Harivamsha Purana
26
अध्याय 26 / 318

Parva 1, Adhyāya 26

49 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ49 श्लोक

अध्याय 26

श्लोक 1

महाराज पुरूरवा के चरित्र और वंश का वर्णन, राजा पुरूरवा का त्रेताग्नि की रचना करना और गन्धर्वो के लोक में जाना बुधस्य तु महाराज विद्वान् पुत्रः पुरूरवाः ।तेजस्वी दानशीलश्च यज्वा विपुलदक्षिणः

mahārāja purūravā ke caritra aura vaṃśa kā varṇana, rājā purūravā kā tretāgni kī racanā karanā aura gandharvo ke loka meṃ jānā budhasya tu mahārāja vidvān putraḥ purūravāḥ | tejasvī dānaśīlaśca yajvā vipuladakṣiṇaḥ

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

जनमेजयने पूछा—बहुश्रुत॒ वैशम्पायनजी ! उर्वशीदेवी तो अप्सरा थी, फिर देवताओंका परित्याग कर वह मनुष्य राजाके पास क्योंकर आयी ? यह मुझे बताइये ॥ श

अध्याय 26

श्लोक 2

ब्रह्मवादी पराक्रान्तः शत्रुभिर्युधि दुर्जयः ।आहर्ता चाग्निहोत्रस्य यज्ञानां च महीपतिः

brahmavādī parākrāntaḥ śatrubhiryudhi durjayaḥ | āhartā cāgnihotrasya yajñānāṃ ca mahīpatiḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

English

⁸³ A name of Indra from _Puru_ much _Huta_ worshipped or invoked.

अध्याय 26

श्लोक 3

सत्यवादी पुण्यमतिः काम्यः संवृतमैथुनः ।अतीव त्रिषु लोकेषु यशसाप्रतिमस्तदा

satyavādī puṇyamatiḥ kāmyaḥ saṃvṛtamaithunaḥ | atīva triṣu lokeṣu yaśasāpratimastadā

श्लोक 3–13 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—राजन्‌ ! ब्रह्शापके कारण उर्वशीको मनुष्यलोकमें आना पड़ा था। वह सुन्दर अड्डोंवाली उर्वशी कुछ शर्तोंक साथ इला-नन्दन पुरूरवाके पास रही थी

English

⁸⁴ This refers to the celebrated episode of Pralhada. He was the son of the Demon king Hiranyakasipu. He began worshipping Vishnu who was an enemy of Hiranykasipu. He prosecuted his son in various ways and afterwards was killed by Vishnu in his man-lion form.

अध्याय 26

श्लोक 4

तं ब्रह्मवादिनं क्षान्तं धर्मज्ञं सत्यवादिनम् ।उर्वशी वरयामास हित्वा मानं यशस्विनी

taṃ brahmavādinaṃ kṣāntaṃ dharmajñaṃ satyavādinam | urvaśī varayāmāsa hitvā mānaṃ yaśasvinī

अर्थ श्लोक 3 के साथ

English

⁸⁵ A sacred fire perpetually maintained by a householder, received from his father and transmitted to his descendants, and from which fires for sacrificial purposes are lighted.

अध्याय 26

श्लोक 5

तया सहावसद् राजा वर्षाणि दश पञ्च च ।पञ्च षट्सप्त चाष्टौ च दश चाष्टौ च भारत

tayā sahāvasad rājā varṣāṇi daśa pañca ca | pañca ṣaṭsapta cāṣṭau ca daśa cāṣṭau ca bhārata

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 26

श्लोक 6

वने चैत्ररथे रम्ये तथा मन्दाकिनीतटे ।अलकायां विशालायां नन्दने च वनोत्तमे

vane caitrarathe ramye tathā mandākinītaṭe | alakāyāṃ viśālāyāṃ nandane ca vanottame

अर्थ श्लोक 3 के साथ

English

⁸⁹ A vessel used at sacrifices for drinking the juice of the acid asclepias; a kind of ladle or spoon.

