Harivamsha Purana
301
अध्याय 301 / 318

Parva 3, Adhyāya 118

48 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ48 श्लोक

अध्याय 301

श्लोक 1

जनार्दनेन हंसं श्रीकृष्णदर्शनजनितस्य उल्लासस्य कथनं, द्वारकायां हंसस्य सन्देशस्य प्रतिक्रियां वर्णयित्वा तं राजसूय अकरणस्य परामर्शं, हंसेन तं रोषपूर्वकं तिरस्कृत्य गमनस्यादेशं, तदनन्तरं सात्यकिना हंसं श्रीकृष्णस्य सन्देशं श्रावयित्वा भर्त्सनम ।इत्युक्तवति हंसे च धर्मात्माथ जनार्दनः ।उवाच प्रहसन् वीरः स्तुवन् नारायणं सदा

janārdanena haṃsaṃ śrīkṛṣṇadarśanajanitasya ullāsasya kathanaṃ, dvārakāyāṃ haṃsasya sandeśasya pratikriyāṃ varṇayitvā taṃ rājasūya akaraṇasya parāmarśaṃ, haṃsena taṃ roṣapūrvakaṃ tiraskṛtya gamanasyādeśaṃ, tadanantaraṃ sātyakinā haṃsaṃ śrīkṛṣṇasya sandeśaṃ śrāvayitvā bhartsanama | ityuktavati haṃse ca dharmātmātha janārdanaḥ | uvāca prahasan vīraḥ stuvan nārāyaṇaṃ sadā

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! हंसके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा वीर जनार्दनने, जो. नारायण- स्वरूप श्रीकृष्णकी सदा स्तुति करता था, हँसते हुए कहा—

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श्लोक 2

अद्राक्षमद्राक्षमहं जनार्दनं हस्तस्थशङ्खं वरचक्रधारिणम् ।आतप्तजाम्बूनदभूषिताङ्गदं स्फुरत्प्रभाद्योतितरत्नधारिणम्

adrākṣamadrākṣamahaṃ janārdanaṃ hastasthaśaṅkhaṃ varacakradhāriṇam | ātaptajāmbūnadabhūṣitāṅgadaṃ sphuratprabhādyotitaratnadhāriṇam

हिन्दी अर्थ

हाँ! मैंने उन जनार्दनका दर्शन किया है! दर्शन किया है!! जिनके एक हाथमें शड्ड शोभा पाता है तथा जो दूसरे हाथमें श्रेष्ठ चक्र धारण करते हैं, जिनका बाजूबन्द तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्णसे भूषित है तथा जो झलमलाती हुई प्रभासे प्रकाशित रत्र (कौस्तुभमणि) धारण करते हैं

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श्लोक 3

अद्राक्षमेनं यदुभिः पुरातनः संसेव्यमानं मुनिवृन्दमुख्यैः ।संस्तूयमानं प्रभुभिः समागधैः स्मितप्रवालाधरपल्लवारुणम्

adrākṣamenaṃ yadubhiḥ purātanaḥ saṃsevyamānaṃ munivṛndamukhyaiḥ | saṃstūyamānaṃ prabhubhiḥ samāgadhaiḥ smitapravālādharapallavāruṇam

हिन्दी अर्थ

मैंने इन भगवान्‌ श्रीकृष्णका दर्शन किया है, जिनकी सेवामें पुरातन यादव-वीर तथा मुख्य- मुख्य मुनिवृन्द उपस्थित रहते हैं, मागधोंसहित बहुत- से राजा भी इनकी स्तुति करते हैं, मूँगे तथा नूतन पल्ललके समान इनका अरुण अधर मन्द मुसकानकी आभासे प्रकाशित होता रहता है

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श्लोक 4

अद्राक्षमेनं कविभिः पुरातनैर्विविच्य वेद्यं विधिवत्सहामरैः ।प्रफुल्लनीलोत्पलशोभितं श्रिया विनिद्रहेमाब्जविराजितोदरम्

adrākṣamenaṃ kavibhiḥ purātanairvivicya vedyaṃ vidhivatsahāmaraiḥ | praphullanīlotpalaśobhitaṃ śriyā vinidrahemābjavirājitodaram

