Harivamsha Purana
211
अध्याय 211 / 318

Parva 3, Adhyāya 28

92 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ92 श्लोक

अध्याय 211

श्लोक 1

पुष्करे श्रीविष्ण्वादीनां तपःकरणं, तस्य प्रभावस्य वर्णनं दिशं जिगमिषुर्दिव्यामुत्तरां सत्यसाधनः ।तथा स धातुनिचये पुण्ये पर्वतरोधसि

puṣkare śrīviṣṇvādīnāṃ tapaḥkaraṇaṃ, tasya prabhāvasya varṇanaṃ diśaṃ jigamiṣurdivyāmuttarāṃ satyasādhanaḥ | tathā sa dhātunicaye puṇye parvatarodhasi

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वबैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! सत्य ही जिनका साधन है, उन परम धर्मात्मा भगवान्‌ विष्णुने उत्तर दिशा (सिद्धिकी पराकाष्टठा मोक्ष)-को जानेकी इच्छा की । वे कमलनयन श्रीहरि पुष्करतीर्थमें धातुओंकी राशिसे परिपूर्ण एक पर्वतके पवित्र तटपर एक ही पैरसे दस हजार वर्षोतक खड़े रहे

अध्याय 211

श्लोक 2

विष्णुः परमधर्मात्मा एकपादेन तिष्ठति ।दशवर्षसहस्राणि पुष्करे पुष्करेक्षणः

viṣṇuḥ paramadharmātmā ekapādena tiṣṭhati | daśavarṣasahasrāṇi puṣkare puṣkarekṣaṇaḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 211

श्लोक 3

आत्मन्यात्मानमाधाय तपसा ब्रह्मसम्भवः ।घटते कर्मणोग्रेण लोकमुत्थानकारणात्

ātmanyātmānamādhāya tapasā brahmasambhavaḥ | ghaṭate karmaṇogreṇa lokamutthānakāraṇāt

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माको भी जन्म देनेवाले वे भगवान्‌ विष्णु अपने चित्तको विशुद्ध आत्मामें विचारद्वारा विलीन करके उत्थान (मोक्ष) -के लिये उग्रकर्म (घोर तपस्या) करने लगे। साक्षात्‌ परमेश्वर होकर भी उन्होंने जगत्‌को शिक्षा देनेके लिये ऐसा किया

अध्याय 211

श्लोक 4

भासुरो भस्मनाऽऽच्छाद्य गात्राणि स्वयमात्मनः ।अष्टौ वर्षसहस्राणि सहस्रं च तपोधनः

bhāsuro bhasmanā''cchādya gātrāṇi svayamātmanaḥ | aṣṭau varṣasahasrāṇi sahasraṃ ca tapodhanaḥ

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार प्रकाशमान सोम भी स्वयं ही अपने अज्ॉको भस्मसे आच्छादित करके नौ हजार वर्षोतक तपस्यारूपी धनके संचयमें लगे रहे

अध्याय 211

श्लोक 5

तेजसा तेन ज्योतींषि विभाव्य ब्राह्मणर्षभः ।तिष्ठते नभसो मध्ये योगात्मा भावयञ्जगत्

tejasā tena jyotīṃṣi vibhāvya brāhmaṇarṣabhaḥ | tiṣṭhate nabhaso madhye yogātmā bhāvayañjagat

हिन्दी अर्थ

तपस्याद्वारा प्राप्त हुए उस प्रसिद्ध तेजसे समस्त ग्रह- नक्षत्रोंको तिरस्कृत करके योगात्मा ब्राह्मणशिरोमणि सोम सम्पूर्ण जगत्‌को आह्वाद प्रदान करते हुए आकाशके मध्यभागमें प्रकाशित होते हैं

अध्याय 211

श्लोक 6

सोमो विषयमाक्षिप्य मनसा धारयन्मनः ।युक्तः परमधर्मात्मा ब्राह्मीं सिद्धिमुपागतः

somo viṣayamākṣipya manasā dhārayanmanaḥ | yuktaḥ paramadharmātmā brāhmīṃ siddhimupāgataḥ

