Harivamsha Purana
246
अध्याय 246 / 318

Parva 3, Adhyāya 63

16 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ16 श्लोक

अध्याय 246

श्लोक 1

राजानं बलिं प्रति प्रह्लादस्य वचनं, बलिना देवसैन्योपरि आक्रमणं बृहस्पतेस्तु वचनं श्रुत्वा सत्यं समीरितम् ।भूयः प्रजज्वाल रणे हविषेव महामखे

rājānaṃ baliṃ prati prahlādasya vacanaṃ, balinā devasainyopari ākramaṇaṃ bṛhaspatestu vacanaṃ śrutvā satyaṃ samīritam | bhūyaḥ prajajvāla raṇe haviṣeva mahāmakhe

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

इ

अध्याय 246

श्लोक 2

हतास्तु माया दैत्यानां प्रदीप्तेनाग्निना रणे ।हतमाया हतबला बलिं ते समुपस्थिताः

hatāstu māyā daityānāṃ pradīptenāgninā raṇe | hatamāyā hatabalā baliṃ te samupasthitāḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 246

श्लोक 3

पराजितेषु दैत्येषु वह्निनाद्भुतकर्मणा ।प्रह्रादस्तूत्तरं वाक्यमाह दैत्यपतिं बलिम्

parājiteṣu daityeṣu vahninādbhutakarmaṇā | prahrādastūttaraṃ vākyamāha daityapatiṃ balim

हिन्दी अर्थ

अद्भुत कर्म ररनेवाले अग्रिके द्वारा समस्त दैत्योंके परास्त कर दिये जानेपर प्रह्मादने दैत्यराज बलिसे यह उत्तम बात ही—

अध्याय 246

श्लोक 4

भवानग्निश्च वायुश्च भास्करः सलिलं शशी ।नक्षत्राणि दिशो व्योम भूश्च दानवसत्तम

bhavānagniśca vāyuśca bhāskaraḥ salilaṃ śaśī | nakṣatrāṇi diśo vyoma bhūśca dānavasattama

हिन्दी अर्थ

दानवशिरोमणे ! अग्नि, वायु, सूर्य, जल, न्द्रमा, नक्षत्र, दिशाएँ, आकाश तथा पृथ्वी-सब कुछ म्हीं हो

अध्याय 246

श्लोक 5

भविष्यं चैव भूतं च भवच्चासुरसत्तम ।दत्तं चैतद् भागवता वरदेन स्वयम्भुवा

bhaviṣyaṃ caiva bhūtaṃ ca bhavaccāsurasattama | dattaṃ caitad bhāgavatā varadena svayambhuvā

श्लोक 5–9 का हिन्दी अर्थ

असुरप्रवर ! भूत, वर्तमान और भविष्य भी तुम्हीं हो। दैत्यराज! वरदायक भगवान्‌ स्वयम्भूने म्हें यह वर दिया है कि तुम इन्द्रत्व और अमरत्व ाप्त करोगे, युद्धमें तुम्हारी पराजय नहीं होगी । ईशित्व, शित्व, अपरिमित शुभ बल तथा सम्पूर्ण भूतोंका मधीश्वरत्व तुम्हें सदा प्राप्त होगा। तुम महायोगीश्वर ोओगे और महासमरमें शौर्य प्राप्त करोगे। अणिमा, घघिमा तथा अन्य जो सात्विक गुण हैं, वे भी तुम्हें मुलभ होंगे, अत: दैत्यराज! तुम सेवकोंसहित समस्त वताओंको पराजित करके महान्‌ ऐश्वर्य प्राप्त करो; राजन्‌! ब्रह्माजीने जैसा कहा है; वह उसी रूपमें सत्य होगा। उसे कोई मिथ्या नहीं कर सकता। महात्मा प्रह्मादका वह वचन सुनकर राजा बलिको बड़ा हर्ष हुआ। ते उत्साहित होकर इन्द्रके रथकी ओर चले