हिन्दी अर्थ

प्राचीन विद्वान्‌ ऋषि-मुनि देवताओंके साथ बैठकर जिनके स्वरूपका विधिपूर्वक विवेचन करके उसे जाननेके योग्य बताते हैं, जो खिले हुए नीलकमलके समान श्यामकान्तिसे सुशोभित हैं तथा जिनका उदर विकसित सुवर्णमय कमलसे सुशोभित होता है, उन्हीं पद्मनाभस्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्णका मैंने दर्शन किया है

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श्लोक 5

भूयोऽहमद्राक्षमजं जगद्गुरुं प्रमोदयन्तं वचनेन यादवान् ।निरूपयन्तं विधिवन्मुनीश्वरैः प्रवृत्तवेदार्थविधिं पुरातनैः

bhūyo'hamadrākṣamajaṃ jagadguruṃ pramodayantaṃ vacanena yādavān | nirūpayantaṃ vidhivanmunīśvaraiḥ pravṛttavedārthavidhiṃ purātanaiḥ

हिन्दी अर्थ

मैंने बारम्बार उन अजन्मा जगदूगुरुका दर्शन किया, जो अपनी वाणीद्वारा यादवोंको आनन्द प्रदान कर रहे थे और प्राचीन मुनीधरोंके साथ प्रवृत्तिमार्ग-सम्बन्धी वेदार्थके विधानका विधिपूर्वक निरूपण करते थे

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श्लोक 6

अद्राक्षमद्राक्षमहं पुनः पुनः समस्तलोकैकहितैषिणं हरिम् ।वसन्तमस्मिञ्जगतो हिताय जगन्मयं तान् परिभूय शत्रून्

adrākṣamadrākṣamahaṃ punaḥ punaḥ samastalokaikahitaiṣiṇaṃ harim | vasantamasmiñjagato hitāya jaganmayaṃ tān paribhūya śatrūn

हिन्दी अर्थ

मैंने समस्त लोकोंके एकमात्र हितैषी उन जगन्मय श्रीहरिका बारम्बार दर्शन किया है, जो जगत्‌के हितके लिये इसके समस्त शत्रुओंको पराजित करके इस भूलोकमें निवास करते हैं

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श्लोक 7

भूयोऽप्यपश्यं सह यादवेश्वरैर्विक्रीडमानं च विहारकाले ।रमन्तमीड्यं रमयन्तमीश्वरान् यदूत्तमान् यादवमुख्यमीश्वरम्

bhūyo'pyapaśyaṃ saha yādaveśvarairvikrīḍamānaṃ ca vihārakāle | ramantamīḍyaṃ ramayantamīśvarān yadūttamān yādavamukhyamīśvaram

हिन्दी अर्थ

यादवकुलके प्रधान पुरुष तथा स्तवनीय ईश्वररूप उन श्रीकृष्णका मैंने अनेक बार दर्शन किया है, जो विहारकालमें यादवेश्वरोंके साथ नाना प्रकारकी क्रीडाएँ करते हैं तथा स्वयं तो क्रोडाओंमें रत रहते ही हैं, सामर्थ्यशाली यादवशिरोमणियोंको भी उनमें प्रवृत्ति करते रहते हैं

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श्लोक 8

भूयोऽप्यपश्यं सरसीरुहेक्षणं समेतया भीष्मतनूजया हरिम् ।वसन्तमम्भोनिधिशायिनं विभुं भक्तप्रियं भक्तजनास्पदं शिवम्

bhūyo'pyapaśyaṃ sarasīruhekṣaṇaṃ sametayā bhīṣmatanūjayā harim | vasantamambhonidhiśāyinaṃ vibhuṃ bhaktapriyaṃ bhaktajanāspadaṃ śivam

हिन्दी अर्थ

श्३३९ "मैंने पुन: उन कमलनयन श्रीहरिका दर्शन किया, जो पत्नीरूपमें प्राप्त हुई भीष्मनन्दिनी रुक्मिणीदेवीके साथ द्वारकामें निवास करते हैं, नारायणरूपसे समुद्रके जलमें सोते हैं तथा जो वैभवशाली, भक्तप्रिय, भक्तजनोंके आश्रय तथा कल्याणस्वरूप हैं

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श्लोक 9

अद्राक्षमद्राक्षमहं सुनिर्वृतः पिबन् पिबंस्तस्य वपुः पुरातनम् ।नेत्रेण मीलद्विवरेण केवलं धन्योऽहमस्मीति तदा व्यचिन्तयम्

adrākṣamadrākṣamahaṃ sunirvṛtaḥ piban pibaṃstasya vapuḥ purātanam | netreṇa mīladvivareṇa kevalaṃ dhanyo'hamasmīti tadā vyacintayam

