Harivamsha Purana
32
अध्याय 32 / 318

Parva 1, Adhyāya 32

90 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ90 श्लोक

अध्याय 32

श्लोक 1

पूरोः वंशान्तर्गतं ऋचेयोः वंशपरम्परा - अजमीढवंशः, पाञ्चाल सोमकवंशं च, कौरववंशः, तुर्वसोः, द्रुह्योः एवं अनोः सन्ततिवर्णनं अनाधृष्यस्तु राजर्षिरृचेयुश्चैकराट् स्मृतः ।ऋचेयोर्ज्वलना नाम भार्या वै तक्षकात्मजा

pūroḥ vaṃśāntargataṃ ṛceyoḥ vaṃśaparamparā - ajamīḍhavaṃśaḥ, pāñcāla somakavaṃśaṃ ca, kauravavaṃśaḥ, turvasoḥ, druhyoḥ evaṃ anoḥ santativarṇanaṃ anādhṛṣyastu rājarṣirṛceyuścaikarāṭ smṛtaḥ | ṛceyorjvalanā nāma bhāryā vai takṣakātmajā

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! राजर्षि ऋचेयु एकच्छत्र सम्राट माने गये हैं। वे दूसरोंके लिये अजेय थे। ऋचेयुकी पत्नीका नाम ज्वलना था, जो तक्षक नागकी पुत्री थी

अध्याय 32

श्लोक 2

तस्यां स देव्यां राजर्षिर्मतिनारो महीपतिः ।मतिनारसुताश्चासंस्त्रयः परमधार्मिकाः

tasyāṃ sa devyāṃ rājarṣirmatināro mahīpatiḥ | matinārasutāścāsaṃstrayaḥ paramadhārmikāḥ

श्लोक 2–3 का हिन्दी अर्थ

महारानी ज्वलनाके गर्भसे पृथ्वीपति राजर्षि मतिनारका जन्म हुआ। मतिनारके तीन परम धर्मात्मा पुत्र हुए—प्रथम तंसु, दूसरे प्रतिरथ और तीसरे धर्मात्मा सुबाहु। मतिनारके एक कन्या भी हुई थी, जो गौरी नामसे विख्यात थी। शुभलक्षणा गौरी ही राजा मान्धाताकी जननी हुई

अध्याय 32

श्लोक 3

तंसुराद्यः प्रतिरथः सुबाहुश्चैव धार्मिकः ।गौरी कन्या च विख्याता मान्धातृजननी शुभा

taṃsurādyaḥ pratirathaḥ subāhuścaiva dhārmikaḥ | gaurī kanyā ca vikhyātā māndhātṛjananī śubhā

अर्थ श्लोक 2 के साथ

English

¹³⁵ A portion of fire.

अध्याय 32

श्लोक 4

सर्वे वेदविदस्तत्र ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ।सर्वे कृतास्त्रा बलिनः सर्वे युद्धविशारदाः

sarve vedavidastatra brahmaṇyāḥ satyavādinaḥ | sarve kṛtāstrā balinaḥ sarve yuddhaviśāradāḥ

हिन्दी अर्थ

मतिनारके सभी पुत्र वेदवेत्ता, ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, अस्त्रविद्याके विद्वानु, बलवान्‌ तथा युद्धकुशल थे

अध्याय 32

श्लोक 5

पुत्रः प्रतिरथस्यासीत् कण्वः समभवन्नृपः ।मेधातिथिः सुतस्तस्य यस्मात्काण्वायना द्विजाः

putraḥ pratirathasyāsīt kaṇvaḥ samabhavannṛpaḥ | medhātithiḥ sutastasya yasmātkāṇvāyanā dvijāḥ

हिन्दी अर्थ

मतिनारके दूसरे पुत्र प्रतिरथके बेटेका नाम कण्व था। कण्व राजा थे। कण्वके पुत्र मेधातिथि हुए, जिनसे काण्वायन ब्राह्मणोंकी परम्परा प्रचलित हुई

अध्याय 32

श्लोक 6

ईलिनी भूप यस्यासीत् कन्या वै जनमेजय ।ब्रह्मवादिन्यधि स्त्रीं च तंसुस्तामभ्यगच्छत

īlinī bhūpa yasyāsīt kanyā vai janamejaya | brahmavādinyadhi strīṃ ca taṃsustāmabhyagacchata

हिन्दी अर्थ

राजा जनमेजय! जिनकी कन्या ईलिनी नामसे प्रसिद्ध हुई थी, वे ईलिन नामक नरेश ब्रह्मवादी ब्राह्मण- समुदायमें उत्कृष्ट माने जाते थे। उनकी उस ईलिनी नामक कन्याको तंसुने पत्नीरूपमें प्राप्त किया

अध्याय 32

श्लोक 7

तंसोः सुरोधो राजर्षिर्धर्मनेत्रो महायशाः ।ब्रह्मवादी पराक्रान्तस्तस्य भार्योपदानवी

taṃsoḥ surodho rājarṣirdharmanetro mahāyaśāḥ | brahmavādī parākrāntastasya bhāryopadānavī

श्लोक 7–8 का हिन्दी अर्थ

तंसुके महायशस्वी राजर्षि सुरोध हुए, जो धर्मके प्रवर्तक होनेसे धर्मनेत्र कहलाते थे। वे ब्रह्मवादी और पराक्रमी थे। उनकी पत्नी उपदानवी थी। उपदानवीने चार पुत्र प्राप्त किये, जो दुष्यन्त, सुष्मन्त, प्रवीर और अनघके नामसे विख्यात थे। ये चारों ईलिनीकुमार सुरोध या धर्मनेत्रके पुत्र थे

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 8

उपदानवी सुताँल्लेभे चतुरस्त्वैलिकात्मजान् ।दुष्यन्तमथ सुष्मन्तं प्रवीरमनघं तथा

upadānavī sutā~llebhe caturastvailikātmajān | duṣyantamatha suṣmantaṃ pravīramanaghaṃ tathā

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 9

दुष्यन्तस्य तु दायादो भरतो नाम वीर्यवान् ।स सर्वदमनो नाम नागायुतबलो महान्

duṣyantasya tu dāyādo bharato nāma vīryavān | sa sarvadamano nāma nāgāyutabalo mahān

हिन्दी अर्थ

दुष्यन्तके पुत्रका नाम भरत था। वे बड़े पराक्रमी थे। सबका दमन करनेके कारण उनका दूसरा नाम सर्वदमन भी था। महान्‌ वीर भरतमें दस हजार हाथियोंका बल था

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 10

चक्रवर्ती सुतो जज्ञे दुष्यन्तस्य महात्मनः ।शकुन्तलायां भरतो यस्य नाम्ना स्थ भारताः

cakravartī suto jajñe duṣyantasya mahātmanaḥ | śakuntalāyāṃ bharato yasya nāmnā stha bhāratāḥ

