Vayu Purana
137
अध्याय 137 / 232

Adhyaya 137

8 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ8 श्लोक

अध्याय 137

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे अहल्यातीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम षट्त्रिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १३७ मार्कण्डेय उवाच: धर्मपुत्र ततो गच्छेत् कर्कटेश्वरमुत्तमम् ।उत्तरे नर्मदाकूले सर्वपापक्षयंकरम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe ahalyātīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma ṣaṭtriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 137 mārkaṇḍeya uvāca: dharmaputra tato gacchet karkaṭeśvaramuttamam / uttare narmadākūle sarvapāpakṣayaṃkaram

हिन्दी अर्थ

के कारण मनु मन्वन्तर के अधीशवर हैं ।४६-४९। और मन्वन्तर के आदिम काल में वे सब प्रक्कार के श्राद्धों का प्रवर्तन करते हैं । द्विजबयंवृल्द, समस्त पितरों का वर्णन क्रमशः आप लोगों को सुना चुका । इन सब कारणों से मनुष्य को इस लोक में आकर अपने धमं के अनुसार श्रद्धापूवंक श्राद्धादि कम करने चाहिए, इन सत्र में

English

On the New Moon day, the Sraddha materials should be placed in the pit in the ground four Angulas square. These rituals are called Trih-sapla-yajna (Three-times seven Yajiia). All the three worlds are sustained by them.

अध्याय 137

श्लोक 2

तत्र स्नात्वा विधानेन यस्तु पूजयते शिवम् ।अनिवर्तिका गतिस्तस्य रुद्रलोकाद् असंशयम्

tatra snātvā vidhānena yastu pūjayate śivam / anivartikā gatistasya rudralokād asaṃśayam

हिन्दी अर्थ

चक्र हक चायुपुराणम् जे छदगायन चाग्नो च॑ अश्वमेंघं तदाप्नुयात् । पितुन्प्रीणाति वे भकत्या पितरः प्रीणयन्सि तमू

English

He will attain nourishment, prosperity, longevity and progeny. Various types of fortune will resort to him and he will gradually attain liberation (from Samsara).

अध्याय 137

श्लोक 3

तस्य तीर्थस्य माहात्म्यं पुराणे यच्छ्रुतं मया ।न तद्वर्णयितुं शक्यं संक्षेपेण वदाम्यतः

tasya tīrthasya māhātmyaṃ purāṇe yacchrutaṃ mayā / na tadvarṇayituṃ śakyaṃ saṃkṣepeṇa vadāmyataḥ

हिन्दी अर्थ

पितरः पुष्टिकामस्य प्रजाकामस्य वां पुनः पुष्टि प्रजां व स्थर्ग व प्रयच्छन्ति स संशय: ५४ देवकार्यादपि सदा पितृकायें विशिष्यते + देवताभ्य: पितृणां हि पु्वंसाप्यायमं स्मतुतमू॒...

English

It removes sins. It sanctifies. It has the same fruit as a horse-sacrifice. I shall mention that Mantra composed by Brahma. It is the Amrla (immortal or nectarine) and it is honoured and worshipped by Brahmanas and grants (the fruit of) Asvamedha.

अध्याय 137

श्लोक 4

तत्र तीर्थे तु यः कुर्यात्किंचित्कर्म शुभाशुभम् ।हर्षान् मदान् महाराज तत्सर्वं जायते ऽक्षयम्

tatra tīrthe tu yaḥ kuryātkiṃcitkarma śubhāśubham / harṣān madān mahārāja tatsarvaṃ jāyate 'kṣayam

हिन्दी अर्थ

इत्येते पितरश्चेव्र लोका दुहितरश्व ब। दोहिन्रा यजमानाश्र प्रोक्ता ये भावयन्ति तानू. .... . चत्वारों मुतिमन्तश्र त्रथस्तेषामसूर्तेयः + तेभ्यः भाद्धानि सत्कृत्य देवा; कुवेल्ति यत्ततः -

English

The Mantra: "Obeisance to all the deities, to Pitrs, to the great Yogins, to Svadha. Obeisance for ever to Svaha.". 1

अध्याय 137

श्लोक 5

तत्र तीर्थे तपस्तप्त्वा वालखिल्या मरीचयः ।रमन्ते ऽद्यापि लोकेषु स्वेच्छया कुरुनन्दन

tatra tīrthe tapastaptvā vālakhilyā marīcayaḥ / ramante 'dyāpi lokeṣu svecchayā kurunandana

हिन्दी अर्थ

अक्ता: प्राज्जजय: सर्वे सेन््रास्तदृगतमान्सा: । विश्वे च सिकताश्चेव पृश्निजा: शूद्धिन (ण)स्तथा ॥ : कृष्णा: श्वेतास्त्वजाश्येब्र विधिवत्युजयन्त्युत । प्रजएता वातरशना दिवाकीरत्यास्तथव व.

