Harivamsha Purana
303
अध्याय 303 / 318

Parva 3, Adhyāya 120

19 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ19 श्लोक

अध्याय 303

श्लोक 1

भगवता श्रीकृष्णेन यादवसेनासहितं पुष्करतीर्थं गत्वा हंसडिम्बकयोः प्रतीक्षणं प्रविश्य स पुरं विष्णोः सात्यकिः शिनिपुङ्गवः ।आचचक्षेऽथ कृष्णाय यथा वृत्तं तयोस्तथा

bhagavatā śrīkṛṣṇena yādavasenāsahitaṃ puṣkaratīrthaṃ gatvā haṃsaḍimbakayoḥ pratīkṣaṇaṃ praviśya sa puraṃ viṣṇoḥ sātyakiḥ śinipuṅgavaḥ | ācacakṣe'tha kṛṣṇāya yathā vṛttaṃ tayostathā

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! शिनिवंश- शिरोमणि सात्यकिने श्रीकृष्णपुरीमें प्रवेश करके उनसे हंस और डिम्भकका सारा समाचार ज्यों -का-त्यों कह सुनाया

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श्लोक 2

ततः प्रभाते विमले केशवः केशिसूदनः ।बलाध्यक्षानुवाचेदं चक्रपाणिर्गदाधरः

tataḥ prabhāte vimale keśavaḥ keśisūdanaḥ | balādhyakṣānuvācedaṃ cakrapāṇirgadādharaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर निर्मल प्रात:काल आनेपर हाथमें चक्र और गदा धारण करनेवाले केशिहन्ता केशवने समस्त _ सेनापतियोंसे इस प्रकार कहा—

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श्लोक 3

सन्नह्यतां बलं सर्वं रथकुञ्जरवाजिमत् ।अनेकभेरीपणवं प्रासासिपरिघाकुलम्

sannahyatāṃ balaṃ sarvaṃ rathakuñjaravājimat | anekabherīpaṇavaṃ prāsāsiparighākulam

श्लोक 3–5 का हिन्दी अर्थ

रथ, हाथी और घोड़ोंसे युक्त सारी सेनाको युद्धके लिये तैयार करो। उसके साथ अनेकानेक भेरी, पणव आदि बाजे भी होने चाहिये। प्रास, खड्ग और परिघ आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे वह सेना सम्पन्न होनी चाहिये । ध्वजा, पताका, अलड्लार तथा अन्य आवश्यक उपकरणोंसे सारी सेनाको सुसब्चित किया जाय'। तब 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीकृष्णके अधीन रहनेवाले उन सेनापतियोंने सब कुछ उसी प्रकार किया। वे पुरुषप्रवर वीर कवच धारण करके रथपर आरूढ़ हो सुदृढ़ धनुष ले सेनाके आगे-आगे तीव्रगतिसे चलने लगे

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श्लोक 4

सध्वजं सपताकं च सालङ्कारपरिच्छदम् ।ते तथेति प्रतिज्ञाय सर्वं चक्रुरधीनगाः

sadhvajaṃ sapatākaṃ ca sālaṅkāraparicchadam | te tatheti pratijñāya sarvaṃ cakruradhīnagāḥ

अर्थ श्लोक 3 के साथ

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श्लोक 5

आदाय सुदृढं चापं रथमारुह्य दंशिताः ।अग्रतो जग्मुरत्यर्थं सेनायाः पुरुषोत्तमाः

ādāya sudṛḍhaṃ cāpaṃ rathamāruhya daṃśitāḥ | agrato jagmuratyarthaṃ senāyāḥ puruṣottamāḥ

अर्थ श्लोक 3 के साथ

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श्लोक 6

सात्यकिश्च तथा राजन् प्रगृहीतशरासनः ।बभौ क्रोधसमायुक्तो जगामाग्रे महाबलः

sātyakiśca tathā rājan pragṛhītaśarāsanaḥ | babhau krodhasamāyukto jagāmāgre mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! महाबली सात्यकि भी धनुष हाथमें लेकर अद्भुत शोभा पाने लगे । वे क्रोधमें भरकर आगे-आगे चले