हिन्दी अर्थ

मैंने अत्यन्त आनन्दमग्र होकर बारम्बार भगवान्‌ श्रीकृष्णका दर्शन किया है और अपलक नेत्रके द्वारा उनके पुरातन श्रीअज्भकी शोभाका पान किया है। उस समय मैं अपने विषयमें केवल यही सोचता रहा कि 'मैं धन्य हो गया'

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श्लोक 10

अद्राक्षमम्भोजयुगं दधानं प्रभुं विभुं भूतमयं विभावनम् ।आद्यं ककुद्मानमुरुं विभावसुं संस्मृत्य संस्मृत्य तमेव निर्वृतः

adrākṣamambhojayugaṃ dadhānaṃ prabhuṃ vibhuṃ bhūtamayaṃ vibhāvanam | ādyaṃ kakudmānamuruṃ vibhāvasuṃ saṃsmṛtya saṃsmṛtya tameva nirvṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

मैंने देखा कि वे सर्वसमर्थ, सर्वव्यापी, भूतमय तथा सबका पालन करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपने हाथोंमें दो कमल लिये हुए थे। मैं उन्हीं माहात्म्यशाली, प्रकाशमान, आदि पुरुष एवं महान्‌ ईश्वरका बारम्बार स्मरण करके आनन्दमग्र हो रहा हूँ

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श्लोक 11

अद्राक्षं जगतामीशं वक्षोराजितकौस्तुभम् ।वीज्यमानं हरिं कृष्णं चामराणां शतैः सदा

adrākṣaṃ jagatāmīśaṃ vakṣorājitakaustubham | vījyamānaṃ hariṃ kṛṣṇaṃ cāmarāṇāṃ śataiḥ sadā

हिन्दी अर्थ

जिनके वक्ष:स्थलपर कौस्तुभमणि प्रकाशित होती है तथा जिनपर सौ-सौ चँवर डुलाये जाते हैं, उन जगदीश्वर श्रीकृष्ण हरिका मैंने दर्शन किया है

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श्लोक 12

युवां विद्वेषयुक्तेन चेतसा यादवेश्वरम् ।स्मरन्तं सर्वदा विष्णुं क्व चैवं क्व च वेत्ति कः

yuvāṃ vidveṣayuktena cetasā yādaveśvaram | smarantaṃ sarvadā viṣṇuṃ kva caivaṃ kva ca vetti kaḥ

हिन्दी अर्थ

वे यादवेश्वर विष्णु विद्वेषयुक्त चित्तसे सदा तुम दोनोंका स्मरण करते थे और जानना चाहते थे कि वे दोनों कहाँ हैं? तथा कहाँ और कौन उन्हें जानता है ?

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श्लोक 13

क्व च द्रक्ष्यामि तौ मन्दौ कुतो वा मत्पुरोगतौ ।ध्यायन्तमित्थं देवेशं करे शङ्खवहं सदा

kva ca drakṣyāmi tau mandau kuto vā matpurogatau | dhyāyantamitthaṃ deveśaṃ kare śaṅkhavahaṃ sadā

हिन्दी अर्थ

उन दोनों मू्खोंको मैं कब देखूँगा ? वे किस उपायसे मेरे सामने उपस्थित होंगे ? हाथमें श्ज लिये हुए वे देवेश्वर निरन्तर ऐसी ही बात सोच रहे थे

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श्लोक 14

हसन्तमेनमद्राक्षं करदं हास्यतत्परम् ।वदन्तं नारदे वाचं दुर्वाससि यतीश्वरे

hasantamenamadrākṣaṃ karadaṃ hāsyatatparam | vadantaṃ nārade vācaṃ durvāsasi yatīśvare

हिन्दी अर्थ

अपनेको करदाता सुनकर वे हँसने लगे और तुम्हारे उपहासमें तत्पर हो गये, उस अवस्थामें मैंने उन्हें देखा था। वे देवर्षि नारद तथा यतीश्वर दुर्वासासे बात करते थे

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श्लोक 15

ब्रह्मसूत्रपदां वाणीं दापयन्तं मुनीश्वरम् ।दृष्ट्वाहं तं हरिं देवं पुनः पुनरचिन्तयम्

brahmasūtrapadāṃ vāṇīṃ dāpayantaṃ munīśvaram | dṛṣṭvāhaṃ taṃ hariṃ devaṃ punaḥ punaracintayam