अध्याय 246

श्लोक 6

इन्द्रत्वं चामरत्वं च युद्धे चाप्यपराजयः ।ईशित्वं च वशित्वं च बलं चैवामितं शुभम्

indratvaṃ cāmaratvaṃ ca yuddhe cāpyaparājayaḥ | īśitvaṃ ca vaśitvaṃ ca balaṃ caivāmitaṃ śubham

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 246

श्लोक 7

सर्वभूतेश्वरत्वं च दैत्यराज सदा तव ।महायोगीश्वरत्वं च शूरत्वं च महामृधे

sarvabhūteśvaratvaṃ ca daityarāja sadā tava | mahāyogīśvaratvaṃ ca śūratvaṃ ca mahāmṛdhe

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 246

श्लोक 8

अणिमा लघिमा चैव ये चान्ये सात्त्विका गुणाः ।तत्पराजित्य दैत्येन्द्र देवान् सर्वांश्च सानुगान्

aṇimā laghimā caiva ye cānye sāttvikā guṇāḥ | tatparājitya daityendra devān sarvāṃśca sānugān

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 246

श्लोक 9

यथोक्तं ब्रह्मणा राजंस्तत्तथा न तदन्यथा ।तस्य तद् वचनं श्रुत्वा प्रह्रादस्य महात्मनः ।बलिः परमसंहृष्टः प्रायाच्छक्ररथं प्रति

yathoktaṃ brahmaṇā rājaṃstattathā na tadanyathā | tasya tad vacanaṃ śrutvā prahrādasya mahātmanaḥ | baliḥ paramasaṃhṛṣṭaḥ prāyācchakrarathaṃ prati

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 246

श्लोक 10

ततः प्रयान्तं त्रिदशेन्द्रसन्निधौ महासुरेन्द्रं बलिमुत्तमश्रियम् ।तमञ्जसा जग्मुरभिप्रदक्षिणं द्विजाश्च पुण्याः पशवश्च सत्तमाः

tataḥ prayāntaṃ tridaśendrasannidhau mahāsurendraṃ balimuttamaśriyam | tamañjasā jagmurabhipradakṣiṇaṃ dvijāśca puṇyāḥ paśavaśca sattamāḥ

हिन्दी अर्थ

इन्द्रके समीप जाते हुए उत्तम शोभासे सम्पन्न महान्‌ असुरेन्द्र बलिको उस समय पवित्र पक्षी और श्रेष्ठ पशु अनायास ही दाहिने करके गये

अध्याय 246

श्लोक 11

महाजटाभारधरास्तपस्विनस्तदा तमाहुर्विधिमन्त्रमङ्गलैः ।अभिष्टुवन्तः कवयः स्वलङ्कृतं बलिं प्रयान्तं रणमूर्धनि स्थिताः

mahājaṭābhāradharāstapasvinastadā tamāhurvidhimantramaṅgalaiḥ | abhiṣṭuvantaḥ kavayaḥ svalaṅkṛtaṃ baliṃ prayāntaṃ raṇamūrdhani sthitāḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय युद्धके मुहानेपर स्थित हुए महानू जटाभारको धारण करनेवाले विद्वान्‌ तपस्वी युद्धोपयोगी वेषभूषासे विभूषित होकर रणकी यात्रा करनेवाले राजा बलिकी विधिपूर्वक मड़लमय पन्त्रोंद्वारा स्तुति करने लगे

अध्याय 246

श्लोक 12

प्रतप्तजाम्बूनदचित्रभूषणैर्दिव्यैश्च रत्नैर्विविधैरलङ्कृतः ।विराजमानः परमेण वर्चसा रणे विभात्यग्निशिखेव दानवः

prataptajāmbūnadacitrabhūṣaṇairdivyaiśca ratnairvividhairalaṅkṛtaḥ | virājamānaḥ parameṇa varcasā raṇe vibhātyagniśikheva dānavaḥ

हिन्दी अर्थ

तपाये हुए सुवर्णके विचित्र आभूषणों तथा नाना प्रकारके दिव्य रत्रोंसे अलंकृत हो उत्तम तेजसे प्रकाशमान दानवराज बलि रणभूमिमें अग्रिशिखाके समान उद्भासित हो रहे थे