हिन्दी अर्थ

महात्मा दुष्यन्तके वीर्य और शकुन्तलाके गर्भसे चक्रवर्ती भरत पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए थे, जिनके नामपर तुमलोग भारत कहलाते हो

अध्याय 32

श्लोक 11

दुष्यन्तं प्रति राजानं वागुवाचाशरीरिणी ।माता भस्त्रा पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः

duṣyantaṃ prati rājānaṃ vāguvācāśarīriṇī | mātā bhastrā pituḥ putro yena jātaḥ sa eva saḥ

श्लोक 11–14 का हिन्दी अर्थ

(कहते हैं-दुष्यन्तने तपोवनमें जाकर शकुन्तलाके साथ गान्धर्व-विवाह किया था और अपनी राजधानीको लौटकर उसके विषयमें कुछ बताया नहीं था। जब शकुन्तला भरतको लेकर दुष्यन्तके यहाँ गयी, तब वे उसे पहचाननेमें भूल करने लगे। उस समय) आकाशवाणीने राजा दुष्यन्तको सम्बोधित करके कहा—“दुष्यन्त ! माता तो केवल चमड़ेकी धौंकनीके समान है, पुत्रपर अधिकार तो पिताका ही है। पुत्र जिसके द्वारा जन्म ग्रहण करता है, उसीका स्वरूप होता है| तुम इस पुत्रका पालन-पोषण करो, शकुन्तलाका अपमान मत करो। नरदेव! अपने ही वीर्यसे उत्पन्न हुआ पुत्र अपने पिताको यमलोकसे (निकालकर स्वर्गलोकको) ले जाता है। “इस पुत्रके आधान करनेवाले तुम्हीं हो '—शकुन्तलाने यह बात ठीक ही कही है'। राजा भरतके कई पुत्र होकर मर गये । तात! माताओंके क्रोधसे ऐसा हुआ था। यह बात मैं तुम्हें पहले (आदिपर्वमें) बता चुका हूँ। राजन्‌ ! भरतके यज्ञमें आये हुए देवताओंने भरतके लिये अज़िरा-नन्दन बृहस्पतिजीके पुत्र महामुनि भरद्वाजको ही पुत्र बनाकर दे दिया

अध्याय 32

श्लोक 12

भरस्व पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्थाः शकुन्तलाम् ।रेतोधाः पुत्र उन्नयति नरदेव यमक्षयात्

bharasva putraṃ duṣyanta māvamaṃsthāḥ śakuntalām | retodhāḥ putra unnayati naradeva yamakṣayāt

अर्थ श्लोक 11 के साथ

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 13

त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ।भरतस्य विनष्टेषु तनयेषु महीपतेः

tvaṃ cāsya dhātā garbhasya satyamāha śakuntalā | bharatasya vinaṣṭeṣu tanayeṣu mahīpateḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 14

मातॄणां तात कोपेन मया ते कथितं पुरा ।बृहस्पतेराङ्गिरसः पुत्रो राजन् महामुनिः ।सङ्क्रामितो भरद्वाजो मरुद्भिः क्रतुभिर्विभुः

mātṝṇāṃ tāta kopena mayā te kathitaṃ purā | bṛhaspaterāṅgirasaḥ putro rājan mahāmuniḥ | saṅkrāmito bharadvājo marudbhiḥ kratubhirvibhuḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 15

अत्रैवोदाहरन्तीमं भरद्वाजस्य धीमतः ।धर्मसङ्क्रमणं चापि मरुद्भिर्भरताय वै

atraivodāharantīmaṃ bharadvājasya dhīmataḥ | dharmasaṅkramaṇaṃ cāpi marudbhirbharatāya vai

श्लोक 15–22 का हिन्दी अर्थ

उध्याय: + श्५३ इसी प्रसड्भमें बुद्धिमान्‌ भरद्वाजके धर्मसंक्रमणकी यह बात कही जाती है। मरुद्रणोंने भरतको पुत्ररूपमें जब भरद्वाजको ही अर्पित कर दिया, तब भरद्वाजने भरतसे देवताओंसहित यज्ञका अनुष्ठान करवाया। इसके पहले भरतके पुत्र-जन्मका सारा प्रयास वितथ (व्यर्थ) हो चुका था। भरद्वाजके प्रयत्रसे जो पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम वितथ हुआ। वितथका जन्म हो जानेपर भरत स्वर्गवासी हो गये। तत्पश्चात्‌ वितथका राज्याभिषेक करके भरद्वाजजी भी वनमें चले गये। राजा वितथने पाँच पुत्र उत्पन्न किये-सुहोत्र, सुहोता, गय, गर्ग तथा महात्मा कपिल। सुहोत्रके भी दो पुत्र हुए—महान्‌ शक्तिशाली काशिक तथा राजा गृत्समति । गृत्समतिके पुत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—तीनों वर्णोके लोग हुए। काशिकके दो पुत्र थे—काशेय और दीर्घतपा। पुरुषप्रवर ! अब आजमीढ नामक दूसरे वंशका वर्णन सुनो—पूर्वोक्त राजा सुहोत्रके एक तीसरा पुत्र और था बृहत्‌। बृहत्‌्के तीन पुत्र हुए—अजमीढ, द्रिमीद और पराक्रमी पुरुमीढ

अध्याय 32

श्लोक 16

अयाजयद् भरद्वाजो मरुद्भिः क्रतुभिर्हि तम् ।पूर्वं तु वितथे तस्य कृते वै पुत्रजन्मनि

ayājayad bharadvājo marudbhiḥ kratubhirhi tam | pūrvaṃ tu vitathe tasya kṛte vai putrajanmani

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 17

ततोऽथ वितथो नाम भरद्वाजसुतोऽभवत् ।ततोऽथ वितथे जाते भरतस्तु दिवं ययौ

tato'tha vitatho nāma bharadvājasuto'bhavat | tato'tha vitathe jāte bharatastu divaṃ yayau

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 18

वितथं चाभिषिच्याथ भरद्वाजो वनं ययौ ।स राजा वितथः पुत्राञ्जनयामास पञ्च वै

vitathaṃ cābhiṣicyātha bharadvājo vanaṃ yayau | sa rājā vitathaḥ putrāñjanayāmāsa pañca vai

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 19

सुहोत्रं च सुहोतारं गयं गर्गं तथैव च ।कपिलं च महात्मानं सुहोत्रस्य सुतद्वयम्

suhotraṃ ca suhotāraṃ gayaṃ gargaṃ tathaiva ca | kapilaṃ ca mahātmānaṃ suhotrasya sutadvayam

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 20

काशिकश्च महासत्त्वस्तथा गृत्समतिर्नृपः ।तथा गृत्समतेः पुत्रा ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः

kāśikaśca mahāsattvastathā gṛtsamatirnṛpaḥ | tathā gṛtsamateḥ putrā brāhmaṇāḥ kṣatriyā viśaḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 21

