Harivamsha Purana
93
अध्याय 93 / 318

Parva 2, Adhyāya 38

65 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ65 श्लोक

अध्याय 93

श्लोक 1

विकद्रुणा यदोः सन्ततिवर्णनम्, जरासन्धस्य आक्रमणानि सोढुं मथुरापुरी न समर्था इति कथनं स तासु नागकन्यासु कालेन महता नृपः ।जनयामास विक्रान्तान् पञ्च पुत्रान् कुलोद्वहान्

vikadruṇā yadoḥ santativarṇanam, jarāsandhasya ākramaṇāni soḍhuṃ mathurāpurī na samarthā iti kathanaṃ sa tāsu nāgakanyāsu kālena mahatā nṛpaḥ | janayāmāsa vikrāntān pañca putrān kulodvahān

हिन्दी अर्थ

बैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! यदुने दीर्घकालके [श्वात्‌ उन पाँचों नागकन्याओंके गर्भसे पाँच पराक्रमी एवं कुलका भार बहन करनेमें समर्थ पुत्र उत्पन्न किये

अध्याय 93

श्लोक 2

मुचुकुन्दं महाबाहुं पद्मवर्णं तथैव च ।माधवं सारसं चैव हरितं चैव पार्थिवम्

mucukundaṃ mahābāhuṃ padmavarṇaṃ tathaiva ca | mādhavaṃ sārasaṃ caiva haritaṃ caiva pārthivam

हिन्दी अर्थ

इनके नाम इस प्रकार हैं—महाबाहु मुचुकुन्द, पद्मवर्ण, माधव, सारस तथा राजा हरित

अध्याय 93

श्लोक 3

एतान् पञ्चसुतान्राजा पञ्चभूतोपमान् भुवि ।ईक्षमाणो नृपः प्रीतिं जगामातुलविक्रमः

etān pañcasutānrājā pañcabhūtopamān bhuvi | īkṣamāṇo nṛpaḥ prītiṃ jagāmātulavikramaḥ

हिन्दी अर्थ

ये पाँचों पुत्र भूतलपर आँच भूतोंके समान थे। अतुल पराक्रमी राजा यदु इन्हें देखकर बहुत प्रसन्न होते थे

अध्याय 93

श्लोक 4

ते प्राप्तवयसः सर्वे स्थिताः पञ्च यथाद्रयः ।तेजिता बलदर्पाभ्यामूचुः पितरमग्रतः

te prāptavayasaḥ sarve sthitāḥ pañca yathādrayaḥ | tejitā baladarpābhyāmūcuḥ pitaramagrataḥ

हिन्दी अर्थ

जब वे वयस्क हुए, तब पाँच पर्वतोंके समान प्रतीत होने लगे । एक दिन अपने तल और दर्पसे प्रोत्साहित होकर वे अपने पिताके सामने बड़े हो इस प्रकार बोले-

अध्याय 93

श्लोक 5

तात युक्ताः स्म वयसा बले महति संस्थिताः ।क्षिप्रमाज्ञप्तुमिच्छामः किं कुर्मस्तव शासनात्

tāta yuktāḥ sma vayasā bale mahati saṃsthitāḥ | kṣipramājñaptumicchāmaḥ kiṃ kurmastava śāsanāt

हिन्दी अर्थ

तात! अब हम बड़ी अवस्थाके हो गये, महान्‌ बलमें हमारी स्थिति है (हम पहानू बलवान्‌ हैं ); अत: शीघ्र आपकी आज्ञा चाहते हैं, बताइये, आपके आदेशसे हम कौन-सा कार्य करें ?'

अध्याय 93

श्लोक 6

स तान् नृपतिशार्दूलः शार्दूलानिव वैगितान् ।प्रीत्या परमया प्राह सुतान् वीर्यकुतूहलात्

sa tān nṛpatiśārdūlaḥ śārdūlāniva vaigitān | prītyā paramayā prāha sutān vīryakutūhalāt

हिन्दी अर्थ

नरेशोंमें सिंहके समान पराक्रमी यदुने सिंहोंके ही सदृश वेगशाली अपने उन पुत्रोंसे उनके बल-पराक्रमको जाननेकी उत्सुकतासे अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक कहा—

अध्याय 93

श्लोक 7

विन्ध्यर्क्षवन्तावभितो द्वे पुर्यौ पर्वताश्रये ।निवेशयतु यत्नेन मुचुकुन्दः सुतो मम

vindhyarkṣavantāvabhito dve puryau parvatāśraye | niveśayatu yatnena mucukundaḥ suto mama

हिन्दी अर्थ

मेरा पुत्र मुचुकुन्द विन्ध्य और ऋक्षवान्‌ पर्वतोंके निकट पर्वतीय भूमिका ही आश्रय ले यल्नपूर्वक दो पुरियाँ बसाये

अध्याय 93

श्लोक 8

सह्यस्य चोपरिष्टात्तु दक्षिणां दिशमाश्रितः ।पद्मवर्णोऽपि मे पुत्रो निवेशयतु मा चिरम्

sahyasya copariṣṭāttu dakṣiṇāṃ diśamāśritaḥ | padmavarṇo'pi me putro niveśayatu mā ciram

हिन्दी अर्थ

मेरा बेटा पद्मवर्ण भी दक्षिण दिशाका आश्रय ले सह्पर्वतके शिखरपर शीघ्र एक नगर बसाये

