Harivamsha Purana
222
अध्याय 222 / 318

Parva 3, Adhyāya 39

23 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ23 श्लोक

अध्याय 222

श्लोक 1

भगवता वराहेण हिरण्याक्षस्य वधं निष्प्रयत्ने सुरपतौ धर्षितेषु सुरेषु च ।हिरण्याक्षवधे बुद्धिं चक्रे चक्रगदाधरः

bhagavatā varāheṇa hiraṇyākṣasya vadhaṃ niṣprayatne surapatau dharṣiteṣu sureṣu ca | hiraṇyākṣavadhe buddhiṃ cakre cakragadādharaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब देवराज इन्द्र निश्चेष्ठ और समस्त देवता पराजित हो गये, तब चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान्‌ विष्णुने स्वयं ही हिरण्याक्षके वधका विचार किया

अध्याय 222

श्लोक 2

वाराहः पर्वतो नाम यः पूर्वं समुदाहृतः ।स एव भूत्वा भगवानाजगामासुरान्तकृत्

vārāhaḥ parvato nāma yaḥ pūrvaṃ samudāhṛtaḥ | sa eva bhūtvā bhagavānājagāmāsurāntakṛt

हिन्दी अर्थ

पहले जिन पर्वताकार यज्ञवाराहका वर्णन किया गया है, वे ही असुरोंका विनाश करनेवाले भगवान्‌ श्रीहरि इस वाराहरूपमें प्रकट हो वहाँ आये

अध्याय 222

श्लोक 3

ततश्चन्द्रप्रतीकाशमगृह्णाच्छङ्खमुत्तमम् ।सहस्रारं च तच्चक्रं चक्रपर्वतसन्निभम्

tataścandrapratīkāśamagṛhṇācchaṅkhamuttamam | sahasrāraṃ ca taccakraṃ cakraparvatasannibham

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर उन्होंने चन्द्रमाके समान उज्चल एवं उत्तम शड्डू हाथमें ले लिया। फिर दूसरे हाथमें चक्र-पर्वतके सदृश विशाल तथा सहस्र अरोंसे युक्त सुप्रसिद्ध सुदर्शन चक्र धारण किया

अध्याय 222

श्लोक 4

महादेवो महाबुद्धिर्महायोगी महेश्वरः ।पठ्यते योऽमरैः सर्वैर्गुह्यैर्नामभिरव्ययः

mahādevo mahābuddhirmahāyogī maheśvaraḥ | paṭhyate yo'maraiḥ sarvairguhyairnāmabhiravyayaḥ

हिन्दी अर्थ

उन्हीं अविनाशी श्रीहरिका महादेव, महाबुद्धि, महायोगी और महेश्वर आदि गुह्म नामोंसे समस्त देवता कीर्तन करते हैं

अध्याय 222

श्लोक 5

सदसच्चात्मनि श्रेष्ठः सद्भिर्यः सेव्यते सदा ।इज्यते यः पुराणश्च त्रिलोके लोकभावनः

sadasaccātmani śreṣṭhaḥ sadbhiryaḥ sevyate sadā | ijyate yaḥ purāṇaśca triloke lokabhāvanaḥ

हिन्दी अर्थ

साधु पुरुष सदा अपने हृदयमें जिन सदसत्स्वरूप श्रेष्ठ परमात्माका सेवन करते हैं, तीनों लोकोंमें जिन लोकभावन पुराण-पुरुषका पूजन किया जाता है

अध्याय 222

श्लोक 6

यो वैकुण्ठः सुरेन्द्राणामनन्तो भोगिनामपि ।विष्णुर्यो योगविदुषां यो यज्ञो यज्ञकर्मणाम्

yo vaikuṇṭhaḥ surendrāṇāmananto bhogināmapi | viṣṇuryo yogaviduṣāṃ yo yajño yajñakarmaṇām

हिन्दी अर्थ

जो देवेश्वरोंके वैकुण्ठ, सर्पोके अनन्त, योगवेत्ताओंके विष्णु तथा यज्ञकर्मियोंके यज्ञ हैं

अध्याय 222

श्लोक 7

मखे यस्य प्रसादेन भुवनस्था दिवौकसः ।आज्यं महर्षिभिर्दत्तमश्नुवन्ति त्रिधा हुतम्

makhe yasya prasādena bhuvanasthā divaukasaḥ | ājyaṃ maharṣibhirdattamaśnuvanti tridhā hutam

हिन्दी अर्थ

जिनके कृपा-प्रसादसे अपने-अपने भुवनोंमें बैठे हुए देवता यज्ञमें महर्षियोंद्वारा दिये गये तथा हुत, हूयमान और प्रहुत नामक तीन प्रकारोंसे होमे गये घृतको भोजन करते हैं ॥'

अध्याय 222

श्लोक 8

यो गतिर्देवदैत्यानां यः सुराणां परा गतिः ।यः पवित्रं पवित्राणां स्वयम्भूरव्ययो विभुः

yo gatirdevadaityānāṃ yaḥ surāṇāṃ parā gatiḥ | yaḥ pavitraṃ pavitrāṇāṃ svayambhūravyayo vibhuḥ

