

"O lord, everything that had been given by you has gone off due to your curse. May you be kind enough to assign something for our livelihood".

अध्याय 225

श्लोक 3

पतिं जघान तं सुप्तं कस्मिंश्चित् कारणान्तरे ।गत्वा निवेदयामास पितरं रत्नवल्लभम्

patiṃ jaghāna taṃ suptaṃ kasmiṃścit kāraṇāntare / gatvā nivedayāmāsa pitaraṃ ratnavallabham

हिन्दी अर्थ

नारद बोले- ब्रह्मत् ! वह प्रसिद्ध शिला किस प्रकार उत्पन्न हुई जिससे गयासुर का दरोर दबाया गया था । उसका स्वरूप एवं माहात्म्य क्या है ? उसका बाम क्या है ? बतलाइये सनत्कुमार बोले - प्राचीमकाल में महान् तेजस्वी, समस्त विज्ञान विज्ञानतत्त्व वेत्ता धर्म मामक महानुभाव हुए । उनको पतिम्नत परायण विश्वरूपा नामक पत्नी थी । उस पत्नी में धर्म के संयोग से धर्मंब्रता नामक एक सती कन्या उत्पन्न हुई जो स्वरूप एवं यौवन से सम्पन्न एवं लक्ष्मी के समान परम गुणवती थी । उसमें जितने गुण उपलब्ध थे वे तीनों जग्रत् के प्राणियों में उपलब्ध थे। धर्मश्रता के लिये धर्म ने तीनों

English

On hearing those words, the sympathetic Brahma spoke tjius to the Brahmanas: "As long as the Moon and the Sun shine, you will be maintaining your livelihood by means of (the earning at the) holy centres.

अध्याय 225

श्लोक 4

पित्रा मात्रा च संत्यक्ता बहुभिर्भर्त्सिता नृप ।गर्भघ्नी त्वं पतिघ्नी त्वमिति दर्शय मा मुखम्

pitrā mātrā ca saṃtyaktā bahubhirbhartsitā nṛpa / garbhaghnī tvaṃ patighnī tvamiti darśaya mā mukham

हिन्दी अर्थ

लोकों में अनुरूप वर ढूंढ़ा किन्तु कहीं भी कोई उपयुक्त पात्र नहीं दिखाई पड़ा । तम धर्म ने बरदान से सिद्धि प्राप्त करने के लिए पुत्री से कहा--बेटी, अनुरूप पति प्राप्ति के लिए तपस्था करो। कन्या ने पिता की आज्ञा स्वीकार कर बन को गरमन किया और वहाँ जाकर परम कठोर तपस्या प्रारम्भ किया

English

Those meritorious persons who perform Sraddhas in Gaya will attain Brahmaloka. I will also always be considered worshipped by those who worship you."

अध्याय 225

श्लोक 5

ब्रह्मघ्नी याहि पापिष्ठे परित्यक्ता गृहाद्व्रज

brahmaghnī yāhi pāpiṣṭhe parityaktā gṛhādvraja

हिन्दी अर्थ

स्वेतकल्प में धर्मत्रता ने उक्त तपस्या के सद्भ में दस सहस्न युगों तक केवल वायु का आहार किया । ब्रह्मा के मानस पृत्र भरीचि परम विख्यात ऋषि थे । वे पृथ्वी का पय्यंटन करते हुए वहाँ आये और उक्त कन्या- ब्रह्मणो मानसः पुत्रों मरौचिर्नाम विश्रुतः । पर्यंटन्पूथिवीं सर्वा कन्यारत्नं ददर्श सः

English

The stomach of the Daitya is overlapped by the mountain Viraja, the righteous. Near the well that forms its

अध्याय 225

श्लोक 6

मार्कण्डेय उवाच: इति दुःखान्विता मूढा ताभ्यां निर्भर्त्सिता सती ।तनुं त्यक्तुं मनश्चक्रे प्राप्य तीर्थान्तरं क्वचित्

mārkaṇḍeya uvāca: iti duḥkhānvitā mūḍhā tābhyāṃ nirbhartsitā satī / tanuṃ tyaktuṃ manaścakre prāpya tīrthāntaraṃ kvacit