अध्याय 93

श्लोक 9

तत्रैव परतः कान्ते देशे चम्पकभूषिते ।सारसो मे पुरं रम्यं निवेशयतु पुत्रकः

tatraiva parataḥ kānte deśe campakabhūṣite | sāraso me puraṃ ramyaṃ niveśayatu putrakaḥ

हिन्दी अर्थ

वहीं पश्चिम दिशाकी ओर चम्पाके वृक्षोंसे सुशोभित मनोरम प्रदेशमें बेटा सारस एक रमणीय राजधानीकी स्थापना करे

अध्याय 93

श्लोक 10

हरितोऽयं महाबाहुः सागरे हरितोदके ।दीपं पन्नगराजस्य सुतो मे पालयिष्यति

harito'yaṃ mahābāhuḥ sāgare haritodake | dīpaṃ pannagarājasya suto me pālayiṣyati

हिन्दी अर्थ

मेरा पुत्र यह महाबाहु हरित हरे जलसे भरे हुए समुद्रमें नागराज धूम्रवर्णके द्वीपका पालन करेगा

अध्याय 93

श्लोक 11

माधवो मे महाबाहुर्ज्येष्ठपुत्रश्च धर्मवित् ।यौवराज्येन संयुक्तः स्वपुरं पालयिष्यति

mādhavo me mahābāhurjyeṣṭhaputraśca dharmavit | yauvarājyena saṃyuktaḥ svapuraṃ pālayiṣyati

हिन्दी अर्थ

मेरा पाँचवाँ पुत्र महाबाहु माधव ज्येष्ठ तथा धर्मज्न है, यह युवराज होकर अपने इसी नगरका (जो वतके समीप है) पालन करेगा

अध्याय 93

श्लोक 12

सर्वे नृपश्रियं प्राप्ता अभिषिक्ताः सचामराः ।पित्रानुशिष्टाश्चत्वारो लोकपालोपमा नृपाः

sarve nṛpaśriyaṃ prāptā abhiṣiktāḥ sacāmarāḥ | pitrānuśiṣṭāścatvāro lokapālopamā nṛpāḥ

श्लोक 12–13 का हिन्दी अर्थ

उन सबको राज्यलक्ष्मी प्राप्त हुई । सबका विभिन्न राज्योंपर अभिषेक हुआ तथा सभी छत्र-चामर आदि राजोचित चिह्नोंसे अलंकृत हुए। तत्पश्चातू पिताकी आज्ञा पाकर लोकपालोंके प्रमान वे चारों नृपश्रेष्ठ राजकुमार अपने-अपने घरमें ये। फिर उन्होंने क्रमश: सुरम्य राजधानी बनानेके लिये स्थानकी खोज प्रारम्भ की

अध्याय 93

श्लोक 13

स्वं स्वं निवेशनं सर्वे भेजिरे नृपसत्तमाः ।पुरस्थानानि रम्याणि मृगयन्तो यथाक्रमम्

svaṃ svaṃ niveśanaṃ sarve bhejire nṛpasattamāḥ | purasthānāni ramyāṇi mṛgayanto yathākramam

अर्थ श्लोक 12 के साथ

अध्याय 93

श्लोक 14

मुचुकुन्दश्च राजर्षिर्विन्ध्यमध्यमरोचयत् ।स्वस्थानं नर्मदातीरे दारुणोपलसङ्कटे

mucukundaśca rājarṣirvindhyamadhyamarocayat | svasthānaṃ narmadātīre dāruṇopalasaṅkaṭe

हिन्दी अर्थ

राजर्षि मुचुकुन्दने विन्ध्यपर्वतके मध्यवर्ती स्थानको पसंद किया। उन्होंने विषम प्रस्तरखण्डोंसे भरे हुए दुर्गम नर्मदातटपर अपना स्थान बनाया

अध्याय 93

श्लोक 15

स च तं शोधयामास विविक्तं च चकार ह ।सेतुं चैव समं चक्रे परिखाश्चामितोदकाः

sa ca taṃ śodhayāmāsa viviktaṃ ca cakāra ha | setuṃ caiva samaṃ cakre parikhāścāmitodakāḥ

हिन्दी अर्थ

उन्होंने उस स्थानका शोधन किया भर उसे एकान्त एवं पवित्र बनाया । सम सेतुका निर्माण केया और अथाह जलसे भरी हुई खाइयाँ खुदवायीं

अध्याय 93

श्लोक 16

स्थापयामास भागेषु देवतायतनान्यपि ।रथ्या वीथीर्नृणां मार्गाश्चत्वराणि वनानि च

sthāpayāmāsa bhāgeṣu devatāyatanānyapi | rathyā vīthīrnṛṇāṃ mārgāścatvarāṇi vanāni ca

हिन्दी अर्थ

गगरके विभिन्न भागोंमें बहुत-से देवमन्दिर भी स्थापित केये। सड़कें, गलियाँ, जनसाधारणके मार्ग तथा चौराहे बनवाये और वन भी लगवाये

अध्याय 93

श्लोक 17

स तां पुरीं धनवतीं पुरुहूतपुरीप्रभाम् ।नातिदीर्घेण कालेन चकार नृपसत्तमः

sa tāṃ purīṃ dhanavatīṃ puruhūtapurīprabhām | nātidīrgheṇa kālena cakāra nṛpasattamaḥ

हिन्दी अर्थ

उन नृपश्रेष्ठ मुचुकुन्दने उस पुरीको थोड़े ही दिनोंमें धन-धान्यसे सम्पन्न करके न्द्रपुरीके समान प्रकाशित एवं सुशोभित कर दिया