काशिकस्य तु काशेयः पुत्रो दीर्घतपास्तथा ।आजमीढोऽपरो वंशः श्रूयतां पुरुषर्षभ

kāśikasya tu kāśeyaḥ putro dīrghatapāstathā | ājamīḍho'paro vaṃśaḥ śrūyatāṃ puruṣarṣabha

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 22

सुहोत्रस्य बृहत् पुत्रो बृहतस्तनयास्त्रयः ।अजमीढो द्विमीढश्च पुरुमीढश्च वीर्यवान्

suhotrasya bṛhat putro bṛhatastanayāstrayaḥ | ajamīḍho dvimīḍhaśca purumīḍhaśca vīryavān

अर्थ श्लोक 15 के साथ

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 23

अजमीढस्य पत्न्यस्तु तिस्रो वै यशसान्विताः ।नीलिनी केशिनी चैव धूमिनी च वराङ्गना

ajamīḍhasya patnyastu tisro vai yaśasānvitāḥ | nīlinī keśinī caiva dhūminī ca varāṅganā

हिन्दी अर्थ

अजमीढकी तीन स्त्रियाँ थीं। तीनों ही बड़ी यशस्विनी थीं। उनके नाम थे—नीलिनी, केशिनी और स्त्रियोंमें श्रेष्ठ धूमिनी

अध्याय 32

श्लोक 24

अजमीढस्य नीलिन्यां सुशान्तिरुदपद्यत ।पुरुजातिः सुशान्तेस्तु वाह्याश्वः पुरुजातितः

ajamīḍhasya nīlinyāṃ suśāntirudapadyata | purujātiḥ suśāntestu vāhyāśvaḥ purujātitaḥ

श्लोक 24–25 का हिन्दी अर्थ

अजमीढके नीलिनीके गर्भसे सुशान्ति नामक पुत्र हुआ। सुशान्तिसे पुरुजति और पुरुजातिसे वाह्याधका जन्म हुआ। वाह्याश्रके पाँच देवोपम पुत्र हुए

अध्याय 32

श्लोक 25

वाह्याश्वतनयाः पञ्च बभूवुरमरोपमाः

vāhyāśvatanayāḥ pañca babhūvuramaropamāḥ

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 26

मुद्गलः सृञ्जयश्चैव राजा बृहदिषुः स्मृतः ।यवीनरश्च विक्रान्तः कृमिलाश्वश्च पञ्चमः

mudgalaḥ sṛñjayaścaiva rājā bṛhadiṣuḥ smṛtaḥ | yavīnaraśca vikrāntaḥ kṛmilāśvaśca pañcamaḥ

हिन्दी अर्थ

उनके नाम इस प्रकार हैं—मुद्रल, सूझय, राजा बृहदिषु, पराक्रमी यवीनर तथा पाँचवें कृमिलाध

अध्याय 32

श्लोक 27

पञ्चैते रक्षणायालं देशानामिति विश्रुताः ।पञ्चानां विद्धि पञ्चालान्स्फीतैर्जनपदैर्वृतान्

pañcaite rakṣaṇāyālaṃ deśānāmiti viśrutāḥ | pañcānāṃ viddhi pañcālānsphītairjanapadairvṛtān

हिन्दी अर्थ

ये पाँचों अपने अधिकारमें आये हुए देशोंकी रक्षाके लिये अलं (समर्थ) थे, इसलिये समृद्धिशाली जनपदोंसे युक्त उन देशोंको पश्टाल समझो

अध्याय 32

श्लोक 28

अलं संरक्षणे तेषां पञ्चाला इति विश्रुताः ।मुद्गलस्य तु दायादो मौद्गल्यः सुमहायशाः

alaṃ saṃrakṣaṇe teṣāṃ pañcālā iti viśrutāḥ | mudgalasya tu dāyādo maudgalyaḥ sumahāyaśāḥ

श्लोक 28–29 का हिन्दी अर्थ

उन देशोंकी रक्षाके लिये अलं होनेसे ये पाँचों वीर पश्चाल नामसे विख्यात हुए। मुदूलके पुत्र महायशस्वी मौदूल्य थे। ये सब-के-सब महात्मा क्षात्रधर्मसे युक्त ब्राह्मण थे। ये अद्िराके पक्षका आश्रय लेकर कण्वमौदल कहलाये

अध्याय 32

श्लोक 29

सर्व एते महात्मानः क्षत्रोपेता द्विजातयः ।एते ह्यङ्गिरसः पक्षं संश्रिताः कण्वमौद्गलाः

sarva ete mahātmānaḥ kṣatropetā dvijātayaḥ | ete hyaṅgirasaḥ pakṣaṃ saṃśritāḥ kaṇvamaudgalāḥ

अर्थ श्लोक 28 के साथ

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 30

मौद्गलस्य सुतो ज्येष्ठो ब्रह्मर्षिः सुमहायशाः ।इन्द्रसेनो यतो गर्भं वध्र्यश्वं प्रत्यपद्यत

maudgalasya suto jyeṣṭho brahmarṣiḥ sumahāyaśāḥ | indraseno yato garbhaṃ vadhryaśvaṃ pratyapadyata

हिन्दी अर्थ

मौदलके ज्येष्ठ पुत्र महायशस्वी ब्रह्मर्षि इन्द्रसेन हुए, जिनसे वश्र्यधका जन्म हुआ

अध्याय 32

श्लोक 31

वध्र्यश्वान्मिथुनं जज्ञे मेनकायामिति श्रुतिः ।दिवोदासश्च राजर्षिरहल्या च यशस्विनी

vadhryaśvānmithunaṃ jajñe menakāyāmiti śrutiḥ | divodāsaśca rājarṣirahalyā ca yaśasvinī

हिन्दी अर्थ

वध््यश्वद्वारा मेनकाके गर्भसे एक पुत्र और एक कन्याका जन्म हुआ, ऐसी प्रसिद्धि है। पुत्रका नाम दिवोदास था, जो राजर्षि एवं ब्रह्मर्षि थे। कन्या यशस्विनी अहल्या थी

अध्याय 32

श्लोक 32

शरद्वतस्तु दायादमहल्या समसूयत ।शतानन्दमृषिश्रेष्ठं तस्यापि सुमहायशाः

śaradvatastu dāyādamahalyā samasūyata | śatānandamṛṣiśreṣṭhaṃ tasyāpi sumahāyaśāḥ

श्लोक 32–34 का हिन्दी अर्थ

अहल्या महर्षि शरद्वान्‌ (गौतम) - की पत्नी थी। उसने गौतमके पुत्र मुनिश्रेष्ठ शतानन्दको जन्म दिया। शतानन्दके भी एक महायशस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम सत्यधृति था। (ये सत्यधृति भी अपने पितामहके समान शरद्वान्‌ कहलाते थे।) सत्यधृति धनुर्वेदके पारज़त विद्वान्‌ थे। एक दिन अपने सामने एक अप्सराको उपस्थित देख सत्यधृति (शरद्वानू)-का वीर्य स्खलित होकर सरकंडोंके समूहपर गिर पड़ा। उससे एक बालक और बालिका जुड़वीं संतानें उत्पन्न हुईं। उस समय राजा शन्तनु शिकार खेलनेके लिये वनमें गये हुए थे। उन्होंने कृपापूर्वक उन दोनों बालकोंको ले लिया