हिन्दी अर्थ

रूपयौवनसंपन्ना परमे तपसि स्थिताम् । पप्रच्छाथ मरीचिस्तां का त्वं कस्यासि तह॒द ८ रूपेणानेन मां भीरु विमोहयसि सुत्रते । ब्रह्मात्मजो5हं विख्यातों मरीचिबेंदपरागः ९ मरीचेव॑चन श्रुत्वा कन्या प्रोवाच तं सुनिम् । अहं धर्मत्रता नाम धमंपुत्नी तपोन्बिता

English

The story is repeated in N 44.16-18, A 36-38.

अध्याय 225

श्लोक 7

संपृच्छ्यमाना तीर्थानि ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिर ।श्रुत्वा पापहरं तीर्थं रेवासागरसङ्गमे

saṃpṛcchyamānā tīrthāni brāhmaṇebhyo yudhiṣṭhira / śrutvā pāpaharaṃ tīrthaṃ revāsāgarasaṅgame

हिन्दी अर्थ

पतिब्रतार्थ विप्रेन्द चरामि परम तपः। धर्मब्रतां मरीचिस्तामुवाच प्रीतिपुर्वकम् ३११ पतिब्रता वर्शनान्से भविष्यसि शुभव्रते । पतिग्रतेक्षया पृथ्वीं विचरासि ह्यह॒निशम् त्वं चेत्पतिब्रता जाता भजे त्वां भज माँ वरम् । लोके न त्वादृशी क्या मम तुल्यों न ते वरः

English

What is the origin of that slab whereby Gayasura was kept steady and submissive? What is its form? What is its greatness? Please mention its name.

अध्याय 225

श्लोक 8

तत्र पार्थ तपश्चक्रे निराहारा जितव्रता ।कृच्छ्रातिकृच्छ्रपाराकमहासांतपनादिभिः

tatra pārtha tapaścakre nirāhārā jitavratā / kṛcchrātikṛcchrapārākamahāsāṃtapanādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

धर्मश्नते धर्मपत्नी तस्मात्त्वं भव मेष्धुना । धर्मब्नता मुनि प्राह धर्म याचय सुत्नत

English

There was once a highly refulgent person named Dharma. He had mastered all sacred lore. His wife Visvarupa was devoted to the service of her husband.

अध्याय 225

श्लोक 9

चान्द्रायणैर्ब्रह्मकूर्चैः कर्शयामास वै तनुम् ।एवं वर्षशतं सार्द्धं व्यतीतं तपसा नृप

cāndrāyaṇairbrahmakūrcaiḥ karśayāmāsa vai tanum / evaṃ varṣaśataṃ sārddhaṃ vyatītaṃ tapasā nṛpa

हिन्दी अर्थ

तच्छ त्वा धर्ममगमन्मुनि धर्मो ददर्श ह। तेज:पुञ्ज वर नत्वा आसनार्ध्यादिना5चेंपत् १५ फिमर्थमागतः पृष्ठो मरीचिर्धममब्रवीत् । कन्यार्थ श्रमता पृथ्वीं दृष्टा ते कस्यका वबरा ॥ रतन का दर्शन किया उन्होंने देखा कि वह परम रूपबती एवं पूर्ण यौवना होते हुए भी घोर तपस्या में लीन है। ऋषिवर मरीचि ने कस्या से जिज्ञासा प्रकट की कि है कल्याणि ! तुम कौन हो ? किसकी पुत्री हो ?

English

A daughter of great qualities and endowed with all the auspicious characteristics like LaksmI was born of her to Dharma. She was the chaste girl named Dharmavrata.