अध्याय 26

श्लोक 7

उत्तरान् स कुरून् प्राप्य मनोरथफलद्रुमान् ।गन्धमादनपादेषु मेरुपृष्ठे तथोत्तरे

uttarān sa kurūn prāpya manorathaphaladrumān | gandhamādanapādeṣu merupṛṣṭhe tathottare

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 26

श्लोक 8

एतेषु वनमुख्येषु सुरैराचरितेषु च ।उर्वश्या सहितो राजा रेमे परमया मुदा

eteṣu vanamukhyeṣu surairācariteṣu ca | urvaśyā sahito rājā reme paramayā mudā

अर्थ श्लोक 3 के साथ

English

⁹¹ A species of grass used in many solemn and religious observances; hence called sacrificial grass.

अध्याय 26

श्लोक 9

देशे पुण्यतमे चैव महर्षिभिरभिष्टुते ।राज्यं च कारयामास प्रयागं पृथिवीपतिः

deśe puṇyatame caiva maharṣibhirabhiṣṭute | rājyaṃ ca kārayāmāsa prayāgaṃ pṛthivīpatiḥ

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 26

श्लोक 10

तस्य पुत्रा बभूवुस्ते सप्त देवसुतोपमाः ।दिवि जाता महात्मान आयुर्धीमानमावसुः

tasya putrā babhūvuste sapta devasutopamāḥ | divi jātā mahātmāna āyurdhīmānamāvasuḥ

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 26

श्लोक 11

विश्वायुश्चैव धर्मात्मा श्रुतायुश्च तथापरः ।दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुताः

viśvāyuścaiva dharmātmā śrutāyuśca tathāparaḥ | dṛḍhāyuśca vanāyuśca śatāyuścorvaśīsutāḥ

अर्थ श्लोक 3 के साथ

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय 26

श्लोक 12

गान्धर्वी चोर्वशी देवी राजानं मानुषं कथम् ।देवानुत्सृज्य सम्प्राप्ता तन्नो ब्रूहि बहुश्रुत

gāndharvī corvaśī devī rājānaṃ mānuṣaṃ katham | devānutsṛjya samprāptā tanno brūhi bahuśruta

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 26

श्लोक 13

ब्रह्मशापाभिभूता सा मानुषं समपद्यत ।ऐलं तु सा वरारोहा समयात्समुपस्थिता

brahmaśāpābhibhūtā sā mānuṣaṃ samapadyata | ailaṃ tu sā varārohā samayātsamupasthitā

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 26

श्लोक 14

आत्मनः शापमोक्षार्थं समयं सा चकार ह ।अनग्नदर्शनं चैव सकामायां च मैथुनम्

ātmanaḥ śāpamokṣārthaṃ samayaṃ sā cakāra ha | anagnadarśanaṃ caiva sakāmāyāṃ ca maithunam

श्लोक 14–15 का हिन्दी अर्थ

भूपाल! उसने अपने शापसे छूटनेके लिये यह शर्त करा ली थी कि 'मैं आपको नंगा न देखूँ, में सकाम होनेपर ही आप सहवास करें, मेरे पलंगके पास सदा दो भेंड़ बँधे रहेंगे और मैं दिनमें एक बार थोड़ा-सा घृतमात्र भोजन करूँगी

अध्याय 26

श्लोक 15

द्वौ मेषौ शयनाभ्याशे सदा बद्धौ च तिष्ठतः ।घृतमात्रो तथाऽऽहारः कालमेकं तु पार्थिव

dvau meṣau śayanābhyāśe sadā baddhau ca tiṣṭhataḥ | ghṛtamātro tathā''hāraḥ kālamekaṃ tu pārthiva

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 26

श्लोक 16

यद्येष समयो राजन् यावत्कालं च ते दृढः ।तावत्कालं तु वत्स्यामि त्वत्तः समय एष नः

yadyeṣa samayo rājan yāvatkālaṃ ca te dṛḍhaḥ | tāvatkālaṃ tu vatsyāmi tvattaḥ samaya eṣa naḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! जबतक इन प्रतिज्ञाओंका आप दृढ़ताके साथ पालन करते रहेंगे, तबतक मैं आपके पास रहूँगी-यह मैं आपसे प्रतिज्ञा करती हूँ