अध्याय 32

श्लोक 33

पुत्रः सत्यधृतिर्नाम धनुर्वेदस्य पारगः ।तस्य सत्यधृते रेतो दृष्ट्वाप्सरसमग्रतः

putraḥ satyadhṛtirnāma dhanurvedasya pāragaḥ | tasya satyadhṛte reto dṛṣṭvāpsarasamagrataḥ

अर्थ श्लोक 32 के साथ

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 34

अवस्कन्नं शरस्तम्बे मिथुनं समपद्यत ।कृपया तच्च जग्राह शन्तनुर्मृगयां गतः

avaskannaṃ śarastambe mithunaṃ samapadyata | kṛpayā tacca jagrāha śantanurmṛgayāṃ gataḥ

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 35

कृपः स्मृतः स वै तस्माद् गौतमी च कृपी तथा ।एते शारद्वताः प्रोक्ता एते ते गौतमाः स्मृताः

kṛpaḥ smṛtaḥ sa vai tasmād gautamī ca kṛpī tathā | ete śāradvatāḥ proktā ete te gautamāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

कृपापूर्वक ग्रहण करनेके कारण बालकका नाम कृप और उस गौतम-बालिकाका नाम कृपी हुआ। ये शतानन्द, सत्यधृति और कृप शारद्वत कहे गये हैं तथा ये गौतम भी कहलाते हैं

अध्याय 32

श्लोक 36

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दिवोदासस्य सन्ततिम् ।दिवोदासस्य दायादो ब्रह्मर्षिर्मित्रयुर्नृप

ata ūrdhvaṃ pravakṣyāmi divodāsasya santatim | divodāsasya dāyādo brahmarṣirmitrayurnṛpa

श्लोक 36–37 का हिन्दी अर्थ

नरेधर! अब मैं दिवोदासकी संततिका वर्णन करूँगा। दिवोदासके पुत्र ब्रह्मर्षि मित्रयु हुए। मित्रयुसे मैत्रायणका जन्म हुआ। मैत्रायणसे सोम हुए। सोमके वंशज मैत्रेय कहे गये हैं। ये भार्गव-पक्षका आश्रय लेकर क्षत्रोपेत भार्गव कहलाये

अध्याय 32

श्लोक 37

मैत्रायणस्ततः सोमो मैत्रेयास्तु ततः स्मृताः ।एते हि संश्रिताः पक्षं क्षत्रोपेतास्तु भार्गवाः

maitrāyaṇastataḥ somo maitreyāstu tataḥ smṛtāḥ | ete hi saṃśritāḥ pakṣaṃ kṣatropetāstu bhārgavāḥ

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 38

आसीत् पञ्चजनः पुत्रः सृञ्जयस्य महात्मनः ।सुतः पञ्चजनस्यापि सोमदत्तो महीपतिः

āsīt pañcajanaḥ putraḥ sṛñjayasya mahātmanaḥ | sutaḥ pañcajanasyāpi somadatto mahīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

महात्मा सृझयके पश्नजन नामक पुत्र हुआ और पद्नजनके पुत्र पृथ्वीपति सोमदत्त हुए

अध्याय 32

श्लोक 39

सोमदत्तस्य दायादः सहदेवो महायशाः ।सहदेवसुतश्चापि सोमको नाम पार्थिवः

somadattasya dāyādaḥ sahadevo mahāyaśāḥ | sahadevasutaścāpi somako nāma pārthivaḥ

हिन्दी अर्थ

सोमदत्तके पुत्र महायशस्वी सहदेव थे और सहदेवके पुत्र राजा सोमक हुए

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 40

अजमीढात् पुनर्जातः क्षीणवंशे तु सोमकः ।सोमकस्य सुतो जन्तुर्यस्य पुत्रशतं बभौ

ajamīḍhāt punarjātaḥ kṣīṇavaṃśe tu somakaḥ | somakasya suto janturyasya putraśataṃ babhau

हिन्दी अर्थ

अजमीढवंशी सहदेवसे सोमकका जन्म उस अवस्थामें हुआ जब कि उनकी वंश-परम्परा क्षीण हो चली थी। सोमकके पुत्रका नाम जन्तु था। जिसके स्थानपर सोमकके सौ पुत्र हो गये*

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 41

तेषां यवीयान् पृषतो द्रुपदस्य पिता प्रभुः ।धृष्टद्युम्नस्तु द्रुपदाद् धृष्टकेतुश्च तत्सुतः

teṣāṃ yavīyān pṛṣato drupadasya pitā prabhuḥ | dhṛṣṭadyumnastu drupadād dhṛṣṭaketuśca tatsutaḥ

श्लोक 41–42 का हिन्दी अर्थ

उनमें सबसे छोटे थे पृषत, जो राजा द्रुपदके प्रभावशाली पिता थे। द्रुपदसे धृष्टद्युप्न और धृष्टुप्नसे धृष्टकेतुका जन्म हुआ। ये महामनस्वी क्षत्रयि अजमीढ और सोमक कहे गये हैं। महामना अजमीढके संतानोंकी ही सोमक संज्ञा हुई

अध्याय 32

श्लोक 42

अजमीढाः स्मृता ह्येते महात्मानस्तु सोमकाः ।पुत्राणामजमीढस्य सोमकत्वं महात्मनः

ajamīḍhāḥ smṛtā hyete mahātmānastu somakāḥ | putrāṇāmajamīḍhasya somakatvaṃ mahātmanaḥ

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 43

महिषी त्वजमीढस्य धूमिनी पुत्रगृद्धिनी ।तृतीया तव पूर्वेषां जननी पृथिवीपते

mahiṣī tvajamīḍhasya dhūminī putragṛddhinī | tṛtīyā tava pūrveṣāṃ jananī pṛthivīpate

हिन्दी अर्थ

राजा अजमीढकी जो धूमिनी नामवाली तीसरी रानी थीं, उनके मनमें पुत्रकी बड़ी लालसा थी। पृथिवीपते ! वे ही तुम्हारे पूर्वजोंकी जननी हुईं

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 44

सा तु पुत्रार्थिनी देवी व्रतचर्यासमन्विता ।ततो वर्षायुतं तप्त्वा तपः परमदुश्चरम्

sā tu putrārthinī devī vratacaryāsamanvitā | tato varṣāyutaṃ taptvā tapaḥ paramaduścaram