अध्याय 303

श्लोक 7

अन्ये च यादवाः शूरा प्रगृहीतमहायुधाः ।सिंहनादं प्रकुर्वन्तो जग्मुरत्यर्थमुत्तमाः

anye ca yādavāḥ śūrā pragṛhītamahāyudhāḥ | siṃhanādaṃ prakurvanto jagmuratyarthamuttamāḥ

हिन्दी अर्थ

अन्य श्रेष्ठ एवं शूरवीर यादव भी महान्‌ आयुध लेकर सिंहनाद करते हुए तीव्रगतिसे चल दिये

अध्याय 303

श्लोक 8

हरिस्तु रथमारुह्य संस्कृतं दारुकेण ह ।शार्ङ्गं भारसहं घोरं गृहीत्वा सशरं धनुः

haristu rathamāruhya saṃskṛtaṃ dārukeṇa ha | śārṅgaṃ bhārasahaṃ ghoraṃ gṛhītvā saśaraṃ dhanuḥ

हिन्दी अर्थ

ततमो5ध्याय: + १३४५ भगवान्‌ श्रीकृष्ण दारुकके द्वारा सुसज्जित किये गये रथपर आरूढ़ हो, भार सहन करनेमें समर्थ भयड्र शा धनुष और बाण लेकर प्रस्थित हुए

अध्याय 303

श्लोक 9

चक्रपाणिस्तदा शङ्खी गदाशरवरासिमान् ।बद्धगोधाङ्गुलित्राणः पीतवासा जनार्दनः

cakrapāṇistadā śaṅkhī gadāśaravarāsimān | baddhagodhāṅgulitrāṇaḥ pītavāsā janārdanaḥ

श्लोक 9–10 का हिन्दी अर्थ

उस समय उनके हाथोंमें शड्ढ, चक्र, गदा, बाण और उत्तम खड्ग शोभा पाते थे। उन्होंने हाथोंमें गोह-चर्मके बने दस्ताने भी बाँध रखे थे। वे पीताम्बरधारी जनार्दन नूतन जलधरके समान श्याम कान्तिसे सुशोभित थे। उनका वक्ष:स्थल कमलपुष्पोंकी मालासे आच्छादित था। वे रथपर बैठकर आनन्दमग्र ब्राह्मणोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए जा रहे थे

अध्याय 303

श्लोक 10

पद्ममालावृतोरस्को नवजीमूतसन्निभः ।ययौ रथगतो विप्रैः स्तूयमानो मुदान्वितैः

padmamālāvṛtorasko navajīmūtasannibhaḥ | yayau rathagato vipraiḥ stūyamāno mudānvitaiḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 303

श्लोक 11

सूतैर्मागधपुत्रैश्च गीयमानस्ततस्ततः ।आनीय सेनां सकलां ययौ काष्ठामथोत्तराम्

sūtairmāgadhaputraiśca gīyamānastatastataḥ | ānīya senāṃ sakalāṃ yayau kāṣṭhāmathottarām

हिन्दी अर्थ

जहाँ-तहाँ सूत, मागध और बन्दीजन उनके गुण गाते रहते थे। उन्होंने सारी सेनाको एकत्रित करके उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया

अध्याय 303

श्लोक 12

पाञ्चजन्यं मुखे न्यस्य सर्वप्राणेन केशवः ।दध्मौ महारवं कुर्वञ्छत्रूणां भयवर्धनम्

pāñcajanyaṃ mukhe nyasya sarvaprāṇena keśavaḥ | dadhmau mahāravaṃ kurvañchatrūṇāṃ bhayavardhanam

हिन्दी अर्थ

पाज्ञजन्य श्भुको अपने मुखपर रखकर केशवने सम्पूर्ण प्राणशक्ति लगाकर उसे बड़े जोरसे बजाया। उसका महान्‌ शब्द प्रकट करके वे शत्रुओंके भयकी वृद्धि करने लगे

अध्याय 303

श्लोक 13

आध्मातस्तेन हरिणा स चक्रे शङ्खराट् ध्रुवम् ।रवः स रोदसी राजन् पूरयामास सर्वतः

ādhmātastena hariṇā sa cakre śaṅkharāṭ dhruvam | ravaḥ sa rodasī rājan pūrayāmāsa sarvataḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌!! श्रीहरिकि बजानेपर उस शज्भुराज पाज्ञजन्यने महानाद किया । उसका वह शब्द पृथ्वी और आकाशमें सब ओर व्याप्त हो गया