हिन्दी अर्थ

जो देवताओं तथा दैत्योंके भी आश्रय हैं, देवगणोंके लिये परम गति हैं, जो पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले, स्वयम्भू, अविनाशी तथा व्यापक हैं

अध्याय 222

श्लोक 9

यस्य चक्रप्रविष्टानि दानवानां युगे युगे ।कुलान्याकुलतां यान्ति यानि दृप्तानि वीर्यतः

yasya cakrapraviṣṭāni dānavānāṃ yuge yuge | kulānyākulatāṃ yānti yāni dṛptāni vīryataḥ

हिन्दी अर्थ

प्रत्येक युगमें अपने बलपर घमंड करनेवाले दानवोंके कितने ही कुल जिनकी चक्राग्िमें प्रविष्ट हो वहीं विलीन हो गये हैं (वे ही भगवान्‌ वहाँ पधारे थे)

अध्याय 222

श्लोक 10

ततो दैत्यद्रवकरं पौराणं शङ्खमुत्तमम् ।धमन् वक्त्रेण बलवानाक्षिपद् दैत्यजीवितम्

tato daityadravakaraṃ paurāṇaṃ śaṅkhamuttamam | dhaman vaktreṇa balavānākṣipad daityajīvitam

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर बलवान्‌ भगवान्‌ वाराहने दैत्योंको भयभीत करनेवाले अपने उत्तम एवं पुरातन शज्जुको मुखसे बजाते हुए बहुत-से दैत्योंके प्राण हर लिये

अध्याय 222

श्लोक 11

श्रुत्वा शङ्खस्वनं घोरमसुराणां भयावहम् ।क्षुभिता दानवाः सर्वे दिशो दश व्यलोकयन्

śrutvā śaṅkhasvanaṃ ghoramasurāṇāṃ bhayāvaham | kṣubhitā dānavāḥ sarve diśo daśa vyalokayan

हिन्दी अर्थ

असुरोंको भय देनेवाले उस घोर शब्गुध्वनिको सुनकर समस्त दानव क्षुब्ध हो गये और दसों दिशाओंकी ओर देखने लगे

अध्याय 222

श्लोक 12

ततः संरक्तनयनो हिरण्याक्षो महासुरः ।कोऽयमित्यब्रवीद् रोषान्नारायणमुदैक्षत

tataḥ saṃraktanayano hiraṇyākṣo mahāsuraḥ | ko'yamityabravīd roṣānnārāyaṇamudaikṣata

हिन्दी अर्थ

तब क्रोधसे लाल आँखें किये महान्‌ असुर हिरण्याक्षने पूछा 'यह कौन है?' साथ ही उसने रोषपूर्वक नारायणकी ओर देखा

अध्याय 222

श्लोक 13

वाराहरूपिणं देवं संस्थितं पुरुषोत्तमम् ।शङ्खचक्रोद्यतकरं देवानामार्तिनाशनम्

vārāharūpiṇaṃ devaṃ saṃsthitaṃ puruṣottamam | śaṅkhacakrodyatakaraṃ devānāmārtināśanam

हिन्दी अर्थ

वे वाराहरूपधारी भगवान्‌ पुरुषोत्तम देवताओंकी पीड़ाका नाश करनेवाले थे, अत: हाथोंमें शड्ड और चक्र लिये वहाँ खड़े हुए

अध्याय 222

श्लोक 14

रराज शङ्खचक्राभ्यां ताभ्यामसुरसूदनः ।सूर्याचन्द्रमसोर्मध्ये यथा नीलपयोधरः

rarāja śaṅkhacakrābhyāṃ tābhyāmasurasūdanaḥ | sūryācandramasormadhye yathā nīlapayodharaḥ

हिन्दी अर्थ

असुरसूदन श्रीहरि उन श्भु-चक्रोंसे ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो नील मेघ सूर्य और चन्द्रमाके बीचमें सुशोभित हो रहा हो

अध्याय 222

श्लोक 15

ततोऽसुरगणाः सर्वे हिरण्याक्षपुरोगमाः ।उद्यतायुधनिस्त्रिंशा दृप्ता देवमुपाद्रवन्

tato'suragaṇāḥ sarve hiraṇyākṣapurogamāḥ | udyatāyudhanistriṃśā dṛptā devamupādravan

हिन्दी अर्थ

उस समय हिरण्याक्ष आदि सभी असुरोंने जो बलके घमंडमें भरे हुए थे, नाना प्रकारके आयुध और खड्ग लिये वहाँ भगवान्‌ वाराहपर धावा किया

अध्याय 222

श्लोक 16

पीड्यमानोऽतिबलिभिर्दैत्यैः सर्वायुधोद्यतैः ।न चचाल हरिर्युद्धेऽकम्प्यमान इवाचलः

pīḍyamāno'tibalibhirdaityaiḥ sarvāyudhodyataiḥ | na cacāla hariryuddhe'kampyamāna ivācalaḥ