हिन्दी अर्थ

परम धर्मात्मा सोमने बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके विषयोंपर अधिकार कर लिया और योगयुक्त होकर वे ब्राह्मी सिद्धिको प्राप्त हुए

अध्याय 211

श्लोक 7

सम्प्रदृश्यत सर्वत्र दिवि भुव्यन्तरे तथा ।ज्योतिष्णु कर्म कुर्वाणो बहुरूपः स सम्पदा

sampradṛśyata sarvatra divi bhuvyantare tathā | jyotiṣṇu karma kurvāṇo bahurūpaḥ sa sampadā

हिन्दी अर्थ

वे प्रकाश फैलानेका कार्य करते हुए स्वर्ग, पृथ्वी और दोनोंके मध्यभाग अन्तरिक्षमें सर्वत्र दिखायी देते हैं तथा अपनी योग-सम्पत्तिसे नाना प्रकारके रसरूप बहुत-से स्वरूप धारण कर लेते हैं

अध्याय 211

श्लोक 8

महेश्वरोऽतिगूढान्मा वृषरूपेण तिष्ठति ।उद्धृत्य दक्षिणं पादं वायुभक्षः समाहितः

maheśvaro'tigūḍhānmā vṛṣarūpeṇa tiṣṭhati | uddhṛtya dakṣiṇaṃ pādaṃ vāyubhakṣaḥ samāhitaḥ

श्लोक 8–9 का हिन्दी अर्थ

अपने स्वरूपको अत्यन्त गुप्त रखनेवाले भगवान्‌ महेश्वर वृषभरूपसे तपस्याके लिये अपना दाहिना पैर उठाकर नौ हजार एक सौ वर्षोतक खड़े रहे। उन दिनों केवल वायु ही उनका आहार था। वे मनको ध्येय वस्तुमें निरन्तर एकाग्र रखते थे । ब्रह्माजीके उत्पत्तिस्थान महायोगी महादेवजी नियमपूर्वक तपस्यामें लगे रहे

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श्लोक 9

अष्टौ वर्षसहस्राणि स्रहस्रं शतमेव च ।महायोगी महादेवो नियमाद् ब्रह्मसम्भवः

aṣṭau varṣasahasrāṇi srahasraṃ śatameva ca | mahāyogī mahādevo niyamād brahmasambhavaḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 211

श्लोक 10

अथ वायुर्घनीभूतो अन्ते चरति गोपतेः ।फेनीभूतं समुद्गारैः पवनं निर्गिरन्मुखात्

atha vāyurghanībhūto ante carati gopateḥ | phenībhūtaṃ samudgāraiḥ pavanaṃ nirgiranmukhāt

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर एक दिन इन्द्रियोंका निग्रह करनेवाले भगवान्‌ महेधरके निकट घनीभूत वायु विचरण करने लगी। उस समय वृषभरूपधारी महादेवजीने अपने उद्वारों (लार आदि) - के द्वारा फेनके रूपमें परिणत हुई उस वायुको भीतर खींचकर फिर मुखसे बाहर निकाला

अध्याय 211

श्लोक 11

स निष्क्रान्तस्ततो वक्त्रात्प्राणेन परमाप्तवान् ।निर्यासभूतः पतितो नैवार्द्रो नैव पार्थिवः

sa niṣkrāntastato vaktrātprāṇena paramāptavān | niryāsabhūtaḥ patito naivārdro naiva pārthivaḥ

हिन्दी अर्थ

5 उद्वारवायुके साथ उनके मुखसे निकली हुई वह आयु रूपान्तरको प्राप्त हो वृक्षोंकी गोंदके समान नीचे गिर डड़ी । उस समय वह न तो गीली थी और न पार्थिव—ाषाण आदिके समान सूखी ही