श्लोक 44–45 का हिन्दी अर्थ

उनकी सौ स्त्रियोंके गर्भसे एक-एक करके सौ पुत्र उत्पन्न हुए। श्५५्‌ जनमेजय! पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाली धूमिनी देवी ब्रतका पालन करने लगीं। वे दस हजार वर्षोतक अत्यन्त दुष्कर तपस्या करती हुई विधिपूर्वक अग़्िमें आइुति देतीं, पवित्रतापूर्वक परिमित भोजन करतीं और अग्रिहोत्रके कुशों पर ही सोतीं

अध्याय 32

श्लोक 45

हुत्वाग्निं विधिवत् सा तु पवित्रमितभोजना ।अग्निहोत्रकुशेष्वेव सुष्वाप जनमेजय

hutvāgniṃ vidhivat sā tu pavitramitabhojanā | agnihotrakuśeṣveva suṣvāpa janamejaya

अर्थ श्लोक 44 के साथ

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 46

धूमिन्या स तया देव्या त्वजमीढः समेयिवान् ।ऋक्षं सञ्जनयामास धूमवर्णं सुदर्शनम्

dhūminyā sa tayā devyā tvajamīḍhaḥ sameyivān | ṛkṣaṃ sañjanayāmāsa dhūmavarṇaṃ sudarśanam

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर राजा अजमीढने देवी धूमिनीके साथ समागम किया। इससे उन्होंने ऋक्ष नामक पुत्रको जन्म दिया। ऋ्श्ष धूम्रके समान वर्णवाले एवं सुन्दर दर्शनीय पुरुष थे

अध्याय 32

श्लोक 47

ऋक्षात् संवरणो जज्ञे कुरुः संवरणात् तथा ।यः प्रयागादतिक्रम्य कुरुक्षेत्रं चकार ह

ṛkṣāt saṃvaraṇo jajñe kuruḥ saṃvaraṇāt tathā | yaḥ prayāgādatikramya kurukṣetraṃ cakāra ha

हिन्दी अर्थ

ऋक्षसे संवरण और संवरणसे कुरु उत्पन्न हुए। जिन्होंने प्रयागसे जाकर कुरुक्षेत्रकी स्थापना की

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 48

तद्वै तत्स महाभागो वर्षाणि सुबहून्यथ ।तप्यमाने तदा शक्रो यत्रास्य वरदो बभौ

tadvai tatsa mahābhāgo varṣāṇi subahūnyatha | tapyamāne tadā śakro yatrāsya varado babhau

हिन्दी अर्थ

महाभाग कुरुने उस क्षेत्रमें बहुत वर्षोतंक तप किया। उनके तप करते समय वरदायक भगवान्‌ इन्द्रने वहाँ जाकर उन्हें वर प्रदान किया

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 49

पुण्यं च रमणीयं च पुण्यकृद्भिर्निषेवितम् ।तस्यान्ववायःसुमहांस्तस्य नाम्ना स्थ कौरवाः

puṇyaṃ ca ramaṇīyaṃ ca puṇyakṛdbhirniṣevitam | tasyānvavāyaḥsumahāṃstasya nāmnā stha kauravāḥ

हिन्दी अर्थ

वह पवित्र एवं रमणीय क्षेत्र पुण्यात्माओंद्वारा सेवित है। कुरुका वंश बहुत बड़ा है। तुमलोग कुरुके ही नामसे कौरव कहलाते हो

अध्याय 32

श्लोक 50

कुरोश्च पुत्राश्चत्वारः सुधन्वा सुधनुस्तथा ।परीक्षिच्च भहाबाहुः प्रवरश्चारिमेजयः

kurośca putrāścatvāraḥ sudhanvā sudhanustathā | parīkṣicca bhahābāhuḥ pravaraścārimejayaḥ

हिन्दी अर्थ

कुरुके चार पुत्र हुए—सुधन्वा, सुधनु, महाबाहु परीक्षित्‌ और श्रेष्ठ बीर अरिमेजय

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 51

सुधन्वनस्तु दायादः सुहोत्रो मतिमांस्ततः ।च्यवनस्तस्य पुत्रस्तु राजा धर्मार्थकोविदः

sudhanvanastu dāyādaḥ suhotro matimāṃstataḥ | cyavanastasya putrastu rājā dharmārthakovidaḥ

हिन्दी अर्थ

सुधन्वाके पुत्र सुहोत्र हुए। सुहोत्रके मतिमान्‌ तथा मतिमान्‌के पुत्र राजा च्यवन हुए, जो धर्म और अर्थके ज्ञाता थे

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 52

च्यवनात् कृतयज्ञस्तु इष्ट्वा यत्रैः स धर्मवित् ।विश्रुतं जनयामास पुत्रमिन्द्रसमं नृपः

cyavanāt kṛtayajñastu iṣṭvā yatraiḥ sa dharmavit | viśrutaṃ janayāmāsa putramindrasamaṃ nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

च्यवनसे कृतयज्ञ हुए। उन धर्मज्ञ नरेशने यज्ञ करके इन्द्रके समान सुविख्यात पराक्रमी पुत्रको जन्म दिया

अध्याय 32

श्लोक 53

चैद्योपरिचरं वीरं वसुं नामान्तरिक्षगम् ।चैद्योपरिचराज्जज्ञे गिरिका सप्त मानवान्

caidyoparicaraṃ vīraṃ vasuṃ nāmāntarikṣagam | caidyoparicarājjajñe girikā sapta mānavān

हिन्दी अर्थ

उसका नाम था उपरिचर वसु। वे वसु चेदि देशके निवासी थे और आकाशमार्गसे चलते थे। चेदिदेशीय उपरिचर वसुसे उनकी पत्नी गिरिकाने सात मनुष्योंको उत्पन्न किया

अध्याय 32

श्लोक 54

महारथो मगधराड् विश्रुतो यो बृहद्रथः ।प्रत्यग्रहः कुशश्चैव यमाहुर्मणिवाहनम्

mahāratho magadharāḍ viśruto yo bṛhadrathaḥ | pratyagrahaḥ kuśaścaiva yamāhurmaṇivāhanam

श्लोक 54–57 का हिन्दी अर्थ

बृहद्रथका पुत्र कुशाग्र नामसे विख्यात हुआ। कुशाग्रके पुत्र वृषभ थे, जो विद्वान्‌ और बलवान्‌ थे। वृषभका पुत्र धर्मात्मा पुष्पवानू था। उसके पुत्र पराक्रमी राजा सत्यहित हुए

अध्याय 32

श्लोक 55

मारुतश्च यदुश्चैव मत्स्यः काली च सत्तमः ।बृहद्रथस्य दायादः कुशाग्रो नाम विश्रुतः

mārutaśca yaduścaiva matsyaḥ kālī ca sattamaḥ | bṛhadrathasya dāyādaḥ kuśāgro nāma viśrutaḥ

अर्थ श्लोक 54 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 56

कुशाग्रस्यात्मजो विद्वान् वृषभो नाम वीर्यवान् ।वृषभस्य तु दायादः पुष्पवान्नाम धार्मिकः

kuśāgrasyātmajo vidvān vṛṣabho nāma vīryavān | vṛṣabhasya tu dāyādaḥ puṣpavānnāma dhārmikaḥ