अध्याय 26

श्लोक 17

तस्यास्तं समयं सर्वं स राजा समपालयत् ।एवं सा वसते तत्र पुरूरवसि भामिनी

tasyāstaṃ samayaṃ sarvaṃ sa rājā samapālayat | evaṃ sā vasate tatra purūravasi bhāminī

हिन्दी अर्थ

राजा उसकी सब शर्तोंका पालन करने लगे। इस प्रकार वह श्रेष्ठ अप्सरा पुरूरवाके यहाँ रहने लगी

अध्याय 26

श्लोक 18

बर्षाण्येकोनषष्टिस्तु तत्सक्ता शापमोहिता ।उर्वश्यां मानुषस्थायां गन्धर्वाश्चिन्तयान्विताः

barṣāṇyekonaṣaṣṭistu tatsaktā śāpamohitā | urvaśyāṃ mānuṣasthāyāṃ gandharvāścintayānvitāḥ

हिन्दी अर्थ

शापके कारण उर्वशीको जब राजामें आसक्त होकर रहते हुए उनसठ वर्ष बीत गये, तब गन्धर्वोंको मनुष्योंके बीच बसनेवाली उर्वशीकी चिन्ता हुई

अध्याय 26

श्लोक 19

चिन्तयध्वं महाभागा यथा सा तु वराङ्गना ।समागच्छेत् पुनर्देवानुर्वशी स्वर्गभूषणम्

cintayadhvaṃ mahābhāgā yathā sā tu varāṅganā | samāgacchet punardevānurvaśī svargabhūṣaṇam

हिन्दी अर्थ

गन्धर्वोने कहा—महाभागो! वराज़ना उर्वशी देवताओंमें फिर किस प्रकार आये? इसका उपाय सोचो; क्योंकि वह स्वर्गका भूषण है

अध्याय 26

श्लोक 20

ततो विश्वावसुर्नाम तत्राह वदतां वरः ।मया तु समयस्ताभ्यां क्रियमाणः श्रुतः पुरा

tato viśvāvasurnāma tatrāha vadatāṃ varaḥ | mayā tu samayastābhyāṃ kriyamāṇaḥ śrutaḥ purā

हिन्दी अर्थ

तब वक्ताओंमं श्रेष्ठ विश्वावसु नामक गन्धर्वने कहा—'उन दोनोंने पहले जो प्रतिज्ञाएँ की थीं, उन्हें मैंने सुना है

अध्याय 26

श्लोक 21

व्युत्क्रान्तसमयं सा वै राजानं त्यक्ष्यते यथा ।तदहं वेद्म्यशेषेण यथा भेत्स्यत्यसौ नृपः

vyutkrāntasamayaṃ sā vai rājānaṃ tyakṣyate yathā | tadahaṃ vedmyaśeṣeṇa yathā bhetsyatyasau nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

राजाके प्रतिज्ञा भड् करनेपर वह उसे छोड़ देगी। उस राजाकी प्रतिज्ञा जिस प्रकार टूटेगी, मैं उसे भी भलीभाँति जानता हूँ

अध्याय 26

श्लोक 22

ससहायो गमिष्यामि युष्माकं कार्यसिद्धये ।एवमुक्त्वा गतस्तत्र प्रतिष्ठानं महायशाः

sasahāyo gamiṣyāmi yuṣmākaṃ kāryasiddhaye | evamuktvā gatastatra pratiṣṭhānaṃ mahāyaśāḥ

हिन्दी अर्थ

तुम्हारे कामको सिद्ध करनेके लिये अपने सहायकोंको साथ लेकर मैं वहाँ जाऊँगा। यों कहकर वे महायशस्वी गन्धर्व प्रतिष्ठानपुर (झूँसी-प्रयाग)-में गये

अध्याय 26

श्लोक 23

निशायामथ चागम्य मेषमेकं जहार सः ।मातृवद् वर्तते सा तु मेषयोश्चारुहासिनी

niśāyāmatha cāgamya meṣamekaṃ jahāra saḥ | mātṛvad vartate sā tu meṣayoścāruhāsinī