अध्याय 211

श्लोक 12

स फेनो वारिणाऽऽविश्य चचार वसुधातले ।नैवार्द्रो नैव शुष्काङ्गो वायुसङ्घातमागतः

sa pheno vāriṇā''viśya cacāra vasudhātale | naivārdro naiva śuṣkāṅgo vāyusaṅghātamāgataḥ

हिन्दी अर्थ

वायुका वह रूप फनके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह फेन जलसे आविष्ट हो पूतलके समीपवर्ती अन्तरिक्षमें विचरने लगा। वह न गीला था न सूखा। वायुके ही घनीभूत स्वरूपको प्राप्त गो गया था

अध्याय 211

श्लोक 13

तत्काले फेनमुत्क्षिप्य पवनः सह वारिणा ।निरालम्बे निरालम्बस्त्वभ्राणि समपद्यत

tatkāle phenamutkṣipya pavanaḥ saha vāriṇā | nirālambe nirālambastvabhrāṇi samapadyata

हिन्दी अर्थ

उस समय जलसहित फेनको ऊपर छालकर निराधार आकाशमें निराधार रुकी हुई वह आयु मेघोंके रूपमें परिणत हो गयी

अध्याय 211

श्लोक 14

ते क्षिपन्ति पयो भूमावात्मानं स्वेन घट्टिताः ।नीलमेघारुणप्रख्या नैवाद्रा नैव पार्थिवाः

te kṣipanti payo bhūmāvātmānaṃ svena ghaṭṭitāḥ | nīlameghāruṇaprakhyā naivādrā naiva pārthivāḥ

हिन्दी अर्थ

वे ओलोंके पमान अपने ही स्वरूपसे घनीभावको प्राप्त हो नील घघ बनकर अपने आत्मा जलको ही इधर-उधर बरसाते । सूर्यसारथि अरुणकी कान्ति पड़नेसे वे लाल रंगके पी दिखायी देते थे। वे भी न तो गीले थे और न मिट्टीके लोंके समान सूखे ही

अध्याय 211

श्लोक 15

ब्राह्मीं मूर्तिं समाधाय वायुः सर्वत्रगो वशी ।समाः सहस्रं सम्पूर्णं चचार विपुल तपः

brāhmīṃ mūrtiṃ samādhāya vāyuḥ sarvatrago vaśī | samāḥ sahasraṃ sampūrṇaṃ cacāra vipula tapaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर सर्वत्र विचरनेवाले ायुदेवने ब्राह्मणका शरीर धारण करके मन और इन्द्रियोंको शमें रखते हुए पूरे एक सहस््र वर्षोतक बड़ी भारी पस्या की

अध्याय 211

श्लोक 16

वह्निर्बहुजटी भूत्वा चीरवल्कलवासभृत् तपस्तप्यदनाहारो मौनमास्थाय पौष्करे

vahnirbahujaṭī bhūtvā cīravalkalavāsabhṛt tapastapyadanāhāro maunamāsthāya pauṣkare

श्लोक 16–18 का हिन्दी अर्थ

अग्रिदेव भी बहुत-सी जटाएँ बढ़ाये गीर और वल्कल वस्त्र धारण किये बिना कुछ खाये- ये मौन हो पुष्करतीर्थमें चार हजार वर्षोतक यत्तपूर्वक पस्यामें लगे रहे। उस अग्रिके तेजसे एक महान्‌ पग्रिका प्रादुर्भाव हुआ, जो स्वर्गमें प्रकाश फैलाकर वहीं हने और वहाँके अन्धकारको दूर करने लगी। (वही र्य आदिके रूपमें प्रसिद्ध है।) वह ब्राह्मण अग्नि अपनी पस्याके प्रभावसे स्वर्गमें * भूतप्रकाश ' नामसे प्रसिद्ध ई