हिन्दी अर्थ

वे मुनी श्वर दुर्वासाकों ब्रह्मसूत्रके पदोंसे युक्त वेदान्तमयी वाणीका शिष्योंको उपदेश देने या पढ़ानेके लिये अनुमति दे रहे थे। उस समय उन भगवान्‌ श्रीहरिका दर्शन करके मैंने बास््बार इस प्रकार विचार किया

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श्लोक 16

असाध्यमिदमारब्धं ताभ्यामिति नृपोत्तम ।नारब्धव्यमिदं कार्यमितःप्रभृति भूमिप

asādhyamidamārabdhaṃ tābhyāmiti nṛpottama | nārabdhavyamidaṃ kāryamitaḥprabhṛti bhūmipa

हिन्दी अर्थ

मेरे उन मित्रोंने यह असाध्य कार्य आरम्भ किया है। नृपश्रेष्ठ ! भूमिपाल! अबसे आप दोनोंको इस कार्यका आरम्भ नहीं करना चाहिये

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श्लोक 17

निवृत्ता सा कथा हंसाचिन्तयद् ग्रहणं तव ।तद् वृत्तमखिलं सर्वं वदिष्यति हि सात्यकिः ।एतद् वचनमाकर्ण्य हंसः कुद्धोऽब्रवीद् वचः

nivṛttā sā kathā haṃsācintayad grahaṇaṃ tava | tad vṛttamakhilaṃ sarvaṃ vadiṣyati hi sātyakiḥ | etad vacanamākarṇya haṃsaḥ kuddho'bravīd vacaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णसे कर लेना है, यह तुम्हारी बात जब वहाँ समाप्त हो गयी, तब भगवान्‌ श्रीकृष्णने तुम्हें कैद करनेकी बात सोची थी। यह सारा वृत्तान्त सात्यकि ही तुम्हें बतायेंगे।' जनार्दनकी यह बात सुनकर हंसने कुपित होकर कहा

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श्लोक 18

अरे ब्राह्मणदायाद का नाम तव वागियम् ।आवयोः पुरतो वक्तुं त्रैलोक्यं जेतुमिच्छतोः

are brāhmaṇadāyāda kā nāma tava vāgiyam | āvayoḥ purato vaktuṃ trailokyaṃ jetumicchatoḥ

हिन्दी अर्थ

हंस बोला—अरे ओ ब्राह्मणके बेटे ! यह तुम्हारे मुखसे कैसी बात निकल रही है । तीनों लोकोंको जीतनेकी इच्छा करनेवाले हम दोनों वीरोंके आगे कहनेके लिये क्या तुम्हें यही बात मिली है

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श्लोक 19

मायया त्वां भ्रामयति कृष्णो लीलाविधानवित् ।तं दृष्ट्वा भ्रम एवैष तव सञ्जायते महान्

māyayā tvāṃ bhrāmayati kṛṣṇo līlāvidhānavit | taṃ dṛṣṭvā bhrama evaiṣa tava sañjāyate mahān

हिन्दी अर्थ

लीलाविधानके ज्ञाता श्रीकृष्ण तुम्हें मायासे चक्करमें डाल रहे हैं। उनका दर्शन करके तुम्हारे मनमें यह महान्‌ भ्रम ही उत्पन्न हो गया है

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श्लोक 20

शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गवनमालाविभूषितम् ।वृष्णिवीरं समावेक्ष्य समुच्छ्रितयशोधरम्

śaṅkhacakragadāśārṅgavanamālāvibhūṣitam | vṛṣṇivīraṃ samāvekṣya samucchritayaśodharam

श्लोक 20–22 का हिन्दी अर्थ

जो शड्गु, चक्र, गदा, शा धनुष और वनमालासे विभूषित हैं, सब ओर फैले हुए यशको धारण करते हैं। सूतों और मागधोंद्वारा की गयी स्तुतिमात्रसे जिनके बाहुबलका कुछ पता चलता है। जो अत्यन्त अद्भुत यशकी राशि हैं और अपने पराक्रमसे लोकको अलंकृत करते हैं। जिनके चार भुजाएँ हैं। जो सेनाओंसे घिरे हुए तथा वृष्णि और यादवकुलके सम्मानित पुरुष हैं, उन वृष्णिवीर श्रीकृष्णका दर्शन करके तुम चक्करमें पड़ गये हो । अहो ! उस चक्रपाणिके दर्शनसे आज तुम्हें भ्रम ही हो गया