हिन्दी अर्थ

सब प्रकारके अख्र-शस्त्रोंसे उद्यत हुए अत्यन्त बलशाली दैत्योंद्वारा पीड़ा दी जानेपर भी भगवान्‌ श्रीहरि उस युद्धमें विचलित नहीं हुए, वे पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े रहे

अध्याय 222

श्लोक 17

ततः प्रज्वलितां शक्तिं वाराहोरसि दानवः ।हिरण्याक्षो महातेजाः पातयामास वीर्यवान्

tataḥ prajvalitāṃ śaktiṃ vārāhorasi dānavaḥ | hiraṇyākṣo mahātejāḥ pātayāmāsa vīryavān

हिन्दी अर्थ

इतनेहीमें महातेजस्वी और पराक्रमी दानव हिरण्याक्षने भगवान्‌ वाराहकी छातीपर एक अत्यन्त प्रज्वलित शक्तिका प्रहार किया

अध्याय 222

श्लोक 18

तस्याः शक्त्याः प्रभावेण ब्रह्मा विस्मयमागतः ।समीपमागतां दृष्ट्वा महाशक्तिं महाबलः

tasyāḥ śaktyāḥ prabhāveṇa brahmā vismayamāgataḥ | samīpamāgatāṃ dṛṣṭvā mahāśaktiṃ mahābalaḥ

श्लोक 18–19 का हिन्दी अर्थ

उस शक्तिके प्रभावसे ब्रह्माजीको बड़ा विस्मय हुआ। उस महाशक्तिको पास आयी देख महाबली भगवान्‌ वाराहने हुंकारसे ही उसे तिरस्कृत करके भूमिपर गिरा दिया। उस शक्तिके प्रतिहत हो जानेपर ब्रह्माजीने भगवान्‌को साधुवाद दिया

अध्याय 222

श्लोक 19

हुङ्कारेणैव निर्भर्त्स्य पातयामास भूतले ।तस्यां प्रतिहतायां तु ब्रह्मा साध्विति चाब्रवीत्

huṅkāreṇaiva nirbhartsya pātayāmāsa bhūtale | tasyāṃ pratihatāyāṃ tu brahmā sādhviti cābravīt

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 222

श्लोक 20

यः प्रभुः सर्वभूतानां वाराहस्तेन ताडितः ।ततो भगवता चक्रमाविध्यादित्यसन्निभम्

yaḥ prabhuḥ sarvabhūtānāṃ vārāhastena tāḍitaḥ | tato bhagavatā cakramāvidhyādityasannibham

श्लोक 20–21 का हिन्दी अर्थ

जो समस्त प्राणियोंके प्रभु हैं, उन भगवान्‌ वाराहको जब उस दैत्यने ताड़ित किया, तब उत्तम कर्म करनेवाले भगवान्‌ने भी अपना सूर्यके समान तेजस्वी चक्र घुमाकर दानवराज हिरण्याक्षके सिरपर दे मारा। तब वहाँ खड़े-खड़े ही उस दैत्यका सिर पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो मेरु पर्वतका सुन्दर एवं सुनहरा शिखर वज्रसे आहत हो धराशायी हो गया हो

अध्याय 222

श्लोक 21

पातितं दानवेन्द्रस्य शिरस्युत्तमकर्मणा ।ततः स्थितस्यैव शिरस्तस्य भूमौ पपात ह ।हिरण्मयं वज्रहतं मेरुशृङ्गमिवोत्तमम्

pātitaṃ dānavendrasya śirasyuttamakarmaṇā | tataḥ sthitasyaiva śirastasya bhūmau papāta ha | hiraṇmayaṃ vajrahataṃ meruśṛṅgamivottamam

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 222

श्लोक 22

हिरण्याक्षे हते दैत्ये शेषा ये तत्र दानवाः ।सर्वे तस्य भयत्रस्ता जग्मुराशु दिशो दश

hiraṇyākṣe hate daitye śeṣā ye tatra dānavāḥ | sarve tasya bhayatrastā jagmurāśu diśo daśa

हिन्दी अर्थ

दैत्य हिरण्याक्षके मारे जानेपर जो दानव वहाँ शेष रह गये थे, वे सभी भगवान्‌के भयसे संत्रस्त हो तात्कालिक दसों दिशाओंमें भाग गये

अध्याय 222

श्लोक 23

स सर्वलोकाप्रतिचक्रचक्रो महाहवेष्वप्रतिमोग्रचक्रः ।बभौ वराहो युधि चक्रपाणिः कालो युगान्तेष्विव दण्डपाणिः

sa sarvalokāpraticakracakro mahāhaveṣvapratimogracakraḥ | babhau varāho yudhi cakrapāṇiḥ kālo yugānteṣviva daṇḍapāṇiḥ

हिन्दी अर्थ

जिनके चक्रकी आज्ञा सम्पूर्ण लोकोंमें कहीं भी प्रतिहत नहीं होती थी, जिनका भयंकर चक्र बड़े-बड़े युद्धके अवसरपर अपना सानी नहीं रखता था, वे चक्रपाणि भगवान्‌ वाराह उस युद्धस्थलमें हाथमें दण्ड लिये प्रलयकालके यमराजकी भाँति शोभा पाते थे

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.