अध्याय 303

श्लोक 14

तस्मिञ्छङ्खे तथाऽऽध्माते दध्मुः शङ्खान्सहस्रशः ।भेर्यश्चापि समाध्माता मृदङ्गा बहवो नृप

tasmiñchaṅkhe tathā''dhmāte dadhmuḥ śaṅkhānsahasraśaḥ | bheryaścāpi samādhmātā mṛdaṅgā bahavo nṛpa

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! पाज्चजन्य श्डुके उस प्रकार बजाये जानेपर दूसरे-दूसरे वीरोंने भी सहसत्रों शड् बजाये। बहुत-सी भेरियाँ और मृदज् भी बज उठे

अध्याय 303

श्लोक 15

नेदुरत्यर्थमतुलं घर्मान्ते जलदा यथा ।अथाययुर्महाराज पुष्करं पुण्यवर्धनम्

neduratyarthamatulaṃ gharmānte jaladā yathā | athāyayurmahārāja puṣkaraṃ puṇyavardhanam

हिन्दी अर्थ

महाराज! वर्षा-कऋतुमें जोर-जोरसे गर्जना करनेवाले मेर्घोकी भाँति वे मृदज् आदि बाजे अनुपम गम्भीर स्वरमें बजने लगे। इस प्रकार समस्त यादव सैनिक पुण्यवर्धक पुष्करतीर्थमें आ पहुँचे

अध्याय 303

श्लोक 16

सरसस्तस्य राजेन्द्र पुष्करस्य नृपोत्तमाः ।प्रतीक्ष्य हंसडिम्भकौ युद्धाय समवस्थिताः

sarasastasya rājendra puṣkarasya nṛpottamāḥ | pratīkṣya haṃsaḍimbhakau yuddhāya samavasthitāḥ

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! वे नृपश्रेष्ठ यादव वीर युद्धके लिये हंस और डिम्भककी प्रतीक्षा करते हुए उस पुष्कर सरोवरके तटपर ठहर गये

अध्याय 303

श्लोक 17

निवेशं कारयामासुर्यादवाः सर्व एव हि ।स्वं स्वं ययुः सुखं राजन् प्रगृहीतकुटीमठम्

niveśaṃ kārayāmāsuryādavāḥ sarva eva hi | svaṃ svaṃ yayuḥ sukhaṃ rājan pragṛhītakuṭīmaṭham

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! सभी यादवोंने वहाँ सेनाकी छावनी डाल दी। सब लोग अपने-अपने लिये स्वीकृत कुटी और मठ आठिमें सुखपूर्वक गये

अध्याय 303

श्लोक 18

भगवानपि गोविन्दः सरो दृष्ट्वा सुशोभनम् ।उपस्पृश्य जले तस्मिन् प्रणम्य यतिपुङ्गवान्

bhagavānapi govindaḥ saro dṛṣṭvā suśobhanam | upaspṛśya jale tasmin praṇamya yatipuṅgavān

श्लोक 18–19 का हिन्दी अर्थ

उस शोभाशाली सरोवरको देखकर भगवान्‌ गोविन्दने भी उसके जलमें आचमन किया और वहाँ रहनेवाले श्रेष्ठ यतियोंको नमस्कार करके हंस और डिम्भकके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए उसके तटपर सुखपूर्वक बैठे। वे भगवान्‌ श्रीकृष्ण वहाँ सब ओर ब्राह्मणोंकी वेद-ध्वनि सुन रहे थे

अध्याय 303

श्लोक 19

तयोरागमनं लिप्सुरास्ते तीरे यथासुखम् ।शृण्वन् वेदध्वनिं विष्णुर्ब्राह्मणानां समन्ततः

tayorāgamanaṃ lipsurāste tīre yathāsukham | śṛṇvan vedadhvaniṃ viṣṇurbrāhmaṇānāṃ samantataḥ

अर्थ श्लोक 18 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

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6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
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