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श्लोक 21

सूतमागधसंस्तावप्रकटद्बाहुवीर्यकम् ।अत्यद्भुतयशोराशिं विक्रमाल्लोकमण्डनम्

sūtamāgadhasaṃstāvaprakaṭadbāhuvīryakam | atyadbhutayaśorāśiṃ vikramāllokamaṇḍanam

अर्थ श्लोक 20 के साथ

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श्लोक 22

चतुर्भुजं बलाक्रान्तं वृष्णियादवसम्मतम् ।अहोऽद्य भ्रम एवैष दर्शनात् तस्य चक्रिणः

caturbhujaṃ balākrāntaṃ vṛṣṇiyādavasammatam | aho'dya bhrama evaiṣa darśanāt tasya cakriṇaḥ

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 301

श्लोक 23

इदानीं च महाराज भ्रामयत्येव दुर्मतिः ।त्वामेव विप्र मन्दात्मन्निन्द्रजालिकता हि या

idānīṃ ca mahārāja bhrāmayatyeva durmatiḥ | tvāmeva vipra mandātmannindrajālikatā hi yā

हिन्दी अर्थ

महाराज! मन्दमते विप्र ! इस समय भी यह दुर्बुद्धि कृष्ण तुम्हें चक्करमें ही डाले हुए है। उसकी जो इन्द्रजालिकता (बाजीगरी) है, वह तुमपर ही प्रभाव डालती है

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श्लोक 24

चापल्यमिदमैवैतत् तव विप्र भ्रमोद्भवम् ।अहो हि खलु सादृश्यं वक्तव्यं भवता मम

cāpalyamidamaivaitat tava vipra bhramodbhavam | aho hi khalu sādṛśyaṃ vaktavyaṃ bhavatā mama

हिन्दी अर्थ

विप्र ! यह तुम्हारा भ्रमजनित चापल्य ही प्रकट हुआ है। अहो ! तुम्हें मेरी और उनकी समानता बतानी चाहिये थी (किंतु तुमने हमारी लघुता व्यक्त की है)

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श्लोक 25

अहमेव त्वया विप्र मर्षये प्रोदितं वचः ।सखिभावाद् द्विजश्रेष्ठ अन्यथा कः सहेदिदम्

ahameva tvayā vipra marṣaye proditaṃ vacaḥ | sakhibhāvād dvijaśreṣṭha anyathā kaḥ sahedidam

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन्‌ ! द्विजश्रेष्ठ! एक मैं ही हूँ. जिसने मित्रताके कारण तुम्हारी इस अनुचित बातको सह लिया, अन्यथा कौन ऐसी बात सह सकता है ?

अध्याय 301

श्लोक 26

गच्छ मन्दमते विप्र यथेष्टं साम्प्रतं तव ।द्विज गच्छ यथेष्टं त्वं पृथिवीं पृथिवी तव

gaccha mandamate vipra yatheṣṭaṃ sāmprataṃ tava | dvija gaccha yatheṣṭaṃ tvaṃ pṛthivīṃ pṛthivī tava

हिन्दी अर्थ

मन्दबुद्धि ब्राह्मण ! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो चले जाओ, इस समय सारी पृथ्वी तुम्हारे लिये खुली हुई है। द्विज ! तुम भूतलपर चाहे जहाँ जा सकते हो

अध्याय 301

श्लोक 27

जित्वा गोपालदायादं हत्वा यादवकान् बहून् ।एष नः प्रथमः कल्पो जेष्याम इति यादवान्

jitvā gopāladāyādaṃ hatvā yādavakān bahūn | eṣa naḥ prathamaḥ kalpo jeṣyāma iti yādavān

हिन्दी अर्थ

मैं उस ग्वालबालको जीतकर और बहुत-से यादवोंका संहार करके अपना यज्ञ करूँगा। हमारा पहला संकल्प यही है कि हम यादवोंको जीतेंगे '

अध्याय 301

श्लोक 28

गच्छ गच्छेति विप्र त्वं धृष्टं परुषवादिनम् ।शत्रुपक्षस्तुतिपरं सह युक्त्वा सदा मया

gaccha gaccheti vipra tvaṃ dhṛṣṭaṃ paruṣavādinam | śatrupakṣastutiparaṃ saha yuktvā sadā mayā