English

At the beginning and the conclusion of the Sraddha, this Mantra shall always be repeated three times. The devotee shall repeat tins with purity of mind, when he offers the balls of rice also. Pitrs arrive quickly and Raksasas flee.

अध्याय 137

श्लोक 6

तत्रस्थास्तन्न जानन्ति नराज्ञानबहिष्कृताः ।शरीरस्थम् इवात्मानम् अक्षयं ज्योतिख्ययम्

tatrasthāstanna jānanti narājñānabahiṣkṛtāḥ / śarīrastham ivātmānam akṣayaṃ jyotikhyayam

हिन्दी अर्थ

लेखाश्र मस्तश्चव ब्रह्माद्याश्न विदोकसः अभिष्ृग्वद्धिराद्याश्व ऋषयः सर्वे एव च ॥१६ ३ यक्षा नागा: सुपर्गाश्च किनरा राक्षस: सह 4 पितृ स्त्व॒पुजयन्सर्वे तित्यमेव फलाथिमः: .... कि डे तर - ह ध्ा है 7 टू ले “ : ््ीऑ ृऔघृ 2€ल्‍छ ी यू ७0 री उरी रऊरउ2/॒॑ ३ ३ऑ२28क्‍ ८ ----+- हा येक॑ या प.+५०५ ० - है जा 4 ३. ; नि हि डर

English

' Regularly repeated at the time of Sraddha by expoun¬ ders of Brahman, this Mantra enables Pitrs to cross (hell) in the three worlds.

अध्याय 137

श्लोक 7

तत्र तीर्थे नृपश्रेष्ठ देवी नारायणी पुरा ।अद्यापि तपते घोरं तपो यावत्किलार्बुदम्

tatra tīrthe nṛpaśreṣṭha devī nārāyaṇī purā / adyāpi tapate ghoraṃ tapo yāvatkilārbudam

हिन्दी अर्थ

चाँदी के बने हुये अथवा मिश्रित चाँदी के बने हुये पात्रों में रखकर पितरों के उद्देश्य से पुरोहित को दी गई स्वधा पितरों को. प्रसन्न करती है। सोम, अग्नि एवं सूम्रपुत्र मनु को स्वधादि से खूब सच्तुष्ट करके तथा सुथ के उत्तटस्तयण़ के अवसर पर अग्नि .में हव॒नादि करके अश्वमेध के फल की प्राप्ति होती है। जो भक्ति पूवेक पितरों को- भ्राद्धादि से प्रश्नन्न करता है, .उसे पितरगण भी, सन्तुष्ठ एवं प्रसन्न करते हैं ।५०-५३। पुष्टि (वृद्धि)

English

I shall mention the Mantra Saptarcis that is auspicious and that bestows all desires. By repeating it regularly, Pitrs are propitiated. 6 1 1 The Saptarcis 1 Mantra: "I always make obeisance to those who are engaged in meditation by means of the yogic

अध्याय 137

श्लोक 8

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा तर्पयेत् पितृदेवताः ।तस्य ते द्वादशाब्दानि तृप्तिं यान्ति पितामहाः

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā tarpayet pitṛdevatāḥ / tasya te dvādaśābdāni tṛptiṃ yānti pitāmahāḥ

हिन्दी अर्थ

क्षयवा प्रजा (पुत्र पौत्रादि) की कामना करनेवालों के पितरगण पुष्टि, प्रजा एवं स्वर्ग को प्रदान करते हैं, इसमें सन्देह नहीं । पितरों के उद्देश से किसे ,ज़ाने वाले श्राद्भधादि क्रार्य, देवताओं के उद्देर्य से किये जानेवःले यज्ञाद़ि कार्यों से भी अधिक फलदायी हैं 4 देवज्नाओं से.पहिले पितरों को सन्‍्तुष्ट करना चाहिए--ऐसा प्रसिद्ध है । पितरों की यह सूक्ष्म योग गति और तृप्ति मांस के नेत्र, से नहीं देश्ली जा सकती, तपस्या द्वास विशेष सिद्धि प्राप्त करने प्र ही: उनकी इस गति एवं तृप्ति का दर्शन हो सकता है।. इन.उपचुेक्त पितरगणों, - उनके लोक, उनकी कथाएँ, उनके दोहित्र, उनके बजमात्त एवं उनकी; भावना करने वाले सब. का ;वर्णन कर चुका । इन

English

I bow to the Seven Sages and Pitrs who fulHl all desires and who are the progenitors of Indra and other (Dcvas) and of Bhrgu and Marlca (Kasyapa).

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।