Vayu Purana
117
अध्याय 117 / 232

Adhyaya 117

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 117

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे पाण्डुतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम षोडशाधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ११७ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र पुण्यं तीर्थं त्रिलोचनम् ।तत्र तिष्ठति देवेशः सर्वलोकनमस्कृतः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe pāṇḍutīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma ṣoḍaśādhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 117 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchettu rājendra puṇyaṃ tīrthaṃ trilocanam / tatra tiṣṭhati deveśaḥ sarvalokanamaskṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

रात में तृम दोनों बहुत बलवान् हो जाओगे और दिन भर सोते रहोगे । अब से माता की दोनों मिलकर रक्षा करो और धर्म की मर्यादा का पालन करो, धर्म का अनुशासन मानो ।” पुत्रों से ऐसी बातें कर कश्यप जी वहीं पर अन्तहित हो गये ।! ०३-१०६। पिता के चले जाने पर स्वभाव से ही दारुण प्रकृति वाले उन दोनों महांवीरों ने प्राणियों की हिंसा में तत्पर रह कर कुत्सित एवं अखाद्य वस्तुओं का भोजन करना श्रारम्भ किया और पिता

English

There are many terrible Bhutas having the same traits as their mother Putana. They harass children in the human world like the evil planets, causing dejectedness.

अध्याय 117

श्लोक 2

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा भक्त्यार्चयति शङ्करम् ।रुद्रस्य भवनं याति मृतो नास्त्यत्र संशयः

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā bhaktyārcayati śaṅkaram / rudrasya bhavanaṃ yāti mṛto nāstyatra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

ने जिस प्रकार धर्म के अनुशासन में रहकर जीवन यापन का उपदेश किया था दौक उसके विपरीत आचरण करना प्रारम्भ किया। वे दोनों महाबलवान थे, महान् पराक्रमी थे, उनके शरीर विशाल थे, कठिनाई से उन्हे कोई अपने वह्य में कर सकता था, इतने मायावी थे कि एक क्षण यदि दिखाई पड्ठते थे तो दूसरे ही क्षण अन्तंधान भी हो जाते थे । स्वभाव से ही क्रूर प्रकृति वाले वे भीषण आकृति से युक्त तथा इच्छानुसार स्वरूप धारण करने वाले थे, अपने भीषण आकार के अनुरूप आहार भी उनका बहुत अधिक और भीषण था। देवताओं, असुरों, ऋषियों, गैन्धवों, किन्नरों, पिशाचों, मनुष्यों, सर्पों, पक्षियों और पशुओं को खाने के लिये वे जहाँ कहीं पाते थे पकड़ने की इच्छा करते थे। इस प्रकार एक बार उन निशाचरों ने खाने के लिये इन्द्र को पकड़ा, और उनको न मारकर दो वरदान प्राप्त किया ।१०७-१११। कभी एक बार यक्ष खोजते

English

There are hundreds of the groups of these evil (Raksasas) like the deceitful types of Skandagrahas and Bhutas named Pu tanas, lakhs and lakhs of them roaming about in

अध्याय 117

श्लोक 3

कल्पक्षये ततः पूर्णे क्रीडित्वा च इहागतः ।आवियोगेन तिष्ठेत पूज्यमानः शतं समाः

kalpakṣaye tataḥ pūrṇe krīḍitvā ca ihāgataḥ / āviyogena tiṣṭheta pūjyamānaḥ śataṃ samāḥ

हिन्दी अर्थ

समय रात में अकेले थोड़ी देर तक घुमता रहा कुछ देर के बाद उसे शब्द सुनाई पड़े और वहू उस शब्द के पीछे-पीछे चला । आगे चलकर उसने दो प्रचण्ड जानू वाले पिशाचों को देखा, जो पीली आँखों वाले थे, जिनके रोम ऊपर की ओर खड़े थे आखें गोलाकार थीं, और देखने में परम भयानक लग रहे थे । वे रक्त मांस और चर्वी का आहार करते थे, मनुष्यों को खा जाते थे। उन महाबलवानों के साथ दो कन्यायें थीं। वे कन्यायें

English

There are Yaksas called Punyajanas and others called Guhyakas. There are still others called Devajanas. All these are included in the group of Guhyakas. There are Raksa¬ sas called Agastyas, Paulastyas and Visvamitras. The great king Kubera, the ruler of Alaka, is the king of all these Yaksas and Raksasas including Paulastyas and Agastyas.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।