अध्याय 225

श्लोक 10

तस्या विशुद्धिम् इच्छन्त्याः शिवध्यानार्चनादिभिः ।ततः कतिपयाहोभिस् तस्या ज्ञात्वा हठं परम् ।परितुष्टः शिवः प्राह पार्वत्या परिचोदितः

tasyā viśuddhim icchantyāḥ śivadhyānārcanādibhiḥ / tataḥ katipayāhobhis tasyā jñātvā haṭhaṃ param / parituṣṭaḥ śivaḥ prāha pārvatyā paricoditaḥ

हिन्दी अर्थ

सद्श्नवतपरायणे ! तुम अपनी मोंहक रूपराशि से हमारे चित्त को मुग्ष कर रही हो भीरू ! तुम डरो मत । मैं ब्रह्मा का पुत्र है, समस्त वेदों का सम्यक् अध्ययन एवं परिशीलत कर चुका हुँ, सारे संसार में लोग मुझे मरीचि नाम से जानते हैं। मरौचि के वचन को सुनकर कन्या ने कहा, मुनिवर ! मैं धर्म की पृत्री हूँ, मेया माम धर्मत्रता है। अनुरूप पति एवं पतिब्रतधर्म की प्राप्ति के लिये मैं यह कठोश तपस्या कर रही है ।

English

Whatever good qualities there are in the three worlds, were present in her. Dharma searched for a befitting bride¬ groom to Dharmavrata in all the three worlds, but in vain. Then he told her, "Perform a penance for the sake of attaining a bridegroom". She said, "So be it", and went to the forest.

अध्याय 225

श्लोक 11

ईश्वर उवाच: पुत्रि मा साहसं कार्षीः शुद्धदेहासि साम्प्रतम् ।तुष्टो ऽहं तपसा ते ऽद्य वरं वरय वाञ्छितम्

īśvara uvāca: putri mā sāhasaṃ kārṣīḥ śuddhadehāsi sāmpratam / tuṣṭo 'haṃ tapasā te 'dya varaṃ varaya vāñchitam

हिन्दी अर्थ

धमंत्रता की बातें सुनकर मुनिवर मरीचिं ने प्रेम पूवंक कहा, शुभन्नते ! मेरे दश्शन मात्र से तुम पतिब्रता हो । ओगी । केवल पतिकब्रता नारियों के देखने की इच्छा ही से मैं रात दिन प्रृथ्वी का पर्यटन करता हूँ ।६-१२। यदि तुम पवित्रता हो तो मुझे पतिरूप में अज्भी कार करो, मैं तुम्हें पत्नीडप में स्वीकार करता हँँ। इस लोक में न तो तुम्हारे समान कोई कम्या है और न मेरे समान कोई वर है घर्मत्रते! अब तुम हमारी धर्मंपत्नी हो जाओ । मुनिवर मरीचि की बातें सुनकर घमंत्रता ने कहा, सुत्रत आप इस विषय में हमारे पिता से याचना करें । धर्मत्रता के कथनानुस।र मरीचि धर्म के पास गये । धर्म ने परम तेजस्वी मरीचि मुति को देखकर आसन एवं अर्ध्यादि समपित कर मरीचि की पूजा की और पूछा कि मुनिवर्य ! आपका शुभागमन किस प्रयोजन द्वारा यहाँ हुआ ? मरीचि बोले, महानुभाव ! योग्य पत्नी के अन्वेषण के लिये समस्त भूमण्डल विचरण की

English

That girl performed a very severe penance which could not be performed by anyone. She subsisted only on the air and spent ten thousand Yugas in that Sveta Kalpa.

अध्याय 225

श्लोक 12

अलिकोवाच: यदि तुष्टो ऽसि देवेश वरार्हा यद्यहं मता ।नानापापाग्नितप्ताया देहि शुद्धिं परां मम

alikovāca: yadi tuṣṭo 'si deveśa varārhā yadyahaṃ matā / nānāpāpāgnitaptāyā dehi śuddhiṃ parāṃ mama

हिन्दी अर्थ

कामना से मैं घूम रहा था कि तुम्हारी परम सुन्दरी एवं धर्मेशोल कन्या धर्मत्रता दृष्टिगत हुई, तुम अपनी

English

During the course of his wandering over the earth, the mental son of Brahma, well known by the name of Marici, saw that jewel of a girl.

