Harivamsha Purana
248
अध्याय 248 / 318

Parva 3, Adhyāya 65

18 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ18 श्लोक

अध्याय 248

श्लोक 1

विजयिनं बलिनं प्रति राजलक्ष्म्यादीनां शुमागमनं निष्प्रयत्नेषु देवेषु त्रैलोक्ये दैत्यपालिते ।जये बलेर्बलवतो मयशम्बरयोस्तथा

vijayinaṃ balinaṃ prati rājalakṣmyādīnāṃ śumāgamanaṃ niṣprayatneṣu deveṣu trailokye daityapālite | jaye balerbalavato mayaśambarayostathā

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर देवता विजयके लिये प्रयत्न छोड़ बैठे और त्रिलोकीके राज्यका दैत्यराज बलिके द्वारा पालन होने लगा। बलवान बलि, मयासुर और शम्बरासुरकी विजय हुई

अध्याय 248

श्लोक 2

सुधासु दिक्षु सर्वासु प्रवृत्ते धर्मकर्मणि ।अपावृत्ते धर्मपथे अयनस्थे दिवाकरे

sudhāsu dikṣu sarvāsu pravṛtte dharmakarmaṇi | apāvṛtte dharmapathe ayanasthe divākare

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण दिशाएँ अमृतमयी हो गर्यीं, धर्म- कर्मका पालन होने लगा। धर्मका मार्ग खुल गया और सूर्यदेव अपने अयनमें स्थित हो गये

अध्याय 248

श्लोक 3

प्रह्रादशम्बरमयैरनुह्रादेन चैव हि ।दिक्षु सर्वासु गुप्तासु गगने दैत्यपालिते

prahrādaśambaramayairanuhrādena caiva hi | dikṣu sarvāsu guptāsu gagane daityapālite

श्लोक 3–7 का हिन्दी अर्थ

प्रह्माद, शम्बरासुर, मयासुर और अनुह्ादके द्वारा म्पूर्ण दिशाएँ सुरक्षित हो गयीं । आकाशका दैत्योंद्वारा ालन होने लगा। दैत्यलोग स्वर्गकी प्रासिके लिये ज्शोभाका दर्शन कराने लगे। उस समय सार नसमुदाय प्रकृतिस्थ होकर सन्मार्गपर चलने लगा। सब कारके पापोंका अभाव हो गया। पुण्यकर्मकी व्यापक त्ता दिखायी देने लगी । सिद्ध पुरुषोंकी तपस्यामें स्थिति ई। सर्वत्र आश्रमोंकी रक्षा होने लगी। धर्म अपने चारों रणोंसे युक्त होकर रहने लगा। अधर्मका चतुर्थाशमात्र शेष रह गया। तेजस्वी राजा प्रजापालनमें तत्पर रहने गे और सभी आश्रमोंके निवासी अपने-अपने धर्ममें स्थत हो गये। ऐसे समयमें समस्त असुरोंने दैत्यराज लिका इन्द्रके पदपर अभिषेक किया

अध्याय 248

श्लोक 4

दैत्येषु मखशोभाश्च स्वर्गार्थं दर्शयत्सु च ।प्रकृतिस्थे तदा लोके वर्तमाने च सत्पथे

daityeṣu makhaśobhāśca svargārthaṃ darśayatsu ca | prakṛtisthe tadā loke vartamāne ca satpathe

अर्थ श्लोक 3 के साथ

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श्लोक 5

अभावे सर्वपापानां भावे चैव तथा स्थिते ।भावे तपसि सिद्धानां सर्वत्राश्रमरक्षिषु

abhāve sarvapāpānāṃ bhāve caiva tathā sthite | bhāve tapasi siddhānāṃ sarvatrāśramarakṣiṣu

अर्थ श्लोक 3 के साथ

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श्लोक 6

चतुष्पादे स्थिते धर्मे अधर्मे पादविग्रहे ।प्रजापालनयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु

catuṣpāde sthite dharme adharme pādavigrahe | prajāpālanayukteṣu bhrājamāneṣu rājasu

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 248

श्लोक 7

स्वधर्मसम्प्रयुक्तेषु सर्वाश्रमनिवासिषु ।अभिषिक्तोऽसुरैः सर्वैर्दैत्यराजो बलिस्तदा

svadharmasamprayukteṣu sarvāśramanivāsiṣu | abhiṣikto'suraiḥ sarvairdaityarājo balistadā

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 248

श्लोक 8

हृष्टेष्वसुरसङ्घेषु नदत्सु मुदितेषु च ।अथाभ्युपगता लक्ष्मीर्बलिं पद्मासने स्थिता

hṛṣṭeṣvasurasaṅgheṣu nadatsu muditeṣu ca | athābhyupagatā lakṣmīrbaliṃ padmāsane sthitā