अध्याय 93

श्लोक 18

नाम चास्याः शुभं चक्रे निर्मितं स्वेन तेजसा ।तस्याः पुर्या नृपश्रेष्ठो देवश्रेष्ठपराक्रमः

nāma cāsyāḥ śubhaṃ cakre nirmitaṃ svena tejasā | tasyāḥ puryā nṛpaśreṣṭho devaśreṣṭhaparākramaḥ

हिन्दी अर्थ

रैवताओंके समान श्रेष्ठ पराक्रमी नृपवर मुचुकुन्दने इस पुरीका अपने ही तेजसे निर्मित शुभ सुन्दर नाम खा—

अध्याय 93

श्लोक 19

महाश्मसङ्घातवती यथेयं विन्ध्यसानुगा ।माहिष्मती नाम पुरी प्रकाशमुपयास्यति

mahāśmasaṅghātavatī yatheyaṃ vindhyasānugā | māhiṣmatī nāma purī prakāśamupayāsyati

हिन्दी अर्थ

विन्ध्य-गिरिके शिखरपर बसी हुई यह गगरी महान्‌ अश्मसंघात (प्रस्तरसमूह )-से युक्त है, सलिये संसारमें *माहिष्मतीपुरी' के नामसे विख्यात होगी

अध्याय 93

श्लोक 20

उभयोर्विन्ध्ययोः पादे नगयोस्तां महापुरीम् ।मध्ये निवेशयामास श्रिया परमया वृताम्

ubhayorvindhyayoḥ pāde nagayostāṃ mahāpurīm | madhye niveśayāmāsa śriyā paramayā vṛtām

हिन्दी अर्थ

राजा मुचुकुन्दने उत्तम शोभा-सम्पत्तिसे पम्पन्न उस महापुरीको दोनों विन्ध्य-पर्वतोंके बीचमें साया था

अध्याय 93

श्लोक 21

पुरिकां नाम धर्मात्मा पुरीं देवपुरीप्रभाम् ।उद्यानशतसम्बाधां समृद्धापणचत्वराम्

purikāṃ nāma dharmātmā purīṃ devapurīprabhām | udyānaśatasambādhāṃ samṛddhāpaṇacatvarām

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ उन धर्मात्मा नरेशने एक पुरिका' नामवाली पुरी बसायी, जो देवपुरीके समान [काशित होती थी। उसके भीतर सैकड़ों उद्यान बने थे था वैभवपूर्ण हाट-बाजार और चौराहे भी उसकी शोभा ढ़ाते थे

अध्याय 93

श्लोक 22

ऋक्षवन्तं समभितस्तीरे तत्र निरामये ।निर्मिता सा पुरी राज्ञा पुरिका नाम नामतः

ṛkṣavantaṃ samabhitastīre tatra nirāmaye | nirmitā sā purī rājñā purikā nāma nāmataḥ

हिन्दी अर्थ

ऋशक्षवान्‌ पर्वतके समीप, रोग-शोकसे रहित नर्मदा- तटपर राजाने पुरिका नामक पुरीका निर्माण कराया था

अध्याय 93

श्लोक 23

स ते द्वे विपुले पुर्यौ देवभोग्योपमे शुभे ।पालयामास धर्मात्मा राजा धर्मे व्यवस्थितः

sa te dve vipule puryau devabhogyopame śubhe | pālayāmāsa dharmātmā rājā dharme vyavasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

धर्ममें स्थित हुए वे धर्मात्मा नरेश देवताओं के उपभोगमें आनेवाली स्वर्गीय पुरियोंके समान उन दो सुन्दर नगरेंका निर्माण करके उनका पालन करने लगे

अध्याय 93

श्लोक 24

पद्मवर्णोऽपि राजर्षिः सह्यपृष्ठे पुरोत्तमम् ।चकार नद्या वेणायास्तीरे तरुलताकुले

padmavarṇo'pi rājarṣiḥ sahyapṛṣṭhe purottamam | cakāra nadyā veṇāyāstīre tarulatākule

हिन्दी अर्थ

राजर्षि पद्मवर्णने भी सह्मपर्वतके पृष्ठभागमें वृक्षों और लताओंसे व्याप्त वेणा नदीके तटपर एक उत्तम नगरका निर्माण कराया

अध्याय 93

श्लोक 25

विषयस्याल्पतां ज्ञात्वा सम्पूर्णं राष्ट्रमेव च ।निवेशयामास नृपः स वप्रप्रायमुत्तमम्

viṣayasyālpatāṃ jñātvā sampūrṇaṃ rāṣṭrameva ca | niveśayāmāsa nṛpaḥ sa vapraprāyamuttamam

हिन्दी अर्थ

अपनी राज्यभूमिका विस्तार दूसरोंकी अपेक्षा छोटा जानकर उन्होंने अपने सम्पूर्ण राष्ट्रको ही एक नगरके रूपमें बसाया और उसे सब ओरसे एक विशाल चहारदिवारीके द्वारा घेर दिया। उस उत्तम राष्ट्रमें परकोटेकी ही प्रधानता थी

अध्याय 93

श्लोक 26

पद्मावतं जनपदं करवीरं च तत्पुरम् ।निर्मितं पद्मवर्णेन प्राजापत्येन कर्मणा

padmāvataṃ janapadaṃ karavīraṃ ca tatpuram | nirmitaṃ padmavarṇena prājāpatyena karmaṇā

