Harivamsha Purana
250
अध्याय 250 / 318

Parva 3, Adhyāya 67

27 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ27 श्लोक

अध्याय 250

श्लोक 1

ब्रह्मणः आज्ञया कश्यपेन अदित्या सह देवानां क्षीरसागरस्य उत्तरे तीरे गत्वा तपःकरणे संलग्नता ।ब्रह्मोवाच ।यदर्थमिह सम्प्राप्ता भवन्तः सर्व एव हि ।विजानाम्यहमव्यग्र एतत् सर्वं महाबलाः

brahmaṇaḥ ājñayā kaśyapena adityā saha devānāṃ kṣīrasāgarasya uttare tīre gatvā tapaḥkaraṇe saṃlagnatā | brahmovāca | yadarthamiha samprāptā bhavantaḥ sarva eva hi | vijānāmyahamavyagra etat sarvaṃ mahābalāḥ

हिन्दी अर्थ

विष्यपर्व्ों वासनावतारके प्रयड्औमें देवताओंका ब्रह्मलोकसें याय पूरा हुआ॥ दर ॥ पोडध्याय: >>ऊउ़्ज दितिसहित देवताओंका क्षीरसागरके तपस्यामें संलग् होना ब्रह्माजीने कहा—महाबली देवताओ! तुम सब लोग जिस उद्देश्यसे यहाँ आये हो, यह सब मैं व्यग्रतारहित होकर जानता हूँ

अध्याय 250

श्लोक 2

भविष्यति च वः सोऽर्थः काङ्क्षितो यः सुरोत्तमाः ।बलेर्दानवमुख्यस्य यो विजेता भविष्यति

bhaviṣyati ca vaḥ so'rthaḥ kāṅkṣito yaḥ surottamāḥ | balerdānavamukhyasya yo vijetā bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

सुरश्रेष्ठण ! तुमलोग जिसकी इच्छा रखते हो, तुम्हारा वह मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा। दानवराज बलिपर विजय पानेवाले जो परम पुरुष हैं, वे शीघ्र ही प्रकट होंगे

अध्याय 250

श्लोक 3

न खल्वसुरसङ्घानामेको जेता स विश्वकृत् ।त्रैलोक्यस्यापि जेतासौ देवानामपि चोत्तमः

na khalvasurasaṅghānāmeko jetā sa viśvakṛt | trailokyasyāpi jetāsau devānāmapi cottamaḥ

हिन्दी अर्थ

वे विश्वस्ष्टा परमात्मा केवल असुरसमुदायोंको ही नहीं जीतेंगे, त्रिलोकीके राज्यको भी जीत लेंगे। वे देवताओंमें भी सबसे उत्तम हैं

अध्याय 250

श्लोक 4

धाता चैव हि लोकानां विश्वयोनिः सनातनः ।पूर्वं देवं सदा प्राहुर्हेमगर्भनिदर्शनम्

dhātā caiva hi lokānāṃ viśvayoniḥ sanātanaḥ | pūrvaṃ devaṃ sadā prāhurhemagarbhanidarśanam

हिन्दी अर्थ

वे ही लोकोंके धाता (धारण-पोषण करनेवाले), सम्पूर्ण विश्वकी योनि एवं सनातन पुरुष हैं । विद्वान पुरुष उन्हींको सदा आदि देवता कहते हैं। मैं हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) उन्हींका निदर्शन (प्रतिबिम्ब अथवा पुत्र) हूँ

अध्याय 250

श्लोक 5

आत्मा देवेन विभुना कृतोऽजेयो महात्मनः ।बलेरसुरमुख्यस्य विश्वस्य जगतस्तथा

ātmā devena vibhunā kṛto'jeyo mahātmanaḥ | balerasuramukhyasya viśvasya jagatastathā

श्लोक 5–6 का हिन्दी अर्थ

उन सर्वव्यापी परमात्मदेवने ही असुरशिरोमणि महात्मा बलिके स्वरूपको अजेय बनाया है। वे ही सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्तिके कारण तथा हम सब देवताओंके भी पूर्वज हैं। शत्रुओंको संताप देनेवाले वे योगयुक्त विश्वात्मा अचिन्त्य (मन और बुद्धिकि अविषय) हैं