अध्याय 225

श्लोक 13

त्वं मे नाथो ह्यनाथायास्त्वमेव जगतां गुरुः ।दीनानाथसमुद्धर्ता शरण्यः सर्वदेहिनाम्

tvaṃ me nātho hyanāthāyāstvameva jagatāṃ guruḥ / dīnānāthasamuddhartā śaraṇyaḥ sarvadehinām

हिन्दी अर्थ

१०५६ वायुपुराणम् अर्ध्यादिना समभ्यच्य धर्म: प्रोचे तथेति तम् । धर्मंत्रतां समानीय दत्तवांस्तां मरीचये १७ रेमे मुनिस्तया साथे यथा विष्णु: श्षिया सह । पार्वेत्या च यथा शंभुः सरस्वत्या यथा हाजः

English

To that girl who was endowed with beauty and youth and who was engaged in the greatest penance, Marici asked, "Tell me who you are and to whom you belong.

अध्याय 225

श्लोक 14

ईश्वर उवाच: त्वं भद्रे शुद्धदेहासि मा किंचिद् अनुशोचिथाः ।स्वनाम्ना स्थापयित्वेह मां ततः स्वर्गमेष्यसि

īśvara uvāca: tvaṃ bhadre śuddhadehāsi mā kiṃcid anuśocithāḥ / svanāmnā sthāpayitveha māṃ tataḥ svargameṣyasi

हिन्दी अर्थ

जज्ञे पुत्रशतं तस्यां मरीचेविष्णुनोपमस् । मरीचिः फलपुष्पार्थ बन गत्वा समागतः (१२० +श्आान्तः कदाचित्ता पत्नीमुवाचेति पतिन्नताम् । भुकत्वा तु शयनस्थस्य पादसंबाहत कुद.

English

O timid lady, of excellent vows, you are a fascinating one by this beauty of yours. I am the son of Brahma, well- known as Marici. I have mastered the Vedas."

अध्याय 225

श्लोक 15

इत्युक्त्वा देवदेवेशस्तत्रैवान्तरधीयत ।अलिकापि ततो भक्त्या स्नात्वा संस्थाप्य शङ्करम्

ityuktvā devadeveśastatraivāntaradhīyata / alikāpi tato bhaktyā snātvā saṃsthāpya śaṅkaram

हिन्दी अर्थ

धर्मत्रता तथेत्युक्त्वा शयनस्थस्य सा सुने: । पादसंबाहनं चक्रे घृतेनाभ्यज्य तत्परा निद्रायमाणे5थ मुनौ ब्रह्मा तं देशमागतः । इयेष दृष्द्वा ब्रह्माणं मनसा5चंयितु प्रभुम्

English

On hearing the words of Marici, the girl replied to the sage, "I am the daughter of Dharma. My name is Dharma¬ vrata. I am endowed with penance.

अध्याय 225

श्लोक 16

दत्त्वा दानं च विप्रेभ्यो लोकमाप महोत्कटम् ।पितरं च समासाद्य मातरं च युधिष्ठिर

dattvā dānaṃ ca viprebhyo lokamāpa mahotkaṭam / pitaraṃ ca samāsādya mātaraṃ ca yudhiṣṭhira

हिन्दी अर्थ

कन्या मुझे दे दो. तुम्हारा परम कल्याण होगा ।१३-१६। मुनि की बातें सुन धर्म ने अर्ध्यादि से पुनः पूजन किया और उनके प्रस्ताव का अनुमोदन किया । वन प्रान्त से धमंत्रता को अपने निवास पर लाकर विधिपूर्वक विवाह कर्म सम्पन्न करके मरीचि को समपित किया । उस मद्भुल काये के उपलक्ष्य में ब्राह्मणों को घन रत्नादि भी समर्पित किये । मरीचि के कथनातुसार सब काये धर्म ने सम्पादित कर दिया, इसके लिये उन्होंने वरदान