हिन्दी अर्थ

उनका राज्य पद्मावत जनपदके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उनकी राजधानीका नाम करवीरपुर हुआ | पद्मवर्णने शिल्पशास्त्रके नियमोंके अनुसार उस नगरका निर्माण कराया था

अध्याय 93

श्लोक 27

सारसेनापि विहितं रम्यं क्रौञ्चपुरं महत् ।चम्पकाशोकबहुलं विपुलं ताम्रमृत्तिकम्

sārasenāpi vihitaṃ ramyaṃ krauñcapuraṃ mahat | campakāśokabahulaṃ vipulaṃ tāmramṛttikam

हिन्दी अर्थ

राजा सारसने भी क्रौज्अपुर* नामक महान्‌ एवं रमणीय नगरका निर्माण कराया, जिसमें चम्पा और अशोक-वृक्षोंकी बहुलता थी । उसका विस्तार बड़ा था और वहाँ ताँबैका कारोबार होता था, जिससे लोगोंकी जीविका चलती थी

अध्याय 93

श्लोक 28

वनवासीति विख्यातः स्फीतो जनपदो महान् ।पुरस्य तस्य तु श्रीमान् द्रुमैः सार्वर्तुकैर्वृतः

vanavāsīti vikhyātaḥ sphīto janapado mahān | purasya tasya tu śrīmān drumaiḥ sārvartukairvṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

उस नगरका महान्‌ समृद्धिशाली एवं शोभायमान जनपद वनवासी' नामसे विख्यात हुआ। वहाँ सभी ऋतुओंमें फूलने-फलनेवाले वृक्ष सब ओर हरे-भरे दिखायी देते थे

अध्याय 93

श्लोक 29

हरितोऽपि समुद्रस्य द्वीपं समभिपालयत् ।रत्नसञ्चयसम्पूर्णं नारीजनमनोहरम्

harito'pi samudrasya dvīpaṃ samabhipālayat | ratnasañcayasampūrṇaṃ nārījanamanoharam

हिन्दी अर्थ

हरित भी रत्रराशिसे पूर्ण उस समुद्र-सम्बन्धी ट्वीपका पालन करने लगे, जो नारीजनोंके लिये मनोहर था (अथवा नारियोंके कारण मनोहर प्रतीत होता था)

अध्याय 93

श्लोक 30

तस्य दाशा जले मग्ना मद्गुरा नाम विश्रुताः ।ये हरन्ति सदा शङ्खान् समुद्रोदरचारिणः

tasya dāśā jale magnā madgurā nāma viśrutāḥ | ye haranti sadā śaṅkhān samudrodaracāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

राजा हरितके द्वारा नियुक्त हुए धीवर, जो वहाँ ' मदुर ' नामसे प्रसिद्ध थे, जलमें डूबकर समुद्रके भीतर विचरनेवाले शड्डोंको पकड़ लाते थे

अध्याय 93

श्लोक 31

तस्यापरे दाशजनाः प्रवालाञ्जलसम्भवान् ।सञ्चिन्वन्ति सदा युक्ता जातरूपं च मौक्तिकम्

tasyāpare dāśajanāḥ pravālāñjalasambhavān | sañcinvanti sadā yuktā jātarūpaṃ ca mauktikam

हिन्दी अर्थ

उनके दूसरे-दूसरे मल्लाह सदा सावधान रहकर जलके भीतर होनेवाले मूँगों तथा चमकीले मोतियोंका संग्रह करते थे

अध्याय 93

श्लोक 32

जलजानि च रत्नानि निषादास्तस्य मानवाः ।प्रचिन्वन्तोऽर्णवे युक्ता नौभिः संयानगामिनः

jalajāni ca ratnāni niṣādāstasya mānavāḥ | pracinvanto'rṇave yuktā naubhiḥ saṃyānagāminaḥ

हिन्दी अर्थ

हरितके कार्यकर्ता निषाद बड़ी बड़ी नौकाओंको साथ लिये छोटी नौकाओंद्वारा समुद्रमें जाते और जलमें उत्पन्न होनेवाले रत्लोंकी खोज करते थे (छोटी नावोंसे दूर-दूरतक जाकर वे रत्लोंका संचय करते और एक जगह खड़ी हुई बड़ी नौकामें लाकर रखते थे)

अध्याय 93

श्लोक 33

मत्स्यमांसेन तै सर्वे वर्तन्ते स्म सदा नराः ।गृहणन्तः सर्वरत्नानि रत्नद्वीपनिवासिनः

matsyamāṃsena tai sarve vartante sma sadā narāḥ | gṛhaṇantaḥ sarvaratnāni ratnadvīpanivāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

उस रलद्वीपमें निवास करनेवाले वे मल्लाह जातिके लोग सब प्रकारके रत्लोंका संग्रह करते और मछलीके मांससे जीवन-निर्वाह करते थे

अध्याय 93

श्लोक 34

तैः संयानगतैर्द्रव्यैर्वणिजो दूरगामिनः ।हरितं तर्पयन्त्येकं यथैव धनदं तथा

taiḥ saṃyānagatairdravyairvaṇijo dūragāminaḥ | haritaṃ tarpayantyekaṃ yathaiva dhanadaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

क्षिण तटपर बतायी है। बंप डे नौकाओंमें समुद्रसे निकाले गये जो द्रव्य संचित होते, उनके द्वारा दूर देशोंकी यात्रा करनेवाले व्यवसायी वैश्य व्यापार करते और प्राप्त हुए धनसे एकमात्र राजा हरितको ही तृप्त करते थे, जैसे यक्ष केवल कुबेरको ही अपने उपार्जित धनसे संतुष्ट किया करते हैं

