अध्याय 36
श्लोक 1
क्रोष्टोः वंशवर्णनम्, पुरोहितगोत्रेण क्षत्रियस्य गोत्रस्य प्रतिस्थापनं क्रोष्टोरेवाभवत् पुत्रो वृजिनीवान्महायशाः ।वृजिनीवत्सुतश्चापि स्वाहिः स्वाहाकृतां वरः
kroṣṭoḥ vaṃśavarṇanam, purohitagotreṇa kṣatriyasya gotrasya pratisthāpanaṃ kroṣṭorevābhavat putro vṛjinīvānmahāyaśāḥ | vṛjinīvatsutaścāpi svāhiḥ svāhākṛtāṃ varaḥ
हिन्दी अर्थ
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! (यदुके पुत्र) क्रोष्टाके ही एक वृजिनीवानू नामक महायशस्वी पुत्र हुए; वृजिनीवानूके पुत्र स्वाहि हुए, वे स्वाहा अर्थात् होम करनेवालोंमें श्रेष्ठ थे (जिस प्रकार क्रोष्टाके वंशमें श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए, उसी प्रकार क्रोष्टाके वंशमें सत्यभामा आदि भी हुईं; क्षत्रियोंमें एक कुलके होनेपर भी सात पीढ़ियाँ बीत जानेके बाद पुरोहितके गोत्रसे यजमान क्षत्रियका भी गोत्र बदल जाता है और इस प्रकार गोत्रभेदसे उनमें विवाह हो जाते हैं। इस अध्यायमें क्रोष्टाके वंशकी उस शाखाका वर्णन किया जायगा, जिसमें महालक्ष्मीकी अवताररूपा ईश्वरी शक्ति श्रीरक्मिणीजी उत्पन्न हुई थीं)