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मण ! जाओ ! जाओ ! ! तुम धृष्ट और कटुवादी हो ! सदा मेरे साथ रहकर भी शत्रुपक्षकी स्तुतिमें लगे रहे हो (इसलिये मैंने तुम्हें त्याग दिया)

अध्याय 301

श्लोक 29

न मे विप्रवधः कार्यः कष्टादपि हि सर्वतः ।इत्युक्त्वा ब्राह्मणं भूयो हंसः सात्यकिमब्रवीत्

na me vipravadhaḥ kāryaḥ kaṣṭādapi hi sarvataḥ | ityuktvā brāhmaṇaṃ bhūyo haṃsaḥ sātyakimabravīt

हिन्दी अर्थ

सब ओरसे कष्ट प्राप्त होनेपर भी मुझे ब्राह्मणका वध नहीं करना चाहिये (इसीलिये तुम्हें जीवित छोड़ रहा हूँ) । ब्राह्मणसे ऐसा कहकर हंसने फिर सात्यकिसे कहा-

अध्याय 301

श्लोक 30

भो भो यादवदायाद किमर्थं प्राप्तवानिह ।किमब्रवीन्नन्दसुतः किं वासौ मेऽदिशत् करम्

bho bho yādavadāyāda kimarthaṃ prāptavāniha | kimabravīnnandasutaḥ kiṃ vāsau me'diśat karam

हिन्दी अर्थ

ओ यादवकुमार! तुम किसलिये यहाँ आये हो? उस नन्दपुत्रने तुमसे कया कहा है ? अथवा उसने मेरे लिये कौन-सा कर प्रदान किया है ?'

अध्याय 301

श्लोक 31

इदं सत्यं वचो हंस शङ्खचक्रगदाभृतः ।शरैर्निशितधाराग्रैः शार्ङ्गमुक्तैः शिलाशितैः

idaṃ satyaṃ vaco haṃsa śaṅkhacakragadābhṛtaḥ | śarairniśitadhārāgraiḥ śārṅgamuktaiḥ śilāśitaiḥ

श्लोक 31–32 का हिन्दी अर्थ

ततमो + १३४१ सात्यकि बोले-हंस! शड्ड, चक्र और गदा धारण करनेवाले श्रीकृष्णका यह सत्य वचन सुनो। उनका क्रहना है कि 'मैं शाड्॑धनुषसे छूटे हुए, शिलापर तेज किये गये और पैनी धारवाले बाणोंद्वारा तुम्हारा पारा कर चुका दूँगा। हंस! अपनी तीखी तलवारसे तेरा सिर काट लूँगा', यह तेरे लिये करदानका अच्छा संग्रह होगा '

अध्याय 301

श्लोक 32

दास्यामि करसर्वस्वमसिना निशितेन ते ।शिरश्छेत्स्यामि ते हंस करदानस्य सङ्ग्रहम्

dāsyāmi karasarvasvamasinā niśitena te | śiraśchetsyāmi te haṃsa karadānasya saṅgraham

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 301

श्लोक 33

धार्ष्ट्यं हि तव मन्दात्मन्किमतोऽपि नृपाधम ।देवदेवाज्जगन्नाथात् करमिच्छति यो नृपः

dhārṣṭyaṃ hi tava mandātmankimato'pi nṛpādhama | devadevājjagannāthāt karamicchati yo nṛpaḥ