अध्याय 93

श्लोक 35

एवमिक्ष्वाकुवंशात् तु यदुवंशो विनिःसृतः ।चतुर्धा यदुपुत्रैस्तु चतुर्भिभिद्यते पुनः

evamikṣvākuvaṃśāt tu yaduvaṃśo viniḥsṛtaḥ | caturdhā yaduputraistu caturbhibhidyate punaḥ

श्लोक 35–36 का हिन्दी अर्थ

वे राजा यदु अपने बड़े पुत्र यदुकुलपुड़्व माधवको अपना राज्य दे इस भूतलपर शरीरका परित्याग करके स्वर्गको चले गये

अध्याय 93

श्लोक 36

स यदुर्माधवे राज्यं विसृज्य यदुपुङ्गवे ।त्रिविष्टपं गतो राजा देहं त्यक्त्वा महीतले

sa yadurmādhave rājyaṃ visṛjya yadupuṅgave | triviṣṭapaṃ gato rājā dehaṃ tyaktvā mahītale

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 93

श्लोक 37

बभूव माधवसुतः सत्त्वतो नाम वीर्यवान् ।सत्त्ववृत्तिर्गुणोपेतो राजा राजगुणे स्थितः

babhūva mādhavasutaḥ sattvato nāma vīryavān | sattvavṛttirguṇopeto rājā rājaguṇe sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

माधवका पराक्रमी पुत्र सत््वत नामसे विख्यात हुआ। वे गुणवान्‌ राजा सत्त्वत राजोचित गुर्णोंमें प्रतिष्ठित थे और सदा सात्तिक वृत्तिसे रहते थे

अध्याय 93

श्लोक 38

सत्त्वतस्य सुतो राजा भीमो नाम महानभूत् ।येन भैमाः सुसंवृत्ताः सत्त्वतात् सात्त्वताः स्मृताः

sattvatasya suto rājā bhīmo nāma mahānabhūt | yena bhaimāḥ susaṃvṛttāḥ sattvatāt sāttvatāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

सत्त्वतके पुत्र महान्‌ राजा भीम हुए, जिनसे भावी पीढ़ीके लोग * भैम' कहलाये। सत्त्वतसे उत्पन्न होनेके कारण उन सबको 'सात्त्वत' भी माना गया है

अध्याय 93

श्लोक 39

राज्ये स्थिते नृपे तस्मिन् रामे राज्यं प्रशासति ।शत्रुघ्नो लवणं हत्वा चिच्छेद स मधोर्वनम्

rājye sthite nṛpe tasmin rāme rājyaṃ praśāsati | śatrughno lavaṇaṃ hatvā ciccheda sa madhorvanam

हिन्दी अर्थ

जब राजा भीम आनर्त देशके राज्यपर प्रतिष्ठित थे, उन्हीं दिनों अयोध्यामें भगवान्‌ श्रीराम भूमण्डलके राज्यका शासन करते थे। उनके राज्यकालमें शत्रुघ्नने मधुपुत्र लवणको मारकर मधुवनका उच्छेद कर डाला

अध्याय 93

श्लोक 40

तस्मिन् मधुवने स्थाने पुरीं च मथुरामिमाम् ।निवेशयामास विभुः सुमित्रानन्दवर्धनः

tasmin madhuvane sthāne purīṃ ca mathurāmimām | niveśayāmāsa vibhuḥ sumitrānandavardhanaḥ

हिन्दी अर्थ

उसी मधुवनके स्थानमें सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले प्रभावशाली शत्रुघ्नने इस मथुरापुरीको बसाया था

अध्याय 93

श्लोक 41

पर्यये चैव रामस्य भरतस्य तथैव च ।सुमित्रासुतयोश्चैव स्थानं प्राप्तं च वैष्णवम्

paryaye caiva rāmasya bharatasya tathaiva ca | sumitrāsutayoścaiva sthānaṃ prāptaṃ ca vaiṣṇavam

श्लोक 41–42 का हिन्दी अर्थ

जब श्रीरामके अवतारका उपसंहार हुआ और श्रीराम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न सभी परमधामको पधारे, तब भीमने इस वैष्णव स्थान (मथुरा)-को प्राप्त किया; क्योंकि (लवणके) मारे जानेपर अब उस राज्यसे उन्हींका लगाव रह गया था। (वे ही उत्तराधिकारी होने योग्य थे।) * भीमने इस पुरीको अपने वशमें किया और वे स्वयं भी यहीं आकर रहने लगे

अध्याय 93

श्लोक 42

भीमेनेयं पुरी तेन राज्यसम्बन्धकारणात् ।स्ववशे स्थापिता पूर्वं स्वयमध्यासिता तथा

bhīmeneyaṃ purī tena rājyasambandhakāraṇāt | svavaśe sthāpitā pūrvaṃ svayamadhyāsitā tathā

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 93

श्लोक 43

ततः कुशे स्थिते राज्ये लवे तु युवराजनि ।अन्धको नाम भीमस्य सुतो राज्यमकारयत्

tataḥ kuśe sthite rājye lave tu yuvarājani | andhako nāma bhīmasya suto rājyamakārayat

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर जब अयोध्याके राज्यपर कुश प्रतिष्टित हुए और लव युवराज बन गये, तब मथुरामें भीमके पुत्र अन्धक राज्य करने लगे