अर्थ श्लोक 54 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 57

दायादस्तस्य विक्रान्तो राजा सत्यहितः स्मृतः

dāyādastasya vikrānto rājā satyahitaḥ smṛtaḥ

अर्थ श्लोक 54 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 58

तस्य पुत्रोऽथ धर्मात्मा नाम्ना ऊर्जस्तु जज्ञिवान् ।ऊर्जस्य सम्भवः पुत्रो यस्य जज्ञे स वीर्यवान्

tasya putro'tha dharmātmā nāmnā ūrjastu jajñivān | ūrjasya sambhavaḥ putro yasya jajñe sa vīryavān

हिन्दी अर्थ

सत्यहितके धर्मात्मा ऊर्ज नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। ऊर्जके पुत्रका नाम सम्भव था (जिसे बुहद्रथ भी कहते हैं) । इसीसे पराक्रमी राजा (जरासंध) की उत्पत्ति हुई थी

अध्याय 32

श्लोक 59

शकले द्वे स वै जातो जरया सन्धितः स तु ।जरया सन्धितो यस्माज्जरासन्धस्ततः स्मृतः

śakale dve sa vai jāto jarayā sandhitaḥ sa tu | jarayā sandhito yasmājjarāsandhastataḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

वह आधे-आधे शरीरके दो टुकड़ोंके रूपमें (दो माताओंके गर्भसे) उत्पन्न हुआ था। इन दोनों टुकड़ोंको जरा नामवाली राक्षसीने जोड़ दिया। जरासे संघित (जोड़ा गया) होनेसे उसका नाम जरासंध हुआ

अध्याय 32

श्लोक 60

सर्वक्षत्रस्य जेतासौ जरासन्धो महाबलः ।जरासन्धस्य पुत्रो वै सहदेवः प्रतापवान्

sarvakṣatrasya jetāsau jarāsandho mahābalaḥ | jarāsandhasya putro vai sahadevaḥ pratāpavān

हिन्दी अर्थ

महाबली जरासंधने सम्पूर्ण क्षत्रिय-समुदायको जीत लिया था। उसका पुत्र प्रतापी सहदेव था

अध्याय 32

श्लोक 61

सहदेवात्मजः श्रीमानुदायुः स महायशाः ।उदायुर्जनयामास पुत्रं परमधार्मिकम्

sahadevātmajaḥ śrīmānudāyuḥ sa mahāyaśāḥ | udāyurjanayāmāsa putraṃ paramadhārmikam

श्लोक 61–64 का हिन्दी अर्थ

सहदेवके कान्तिमानू पुत्र महायशस्वी उदायु हुए। उदायुने श्रुतधर्मा नामक परम धर्मात्मा पुत्रको जन्म दिया, जो वैभवसम्पन्न होकर मगध देशमें निवास करता था। (कुरुके दूसरे पुत्र) परीक्षितके आत्मज धर्मात्मा जनमेजय हुए। जनमेजयके श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन—अये तीन महारथी पुत्र थे। ये सभी महाभाग राजकुमार पराक्रमी तथा बलशाली थे। जनमेजयके दो पुत्र हुए सुरथ और मतिमान्‌

अध्याय 32

श्लोक 62

श्रुतधर्मेति नामानं मगधान् योऽवसद् विभुः ।परीक्षितस्तु दायादो धार्मिको जनमेजयः

śrutadharmeti nāmānaṃ magadhān yo'vasad vibhuḥ | parīkṣitastu dāyādo dhārmiko janamejayaḥ

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 63

जनमेजयस्य दायादास्त्रय एव महा रथाः ।श्रुतसेनोग्रसेनौ च भीमसेनश्च नामतः

janamejayasya dāyādāstraya eva mahā rathāḥ | śrutasenograsenau ca bhīmasenaśca nāmataḥ

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 64

एते सर्वे महाभागा विक्रान्ता बलशालिनः ।जनमेजयस्य पुत्रौ तु सुरथो मतिमांस्तथा

ete sarve mahābhāgā vikrāntā balaśālinaḥ | janamejayasya putrau tu suratho matimāṃstathā

अर्थ श्लोक 61 के साथ

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 65

सुरथस्य तु विक्रान्तः पुत्रो जज्ञे विदूरथः ।विदूरथस्य दायाद ऋक्ष एव महारथः

surathasya tu vikrāntaḥ putro jajñe vidūrathaḥ | vidūrathasya dāyāda ṛkṣa eva mahārathaḥ

श्लोक 65–68 का हिन्दी अर्थ

सुरथके एक पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम था विदूरथ। विदूरथके महारथी पुत्रका नाम भी ऋ्ष ही था। ये दूसरे राजा थे, जो उसी (ऋक्ष) नामसे प्रसिद्ध हुए। राजन्‌ ! तुम्हारे इस वंशमें दो 'ऋक्ष' और दो ही ' परीक्षित्‌' नामके राजा हो गये हैं। तीन ' भीमसेन' और दो *जनमेजय' हुए हैं । द्वितीय ऋक्षके पुत्र भीमसेन हुए। भीमसेनके प्रतीप और प्रतीपके पुत्र शन्तनु, देवापि तथा बाह्हिक थे। ये तीनों ही महारथी वीर थे

अध्याय 32

श्लोक 66

द्वितीयः स बभौ राजा नाम्ना तेनैव संज्ञितः ।द्वावृक्षौ तव वंशेऽस्मिन्द्वावेव तु परीक्षितौ

dvitīyaḥ sa babhau rājā nāmnā tenaiva saṃjñitaḥ | dvāvṛkṣau tava vaṃśe'smindvāveva tu parīkṣitau

अर्थ श्लोक 65 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 67

भीमसेनास्त्रयो राजन् द्वावेव जनमेजयौ ।ऋक्षस्य तु द्वितीयस्य भीमसेनोऽभवत्सुतः

bhīmasenāstrayo rājan dvāveva janamejayau | ṛkṣasya tu dvitīyasya bhīmaseno'bhavatsutaḥ

अर्थ श्लोक 65 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 68

प्रतीपो भीमसेनस्य प्रतीपस्य तु शन्तनुः ।देवापिर्बाह्लिकश्चैव त्रय एव महारथाः

pratīpo bhīmasenasya pratīpasya tu śantanuḥ | devāpirbāhlikaścaiva traya eva mahārathāḥ

अर्थ श्लोक 65 के साथ

English

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अध्याय 32

श्लोक 69

शन्तनोः प्रसवस्त्वेष यत्र जातोऽसि पार्थिव ।बाह्लिकस्य तु राज्यं वै सप्तवाह्यं नरेश्वर

śantanoḥ prasavastveṣa yatra jāto'si pārthiva | bāhlikasya tu rājyaṃ vai saptavāhyaṃ nareśvara

