Harivamsha Purana
274
अध्याय 274 / 318

Parva 3, Adhyāya 91

18 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ18 श्लोक

अध्याय 274

श्लोक 1

पौण्ड्रकेन राजानां सभायां स्वकं शङ्ख, चक्रादि युक्तं वासुदेवं घोषयित्वा श्रीकृष्णस्य पराजयितुं काङ्क्षाकरणं एतस्मिन्नेव काले तु पौण्ड्रो नृपवरोत्तमः ।बलवान् सत्त्वसम्पन्नो योद्धा विपुलविक्रमः

pauṇḍrakena rājānāṃ sabhāyāṃ svakaṃ śaṅkha, cakrādi yuktaṃ vāsudevaṃ ghoṣayitvā śrīkṛṣṇasya parājayituṃ kāṅkṣākaraṇaṃ etasminneva kāle tu pauṇḍro nṛpavarottamaḥ | balavān sattvasampanno yoddhā vipulavikramaḥ

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इसी समय राजाओंगें श्रेष्ठतम, बलवान, सत्त्वसम्पन्न, महापराक्रमी योद्धा, वृष्णिवंशियोंसे शत्रुभाव रखनेवाला तथा श्रीकृष्णका द्वेषी पौण्ड्रक समस्त राजाओंको बलपूर्वक बुलाकर उनकी सभामें बोला—

अध्याय 274

श्लोक 2

वृष्णिशत्रुस्तदा राजा कृष्णद्वेषी बलात् तदा ।नृपान् सर्वान् समाहूय प्रोवाच नृपसंसदि

vṛṣṇiśatrustadā rājā kṛṣṇadveṣī balāt tadā | nṛpān sarvān samāhūya provāca nṛpasaṃsadi

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 274

श्लोक 3

जिता च पृथिवी सर्वा जिताश्च नृपसत्तमाः ।वृष्णयस्ते बलोन्मत्ताः कृष्णमाश्रित्य गर्विताः

jitā ca pṛthivī sarvā jitāśca nṛpasattamāḥ | vṛṣṇayaste balonmattāḥ kṛṣṇamāśritya garvitāḥ

हिन्दी अर्थ

मैंने सारी पृथ्वी जीत ली और बड़े-बड़े राजाओंको पराजित कर दिया। परन्तु बलोन्मत्त वृष्णिवंशी श्रीकृष्णका सहारा लेकर घमंडमें भर गये हैं

अध्याय 274

श्लोक 4

दास्यन्ति मे करं सर्वे न हि ते कृष्णसंश्रयात् ।स तु कृष्णश्चक्रबलान्मामवज्ञाय तिष्ठति

dāsyanti me karaṃ sarve na hi te kṛṣṇasaṃśrayāt | sa tu kṛṣṇaścakrabalānmāmavajñāya tiṣṭhati

हिन्दी अर्थ

कृष्णका आश्रय लेकर वे सब-के-सब मुझे कर नहीं देते हैं और वह कृष्ण अपने चक्रके बलसे मेरी अवहेलना करता रहता है

अध्याय 274

श्लोक 5

अहं चक्रीति गर्वोऽभूत्तस्य गोपस्य सर्वदा ।शङ्खी चक्री गदी शार्ङ्गी शरी तूणी सहायवान्

ahaṃ cakrīti garvo'bhūttasya gopasya sarvadā | śaṅkhī cakrī gadī śārṅgī śarī tūṇī sahāyavān