अध्याय 93

श्लोक 44

अन्धकस्य सुतो जज्ञे रेवतो नाम पार्थिवः ।ऋक्षोऽपि रेवताज्जज्ञे रम्ये पर्वतमूर्धनि

andhakasya suto jajñe revato nāma pārthivaḥ | ṛkṣo'pi revatājjajñe ramye parvatamūrdhani

श्लोक 44–45 का हिन्दी अर्थ

अन्धकके पुत्र राजा रेवत हुए। रेवतसे पर्वतके रमणीय शिखरपर ऋश्षका जन्म हुआ। इस प्रकार उनसे रैवत (ऋक्ष)-की उत्पत्ति हुई। उस समय समुद्रके तटकी भूमिपर जो विशाल भूधर था, वह उसी रैवतके नामपर रैवतक पर्वतके नामसे प्रसिद्ध हुआ

अध्याय 93

श्लोक 45

ततो रैवत उत्पन्नः पर्वतः सागरान्तिके ।नाम्ना रैवतको नाम भूमौ भूमिधरः स्मृतः

tato raivata utpannaḥ parvataḥ sāgarāntike | nāmnā raivatako nāma bhūmau bhūmidharaḥ smṛtaḥ

अर्थ श्लोक 44 के साथ

अध्याय 93

श्लोक 46

रैवतस्यात्मजो राजा विश्वगर्भो महायशाः ।बभूव पृथिवीपालः पृथिव्यां प्रथितः प्रभुः

raivatasyātmajo rājā viśvagarbho mahāyaśāḥ | babhūva pṛthivīpālaḥ pṛthivyāṃ prathitaḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

हुए थे; अत: वे मधुके दौहित्र थे। नानाके कोई पुत्र न हो त्रका नियम है, अत: लवणासुरके मारे जानेपर यदुपौत्र भीम भैवत (ऋक्ष)-के पुत्र महायशस्वी राजा विश्वगर्भ ए, जो इस पृथ्वीपर प्रसिद्ध एवं प्रभावशाली भूमिपाल [

अध्याय 93

श्लोक 47

तस्य तिसृषु भार्यासु दिव्यरूपासु केशव ।चत्वारो जज्ञिरे पुत्रा लोकपालोपमाः शुभाः

tasya tisṛṣu bhāryāsu divyarūpāsu keśava | catvāro jajñire putrā lokapālopamāḥ śubhāḥ

हिन्दी अर्थ

केशव! उनके तीन भार्याएँ थीं। तीनों ही दव्य रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित होती थीं। उनके गर्भसे [जाके चार सुन्दर पुत्र हुए, जो लोकपालोंके समान राक्रमी थे

अध्याय 93

श्लोक 48

वसुर्बभ्रुः सुषेणश्च सभाक्षश्चैव वीर्यवान् ।यदुप्रवीराः प्रख्याता लोकपाला इवापरे

vasurbabhruḥ suṣeṇaśca sabhākṣaścaiva vīryavān | yadupravīrāḥ prakhyātā lokapālā ivāpare

हिन्दी अर्थ

उनके नाम इस प्रकार हैं—वसु, भर, सुषेण और बलवान्‌ सभाक्ष। ये यदुकुलके प्रख्यात ष्ठ वीर दूसरे लोकपालोंके समान शक्तिशाली थे

अध्याय 93

श्लोक 49

तैरयं यादवो वंशः पार्थिवैर्बहुलीकृतः ।यैः साकं कृष्णलोकेऽस्मिन् प्रजावन्तः प्रजेश्वराः

tairayaṃ yādavo vaṃśaḥ pārthivairbahulīkṛtaḥ | yaiḥ sākaṃ kṛṣṇaloke'smin prajāvantaḥ prajeśvarāḥ

श्लोक 49–51 का हिन्दी अर्थ

कृष्ण ! उन राजाओंने इस यादववंशको बढ़ाकर बड़ी परी संख्यासे सम्पन्न कर दिया। जिनके साथ इस सारमें बहुत-से संतानवान्‌ नरेश हैं। वसुसे (जिनका ्‌सरा नाम शूर था) वसुदेव उत्पन्न हुए। ये वसुपुत्र सुदेव बड़े प्रभावशाली हैं। वसुदेवकी उत्पत्तिके भनन्तर वसुने दो कान्तिमती कन्याओंको जन्म दिया जो पृथा (कुन्ती ) और श्रुतश्रवा नामसे विख्यात हुईं) । नमेंसे पृथा कुन्तिदेशमें (राजा कुन्तिभोजकी दत्तक त्रीके रूपमें) रहती थी। कुन्ती जो पृथ्वीपर विचरनेवाली वाड्नाके समान थी, महाराज पाण्डुकी महारानी हुई था सुन्दर कान्तिसे प्रकाशित होनेवाली श्रुतश्रवा चेद्रिज रमघोषकी पत्नी हुई

अध्याय 93

श्लोक 50

वसोस्तु कुन्तिविषये वसुदेवः सुतो विभुः ।ततः स जनयामास सुप्रभे द्वे च दारिके

vasostu kuntiviṣaye vasudevaḥ suto vibhuḥ | tataḥ sa janayāmāsa suprabhe dve ca dārike