हिन्दी अर्थ

वहाँ आकर उन्होंने रातमें एक भेंड़ चुरा ली। मनोहर हासवाली वह उर्वशी उन भेड़ोंपर माताके समान ख्रेह करती थी

अध्याय 26

श्लोक 24

गन्धर्वागमनं श्रुत्वा शापान्तं च यशस्विनी ।राजानमब्रवीत् तत्र पुत्रो मेऽह्रियतेति सा

gandharvāgamanaṃ śrutvā śāpāntaṃ ca yaśasvinī | rājānamabravīt tatra putro me'hriyateti sā

हिन्दी अर्थ

यशस्विनी उर्वशीने गन्धर्वोके आगमनको सुनकर विचारा कि अब मेरे शापके अन्त होनेका समय आ गया, तब उसने राजासे कहा—'राजन्‌ ! मेरे एक बच्चेको चोर चुरा ले गये '

अध्याय 26

श्लोक 25

एवमुक्तो विनिश्चित्य नग्नो नैवोदतिष्ठत ।नग्नं मां द्रक्ष्यते देवी समयो वितथो भवेत्

evamukto viniścitya nagno naivodatiṣṭhata | nagnaṃ māṃ drakṣyate devī samayo vitatho bhavet

हिन्दी अर्थ

यह कहनेपर भी वह यह विचारकर नंगा नहीं उठा कि यदि यह देवी मुझे नंगा देख लेगी तो मेरी प्रतिज्ञा झूठी हो जायगी

अध्याय 26

श्लोक 26

ततो भूयस्तु गन्धर्वा द्वितीयं मेषमाददुः ।द्वितीये तु हृते मेषे ऐलं देव्यब्रवीदिदम्

tato bhūyastu gandharvā dvitīyaṃ meṣamādaduḥ | dvitīye tu hṛte meṣe ailaṃ devyabravīdidam

हिन्दी अर्थ

इतनेहीमें गन्धर्व पुन: दूसरे भेंड़को भी उठा ले गये। दूसरे भेंड़के चुराये जानेपर देवी उर्वशीने पुरूरवासे यह कहा—

अध्याय 26

श्लोक 27

पुत्रो मेऽपहृतो राजन्ननाथाया इव प्रभो ।एवमुक्तस्तथोत्थाय नग्नो राजा प्रधावितः

putro me'pahṛto rājannanāthāyā iva prabho | evamuktastathotthāya nagno rājā pradhāvitaḥ

श्लोक 27–29 का हिन्दी अर्थ

सामर्थ्यशाली राजन्‌! अनाथ स्त्रीके समान मेरे पुत्रोंको छीन लिया गया। यों उर्वशीके कहनेपर राजा नंगे ही उठकर भेड़ोंके पैरके चिह्नका अनुसरण करते हुए दौड़े । इसी समय गन्धर्वोने बड़ी भारी बिजली चमकायी । उस समय वह विशाल भवन एक साथ प्रकाशित हो गया। तब तो उर्वशीने राजाको नंगा देख लिया। वह कामरूपिणी अप्सरा राजाको नंगा देखते ही अन्तर्धान हो गयी

अध्याय 26

श्लोक 28

मेषयोः पदमन्विच्छन् गन्धर्वैर्विद्युदप्यथ ।उत्पादिता सुमहती ययौ तद्भवनं महत्

meṣayoḥ padamanvicchan gandharvairvidyudapyatha | utpāditā sumahatī yayau tadbhavanaṃ mahat

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 26

श्लोक 29

प्रकाशितं वै सहसा ततो नग्नमवैक्षत ।नग्नं दृष्ट्वा तिरोभूता साप्सरा कामरूपिणी

prakāśitaṃ vai sahasā tato nagnamavaikṣata | nagnaṃ dṛṣṭvā tirobhūtā sāpsarā kāmarūpiṇī