अध्याय 211

श्लोक 17

वर्षाणां च सहस्राणि त्रीणि चैकं च यत्नतः ।तस्याग्नेस्तेजः सम्भूतो महानग्निः प्रवर्तते

varṣāṇāṃ ca sahasrāṇi trīṇi caikaṃ ca yatnataḥ | tasyāgnestejaḥ sambhūto mahānagniḥ pravartate

अर्थ श्लोक 16 के साथ

अध्याय 211

श्लोक 18

स्वर्गप्रकाशं कृत्वा च स्वर्गवासी तमोनुदः ।दिवि भूतप्रकाशाख्यस्तपसा ब्रह्मसम्भवः

svargaprakāśaṃ kṛtvā ca svargavāsī tamonudaḥ | divi bhūtaprakāśākhyastapasā brahmasambhavaḥ

अर्थ श्लोक 16 के साथ

अध्याय 211

श्लोक 19

तत्तमो भुवि राजेन्द्र मानुषेषु प्रतिष्ठितम् ।भास्करस्तेजसंहारस्ततो भवति सत्तमः

tattamo bhuvi rājendra mānuṣeṣu pratiṣṭhitam | bhāskarastejasaṃhārastato bhavati sattamaḥ

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र! वह अन्धकार भूतलपर मनुष्योंमें तिष्ठित हुआ। (यहाँ अन्धकारका अर्थ धूम तथा उससे पलक्षित धूममार्ग है, जो वर्णाश्रमाभिमानी मनुष्योंमें तिष्ठित है।) तेज:पुझ्ज सूर्य उस पूर्व अग्रिकी अपेक्षा तत्यन्त उत्कृष्ट हैं

अध्याय 211

श्लोक 20

मर्त्यानां सर्वभूतानां तेज आक्षिप्य वर्तते ।न तु योगबले राजन् ब्राह्मणस्य विशेषतः ।तत्तमोनाशयेद् रात्रौ नाप्यहोभविताद्वयम्

martyānāṃ sarvabhūtānāṃ teja ākṣipya vartate | na tu yogabale rājan brāhmaṇasya viśeṣataḥ | tattamonāśayed rātrau nāpyahobhavitādvayam

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! योगबलके होनेपर र्यदेव मर्त्यलोकके अन्य समस्त प्राणियोंके तेजको रस्कृत कर देते या छीन लेते हैं। परंतु ब्राह्मणके जका वे संहार नहीं करते हैं। उसपर विशेष ध्यान व्रते हैं। जो सूर्यदेवका उपासक है, उसके तम ( धूममार्ग)- ग वे रातमें भी नाश कर देते हैं (अर्थात्‌ सूर्योपासककी तमें मृत्यु हो तो भी उसे अर्चि आदि मार्ग ही मिलता )। परंतु जो सकाम कर्मोमें लगा हुआ है, उसकी रनमें मृत्यु हो तो भी वह दिन उसे अद्वय (मोक्ष) दकी प्राप्ति करानेवाला नहीं होता

अध्याय 211

श्लोक 21

पुष्पमित्रो महातेजा यक्षः सर्वत्रगो वशी ।तपश्चरति धर्मात्मा पुष्करेषु समाहितः

puṣpamitro mahātejā yakṣaḥ sarvatrago vaśī | tapaścarati dharmātmā puṣkareṣu samāhitaḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वत्र जानेमें समर्थ और जितेन्द्रिय यक्ष महातेजस्वी धर्मात्मा पुष्पमित्र एकाग्रचित्त हो पुष्करमें तपस्या करते हैं

अध्याय 211

श्लोक 22

महेन्द्रशिखराद्धारा यावन्त्यो यान्ति मेदिनीम् ।तावत्स्वरूपमास्थाय तिष्ठते निखिलाः समाः

mahendraśikharāddhārā yāvantyo yānti medinīm | tāvatsvarūpamāsthāya tiṣṭhate nikhilāḥ samāḥ

