अध्याय 80
श्लोक 1
अक्रूरस्य व्रजं आगत्वा भगवतः श्रीकृष्णस्य दर्शनं, तस्य विषये अनेकानां प्रकाराणां चिन्तनं अथास्तं गच्छति तदा मन्दरश्मौ दिवाकरे ।सन्ध्यारक्ततले व्योम्नि शशाङ्के पाण्डुमण्डले
akrūrasya vrajaṃ āgatvā bhagavataḥ śrīkṛṣṇasya darśanaṃ, tasya viṣaye anekānāṃ prakārāṇāṃ cintanaṃ athāstaṃ gacchati tadā mandaraśmau divākare | sandhyāraktatale vyomni śaśāṅke pāṇḍumaṇḍale
श्लोक 1–13 का हिन्दी अर्थ
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस दिन जब सूर्यदेव अस्ताचलको जाने लगे, उनकी किरणें पन््द हो गयीं, पश्चिमके आकाशमें संध्याकी लाली छा गयी, चन्द्रमाका श्रेत-पीत मण्डल उदित होने लगा, पक्षी अपने नीड़ों (घोसलों )-में विश्राम करने लगे, श्रेष्ठ याज्ञिकोंने जब अप्रि प्रज्वलित कर दी, सम्पूर्ण देशाएँ सब ओरसे जब कुछ-कुछ अन्धकारसे आवृत्त हो गयीं, व्रजवासी सोनेकी तैयारी करने लगे, गीदड़ियाँ बोलने लगीं, मांसाहारकी अभिलाषा रखनेवाले निशाचर डर्षमें भर गये, धूपसे तपे हुए इन्द्रगोप नामक कीड़ोंको आनन्द देनेवाला और वेदोंके स्वाध्यायको बंद करनेवाला प्रदोषकाल जब आ पहुँचा, जब सूर्यदेव संध्यारूपिणी पुफामें प्रविष्ट हो गये, जब गृहस्थोंके लिये हवनीय बृत या दुग्धको आगपर रखनेकी वेला आ पहुँची, त्रनवासी वैखानस (वानप्रस्थ) जब मन्त्रोंद्वारा अग्रिमें भाहुति देने लगे, जब गौएँ वनसे लौटकर ब्रजमें आ गयीं और उनका दूध दुह॒ लिया गया, जिनके बछड़े बँधे थे और जो स्वयं भी लम्बी रस्सियोंमें आबद्ध थीं, वे धेनुएँ जब बार-बार रँभाने लगीं, गौओंको बुलाते हुए गोपगण जब सब ओर कोलाहल करने लगे, जब त्रँधनेके लिये गौओंको हाँककर ले जाया जाने लगा; काष्ठके भारसे झुके हुए कंधोंवाले गोप जब घर आकर पब ओर फैले हुए सूखे गोबरके चूरोंको सुलगाने या प्ज्वलित करने लगे, किंचित् उदित हुए चन्द्रदेव जब अपनी मन्द किरणोंसे ही प्रकाशित हो रहे थे, दिन चले जानेपर थोड़ी-सी ही रातका आगमन हुआ था, दिनकी पूर्ण समासि होकर रात्रिके प्रथम प्रहरका अभी आरम्भ ही हुआ था, सूर्यका उष्ण प्रकाश अस्त होकर चन्द्रमाका शीतल प्रकाश उपस्थित हुआ था, जिस समय अप्रिहोत्रकी सुगन्धि सब ओर व्याप्त हो रही थी, स्वभावत: सौम्य चन्द्रदेब उदित हुए, जब सम्पूर्ण जगत्में अग्नीषोमात्मक संधिका समय वर्तमान था, जब पश्चिममें अग्रिके समान संध्याकालका अरुण प्रकाश फैला था तथा पूर्वमें भी लाल कमलके समान | कान्तिवाले चन्द्रमाकी कुड्डुम-जैसी प्रभा फैली हुई थी और उन दोनों दिशाओंके अरुण प्रकाशसे जब आकाश उभयपार्थसे दग्ध हुए पर्वतके समान प्रतीत हो रहा था और उसमें कुछ-कुछ तारे प्रकट हो गये थे, ऐसे समयमें घर लौटनेकी इच्छावाले पथिकोंको बन्धुओंसे समागम होनेकी सूचना-सी देनेवाले पक्षियोंके साथ- साथ दानपति अक्रूर अपने रथके द्वारा शीघ्र ही ब्रजमें आ पहुँचे
English
Vaishampāyana said:—In the Puranas this highly energetic and powerful Baladeva is described as the Naga king Sesha, the mine of lustre, who holds up the earth, as the foremost of Purushas, as a teacher of Yoga and as the foremost of those who are well-read in the Mantras of the Vedas. Many times he defeated Jarāsandha while fighting with clubs but he did not kill him (4-5). The other celebrated kings, of earth who followed the Maagdha emperor, were defeated by him in battle (6). In wrestling with him even Bhima, of dreadful prowess, endued with the strength of an Ayuta elephant, was defeated by him (7). On account of his stealing awaya Duryodhana's daughter Lakshmanā, Jamvavati's son Shāmva was confined by those princes in the city of Hastina. Hearing of his confinement the highly powerful Rāma went to that city for releasing him, but did not find him. Thereat worked up with anger that powerful hero performed the following wonderful feat. Taking up his invincible, incomparable, and celestial weapon, plough-share, powerful like that of Brahma and fixing it on the wall of the city he thought of, throwing that city of the Kauravas into the Ganges (8-12).