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 26

श्लोक 30

उत्सृष्टावुरणौ दृष्ट्वा राजा गृह्यागतो गृहे ।अपश्यन्नुर्वशीं तत्र विललाप सुदुःखितः

utsṛṣṭāvuraṇau dṛṣṭvā rājā gṛhyāgato gṛhe | apaśyannurvaśīṃ tatra vilalāpa suduḥkhitaḥ

हिन्दी अर्थ

उधर राजा भी (गन्धर्वोके) छोड़े हुए भेड़ोंको देख उन्हें साथ लेकर घरमें घुसे, पर वहाँ उन्हें उर्वशी नहीं दिखायी दी । तब वे परम दुः:खित हो विलाप करने लगे

अध्याय 26

श्लोक 31

चचार पृथिवीं सर्वां मार्गमाण इतस्ततः ।अथापश्यत् स तां राजा कुरुक्षेत्रे महाबलः

cacāra pṛthivīṃ sarvāṃ mārgamāṇa itastataḥ | athāpaśyat sa tāṃ rājā kurukṣetre mahābalaḥ

श्लोक 31–32 का हिन्दी अर्थ

फिर वे उर्वशीको खोजते हुए पृथ्वीपर सर्वत्र घूमने लगे। कुछ समयके अनन्तर उन महाबली नरेशने उस शोभामयी अप्सराको कुरक्षेत्रके प्लक्षतीर्थकी हैमवती नामवाली पुष्करिणीमें स्रानकर अपनी पाँच सखियोंके साथ क्रीड़ा करते देखा

अध्याय 26

श्लोक 32

प्लक्षतीर्थे पुष्करिण्यां हैमवत्यां समाप्लुताम् ।क्रीडन्तीमप्सरोभिश्च पञ्चभिः सह शोभनाम्

plakṣatīrthe puṣkariṇyāṃ haimavatyāṃ samāplutām | krīḍantīmapsarobhiśca pañcabhiḥ saha śobhanām

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 26

श्लोक 23b

तां क्रीडन्तीं ततो दृष्ट्वा विललाप सुदुःखितः ।सा चापि तत्र तं दृष्ट्वा राजानमविदूरतः

tāṃ krīḍantīṃ tato dṛṣṭvā vilalāpa suduḥkhitaḥ | sā cāpi tatra taṃ dṛṣṭvā rājānamavidūrataḥ

अध्याय 26

श्लोक 34

उर्वशी ताः सखीः प्राह स एष पुरुषोत्तमः ।यस्मिन्नहमवात्सं वै दर्शयामास तं नृपम्

urvaśī tāḥ sakhīḥ prāha sa eṣa puruṣottamaḥ | yasminnahamavātsaṃ vai darśayāmāsa taṃ nṛpam

अध्याय 26

श्लोक 35

समाविग्नास्तु ताः सर्वाः पुनरेव नराधिपः ।जाये ह तिष्ठ मनसा घोरे वचसि तिष्ठ ह

samāvignāstu tāḥ sarvāḥ punareva narādhipaḥ | jāye ha tiṣṭha manasā ghore vacasi tiṣṭha ha

श्लोक 35–36 का हिन्दी अर्थ

उस समय वे सभी अप्सराएँ (उर्वशीके पुनर्गमनकी आशड्गासे) घबरा गयीं। इधर राजा उससे फिर कहने लगे-“प्रिये! तू थोड़ा ठहर, ओ कठोर हृदयवाली ! ठहर जा और अपने वचनोंपर दृढ़ रह! इस प्रकार वैदिक सूक्तोंको वे दोनों एक-दूसरेके प्रति उत्तर-प्रत्युत्तरके रूपमें कहने लगे । उस समय उर्वशीने इला-पुत्र पुरूरवासे कहा—'प्रभो! मैं आपके द्वारा गर्भवती हूँ

अध्याय 26

श्लोक 36

एवमादीनि सूक्तानि परस्परमभाषत ।उर्वशी चाब्रवीदैलं सगर्भाहं त्वया प्रभो

evamādīni sūktāni parasparamabhāṣata | urvaśī cābravīdailaṃ sagarbhāhaṃ tvayā prabho