English

O leading Brahmana, I am performing this great penance for the wooing of a good husband". Marici thereupon spoke to Dharmavrata lovingly:

अध्याय 225

श्लोक 17

तैश्च संमानिता प्रीत्या बन्धुभिः सालिका ततः ।विमानवरमारूढा दिव्यमालान्विता नृप

taiśca saṃmānitā prītyā bandhubhiḥ sālikā tataḥ / vimānavaramārūḍhā divyamālānvitā nṛpa

हिन्दी अर्थ

दिया । तदन्‍्तर मरीचि अपनी नव विवाहिता धर्म पत्नीं घमंत्रता को अग्निहोत्रादि वेवाहिक धामिक विधियों का विधिवत् अनुष्ठान कर अपने आश्रम में ले गये और वहाँ उसके साथ इस प्रकार आनन्दोपभोग किया जिस प्रकार भगवान् विष्णु लक्ष्मी के साथ, शम्भु पावंती के साथ तथा अजन्मा ब्रह्मा सरस्बती के साथ करते हैं धर्मत्रता के संयोग से मरीचि के भगवान् विष्णु के समान परम तेजस्वी एवं प्रभावशाली सौ पुत्र उत्पन्न हुए । एक बःर कभी फलपुष्पादि लासे के लिये मुनिवर वन को गये थे ओर बहाँ से लोटकर बहुत थक गये थे, भोजनोपरान्त अपनी पतित्रता पत्नी घमंब्रता से उन्होंने कहा कि प्रिये ! मैं शय्या पर लेट गया हें, मेरा पर दबा दो । धर्मत्रता ने आज्ञा अज्भीकार कर दाय्या पर लेटे हुए मुनिवर मरीबि का पाद संवाहन प्रारम्भ कर दिया । सर्वप्रथम घत लगाकर वह तन्मयता पूवंक पैर दबाने लगी, थोड़ी हो देर में जब मुनि

English

"O woman of auspicious rites, by merely looking at me, you will become a great chaste lady. I am roaming day and night on the earth, only with a desire to meet with a chaste lady.

अध्याय 225

श्लोक 18

गौरीलोकमनुप्राप्तसखित्वे ऽद्यापि मोदते ।ततः प्रभृति तत्पार्थ विख्यातम् अलिकेश्वरम्

gaurīlokamanuprāptasakhitve 'dyāpi modate / tataḥ prabhṛti tatpārtha vikhyātam alikeśvaram

हिन्दी अर्थ

को नींद लग गई, पितामह ब्रह्मा जी उस स्थान पर पधारे ।!७-२२३। समुपस्थित ब्रह्मा को देखकर साध्वी धमंत्रता ने मन में प्रभुव्थ की अचंना करने का संकल्प किया, किन्तु उसके मन में वितक हुआ कि ऐसी अवस्था में जब कि पतिदेव बहुत ही थके हुये हैं, मुझे क्या उचित है, में पतिदेव का पाद संवाहन करती रहें !

English

If you have become a Pativrata, I shall resort to you Come unto me.as your bridegroom. There is no other girl in the world like you, and you will never have another bride- groom equal to me.

अध्याय 225

श्लोक 19

तत्र तीर्थे तु या नारी पुरुषो वा युधिष्ठिर ।स्नात्वा सम्पूजयेद्भक्त्या महादेवमुमायुतम्

tatra tīrthe tu yā nārī puruṣo vā yudhiṣṭhira / snātvā sampūjayedbhaktyā mahādevamumāyutam

हिन्दी अर्थ

+इदमध नास्ति क. पुस्तके । +-इत आरभ्य मुनेरित्यन्तं नास्ति ख, पुस्तके । » नास्तीदमर्ध ख. पृस्तके । अध्यंपाद्यादिक दत्तवा ब्रह्माणं समपुजयत् । सत्कृतायां तु शब्यायां (वश्चाममकरोदजः २५ एतस्मिन्नन्तरे भर्ता समुत्तस्थो स्वतल्पतः । धर्मत्रतामपश्यन्स विध्रः क़ुद्ध/ शशाप ताम् २६ पादसंवाहन त्यक्त्वा यस्मादाज्ञां विहाय मे । गताउन्यन्न ततः पापाच्छापदर्धा शिला भव.

