Harivamsha Purana
22
अध्याय 22 / 318

Parva 1, Adhyāya 22

11 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ11 श्लोक

अध्याय 22

श्लोक 1

पितृकल्प, शुचिवाक पक्षी का स्वतन्त्र आदि तीन पक्षियों को शाप देना, सुमना पक्षी का अनुग्रहपूर्वक उन्हें शाप से मुक्त करना ततस्तं चक्रवाकौ द्वावूचतुः सहचारिणौ ।आवां ते सचिवौ स्यावस्तव प्रियहितैषिणौ

pitṛkalpa, śucivāka pakṣī kā svatantra ādi tīna pakṣiyoṃ ko śāpa denā, sumanā pakṣī kā anugrahapūrvaka unheṃ śāpa se mukta karanā tatastaṃ cakravākau dvāvūcatuḥ sahacāriṇau | āvāṃ te sacivau syāvastava priyahitaiṣiṇau

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी बोले—उस समय उस स्वतन्त्र पक्षीके साथमें रहनेवाले दो चक्रवाकोंने उससे कहा—हम आपका प्रिय एवं हित चाहनेवाले आपके मन्त्री बनेंगे

अध्याय 22

श्लोक 2

तथेत्युक्त्वा च तस्यासीत्तदा योगात्मिका मतिः ।एवं ते समयं चक्रुः शुचिवाक् तमुवाच ह

tathetyuktvā ca tasyāsīttadā yogātmikā matiḥ | evaṃ te samayaṃ cakruḥ śucivāk tamuvāca ha

हिन्दी अर्थ

तब स्वतन्त्रने कहा-' बहुत अच्छा! । यों कहकर वह पुन: अपने योगधर्मका विचार करने लगा। जब इस प्रकार उन तीनोंने प्रतिज्ञा कर ली, तब शुचिवाकूने उस (स्वतन्त्र)-से कहा

अध्याय 22

श्लोक 3

यस्मात् कामप्रधानस्त्वं योगधर्ममपास्य वै ।एवं वरं प्रार्थयसे तस्माद् वाक्यं निबोध मे

yasmāt kāmapradhānastvaṃ yogadharmamapāsya vai | evaṃ varaṃ prārthayase tasmād vākyaṃ nibodha me

हिन्दी अर्थ

तू योगधर्मको छोड़कर कामप्रधान धर्मकी कामनासे ऐसा वर माँग रहा है, इसलिये तू मेरा यह शाप सुन ले

अध्याय 22

श्लोक 4

राजा त्वं भविता तात काम्पिल्ये नात्र संशयः ।भविष्यतः सखायौ च द्वाविमौ सचिवौ तव

rājā tvaṃ bhavitā tāta kāmpilye nātra saṃśayaḥ | bhaviṣyataḥ sakhāyau ca dvāvimau sacivau tava

हिन्दी अर्थ

तात! तू काम्पिल्य नगरका राजा बनकर उत्पन्न होगा, इसमें संदेह नहीं। तेरे ये दोनों मित्र भी तेरे मन्त्री बनकर उत्पन्न होंगे

अध्याय 22

श्लोक 5

शप्त्वा चानभिभाष्यांस्तांश्चत्वारश्चक्रुरण्डजाः ।तांस्त्रीनभीप्सतो राज्यं व्यभिचारप्रदर्शितान्

śaptvā cānabhibhāṣyāṃstāṃścatvāraścakruraṇḍajāḥ | tāṃstrīnabhīpsato rājyaṃ vyabhicārapradarśitān

हिन्दी अर्थ

(इस प्रकार) शेष चार पक्षियोंने राज्यकी इच्छा करके योगधर्मसे भ्रष्ट होनेवाले उन तीन पक्षियोंको शाप देकर उनसे बोलना भी छोड़ दिया

अध्याय 22

श्लोक 6

शप्ताः खगास्त्रयस्ते तु योगभ्रष्टा विचेतसः ।तानयाचन्त चतुरस्त्रयस्ते सहचारिणः

śaptāḥ khagāstrayaste tu yogabhraṣṭā vicetasaḥ | tānayācanta caturastrayaste sahacāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार योगश्रष्ट होनेके कारण शापसे ग्रस्त हुए वे तीनों पक्षी डरके मारे अचेत हो गये। उन तीनों साथियोंने चारों पक्षियोंसे (शापका अनुग्रह करनेकी ) प्रार्थना की

English

⁶² A name of Krishna.