श्लोक 5–10 का हिन्दी अर्थ

उस ग्वालेको सदा इस बातका गर्व रहता है कि मैं चक्रधारी हूँ। मेरे पास शक्ल, चक्र गदा, शाधनुष, बाण और तरकस हैं; मैं सहायतासे सम्पन्न हूँ। इस तरह इस समय उसका गर्व बहुत बढ़ा-चढ़ा है। लोकमें जो मेरा वासुदेव यह प्रसिद्ध नाम है, उसे उस मदमत्त एवं बलवान्‌ गोपने ग्रहण कर लिया है। मेरे पास भी एक विशाल एवं तीखा चक्र है, जो उसके चक्रका नाश करनेवाला है। मेरा यह चक्र सदा उस (कृष्ण)-के गर्वको चूर्ण करनेमें समर्थ है, इसका नाम भी सुदर्शन है।' श्रेष्ठ राजाओ! मेरे इस चक्रमें एक सहस्तर अरे लगे हुए हैं। यह महाभयंकर है और गोपबालक श्रीकृष्णके चक्रका नाश करनेवाला है। यह अनेक रूप धारण करनेमें समर्थ और कहीं भी प्रतिहत होनेवाला नहीं है। मेरा भी यह धनुष दिव्य है, सींगका बना हुआ है, इसलिये शार्ज़नामसे प्रसिद्ध है और बड़ी भारी टड्ार-ध्वनि करता है। मेरी इस गदाका नाम भी कौमोदकी है। यह विशाल एवं सुदृढ़ है। मैंने एक सहस्र भार लोहेसे इसका निर्माण कराया है

अध्याय 274

श्लोक 6

एवमादिर्महागर्वस्तस्य सम्प्रति वर्तते ।लोके च मम यन्नाम वासुदेवेति विश्रुतम्

evamādirmahāgarvastasya samprati vartate | loke ca mama yannāma vāsudeveti viśrutam

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 274

श्लोक 7

अगृह्णान्मम तन्नाम गोपो मदबलान्वितः ।तस्य चक्रस्य यच्चक्रं ममापि निशितं महत्

agṛhṇānmama tannāma gopo madabalānvitaḥ | tasya cakrasya yaccakraṃ mamāpi niśitaṃ mahat

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 274

श्लोक 8

गर्वहन्तृ सदा तस्य नाम्ना चापि सुदर्शनम् ।सहस्रारं महाघोरं तस्य चक्रस्य नाशनम्

garvahantṛ sadā tasya nāmnā cāpi sudarśanam | sahasrāraṃ mahāghoraṃ tasya cakrasya nāśanam

अर्थ श्लोक 5 के साथ

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श्लोक 9

अनेकमहतं चक्रं गोपजस्य नृपोत्तमाः ।ममाप्येतद् धनुर्दिव्यं शार्ङ्गं नाम महारवम्

anekamahataṃ cakraṃ gopajasya nṛpottamāḥ | mamāpyetad dhanurdivyaṃ śārṅgaṃ nāma mahāravam

अर्थ श्लोक 5 के साथ

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श्लोक 10

गदा कौमोदकी नाम ममेयं बृहती दृढा ।कालायससहस्रस्य भारेण सुकृता मया

gadā kaumodakī nāma mameyaṃ bṛhatī dṛḍhā | kālāyasasahasrasya bhāreṇa sukṛtā mayā

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 274

श्लोक 11

खड्गो नन्दकनामासौ ममायं विपुलो दृढः ।अन्तकस्यान्तको घोरस्तस्य खड्गस्य नाशकः

khaḍgo nandakanāmāsau mamāyaṃ vipulo dṛḍhaḥ | antakasyāntako ghorastasya khaḍgasya nāśakaḥ

हिन्दी अर्थ

मेरा यह विशाल खड्ग बहुत मजबूत है। इसका नाम नन्दक है। यह घोर खड्ग कालका भी काल और श्रीकृष्णके खड्गका नाश करनेवाला है

अध्याय 274

श्लोक 12

तत्राहं च गदी खड्गी शङ्खी चक्री तनुत्रवान् ।युधि जेता च कृष्णस्य नात्र कार्या विचारणा

tatrāhaṃ ca gadī khaḍgī śaṅkhī cakrī tanutravān | yudhi jetā ca kṛṣṇasya nātra kāryā vicāraṇā