श्लोक 33–42 का हिन्दी अर्थ

मन्दात्मनू! नृपाधम! इससे बढ़कर तेरी धृष्टता क्या हो सकती है? नराधम! जो राजा देवाधिदेव जगन्नाथसे कर लेना चाहता है, उसकी जीभ काट ली जाय, यही उसके करको समाप्त करनेका उपाय है। श्रीहरिके शा धनुषकी टड्ार और पाज्चजन्य शड्डुका हुंकार सुनकर कौन जीवित रहनेकी आशा कर सकता है। तू अब हमारे सामने खड़ा तो हो । भगवान्‌ शड्टरसे मिले वरके घमंडमें आकर कौन पुरुष भगवान्‌ श्रीकृष्णसे ऐसी बात कह सकता है, जैसी तूने कही है। बलभद्र आदि हम सभी वीर श्रीकृष्णके सहायक हैं । प्रथम तो बलभद्रजी हैं, दूसरा मैं सात्यकि हूँ, तीसरा कृतवर्मा है, चौथा बलवान्‌ निशठ है, पाँचवाँ बभ्रु, छठा उत्कल, सातवाँ अस्त्र- शस्त्रविशारद बुद्धिमान्‌ तारण, आठवाँ सारज़, नवाँ विपृथु और दसवें बुद्धिमान्‌ उद्धवजी हैं। ये हम सभी सहायक बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं। ये सभी वीर समस्त युद्धोंमें अपने रक्षक शड्ड, चक्र और गदा धारण करनेवाले देवाधिदेव श्रीकृष्णके आगे ही खड़े होते हैं। उनके जो दो विख्यात पुत्र (प्रद्युम्न और साम्ब) हैं, वे दोनों बलमें अध्विनीकुमारोंके समान हैं। केवल वे दोनों ही युद्धमें बलके मदसे उन्मत्त हुए तुम दोनों भाइयोंको मार सकते हैं। वाणीके देवता जो गिरीश शिव हैं, वे तो वर देकर अलग खड़े हैं। तुम दोनों किसके बलका सहारा लेकर युद्धमें खड़े हुए हो और धनुष-बाण लेकर शत्रुओंके साथ जूझनेको तैयार हुए हो ?

अध्याय 301

श्लोक 34

तस्यैष करसङ्क्षेपो जिह्वाच्छेदो नराधम ।तस्य शार्ङ्गरवं श्रुत्वा शङ्खस्य च हरेः पुनः

tasyaiṣa karasaṅkṣepo jihvācchedo narādhama | tasya śārṅgaravaṃ śrutvā śaṅkhasya ca hareḥ punaḥ

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 301

श्लोक 35

को नाम जीवितं काङ्क्षेत् तिष्ठेदानीं त्वमद्य वै ।गिरीशवरदर्पेण को ब्रूयादीदृशं वचः

ko nāma jīvitaṃ kāṅkṣet tiṣṭhedānīṃ tvamadya vai | girīśavaradarpeṇa ko brūyādīdṛśaṃ vacaḥ

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 301

श्लोक 36

सहाया वयमेवैते बलभद्रपुरोगमाः ।प्रथमो बलभद्रोऽसौ द्वितीयोऽहं च सात्यकिः

sahāyā vayamevaite balabhadrapurogamāḥ | prathamo balabhadro'sau dvitīyo'haṃ ca sātyakiḥ

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 301

श्लोक 37

कृतवर्मा तृतीयस्तु चतुर्थो निशठो बली ।पञ्चमोऽथ च बभ्रुस्तु षष्ठश्चैवोत्कलः स्मृतः

kṛtavarmā tṛtīyastu caturtho niśaṭho balī | pañcamo'tha ca babhrustu ṣaṣṭhaścaivotkalaḥ smṛtaḥ

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 301

श्लोक 38

सप्तमस्तारणो धीमानस्त्रशस्त्रविशारदः ।अष्टमस्त्वथ सारङ्गो नवमो विपृथुस्तथा

saptamastāraṇo dhīmānastraśastraviśāradaḥ | aṣṭamastvatha sāraṅgo navamo vipṛthustathā

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 301

श्लोक 39

दशमश्चोद्धवो धीमान् वयमेते बलान्विताः ।त एते पुरतो गोप्तुः शङ्खचक्रगदाभृतः

daśamaścoddhavo dhīmān vayamete balānvitāḥ | ta ete purato goptuḥ śaṅkhacakragadābhṛtaḥ

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 301

श्लोक 40

देवदेवस्य युद्धेषु तिष्ठन्त्येव दिवानिशम् ।यौ हि वीरौ सुतौ तस्य नासत्यसदृशौ बले

devadevasya yuddheṣu tiṣṭhantyeva divāniśam | yau hi vīrau sutau tasya nāsatyasadṛśau bale

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 301

श्लोक 41

तावेव वां क्षमौ युद्धे हन्तुं बलमदान्वितौ ।यो गिरीशो गिरां देवो वरं दत्त्वा स तिष्ठति

tāveva vāṃ kṣamau yuddhe hantuṃ balamadānvitau | yo girīśo girāṃ devo varaṃ dattvā sa tiṣṭhati