अध्याय 246

श्लोक 13

स वै तदा शत्रुबलार्दितं बलं बलिर्ददर्शोत्तमसत्त्ववीर्यवान् ।जलागमे श्रीमदिवाभ्रमण्डलं विशीर्यमाणं नभसीव वायुना

sa vai tadā śatrubalārditaṃ balaṃ balirdadarśottamasattvavīryavān | jalāgame śrīmadivābhramaṇḍalaṃ viśīryamāṇaṃ nabhasīva vāyunā

हिन्दी अर्थ

उस समय उत्तम सत्त्व और बल-पराक्रमसे सम्पन्न राजा बलिने देखा कि शत्रुओंकी सेनाने मेरी सेनाको भलीभाँति पीड़ित कर दिया है। जैसे वर्षा-ऋतुमें शोभासम्पन्न मेघमण्डल आकाशमें वायुके द्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया जाता है, उसी प्रकार दैत्यसेना तितर-बितर हो गयी है

अध्याय 246

श्लोक 14

ततो ददर्शाथ बलानि सर्वतो रणे प्रगुप्तानि हुताशनेन वै ।समुच्छ्रितान्युग्रतराणि तत्र वै समुद्रवेगानिव पर्वसन्धिषु

tato dadarśātha balāni sarvato raṇe praguptāni hutāśanena vai | samucchritānyugratarāṇi tatra vai samudravegāniva parvasandhiṣu

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर उन्होंने देखा कि शत्रुओंकी सेनाएँ णभूमिमें अग्रिके द्वारा सब ओरसे सुरक्षित हैं। वे निरन्तर उत्कर्षके पथपर बढ़ती हुई उग्रतर होती चली जा रही हैं । जैसे पर्वसंधि (पूर्णिमा)-की बेलामें समुद्रॉंके वेग बढ़ जाते हैं, उसी प्रकार शत्रुसेनाकी प्रगति उत्तरोत्तर बढ़ ही है

अध्याय 246

श्लोक 15

सशूलशक्त्यृष्टिगदासिसायकान् क्षिपन् रिपूणां समरे महात्मनाम् ।ननाद सिंहर्षभमत्तनागवज्जलागमे तोयदवच्च वीर्यवान्

saśūlaśaktyṛṣṭigadāsisāyakān kṣipan ripūṇāṃ samare mahātmanām | nanāda siṃharṣabhamattanāgavajjalāgame toyadavacca vīryavān

हिन्दी अर्थ

तब वे पराक्रमी राजा बलि समरभूमिमें पहामनस्वी शत्रु ऑपर शूल, शक्ति, ऋणष्टि, गदा, खड्ग और पायकोंकी वर्षा करते हुए सिंह, साँड, मतवाले हाथी और रर्षकालके मेघकी भाँति जोर-जोरसे गर्जना करने लगे

अध्याय 246

श्लोक 16

दिव्यास्त्रधूमः सुभुजोग्रवायुर्महाबलः पौरुषविक्रमेन्धनः ।प्रजा दिधक्षन्निव कालवह्निः सुघोररूपो विबभौ रणे बलिः

divyāstradhūmaḥ subhujogravāyurmahābalaḥ pauruṣavikramendhanaḥ | prajā didhakṣanniva kālavahniḥ sughorarūpo vibabhau raṇe baliḥ

हिन्दी अर्थ

उस रणभूमिमें महाबलवान्‌ राजा बलि समस्त प्रजाओंको रग्ध कर डालनेकी इच्छावाले प्रलयंकर अग्िके समान अत्यन्त. घोर रूपमें प्रकाशित होने लगे। दिव्यांस्त्र ही उन प्रग्रिस्वरूप बलिके धूम थे । उत्तम भुजा ही उन्हें उत्तेजित करनेवाली भयंकर वायु थी और पुरुषार्थ एवं पराक्रम ही झस अग्रिको उद्दीस करनेवाले ईंधन थे

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.