अर्थ श्लोक 49 के साथ

अध्याय 93

श्लोक 51

कुन्तीं च पाण्डोर्महिषीं देवतामिव भूचरीम् ।भार्यां च दमघोषस्य चेदिराजस्य सुप्रभाम्

kuntīṃ ca pāṇḍormahiṣīṃ devatāmiva bhūcarīm | bhāryāṃ ca damaghoṣasya cedirājasya suprabhām

अर्थ श्लोक 49 के साथ

अध्याय 93

श्लोक 52

एष ते स्वस्य वंशस्य प्रभवः सम्प्रकीर्तितः ।श्रुतो मया पुरा कृष्ण कृष्णद्वैपायनान्तिकात्

eṣa te svasya vaṃśasya prabhavaḥ samprakīrtitaḥ | śruto mayā purā kṛṣṇa kṛṣṇadvaipāyanāntikāt

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण! यह मैंने [मसे अपने यादववंशकी उत्पत्ति बतायी है। इसे मैंने हहले श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीसे सुना था

अध्याय 93

श्लोक 53

त्वं त्विदानीं प्रणष्टेऽस्मिन् वंशे वंशभृतां वर ।स्वयम्भूरिव सम्प्राप्तो भवायास्मज्जयाय च

tvaṃ tvidānīṃ praṇaṣṭe'smin vaṃśe vaṃśabhṛtāṃ vara | svayambhūriva samprāpto bhavāyāsmajjayāya ca

हिन्दी अर्थ

वंशधारियों में रेष्ठ गोविन्द! इस समय यह वंश नष्ट-सा हो चला था। परंतु तुम स्वयम्भू ब्रह्माजीके समान इस वंशके द्धव तथा हमारी विजयके लिये इसमें अवतीर्ण हुए हो

अध्याय 93

श्लोक 54

न तु त्वां पौरमात्रेण शक्ता गूहयितुं वयम् ।देवगुह्येष्वपि भवान् सर्वज्ञः सर्वभावनः

na tu tvāṃ pauramātreṇa śaktā gūhayituṃ vayam | devaguhyeṣvapi bhavān sarvajñaḥ sarvabhāvanaḥ

हिन्दी अर्थ

हमलोग तुम्हें साधारण पुरवासी बताकर छेपानेमें असमर्थ हैं; क्योंकि तुम देवताओंके गुप्त हस्योंसे भी परिचित, सर्वज्ञ तथा सबको उत्पन्न करनेवाले हो

अध्याय 93

श्लोक 55

शक्तश्चापि जरासन्धं नृपं योधयितुं विभो ।त्वद्बुद्धिवशगाः सर्वे वयं योधव्रते स्थिताः

śaktaścāpi jarāsandhaṃ nṛpaṃ yodhayituṃ vibho | tvadbuddhivaśagāḥ sarve vayaṃ yodhavrate sthitāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! तुम राजा जरासंधसे युद्ध करनेमें समर्थ हो। हम सब लोग योधाओंके ब्रतमें स्थर रहकर सदा तुम्हारी बुद्धिकि वशीभूत रहेंगे

अध्याय 93

श्लोक 57

जरासन्धस्तु बलवान् नृपाणां मूर्ध्नि तिष्ठति ।अप्रमेयबलश्चैव वयं च कृशसाधनाः ॥ ५६ ! ।न चेयमेकाहमपि पुरी रोधं सहिष्यति ।कृशभक्तेन्धनक्षामा दुर्गैरपरिवेष्टिता

jarāsandhastu balavān nṛpāṇāṃ mūrdhni tiṣṭhati | aprameyabalaścaiva vayaṃ ca kṛśasādhanāḥ || 56 ! | na ceyamekāhamapi purī rodhaṃ sahiṣyati | kṛśabhaktendhanakṣāmā durgairapariveṣṭitā

हिन्दी अर्थ

यह मथुरापुरी शत्रुओंद्वारा किये गये एक दिनके उपरोध (घेरे)-को भी नहीं सह सकेगी; क्योंकि यहाँ खाने-पीनेकी सामग्री बहुत कम है। लकड़ियोंका संचय भी स्वल्प ही है तथा यह पुरी वेभिन्‍न प्रकारके दुर्गोंसे घिरी हुई नहीं है

अध्याय 93

श्लोक 58

असंस्कृताम्बुपरिखा द्वारयन्त्रविवर्जिता ।वप्रप्राकारनिचया कर्तव्या बहुविस्तरा

asaṃskṛtāmbuparikhā dvārayantravivarjitā | vapraprākāranicayā kartavyā bahuvistarā

हिन्दी अर्थ

पा इसके चारों ओर जो जल भरनेके लिये खाइयाँ बनी हुई हैं, उनकी बहुत दिनोंसे मरम्मत और सफाई नहीं हुई है तथा नगरके द्वारपर रक्षाके लिये यन्त्र (तोप आदि) भी नहीं लगे हुए हैं। पुरीकी रक्षाके लिये चारों ओरसे मिट्टीकी मोटी दीवारें तथा कई पक्के परकोटे बनवानेकी आवश्यकता है, जिनका विस्तार बहुत बड़ा हो

अध्याय 93

श्लोक 59

संस्कर्तव्यायुधागारा योक्तव्या चेष्टिकाचयैः ।कंसस्य बलभोग्यत्वान्नातिगुप्ता पुरा जनैः

saṃskartavyāyudhāgārā yoktavyā ceṣṭikācayaiḥ | kaṃsasya balabhogyatvānnātiguptā purā janaiḥ