English

Hence O Dharmavrata, be my lawfully wedded wife now". Dharmavrata thereupon told the sage, "O sage of good rites, request Dharma (for my hand)."

अध्याय 225

श्लोक 20

स पापैर्विविधैर्मुक्तो लोकमाप्नोति शांकरम् ।मानसं वाचिकं पापं कायिकं यत्पुरा कृतम्

sa pāpairvividhairmukto lokamāpnoti śāṃkaram / mānasaṃ vācikaṃ pāpaṃ kāyikaṃ yatpurā kṛtam

हिन्दी अर्थ

भर्ता धमंत्रता शप्ता मरीचि प्राह सा रुषा। शयाने त्वयि संप्राप्ते ब्रह्मा त्वज्जनको गुरुः २८ त्वयोत्थाय हि कतंव्यं स्वगुरो: पूजन सदा । सया तु ध्म चारिण्या तब कार्य कते मुने ॥२ ६

English

On hearing those words, he went to Dharma. Dhanna saw the (prospective) bridegroom like a mass of refulgence. He bowed to him and honoured him with the offer of seat and materials of worship.

अध्याय 225

श्लोक 21

सर्वं तद्विलयं याति भोजयित्वा द्विजान्सदा ।दीपं दत्त्वा च देवाग्रे न रोगैः परिभूयते

sarvaṃ tadvilayaṃ yāti bhojayitvā dvijānsadā / dīpaṃ dattvā ca devāgre na rogaiḥ paribhūyate

हिन्दी अर्थ

अदोषा5हं यतः शप्ता तस्माच्छापं ददामि ते। त्वं च शापं महादेवाउदूतें: प्राप्स्थस्यसंशयमू +व्याकुलं त॑ं पति दुष्ट्वा व्याकुला5गात्प्रजापतिम् । नत्वा शयान ब्रह्माणमग्नि प्रज्ञाल्य चेन्धनः ॥ गाहेपत्ये स्थिता चक्के तपः परमदुष्करम् ।॥ तथा शप्तो मरीचिश््व तपस्तेपे सुदारुणम् ॥३ २

English

On being asked "Why have you come?" Marici replied to Dharma, "While roaming over the whole earth for the sake of a (marriageable) girl, your excellent daughter has been seen by me. Give that daughter unto me. You will have welfare resulting therefrom." After honouring him with Arghya etc., Dharma said to him, "So be it". He brought Dharmavrata there and gave her to Marici.

अध्याय 225

श्लोक 22

धूपपात्रं विमानं च घण्टां कलशमेव च ।दत्त्वा देवाय राजेन्द्र शाक्रं लोकमवाप्नुयात्

dhūpapātraṃ vimānaṃ ca ghaṇṭāṃ kalaśameva ca / dattvā devāya rājendra śākraṃ lokamavāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

या जगत् पूज्य ब्रह्मदेव को पूजा सम्पन्न करूँ ? ऐसा विचार मन में उठते न उठते ही वह आकुल चित्त होकर उठ खड़ी हुई कि ब्रह्मा जगद्गुरु हैं, उनकी पूजा परमावश्यक है। वहाँ से उठकर उसने अध्य पाद्यादि समर्पित कर ब्रह्मा की विविधत् पूजा की विधिपृर्वंक सत्कार किये जाने पर अज ब्रह्मा जी (एक दूसरी) शय्या पर विश्राम करने लगे ।३३०२४५। दुर्भाग्यवश इसी बीच में पतिदेव की आँखे खुल गई।

English

He granted him boons as well. He fulfilled the promise made. The Brahmana (Marici) took her to his hermitage along with Agnihotra (sacred fire).

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

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