Ravana Samhita
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अध्याय 15 / 19

Upadesa-Sara — The Final Distillation

उपदेशसार

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 15

श्लोक 1

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः

sarvadharmān parityajya māmekaṃ śaraṇaṃ vraja | ahaṃ tvāṃ sarvapāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ

हिन्दी अर्थ

सभी धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त करूँगा — शोक मत करो।

English

Abandoning all dharmas, take refuge in me alone. I will liberate you from all sins — do not grieve.

अध्याय 15

श्लोक 22

विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय ।खलस्य साधोर्विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय

vidyā vivādāya dhanaṃ madāya śaktiḥ pareṣāṃ paripīḍanāya | khilasya sādhorviparītametat jñānāya dānāya ca rakṣaṇāya

हिन्दी अर्थ

दुष्ट के लिए: विद्या विवाद के लिए, धन मद के लिए, शक्ति दूसरों को पीड़ित करने के लिए। साधु के लिए: इसका विपरीत — ज्ञान के लिए, दान के लिए, रक्षा के लिए।

English

For the wicked: knowledge leads to argument, wealth to arrogance, power to oppression of others. For the noble: the very opposite — knowledge for wisdom, wealth for giving, power for protection.

अध्याय 15

श्लोक 40

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः

yatra nāryastu pūjyante ramante tatra devatāḥ | yatraitāstu na pūjyante sarvāstatrāphalāḥ kriyāḥ

हिन्दी अर्थ

जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता प्रसन्न होते हैं। जहाँ उनका सम्मान नहीं, वहाँ सभी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं।

English

Where women are honoured and respected, the gods rejoice. Where they are not honoured, all actions become fruitless.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/ · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।