हिन्दी अर्थ

नगरके जितने आयुधागार हैं, उन सबका संस्कार (मरम्मत और सफाई) होना चाहिये। जगह- जगह ईंटोंके ढेर जुटा लेनेकी आवश्यकता है। कंसकी सेनाके उपयोगमें आनेके कारण इस नगरकी रक्षाके लिये लोगोंने पहलेसे कोई व्यवस्था नहीं रखी है

अध्याय 93

श्लोक 60

सद्यो निपतिते कंसे राज्येऽस्माकं नवोदये ।पुरी प्रत्यग्ररोधेव न रोधं विसहिष्यति

sadyo nipatite kaṃse rājye'smākaṃ navodaye | purī pratyagrarodheva na rodhaṃ visahiṣyati

हिन्दी अर्थ

अभी हालमें कंस मारा गया है, अतः: हमारे राज्यका अभी नवोदय (प्रभात) काल है। जैसे राजाके सिपाही कर वसूल करनेके लिये गाँवको घेर लेते हैं, उसी तरह यदि इस पुरीका भी अवरोध हुआ तो यह उसे सहन न कर सकेगी

अध्याय 93

श्लोक 61

बलं सम्मर्दभग्नं च कृष्यमाणं परेण ह ।असंशयमिदं राष्ट्रं जनैः सह विनङ्क्ष्यति

balaṃ sammardabhagnaṃ ca kṛṣyamāṇaṃ pareṇa ha | asaṃśayamidaṃ rāṣṭraṃ janaiḥ saha vinaṅkṣyati

हिन्दी अर्थ

हमारी सेना अनेक युद्धोंका सामना करनेके कारण हताश हो गयी है। शत्रु इसे बार- बार पीड़ा देकर क्षीण कर रहा है, अत: यह राष्ट्र यहाँके निवासियोंके साथ ही नष्ट हो जायगा। इसमें संदेह नहीं है

अध्याय 93

श्लोक 62

यादवानां विरोधेन ये जिता राज्यकामुकैः ।ते सर्वे द्वैधमिच्छन्ति यत्क्षमं तद्विधीयताम्

yādavānāṃ virodhena ye jitā rājyakāmukaiḥ | te sarve dvaidhamicchanti yatkṣamaṃ tadvidhīyatām

हिन्दी अर्थ

हमलोगोंने राज्य-प्राप्तिकी इच्छा रखकर यादवोंका विरोध करनेके कारण जिन-जिन लोगोंको पराजित किया है, वे सब लोग हममें फूट डालना चाहते हैं। ऐसी परिस्थितिमें जो उचित हो सो करो

अध्याय 93

श्लोक 63

वञ्चनीया भविष्यामो नृपाणां नृपकारणात् ।जरासन्धभयार्तानां द्रवतां राज्यसम्भ्रमे

vañcanīyā bhaviṣyāmo nṛpāṇāṃ nṛpakāraṇāt | jarāsandhabhayārtānāṃ dravatāṃ rājyasambhrame

हिन्दी अर्थ

राजा जरासंधके कारण दूसरे-दूसरे राजा भी हमें धोखा देंगे; क्योंकि वे जरासंधके भयसे पीड़ित हैं और अपने राज्यमें कोई विप्लव न मच जाय, इसके डरसे सब-के-सब उसके पीछे दौड़ते हैं

अध्याय 93

श्लोक 64

आर्ता वक्ष्यन्ति नः सर्वे रुध्यमानाः पुरे जनाः ।यादवानां विरोधेन विनष्टाः स्मेति केशव

ārtā vakṣyanti naḥ sarve rudhyamānāḥ pure janāḥ | yādavānāṃ virodhena vinaṣṭāḥ smeti keśava

हिन्दी अर्थ

केशव! यदि इस नगरके सब लोग शत्रुओंके घेरा डालनेसे अवरुद्ध हो जायँगे तो ये पीड़ित होकर हमारे लिये यही कहेंगे कि हम यादवोंके विरोधसे नष्ट हो गये

अध्याय 93

श्लोक 65

एतन्मम मतं कृष्ण विस्रम्भात्समुदाहृतम् ।त्वं तु विज्ञापितः पूर्वं न पुनः सम्प्रबोधितः

etanmama mataṃ kṛṣṇa visrambhātsamudāhṛtam | tvaṃ tu vijñāpitaḥ pūrvaṃ na punaḥ samprabodhitaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण ! यह मेरा मत है, जिसे तुमपर विश्वास होनेके कारण मैंने प्रकट किया है। तुम्हें इस बातकी पहले-पहल सूचना दी गयी है । तुम्हें समझानेका प्रयत्न नहीं किया गया है

अध्याय 93

श्लोक 66

यदत्र वः क्षमं कृष्ण तच्च वै संविधीयताम् ।त्वमस्य नेता सैन्यस्य वयं त्वच्छासने स्थिताः ।त्वन्मूलश्च विरोधोऽयं रक्षास्मानात्मना सह

yadatra vaḥ kṣamaṃ kṛṣṇa tacca vai saṃvidhīyatām | tvamasya netā sainyasya vayaṃ tvacchāsane sthitāḥ | tvanmūlaśca virodho'yaṃ rakṣāsmānātmanā saha

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण! इस परिस्थितिमें जो उचित हो, वह करो। तुम इस यादव-सेनाके नेता हो और हम तुम्हारे शासनमें स्थित हैं। इस विरोधके मूल कारण तुम्हीं हो, इसलिये तुम अपने साथ ही हमलोगोंकी रक्षा करो

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.