हिन्दी अर्थ

महेन्द्रपर्वतके शिखरसे जलकी जितनी धाराएँ पृथ्वीपर जाती हैं, उतने स्वरूप धारण करके वे सारे वर्षोतक तपस्यामें ही लगे रहते हैं

अध्याय 211

श्लोक 23

जानुभ्यां पतितो भूमौ ज्योतिर्नभसि पश्यति ।समाः सहस्रं निखिलं नेत्रैरनिमिषैर्जगत्

jānubhyāṃ patito bhūmau jyotirnabhasi paśyati | samāḥ sahasraṃ nikhilaṃ netrairanimiṣairjagat

हिन्दी अर्थ

वे पृथ्वीपर घुटने टेककर पड़ जाते हैं (अर्थात्‌ सूर्यदेवको नमस्कार करते हैं) । इसका फल यह होता है कि सूर्यमण्डलके मध्यभागमें जो आकाश-सा प्रकाशित होता है, उसमें एकटक आँखें लगाकर वे सहस्रों वर्षोतक सम्पूर्ण जगत्‌को देखते रहते हैं

अध्याय 211

श्लोक 24

नेत्राणि बहुधा तस्य नेत्रान्तैरभिनिःसृताः ।मध्यन्दिनकरे प्राप्ते रश्मिवान् सपरिग्रहे

netrāṇi bahudhā tasya netrāntairabhiniḥsṛtāḥ | madhyandinakare prāpte raśmivān saparigrahe

श्लोक 24–25 का हिन्दी अर्थ

सूर्यमण्डलके मध्यभागमें दृष्टि डालनेपर अंशुमाली सूर्य परिवेष (घेरे)-की भाँति प्रतीत होते हैं और मध्यभागमें गोल दर्पणके समान दिखायी देते हैं । जब पुष्पमित्रके नेत्र-प्रान्त सूर्यमण्डलमें पहुँचते, तब सूर्यकी प्रभासे मिले हुए नेत्रोंके साथ वे सुप्रसिद्ध सूर्यरश्मियाँ वहाँसे निकलकर ऊपर-नीचे इधर-उधर सब ओर फैल जातीं और सूर्यकी धारणा करनेवाले उन यक्षराजके लिये बहुसंख्यक—सैकड़ों और हजारों नेत्र बन जाती थीं। वे उन अनेक नेत्रोंके तेजसे संयुक्त होकर ऐसी शोभा पाते थे, जैसे विद्वान्‌ ऋत्विजोंसे घिरे हुए अग्रिदेव सुशोभित होते हैं

अध्याय 211

श्लोक 25

ते रश्मयः प्रभानेत्रैः शतशोऽथ सहस्रशः ।रराज तेजःसंयोगाद् विद्वद्भिरिव पावकः

te raśmayaḥ prabhānetraiḥ śataśo'tha sahasraśaḥ | rarāja tejaḥsaṃyogād vidvadbhiriva pāvakaḥ

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 211

श्लोक 26

स विस्फुलिङ्गैर्नेत्रान्तैरादित्यमनुवर्तते ।कर्मणोऽन्ते युगान्ते वा जगतो बहुरूपिणः

sa visphuliṅgairnetrāntairādityamanuvartate | karmaṇo'nte yugānte vā jagato bahurūpiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

जब देहारम्भके कर्मोका क्षय हो जाता है अथवा अनेक रूपवाले जगत्‌का प्रलयकाल उपस्थित होता है, उस समय वे पुष्पमित्र अथवा भावी कुबेर आगकी चिनगारियोंके समान प्रकाशित होनेवाले अपने नेत्रकोणोंके द्वारा सूर्यदेवका अनुवर्तन करते हैं

अध्याय 211

श्लोक 27

बहुतापः पुनर्भूत्वा निषण्णो वसुधातले ।समाः सहस्रं सम्पूर्णं तपस्तेपे सुदारुणम्

bahutāpaḥ punarbhūtvā niṣaṇṇo vasudhātale | samāḥ sahasraṃ sampūrṇaṃ tapastepe sudāruṇam