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 301

श्लोक 42

युवां हि किम्बलौ युद्धे तिष्ठतः सशरं धनुः ।गृहीत्वा शत्रुभिः सार्धं युद्धं कर्तुं समुद्यतौ

yuvāṃ hi kimbalau yuddhe tiṣṭhataḥ saśaraṃ dhanuḥ | gṛhītvā śatrubhiḥ sārdhaṃ yuddhaṃ kartuṃ samudyatau

अर्थ श्लोक 33 के साथ

अध्याय 301

श्लोक 43

ईदृशेष्वथ भृत्येषु युद्धं कुर्वत्सु शत्रुभिः ।त्रैलोक्यं रक्षतस्तस्मात्करमिच्छन् व्रजेत कः

īdṛśeṣvatha bhṛtyeṣu yuddhaṃ kurvatsu śatrubhiḥ | trailokyaṃ rakṣatastasmātkaramicchan vrajeta kaḥ

हिन्दी अर्थ

जिनके हम-जैसे सेवक शत्रुओंके साथ युद्ध कर रहे हों, त्रिलोकीकी रक्षा करनेवाले उन जगदीथरसे कर लेनेकी इच्छा रखकर कौन जीवित लौट सकता है?

अध्याय 301

श्लोक 44

हनिष्यत्येव वां युद्धे त्रैलोक्यं यो हि रक्षति ।शरेण निशितेनाजौ शार्ङ्गमुक्तेन केवलम्

haniṣyatyeva vāṃ yuddhe trailokyaṃ yo hi rakṣati | śareṇa niśitenājau śārṅgamuktena kevalam

हिन्दी अर्थ

जो तीनों लोकोंकी रक्षा करते हैं, वे भगवान्‌ श्रीकृष्ण युद्धस्थलमें केवल शा धनुषसे छूटे हुए पैने बाणसे तुम दौनोंको अवश्य मार डालेंगे

अध्याय 301

श्लोक 45

क्व नः सङ्ग्राम इत्येवं पुनराह जगत्पतिः ।पुष्करे पुण्यदे नित्यमुत गोवर्धने गिरौ

kva naḥ saṅgrāma ityevaṃ punarāha jagatpatiḥ | puṣkare puṇyade nityamuta govardhane girau

श्लोक 45–47 का हिन्दी अर्थ

उन जगदीश्वरने फिर यह पूछा था कि हमलोगोंका यह संग्राम कहाँ होगा? सदा ही पुण्य प्रदान करनेवाले पुष्करमें, गोवर्धन पर्वतपर, मथुरामें अथवा प्रयागमें। जहाँ इच्छा हो मुझे अपना बल दिखानेके लिये आ जायेँ। शड्डू और चक्र धारण करनेवाले श्रीकृष्ण जब जगत्‌के पालनमें तत्पर हों, उस समय कौन उनकी आज्ञा लिये बिना स्वयं राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान करना चाहेगा? अथवा तुम्हारे सिवा दूसरा कौन मनुष्य है, जो ऐसी बात कहकर सकुशल एवं सुखपूर्वक घरको जा सकता है ?

अध्याय 301

श्लोक 46

मथुरायां प्रयागे वा दर्शयन्तो बलानि मे ।शङ्खचक्रधरे देवे जगत्पालनतत्परे

mathurāyāṃ prayāge vā darśayanto balāni me | śaṅkhacakradhare deve jagatpālanatatpare

अर्थ श्लोक 45 के साथ

अध्याय 301

श्लोक 47

राजसूयं महायज्ञं कर्तुमिच्छति कः स्वयम् ।वदन्वा स्वस्तिमान्मर्त्यस्त्वां विना को व्रजेत् सुखम्

rājasūyaṃ mahāyajñaṃ kartumicchati kaḥ svayam | vadanvā svastimānmartyastvāṃ vinā ko vrajet sukham

अर्थ श्लोक 45 के साथ

अध्याय 301

श्लोक 48

इदमिच्छसि चेन्मूढ हास्यतां यासि भूतले ।इत्युक्त्वा सात्यकिर्वीरो हसन्निव भुवि स्थितः

idamicchasi cenmūḍha hāsyatāṃ yāsi bhūtale | ityuktvā sātyakirvīro hasanniva bhuvi sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

मूढ! यदि तू ऐसा चाहता है तो इस भूतलपर उपहासका पात्र बनेगा। ऐसा कहकर वीर सात्यकि हँसते हुए-से भूतलपर खड़े हो गये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.