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 26

श्लोक 37

संवत्सरात् कुमारास्ते भविष्यन्ति न संशयः ।निशामेकां च नृपते निवत्स्यसि मया सह

saṃvatsarāt kumārāste bhaviṣyanti na saṃśayaḥ | niśāmekāṃ ca nṛpate nivatsyasi mayā saha

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! निस्संदेह एक-एक वर्षपर मेरे गर्भसे आपके कुमार उत्पन्न होंगे तथा प्रतिवर्ष एक रात्रि आप मेरे साथ रह सकेंगे

अध्याय 26

श्लोक 38

हृष्टो जगाम राजाथ स्वपुरं तु महायशाः ।गते संवत्सरे भूय उर्वशी पुनरागमत्

hṛṣṭo jagāma rājātha svapuraṃ tu mahāyaśāḥ | gate saṃvatsare bhūya urvaśī punarāgamat

हिन्दी अर्थ

तब वे महायशस्वी राजा प्रसन्न हो गये और अपने नगरमें आ गये। वर्ष समाप्त होनेपर उर्वशी उनके पास फिर आयी

अध्याय 26

श्लोक 39

उषितश्च तया सार्द्धमेकरात्रं महायशाः ।उर्वश्यथाब्रवीदैलं गन्धर्वा वरदास्तव

uṣitaśca tayā sārddhamekarātraṃ mahāyaśāḥ | urvaśyathābravīdailaṃ gandharvā varadāstava

हिन्दी अर्थ

महायशस्वी पुरूरवा उसके साथ एक रात्रि रहे। तदनन्तर उर्वशीने पुरूरवासे कहा—*गन्धर्व आपको वर देना चाहते हैं

अध्याय 26

श्लोक 40

तान् वृणीष्व महाराज ब्रूहि चैनांस्त्वमेव हि ।वृणीष्व समतां राजन् गन्धर्वाणां महात्मनाम्

tān vṛṇīṣva mahārāja brūhi caināṃstvameva hi | vṛṇīṣva samatāṃ rājan gandharvāṇāṃ mahātmanām

हिन्दी अर्थ

महाराज! अब आप वर माँग लीजिये। आप इनसे इन महात्मा गन्धर्वॉंकी समता माँग लीजिये

अध्याय 26

श्लोक 41

तथेत्युक्त्वा वरं वव्रे गन्धर्वाश्च तथास्त्विति ।पूरयित्वाग्निना स्थालीं गन्धर्वाश्च तमब्रुवन्

tathetyuktvā varaṃ vavre gandharvāśca tathāstviti | pūrayitvāgninā sthālīṃ gandharvāśca tamabruvan

हिन्दी अर्थ

तब पुरूरवाने “बहुत अच्छा' कहकर गन्धर्वोंसे वर माँग लिया। तब गन्धर्वबोने ' बहुत अच्छा', 'ऐसा ही होगा', कहकर एक थालीमें अग्रि भरकर पुरूरवासे कहा—

अध्याय 26

श्लोक 42

अनेनेष्ट्वा च लोकान्नः प्राप्स्यसि त्वं नराधिप ।तानादाय कुमारांस्तु नगरायोपचक्रमे

aneneṣṭvā ca lokānnaḥ prāpsyasi tvaṃ narādhipa | tānādāya kumārāṃstu nagarāyopacakrame

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! इस अग्रिसे यज्ञ करके तुम हमारे लोकोंमें आ जाओगे। तब वे राजा (अग्नि और) अपने पुत्रोंको लेकर नगरकी ओर चले

अध्याय 26

श्लोक 43

निक्षिप्याग्निमरण्ये तु सपुत्रस्तु गृहं ययौ ।स त्रेताग्निं तु नापश्यदश्वत्थं तत्र दृष्टवान्

nikṣipyāgnimaraṇye tu saputrastu gṛhaṃ yayau | sa tretāgniṃ tu nāpaśyadaśvatthaṃ tatra dṛṣṭavān

हिन्दी अर्थ

(मार्गमें ) उन्होंने वनमें अग्रिको रख दिया और अपने पुत्रोंको लेकर घरमें प्रवेश किया। फिर वनमें जानेपर वहाँ उन्होंने अग्निको नहीं देखा; किंतु उसकी जगह एक पीपलके वृक्षको खड़ा देखा