श्लोक 8–18 का हिन्दी अर्थ

लक्ष्मी बोलीं—बलवानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी महाराज लि! तुम्हारा भला हो। तुमने जो देवताओंको पराजित कया है, इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हुई हूँ। मने युद्धमें पराक्रम करके जो देवराज इन्द्रपर विजय यी है, तुम्हारे उस उत्तम सत्त्व (धैर्य और बल) - गे देखकर मैं स्वयं तुम्हारे पास चली आयी हूँ। [नवशिरोमणे ! तुम असुरराज हिरण्यकशिपुके कुलमें त्पन्न हुए हो, अतः: तुम्हारा ऐसा पराक्रम करना ाश्चर्यकी बात नहीं है। राजन्‌ ! तुमने अपने प्रपितामह स दैत्यराज हिरण्यकशिपुका महत्त्व बढ़ा दिया, जसने प्रवाहरूपसे सदा बने रहनेवाले इस समस्त ्रभुवनके राज्यका उपभोग किया है। प्रभो! सबसे त्शेष बात यह है कि तुम्हारे राज्यमें सब लोग मकि मार्गपर स्थित हैं। अमितपराक्रमी दैत्यराज! स त्रिलोकीकी श्रेष्ठ वस्तु धर्मके साथ रहकर म॒राज्यका उपभोग करोगे। ऐसा कहकर सम्पूर्ण णियोंके मनको प्रिय लगनेवाली सौम्यरूपा वरदायिनी क्ष्मीदेवी दैत्यराज बलिके भीतर प्रविष्ट हो गयीं। शेष जो श्रेष्ठ देवियाँ थीं, उन कीर्ति, द्युति, प्रभा, धृति, क्षमा, भूति, नीति, विद्या, दया, स्मृति, कृति, लज्जा, मेधा, लक्ष्मी, ईहा, गति, श्रुति, प्रीति, इला ( श्रौतक्रिया ), कीर्ति, शान्ति, पुष्टि तथा क्रिया आदिने एवं नृत्यगीतविशारद सम्पूर्ण दिव्य अप्सराओंने उत्तम दैत्यकुमार राजा बलिको पति (पालक) -रूपमें प्राप्त किया। ब्रह्मवादी बलिने चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीमें असीम ऐश्वर्य प्रात कर लिया

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श्लोक 9

पद्मोद्यतकरा देवी वरदा सुरमोहिनी ।बले बलवतां श्रेष्ठ महाराज महाद्युते

padmodyatakarā devī varadā suramohinī | bale balavatāṃ śreṣṭha mahārāja mahādyute

अर्थ श्लोक 8 के साथ

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श्लोक 10

प्रीतास्मि तव भद्रं ते देवतानां पराजये ।यस्त्वया युधि विक्रम्य देवराजः पराजितः

prītāsmi tava bhadraṃ te devatānāṃ parājaye | yastvayā yudhi vikramya devarājaḥ parājitaḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

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श्लोक 11

दृष्ट्वा ते परमं सत्त्वं ततोऽहं स्वयमागता ।नाश्चर्यं दानवश्रेष्ठ हिरण्यकशिपोः कुले

dṛṣṭvā te paramaṃ sattvaṃ tato'haṃ svayamāgatā | nāścaryaṃ dānavaśreṣṭha hiraṇyakaśipoḥ kule

अर्थ श्लोक 8 के साथ

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श्लोक 12

प्रसूतस्यासुरेन्द्रस्य तव कर्मेदमीदृशम् ।विशेषितस्त्वया राजन् दैत्येन्द्रः प्रपितामहः

prasūtasyāsurendrasya tava karmedamīdṛśam | viśeṣitastvayā rājan daityendraḥ prapitāmahaḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

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श्लोक 13

येन भुक्तं हि निखिलं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ।विशेषतस्तव विभो सर्वे धर्मपथे स्थिताः

yena bhuktaṃ hi nikhilaṃ trailokyamidamavyayam | viśeṣatastava vibho sarve dharmapathe sthitāḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

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श्लोक 14

तेन त्रैलोक्यमुख्येन भोक्ष्यस्यमितविक्रम ।एवमुक्त्वा हि सा देवी लक्ष्मीर्दैत्यपतिं बलिम्

tena trailokyamukhyena bhokṣyasyamitavikrama | evamuktvā hi sā devī lakṣmīrdaityapatiṃ balim

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 248

श्लोक 15

प्रविष्टा वरदा सौम्या सर्वभूतमनोरमा ।शिष्टाश्च देव्यः प्रवरा ह्रीः कीर्तिर्द्युतिरेव च

praviṣṭā varadā saumyā sarvabhūtamanoramā | śiṣṭāśca devyaḥ pravarā hrīḥ kīrtirdyutireva ca

अर्थ श्लोक 8 के साथ

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श्लोक 16

प्रभा धृतिः क्षमा भूतिर्नीतिर्विद्यादया स्मृतिः ।कृतिर्लज्जा तथा मेधा लक्ष्मीरीहा गतिस्तथा

prabhā dhṛtiḥ kṣamā bhūtirnītirvidyādayā smṛtiḥ | kṛtirlajjā tathā medhā lakṣmīrīhā gatistathā

अर्थ श्लोक 8 के साथ

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श्लोक 17

श्रुतिः प्रीतिरिला कीर्तिः शान्तिः पुष्टिः क्रियास्तथा ।सर्वाश्चाप्सरसो दिव्या नृत्यगीतविशारदाः

śrutiḥ prītirilā kīrtiḥ śāntiḥ puṣṭiḥ kriyāstathā | sarvāścāpsaraso divyā nṛtyagītaviśāradāḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 248

श्लोक 18

पतिं प्राप्ताः सुदैतेयं त्रैलोक्ये सचराचरे ।प्राप्तमैश्वर्यममितं बलिना ब्रह्मवादिना

patiṃ prāptāḥ sudaiteyaṃ trailokye sacarācare | prāptamaiśvaryamamitaṃ balinā brahmavādinā

अर्थ श्लोक 8 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

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6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
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मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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