श्लोक 27–28 का हिन्दी अर्थ

अपनी तपस्याका प्रभाव बहुत अधिक बढ़ जानेपर वे पृथ्वीतलपर बैठ गये और इन्द्रियोंको काबूमें करके पूरे 'एक सहस्र वर्षोतक पुन: अत्यन्त दारुण तपस्या करते रहे। तत्पश्चात्‌ मेरुपर्वतके शिखरपर जाकर भोगके द्वारा ही कामका परित्याग करते हुए उन्होंने अप्सराओंके साथ रमण किया

अध्याय 211

श्लोक 28

निगृहीतेन्द्रियो भूत्वा अप्सरोभिर्ललाम ह ।मेरोः शिखरमासाद्य कामं कामेन निर्वमन्

nigṛhītendriyo bhūtvā apsarobhirlalāma ha | meroḥ śikharamāsādya kāmaṃ kāmena nirvaman

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 211

श्लोक 29

तपःकामः स यक्षस्तु कुबेरो नरवाहनः ।विष्णुरेव तपोऽध्यक्षस्तेजसोऽन्ते विजृम्भति

tapaḥkāmaḥ sa yakṣastu kubero naravāhanaḥ | viṣṇureva tapo'dhyakṣastejaso'nte vijṛmbhati

हिन्दी अर्थ

तपस्याकी कामनावाला जो पुष्पमित्र नामक यक्ष था, वही नरवाहन कुबेर हुआ। उसके रूपमें तपस्याके अध्यक्ष भगवान्‌ विष्णु ही थे, जो तपके अन्तमें तेजोवृद्धिको प्राप्त हुए

अध्याय 211

श्लोक 30

न हि कश्चित् पुमानस्ति य एवं तप आचरेत् ।त्रिषु लोकेषु राजेन्द्र ऋते विष्णुं सनातनम्

na hi kaścit pumānasti ya evaṃ tapa ācaret | triṣu lokeṣu rājendra ṛte viṣṇuṃ sanātanam

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! तीनों लोकोंमें सनातन भगवान्‌ विष्णुको छोड़कर दूसरा कोई पुरुष ऐसा नहीं है, जो ऐसी कठोर तपस्या कर सके

अध्याय 211

श्लोक 31

वासुकिर्बहुशीर्षस्तु नागेन्द्रो मौनमास्थितः ।तप आचरते सम्यङ् निधाय मनसा मनः

vāsukirbahuśīrṣastu nāgendro maunamāsthitaḥ | tapa ācarate samyaṅ nidhāya manasā manaḥ

हिन्दी अर्थ

अनेक सिरवाले नागराज वासुकि भी मौन हो बुद्धिके द्वारा मनको सम्यक्‌-रूपसे ब्रह्ममें लगाकर तपस्या करते थे

अध्याय 211

श्लोक 32

शेषः सत्यधृतिर्नागो बलवान् ब्रह्मसम्भवः ।वृक्षमारुह्य धर्मात्मा अवाक्छीर्षोऽवलम्बते

śeṣaḥ satyadhṛtirnāgo balavān brahmasambhavaḥ | vṛkṣamāruhya dharmātmā avākchīrṣo'valambate

श्लोक 32–33 का हिन्दी अर्थ

५ सत्यको धारण करनेवाले ब्राह्मणपुत्र कश्यपनन्दन लवान्‌ नाग धर्मात्मा शेष एक वृक्षपर चढ़कर नीचेको सर किये लटक रहे थे तथा लपलपाती हुई जिह्लाओंसे भपने शरीरका विष त्याग रहे थे। तपस्याके धनी शेषने रे एक सहस्र वर्ष निराहार रहकर बिताये

अध्याय 211

श्लोक 33

जिह्वाभिर्लेलिहानाभिर्गात्रजं विषमुत्सृजन् ।समाः सहस्रं सम्पूर्णं निराहारस्तपोधनः

jihvābhirlelihānābhirgātrajaṃ viṣamutsṛjan | samāḥ sahasraṃ sampūrṇaṃ nirāhārastapodhanaḥ