अध्याय 250

श्लोक 6

प्रभवः स हि सर्वेषामस्माकमपि पूर्वजः ।अचिन्त्यः स हि विश्वात्मा योगयुक्तः परन्तपः

prabhavaḥ sa hi sarveṣāmasmākamapi pūrvajaḥ | acintyaḥ sa hi viśvātmā yogayuktaḥ parantapaḥ

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 250

श्लोक 7

तं देवापि महात्मानं न विदुः कोऽप्यसाविति ।वेदात्मानं च विश्वं च स देवः पुरुषोत्तमः

taṃ devāpi mahātmānaṃ na viduḥ ko'pyasāviti | vedātmānaṃ ca viśvaṃ ca sa devaḥ puruṣottamaḥ

हिन्दी अर्थ

देवता भी उन परमात्माके विषयमें यह नहीं जानते कि वे कौन हैं? किंतु वे पुरुषोत्तमदेव अपनेको तथा सम्पूर्ण विश्वको भी जानते हैं

अध्याय 250

श्लोक 8

तस्यैव तु प्रसादेन प्रवक्ष्येऽहं परां गतिम् ।यत्र योगं समास्थाय तपश्चरति दुश्चरम्

tasyaiva tu prasādena pravakṣye'haṃ parāṃ gatim | yatra yogaṃ samāsthāya tapaścarati duścaram

हिन्दी अर्थ

उन्हींके कृपा- प्रसादसे मैं उनकी परा गति (उत्कृष्ट आश्रय)-का पता बता रहा हूँ, जहाँ योगका आश्रय लेकर वे दुष्कर तपस्या करते हैं

अध्याय 250

श्लोक 9

क्षीरोदस्योत्तरे कूले उदीच्यां दिशि देवताः ।अमृतं नाम परमं स्थानमाहुर्मनीषिणः

kṣīrodasyottare kūle udīcyāṃ diśi devatāḥ | amṛtaṃ nāma paramaṃ sthānamāhurmanīṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

देवताओ! मनीषी पुरुष कहते हैं कि उत्तर दिशामें क्षीरसागरके उत्तर तटपर 'अमृत' नामक उत्कृष्ट स्थान (परम पद) है

अध्याय 250

श्लोक 10

भवन्तस्तत्र वै गत्वा तपसा संशितव्रताः ।अमृतं स्थानमासाद्य तपश्चरत दुश्चरम्

bhavantastatra vai gatvā tapasā saṃśitavratāḥ | amṛtaṃ sthānamāsādya tapaścarata duścaram

हिन्दी अर्थ

तुमलोग वहीं जाकर तपस्यापूर्वक कठोर ब्रतका पालन करो। उस ' अमृत स्थानमें पहुँचकर दुष्कर तपस्यामें लग जाओ

अध्याय 250

श्लोक 11

तत्र श्रोष्यथ विस्पष्टां स्निग्धगम्भीरनिःस्वनाम् ।उष्णगे तोयपूर्णस्य तोयदस्य समस्वनाम्

tatra śroṣyatha vispaṣṭāṃ snigdhagambhīraniḥsvanām | uṣṇage toyapūrṇasya toyadasya samasvanām