श्लोक 12–13 का हिन्दी अर्थ

इस प्रकार मैं गदा, खड्‌ग, शड्ड, चक्र और कवचसे युक्त होकर युद्धमें श्रीकृष्णको जीत लूँगा। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है; अत: श्रेष्ठ नरपतियो ! अब तुमलोग मुझे ही सदा गदाधर, चक्रपाणि, शड्जुधारी एवं शा धनुर्धर वीर कहा करो

अध्याय 274

श्लोक 13

मां च ब्रूत नृपाश्चैव गदिनं चक्रिणं तथा ।शङ्खिनं शार्ङ्गिणं वीरं ब्रूत नित्यं नृपोत्तमाः

māṃ ca brūta nṛpāścaiva gadinaṃ cakriṇaṃ tathā | śaṅkhinaṃ śārṅgiṇaṃ vīraṃ brūta nityaṃ nṛpottamāḥ

अर्थ श्लोक 12 के साथ

अध्याय 274

श्लोक 14

वासुदेवेति मां ब्रूत न तु गोपं यदूत्तमम् ।एकोऽहं वासुदेवो हि हत्वा तं गोपदारकम्

vāsudeveti māṃ brūta na tu gopaṃ yadūttamam | eko'haṃ vāsudevo hi hatvā taṃ gopadārakam

हिन्दी अर्थ

मुझे ही वासुदेव कहो, उस यदुश्रेष्ठ गोपको नहीं । उस गोपबालकको मारकर एकमात्र मैं ही वासुदेव रहूँगा

अध्याय 274

श्लोक 15

सख्युर्मम बलाद्धन्ता नरकस्य महात्मनः ।मां तथा यदि न ब्रूत दण्ड्या भारशतैः शतम्

sakhyurmama balāddhantā narakasya mahātmanaḥ | māṃ tathā yadi na brūta daṇḍyā bhāraśataiḥ śatam

श्लोक 15–17 का हिन्दी अर्थ

महामनस्वी नरकासुर मेरा मित्र था, उसको इस गोपने बलपूर्वक मार डाला है (इसलिये मैं भी इसका वध करूँगा); अतः यदि तुमलोग मुझे वासुदेव नहीं कहोगे तो मैं तुमपर दस हजार भार सुवर्ण एवं निष्कका तथा बहुत-सी धान्यराशिका दण्ड लगाऊँगा' । राजाधिराज पौण्ड्कके इस तरह मनको असझ्य लगनेवाली बात कहनेपर कुछ प्रबल नरेश लज्जित होकर चुप रह गये। राजन्‌! वे सब ने बल-वीर्यके रसज्ञ थे

अध्याय 274

श्लोक 16

सुवर्णस्य च निष्कस्य धान्यस्य बहुशस्तदा ।तथा ब्रुवति राजेन्द्रे मनसा दुस्सहं यथा

suvarṇasya ca niṣkasya dhānyasya bahuśastadā | tathā bruvati rājendre manasā dussahaṃ yathā

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 274

श्लोक 17

केचिल्लज्जासमायुक्ता आसंस्ते बलवत्तराः ।रसज्ञा बलवीर्यस्य राजानस्ते सदा नृप

kecillajjāsamāyuktā āsaṃste balavattarāḥ | rasajñā balavīryasya rājānaste sadā nṛpa

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 274

श्लोक 18

अपरे तु नृपा राजन्नेवमेवेति चुक्रुशुः ।अन्ये बलमदोत्सिक्ता जेष्यामः केशवं रणे

apare tu nṛpā rājannevameveti cukruśuḥ | anye balamadotsiktā jeṣyāmaḥ keśavaṃ raṇe

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! दूसरे चापलूस नरेश * ठीक है! ठीक है! !' ऐसा कोलाहल करने लगे तथा बलके मदसे उन्मत्त हुए अन्य राजा कहने लगे कि हम युद्धमें श्रीकृष्णको अवश्य जीतेंगे

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

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6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
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