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीनाथ ! यह शन्तनुका कुल है, जिसमें तुम्हारा जन्म हुआ है। नरेश्र! बाहिकका राज्य सप्तवाह्य (मन्त्री आदि सात अज्ोंद्वारा संचालित होने योग्य) था

अध्याय 32

श्लोक 70

बाह्लिकस्य सुतश्चैव सोमदत्तो महायशाः ।जज्ञिरे सोमदत्तात्तु भूरिर्भूरिश्रवाः शलः

bāhlikasya sutaścaiva somadatto mahāyaśāḥ | jajñire somadattāttu bhūrirbhūriśravāḥ śalaḥ

हिन्दी अर्थ

बाहिकके पुत्र महायशस्वी सोमदत्त हुए। सोमदत्तसे भूरि, भूरिश्रवा और शल—ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 71

उपाध्यायस्तु देवानां देवापिरभवन्मुनिः ।च्यवनस्य कृतः पुत्र इष्टश्चासीन्महात्मनः

upādhyāyastu devānāṃ devāpirabhavanmuniḥ | cyavanasya kṛtaḥ putra iṣṭaścāsīnmahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

देवापि देवताओंके उपाध्याय और मुनि हुए। महात्मा च्यवनने उन्हें अपना प्रिय पुत्र बना लिया था

अध्याय 32

श्लोक 72

शन्तनुस्त्वभवद् राजा कौरवाणां धुरन्धरः ।शान्तनोः सम्प्रवक्ष्यामि यत्र जातोऽसि पार्थिव

śantanustvabhavad rājā kauravāṇāṃ dhurandharaḥ | śāntanoḥ sampravakṣyāmi yatra jāto'si pārthiva

हिन्दी अर्थ

राजा शन्तनु कौरवकुलका भार वहन करनेवाले हुए। पृथ्वीनाथ! अब मैं शन्तनुके वंशका वर्णन करता हूँ, जिसमें तुम्हारा जन्म हुआ है

अध्याय 32

श्लोक 73

गाङ्गं देवव्रतं नाम पुत्रं सोऽजनयत् प्रभुः ।स तु भीष्म इति ख्यातः पाण्डवानां पितामहः

gāṅgaṃ devavrataṃ nāma putraṃ so'janayat prabhuḥ | sa tu bhīṣma iti khyātaḥ pāṇḍavānāṃ pitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रभावशाली शन्तनुने गज़ाजीके गर्भसे देवब्रत नामक पुत्रको जन्म दिया। वे ही भीष्म नामसे विख्यात हुए, जो पाण्डवोंके पितामह थे

English

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अध्याय 32

श्लोक 74

काली विचित्रवीर्यं तु जनयामास भारत ।शन्तनोर्दयितं पुत्रं धर्मात्मानमकल्मषम्

kālī vicitravīryaṃ tu janayāmāsa bhārata | śantanordayitaṃ putraṃ dharmātmānamakalmaṣam

हिन्दी अर्थ

भारत! उनकी दूसरी पत्नी काली (सत्यवती)-ने शन्तनुके प्रिय पुत्र विचित्रवीर्यको उत्पन्न किया, जो पापशून्य तथा धर्मात्मा थे

अध्याय 32

श्लोक 75

कृष्णद्वैपायनश्चैव क्षेत्रे वैचित्रवीर्यके ।धृतराष्ट्रं च पाण्डुं च विदुरं चाप्यजीजनत्

kṛṣṇadvaipāyanaścaiva kṣetre vaicitravīryake | dhṛtarāṣṭraṃ ca pāṇḍuṃ ca viduraṃ cāpyajījanat

हिन्दी अर्थ

विचित्रवीर्यके क्षेत्र (अर्थात्‌ उनकी पत्नियोंके गर्भ) - से श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीने धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरको उत्पन्न किया था

अध्याय 32

श्लोक 76

धृतराष्ट्रश्च गान्धार्यां पुत्रानुत्पादयच्छतम् ।तेषां दुर्योधनः श्रेष्ठः सर्वेषामेव स प्रभुः

dhṛtarāṣṭraśca gāndhāryāṃ putrānutpādayacchatam | teṣāṃ duryodhanaḥ śreṣṭhaḥ sarveṣāmeva sa prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

धृतराष्ट्रने गान्धारीके गर्भसे सौ पुत्र उत्पन्न किये। उन सबमें दुर्योधन ही श्रेष्ठ और प्रभावशाली था

अध्याय 32

श्लोक 77

पाण्डोर्धनञ्जयः पुत्रः सौभद्रस्तस्य चात्मजः ।अभिमन्योः परीक्षित् तु पिता तव जनेश्वर

pāṇḍordhanañjayaḥ putraḥ saubhadrastasya cātmajaḥ | abhimanyoḥ parīkṣit tu pitā tava janeśvara

हिन्दी अर्थ

पाण्डुके पुत्र धनब्जय (अर्जुन) हुए। धनञ्जयसे सुभद्राकुमार अभिमन्युका जन्म हुआ। जनेश्वर! अभिमन्युके पुत्र तुम्हारे पिता परीक्षितू थे

English

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अध्याय 32

श्लोक 78

एष ते पौरवो वंशो यत्र जातोऽसि पार्थिव ।तुर्वसोस्तु प्रवक्ष्यामि द्रुह्योश्चानोर्यदोस्तथा

eṣa te pauravo vaṃśo yatra jāto'si pārthiva | turvasostu pravakṣyāmi druhyoścānoryadostathā

हिन्दी अर्थ

जनमेजय! यह तुमसे पौरववंशका वर्णन किया गया, जिसमें तुम्हारा जन्म हुआ है। अब तुर्वसु, द्र्यु, अनु और यदुकी संततिका वर्णन करूँगा

English

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अध्याय 32

श्लोक 79

सुतस्तु तुर्वसोर्वह्निर्वह्नेर्गोभानुरात्मजः ।गोभानोस्तु सुतो राजा त्रैसानुरपराजितः

sutastu turvasorvahnirvahnergobhānurātmajaḥ | gobhānostu suto rājā traisānuraparājitaḥ

हिन्दी अर्थ

तुर्वसुके पुत्र वहि और वहिके गोभानु हुए। गोभानुके पुत्र राजा त्रैसानु थे, जो कभी परास्त नहीं होते थे

अध्याय 32

श्लोक 80

करन्धमस्तु त्रैसानोर्मरुत्तस्तस्य चात्मजः ।अन्यस्त्वावीक्षितो राजा मरुत्तः कथितस्तव

karandhamastu traisānormaruttastasya cātmajaḥ | anyastvāvīkṣito rājā maruttaḥ kathitastava

हिन्दी अर्थ

त्रैसानुके करन्धम और करन्धमके पुत्र मरुत्त हुए। अवीक्षितके पुत्र राजा मरुत्त दूसरे हैं। उनका परिचय तुम्हें दिया जा चुका है*