श्लोक 11–18 का हिन्दी अर्थ

सर्वदेवगण! वहाँ व्रतकी समाप्ति होनेपर उस वब्रतके विसर्जनसे पूर्व तुम्हें वर्षाकालके सजल जलधरकी भाँति खिग्ध एवं गम्भीर स्वरमें उन अमोघ परमात्माकी सुस्पष्ट वाणी सुनायी देगी, जो उपयुक्त अक्षरों और पदोंसे युक्त, स्रेहपूर्, रमणीय, अभयदायिनी, मज़्लकारिणी, उत्तम संस्कारोंसे सम्पन्न, वरदायक तथा ब्रह्मवादिनी होगी । उन शुद्ध अन्तःकरणवाले सर्वदेवाधिदेव भगवान्‌की कही हुई वह दिव्य सत्य वाणी सम्पूर्ण कल्मषोंका नाश करनेवाली होगी। वे कहेंगे-'मेरे पास खड़े हुए सुरश्रेष्ठगण ! तुम्हारा स्वागत है मैं वर देनेके लिये खड़ा हूँ, बोलो किसको कौन-सा वर दूँ?' उस समय कश्यप, अदिति और तुम सब लोग उनसे वर ग्रहण करना। कश्यप और अदिति उन योगात्मा श्रीहरिके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम करनेके. पश्चात्‌ निस्संदेह यही बात कहें कि 'आप ही मेरे पुत्र होकर प्रकट हों'। परम भक्तिभावसे ऐसी बात कहनेपर वे भगवान्‌ * तथास्तु—ऐसा ही होगा' यह कहेंगे, सब देवता भी उनसे यही कहें कि आप हमारे भाई हो जायेँ। तब वे सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा श्रीमानू भगवान्‌ 'तथास्तु' कहकर तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर लेंगे

अध्याय 250

श्लोक 12

युक्ताक्षरपदस्निग्धां रम्यामभयदां शिवाम् ।वाणीं परमसंस्कारां वरदां ब्रह्मवादिनीम्

yuktākṣarapadasnigdhāṃ ramyāmabhayadāṃ śivām | vāṇīṃ paramasaṃskārāṃ varadāṃ brahmavādinīm

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 250

श्लोक 13

दिव्यां सरस्वतीं सत्यां सर्वकिल्बिषनाशिनीम् ।सर्वदेवाधिदेवस्य भाषितां भावितात्मनः

divyāṃ sarasvatīṃ satyāṃ sarvakilbiṣanāśinīm | sarvadevādhidevasya bhāṣitāṃ bhāvitātmanaḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 250

श्लोक 14

तस्य व्रतसमाप्तौ तु यावद् व्रतविसर्जनम् ।अमोघस्य तु देवस्य विश्वेदेवा महात्मनः

tasya vratasamāptau tu yāvad vratavisarjanam | amoghasya tu devasya viśvedevā mahātmanaḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 250

श्लोक 15

स्वागतं वः सुरश्रेष्ठा मत्सकाशे व्यवस्थिताः ।कस्य किं वा वरं देवा ददामि वरदः स्थितः

svāgataṃ vaḥ suraśreṣṭhā matsakāśe vyavasthitāḥ | kasya kiṃ vā varaṃ devā dadāmi varadaḥ sthitaḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 250

श्लोक 16

तं कश्यपोऽदितिश्चैव वरं गृह्णीत वै ततः ।प्रणम्य शिरसा पादौ तस्मै योगात्मने तदा

taṃ kaśyapo'ditiścaiva varaṃ gṛhṇīta vai tataḥ | praṇamya śirasā pādau tasmai yogātmane tadā

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 250

श्लोक 17

भवानेव च नः पुत्रो भवत्विति न संशयः ।उक्तश्च परया भक्त्या तथास्त्विति स वक्ष्यति

bhavāneva ca naḥ putro bhavatviti na saṃśayaḥ | uktaśca parayā bhaktyā tathāstviti sa vakṣyati

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 250

श्लोक 18

देवा ब्रुवन्तु तं सर्वे भ्राता नस्त्वं भवेति ह ।तथास्त्विति च स श्रीमान् वक्ष्यते सर्वलोककृत्

devā bruvantu taṃ sarve bhrātā nastvaṃ bhaveti ha | tathāstviti ca sa śrīmān vakṣyate sarvalokakṛt

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 250

श्लोक 19

तस्मादेवं गृहीत्वा तु वरं त्रिदशसत्तमाः ।कृतकृत्याः पुनः सर्वे गच्छध्वं स्वं स्वमालयम्

tasmādevaṃ gṛhītvā tu varaṃ tridaśasattamāḥ | kṛtakṛtyāḥ punaḥ sarve gacchadhvaṃ svaṃ svamālayam

हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ देवताओ! इस प्रकार उनसे वर लेकर कृतकृत्य हो पुन: तुम सब लोग अपने-अपने स्थानको चले जाना