अध्याय 26

श्लोक 44

शमीजातं तु तं दृष्ट्वा अश्वत्थं विस्मितस्तदा ।गन्धर्वेभ्यस्तदाशंसदग्निनाशं ततस्तु सः

śamījātaṃ tu taṃ dṛṣṭvā aśvatthaṃ vismitastadā | gandharvebhyastadāśaṃsadagnināśaṃ tatastu saḥ

हिन्दी अर्थ

तब वे राजा (अग्रिको अपने गर्भमें छिपानेवाले) शमी (जड़) -के वृक्षमेंसे उत्पन्न हुए पीपलको देखकर विस्मयमें पड़ गये और उन्होंने गन्धरवॉँसे अग्रिके न दीखनेका वृत्तान्त कहा

अध्याय 26

श्लोक 45

श्रुत्वा तमर्थमखिलमरणीं तु समादिशन् ।अश्वत्थादरणीं कृत्वा मथित्वाग्निं यथाविधि

śrutvā tamarthamakhilamaraṇīṃ tu samādiśan | aśvatthādaraṇīṃ kṛtvā mathitvāgniṃ yathāvidhi

श्लोक 45–46 का हिन्दी अर्थ

गन्धर्वोने सब बातको सुनकर कहा, *तुम पीपलकी अरणी बना लो' तब उन्होंने पीपलकी अरणी बनाकर शास्त्रीय विधिके अनुसार उन अरणियोंको मथकर अग्रिको उत्पन्न किया। फिर उस अप्रिके तीन विभाग किये। तदनन्तर उस अग्रिसे उन्होंने यजन किया था । वे उस त्रेताग्रिसे अनेक प्रकारके यज्ञ कर गन्धर्वोंकी समानता पाकर गन्धर्बोंके लोकमें पहुँच गये

अध्याय 26

श्लोक 46

मथित्वाग्निं त्रिधा कृत्वा अयजत्स नराधिपः ।इष्ट्वा यज्ञैर्बहुविधैर्गतस्तेषां सलोकताम्

mathitvāgniṃ tridhā kṛtvā ayajatsa narādhipaḥ | iṣṭvā yajñairbahuvidhairgatasteṣāṃ salokatām

अर्थ श्लोक 45 के साथ

अध्याय 26

श्लोक 47

गन्धर्वेभ्यो वरं लब्ध्वा त्रेताग्निं समकारयत् ।एकोऽग्निः पूर्वमेवासीदैलस्त्रेतामकारयत्

gandharvebhyo varaṃ labdhvā tretāgniṃ samakārayat | eko'gniḥ pūrvamevāsīdailastretāmakārayat

हिन्दी अर्थ

राजा पुरूरवाने गन्धर्वोंसे वर पाकर त्रेताग्रिकी रचना की थी। पहले अग्ि एक ही था, पुरूरवाने उसको तीन बनाया था

अध्याय 26

श्लोक 48

एवम्प्रभावो राजासीदैलस्तु नरसत्तम ।देशे पुण्यतमे चैव महर्षिभिरभिष्टुते

evamprabhāvo rājāsīdailastu narasattama | deśe puṇyatame caiva maharṣibhirabhiṣṭute

श्लोक 48–49 का हिन्दी अर्थ

नर्श्रेष्ठ ! राजा पुरूरवा ऐसे प्रतापी थे। उन महायशस्वी पृथ्वीपतिने गड़ाके उत्तर तटपर बसे हुए महर्षियोंसे प्रशंसित परम पवित्र प्रतिष्ठान (झूँसी—प्रयाग) -में राज्य किया था

अध्याय 26

श्लोक 49

राज्यं स कारयामास प्रयागे पृथिवीपतिः ।उत्तरे जाह्नवीतीरे प्रतिष्ठाने महायशाः

rājyaṃ sa kārayāmāsa prayāge pṛthivīpatiḥ | uttare jāhnavītīre pratiṣṭhāne mahāyaśāḥ

अर्थ श्लोक 48 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.