अध्याय 32

श्लोक 81

अनपत्योऽभवद् राजा यज्वा विपुलदक्षिणः ।दुहिता सम्मता नाम तस्यासीत् पृथिवीपते

anapatyo'bhavad rājā yajvā vipuladakṣiṇaḥ | duhitā sammatā nāma tasyāsīt pṛthivīpate

हिन्दी अर्थ

ये करन्धम-पुत्र राजा मरुत्त पुत्रहीन थे। ये बड़े-बड़े यज्ञ करते और उनमें प्रचुर दक्षिणाएँ देते थे। पृथिवीपते ! उनके एक पुत्री थी, जिसका नाम सम्मता था

English

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अध्याय 32

श्लोक 82

दक्षिणार्थं स्म वै दत्ता संवर्ताय महात्मने ।दुष्यन्तं पौरवं चापि लेभे पुत्रमकल्मषम्

dakṣiṇārthaṃ sma vai dattā saṃvartāya mahātmane | duṣyantaṃ pauravaṃ cāpi lebhe putramakalmaṣam

हिन्दी अर्थ

उन्होंने महात्मा संवर्तको अपनी वह कन्या ही दक्षिणारूपमें दे दी थी। (फिर संवर्तने दुष्यन्तके पिताको वह कन्या अर्पित कर दी। उनके संयोगसे) सम्मताने पुरुवंशी दुष्यन्तको पुत्ररूपमें प्राप्त किया। दुष्यन्त निष्पाप राजा थे

अध्याय 32

श्लोक 83

एवं ययातेः शापेन जरासङ्क्रमणे तदा ।पौरवं तुर्वसोर्वंशं प्रविवेश नृपोत्तम

evaṃ yayāteḥ śāpena jarāsaṅkramaṇe tadā | pauravaṃ turvasorvaṃśaṃ praviveśa nṛpottama

हिन्दी अर्थ

नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार पुत्रोंको अपना बुढ़ापा लेनेके लिये कहते समय ययातिने जो शाप दिया था, उसके अनुसार तुर्वसुका वंश समाप्त होकर पौरववंशमें विलीन हो गया

अध्याय 32

श्लोक 84

दुष्यन्तस्य तु दायादः करुत्थामः प्रजेश्वरः ।करुत्थामात्तथाऽऽक्रीडश्चत्वारस्तस्य चात्मजाः

duṣyantasya tu dāyādaḥ karutthāmaḥ prajeśvaraḥ | karutthāmāttathā''krīḍaścatvārastasya cātmajāḥ

श्लोक 84–85 का हिन्दी अर्थ

दुष्यन्तके (शकुन्तलासे भिन्न दूसरी रानीके गर्भसे) राजा करुत्थाम हुए। करुत्थामसे आक्रीडका जन्म हुआ। उसके चार पुत्र थे-पाण्ड्य, केरल, कोल तथा राजा चोल। उनके समृद्धिशाली प्रदेश भी उन्हींके नामपर पाण्ड्य, चोल और केरल कहलाये

अध्याय 32

श्लोक 86

पाण्ड्यश्च केरलश्चैव कोलश्चोलश्च पार्थिवः ।तेषां जनपदाः स्फीताः पाण्ड्याश्चोलाः सकेरलाः ८५ द्रुह्योश्च तनयो राजन् बभ्रुः सेतुश्च पार्थिवः ।अङ्गारसेतुस्तत्पुत्रो मरुतां पतिरुच्यते

pāṇḍyaśca keralaścaiva kolaścolaśca pārthivaḥ | teṣāṃ janapadāḥ sphītāḥ pāṇḍyāścolāḥ sakeralāḥ 85 druhyośca tanayo rājan babhruḥ setuśca pārthivaḥ | aṅgārasetustatputro marutāṃ patirucyate

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! ययातिकुमार द्रु्युके पुत्र राजा बभ्चु और सेतु हुए। सेतुके पुत्र अद्वारसेतु हुए। इन्हें मरुत्पति भी कहा जाता है

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 87

यौवनाश्वेन समरे कृच्छ्रेण निहतो बली ।युद्धं सुमहदस्यासीन्मासान्परि चतुर्दश

yauvanāśvena samare kṛcchreṇa nihato balī | yuddhaṃ sumahadasyāsīnmāsānpari caturdaśa

हिन्दी अर्थ

युवनाश्वके पुत्र मान्धाताके साथ इनका चौदह महीनोंतक बड़ा भारी युद्ध हुआ। उस समराड़णमें बलवान्‌ अज्ञारसेतु शत्रुद्धरा बड़ी कठिनाईसे मारे गये

अध्याय 32

श्लोक 88

अङ्गारस्य तु दायादो गान्धारो नाम भारत ।ख्यायते तस्य नाम्ना वै गान्धारविषयो महान्

aṅgārasya tu dāyādo gāndhāro nāma bhārata | khyāyate tasya nāmnā vai gāndhāraviṣayo mahān

श्लोक 88–90 का हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! अज्ञारके पुत्र गान्धार हुए। उन्हींके नामसे महान्‌ गान्धारदेशकी ख्याति हुई। प्रमेधिकपर्व ( अध्याय ६-१० तक) । गान्धारदेशके घोड़े सब घोड़ोंसे श्रेष्ठ माने गये हैं । ययातिपुत्र अनुके पुत्र धर्म हुए और धर्मके पुत्र धृत, धृतसे दुदुहका जन्म हुआ । दुदुहके पुत्र प्रचेता और प्रचेताके पुत्र सुचेता हुए। इस प्रकार मैंने (संश्षेपसे) अनुवंशका वर्णन किया है

अध्याय 32

श्लोक 89

गान्धारदेशजाश्चैव तुरगा वाजिनां वराः ।अनोस्तु पुत्रो धर्मोऽभूद् धृतस्तस्यात्मजोऽभवत्

gāndhāradeśajāścaiva turagā vājināṃ varāḥ | anostu putro dharmo'bhūd dhṛtastasyātmajo'bhavat

अर्थ श्लोक 88 के साथ

अध्याय 32

श्लोक 90

धृतात् तु दुदुहो जज्ञे प्रचेतास्तस्य चात्मजः ।प्रचेतसः सुचेतास्तु कीर्तितो ह्यानवो मया

dhṛtāt tu duduho jajñe pracetāstasya cātmajaḥ | pracetasaḥ sucetāstu kīrtito hyānavo mayā

अर्थ श्लोक 88 के साथ

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय 32

श्लोक 91

यदोर्वंशं प्रवक्ष्यामि ज्येष्ठस्योत्तमतेजसः ।विस्तरेणानुपूर्व्यात्तु गदतो मे निशामय

yadorvaṃśaṃ pravakṣyāmi jyeṣṭhasyottamatejasaḥ | vistareṇānupūrvyāttu gadato me niśāmaya

हिन्दी अर्थ

अब मैं ययातिके ज्येष्ठ पुत्र उत्तम तेजस्वी यदुके वंशका क्रमश: विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा । तुम मेरे मुखसे इसको सुनो

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

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शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.