अध्याय 250

श्लोक 20

तथास्त्विति सुराः सर्वे कश्यपोऽदितिरेव च ।वन्दित्वा ब्रह्मचरणौ गताः सौम्यां दिशं प्रति

tathāstviti surāḥ sarve kaśyapo'ditireva ca | vanditvā brahmacaraṇau gatāḥ saumyāṃ diśaṃ prati

हिन्दी अर्थ

तब सब देवता, कश्यप और अदितिने “ऐसा ही होगा' यह कहकर ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणाम किया और सब-के-सब उत्तर दिशाकी ओर चल दिये

अध्याय 250

श्लोक 21

तेऽचिरेणैव सम्प्राप्ताः क्षीरोदस्योत्तरं तटम् ।यथोद्दिष्टं भगवता ब्रह्मणा ब्रह्मवादिना

te'cireṇaiva samprāptāḥ kṣīrodasyottaraṃ taṭam | yathoddiṣṭaṃ bhagavatā brahmaṇā brahmavādinā

श्लोक 21–25 का हिन्दी अर्थ

कश्यपके साथ अमृतस्थानमें पहुँचकर समस्त देवताओंने उन योगस्वरूप बुद्धिमान्‌ देवेश्वर सहस्रललोचनधारी नारायणदेवकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे एक सहस्र वर्षोके लिये दिव्य कामदब्रतकी दीक्षा ली

अध्याय 250

श्लोक 22

तेऽतीत्य सागरान् सर्वान्पर्वतांश्च बहून्क्षणात् ।नद्यश्च विविधा दिव्याः पृथिव्यां सुरसत्तमाः

te'tītya sāgarān sarvānparvatāṃśca bahūnkṣaṇāt | nadyaśca vividhā divyāḥ pṛthivyāṃ surasattamāḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 250

श्लोक 23

पश्यन्ति च सुघोरां वै सर्वसत्त्वविवर्जिताम् ।अभास्कराममर्यादां तमसा संवृतां दिशम्

paśyanti ca sughorāṃ vai sarvasattvavivarjitām | abhāskarāmamaryādāṃ tamasā saṃvṛtāṃ diśam

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 250

श्लोक 24

अमृतं स्थानमासाद्य कश्यपेन सुराः सह ।दीक्षिताः कामदं दिव्यं व्रतं वर्षसहस्रकम्

amṛtaṃ sthānamāsādya kaśyapena surāḥ saha | dīkṣitāḥ kāmadaṃ divyaṃ vrataṃ varṣasahasrakam

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 250

श्लोक 25

प्रसादार्थं सुरेशाय तस्मै योगाय धीमते ।नारायणाय देवाय सद्दस्राक्षाय धीमते

prasādārthaṃ sureśāya tasmai yogāya dhīmate | nārāyaṇāya devāya saddasrākṣāya dhīmate

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 250

श्लोक 26

ब्रह्मचर्येण मौनेन स्थानवीरासनेन च ।दमेन च सुराः सर्वे तपो दुश्चरमास्थिताः

brahmacaryeṇa maunena sthānavīrāsanena ca | damena ca surāḥ sarve tapo duścaramāsthitāḥ

हिन्दी अर्थ

वे सब देवता ब्रह्मचर्यपालन, मौनधारण, वीरासनग्रहण तथा मन और इन्द्रियोंके संयमद्वारा दुष्कर तपस्यामें संलग्न हो गये

अध्याय 250

श्लोक 27

कश्यपस्तत्र भगवान् प्रसादार्थं महात्मनः ।उदीरयति वेदोक्तं यमाहुः परमं स्तवम्

kaśyapastatra bhagavān prasādārthaṃ mahātmanaḥ | udīrayati vedoktaṃ yamāhuḥ paramaṃ stavam

हिन्दी अर्थ

वहाँ उन परमात्माकी प्रसन्नताके लिये भगवान्‌ कश्यप एक वेदोक्त स्तोत्रका पाठ करने लगे, जिसे 'परमस्तव' कहते हैं

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

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भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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शोध टिप्पणीResearch note

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.