अध्याय 22

श्लोक 7

तेषां प्रसादं ते चक्रुरथैतान्सुमनाऽब्रवीत् ।सर्वेषामेव वचनात्प्रसादानुगतं वचः

teṣāṃ prasādaṃ te cakrurathaitānsumanā'bravīt | sarveṣāmeva vacanātprasādānugataṃ vacaḥ

हिन्दी अर्थ

तब उन्होंने उनके ऊपर कृपा की और सबकी सम्मतिसे सुमनाने अनुग्रहपूर्वक यह बात कही—

अध्याय 22

श्लोक 8

अन्तवान् भविता शापो युष्माकं नात्र संशयः ।इतश्च्युताश्च मानुष्यं प्राप्य योगमवाप्स्यथ

antavān bhavitā śāpo yuṣmākaṃ nātra saṃśayaḥ | itaścyutāśca mānuṣyaṃ prāpya yogamavāpsyatha

हिन्दी अर्थ

इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे इस शापका शीघ्र ही अन्त होगा। यहाँ योगसे भ्रष्ट होकर तुम मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होगे और अन्तमें फिर तुम्हें योगज्ञान प्राप्त होगा

English

⁶² A name of Krishna.

अध्याय 22

श्लोक 9

सर्वसत्त्वरुतज्ञश्च स्वतन्त्रोऽयं भविष्यति ।पितृप्रसादो ह्यस्माभिरस्य प्राप्तः कृतेन वै

sarvasattvarutajñaśca svatantro'yaṃ bhaviṣyati | pitṛprasādo hyasmābhirasya prāptaḥ kṛtena vai

श्लोक 9–10 का हिन्दी अर्थ

यह स्वतन्त्र नामक हंस सब जीवोंकी बोली समझनेवाला होगा। पूर्वजन्ममें इसीके कथनानुसार कार्य करनेसे हमें पितरोंकी कृपा प्राप्त हुई । इसने कहा था कि 'गौका प्रोक्षण करके इसे पितरोंको अर्पित किया जाय।' इसीके पालनसे हम सबको योगसाधक ज्ञानकी प्राप्ति हुई है

अध्याय 22

श्लोक 10

गां प्रोक्षयित्वा धर्मेण पितृभ्य उपकल्प्यताम् ।अस्माकं ज्ञानसंयोगः सर्वेषां योगसाधनः

gāṃ prokṣayitvā dharmeṇa pitṛbhya upakalpyatām | asmākaṃ jñānasaṃyogaḥ sarveṣāṃ yogasādhanaḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

English

⁶² A name of Krishna.

अध्याय 22

श्लोक 11

इमं च वाक्यसन्दर्भश्लोकमेकमुदाहृतम् ।पुरुषान्तरितं श्रुत्वा ततो योगमवाप्स्यथ

imaṃ ca vākyasandarbhaślokamekamudāhṛtam | puruṣāntaritaṃ śrutvā tato yogamavāpsyatha

हिन्दी अर्थ

उस मनुष्य-जन्ममें जब कोई पुरुष तुम्हें यह आगे बताया जानेवाला वाक्य संदर्भरूप ('सप्त व्याधा दशार्णोषु' आदि) * श्लोक सुनायेगा, तब तुम्हें यह मोक्ष देनेवाला ज्ञानमय योगधर्म फिर प्राप्त हो जायगा

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.