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 211

श्लोक 34

कालकूटं विषं तद्धि सुमहत् समपद्यत ।येन लोको ह्यभिग्रस्तो न सुखं विन्दते नृप

kālakūṭaṃ viṣaṃ taddhi sumahat samapadyata | yena loko hyabhigrasto na sukhaṃ vindate nṛpa

हिन्दी अर्थ

झनका छोड़ा हुआ वह विष ही महान्‌ कालकूट नामक विष हो गया। नरेश्वर! उस विषसे ग्रस्त हुआ लोक कभी पुख नहीं पाता है

अध्याय 211

श्लोक 35

सर्वत्रानुगतं तीक्ष्णं भुजङ्गेषु महीपते ।जङ्गमं स्थावरं चैव सर्वत्रानुगतं विषम्

sarvatrānugataṃ tīkṣṇaṃ bhujaṅgeṣu mahīpate | jaṅgamaṃ sthāvaraṃ caiva sarvatrānugataṃ viṣam

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीनाथ! वह तीक्ष्ण विष र्पोमें सर्वत्र व्याप्त है । स्थावर और जंगम सभी प्राणियों में मनुगत है

अध्याय 211

श्लोक 36

परस्परविवृद्धेन हिंसायुक्तेन भारत ।नाशयत्यान्मनोऽङ्गानि तेन तीक्ष्णेन भारत

parasparavivṛddhena hiṃsāyuktena bhārata | nāśayatyānmano'ṅgāni tena tīkṣṇena bhārata

हिन्दी अर्थ

भारत! एक-दूसरेके प्रति बढ़े हुए हेंसाभावसे युक्त तीव्र क्रोधके रूपमें परिणत हुआ तप तामस होकर साधकके अपने ही अड्डोंका नाश कर डालता है

अध्याय 211

श्लोक 37

अथ ब्रह्मा महाभागो भूतानां हितकाम्यया ।मन्त्रं विसृजते राजन् ब्रह्माक्षरमहिंसकम्

atha brahmā mahābhāgo bhūtānāṃ hitakāmyayā | mantraṃ visṛjate rājan brahmākṣaramahiṃsakam

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! हिंसक विषकी उत्पत्तिके मनन्तर महाभाग ब्रह्माने सम्पूर्ण भूतोंके हितकी कामनासे हेंसाका निवारण करनेवाले-विषनाशक मन्त्रकी सृष्टि की, जो ब्रह्माक्षमय (वेदाक्षरमय) है

अध्याय 211

श्लोक 38

गरुत्मान् विततैः पक्षैर्नखाग्रैः सलिलं महीम् ।समाः सहस्रं सम्पूर्णं चूलाग्रेणावलम्बिना

garutmān vitataiḥ pakṣairnakhāgraiḥ salilaṃ mahīm | samāḥ sahasraṃ sampūrṇaṃ cūlāgreṇāvalambinā

हिन्दी अर्थ

गरुड़ प्रपने फैले हुए पंखों, नखागरों (पश्चाद्ओों) तथा लटकती ुई शिखाके अग्रभागसे जल (जीवन) और पृथ्वी शरीर)-की पूरे सहस्र वर्षोतक रक्षा करें *

अध्याय 211

श्लोक 39

पर्णभारैश्च विकचैर्विस्तीर्णैर्वसुधातले ।रराज वसुधा चैव पर्णैर्बहुविचित्रितैः

parṇabhāraiśca vikacairvistīrṇairvasudhātale | rarāja vasudhā caiva parṇairbahuvicitritaiḥ

हिन्दी अर्थ

इसमें ब्रह्से प्रणव लिया गया है। ' अहिंसक अक्षर' से अमृत तू दीर्घस्वरसे युक्त कहा गया है। इसके बाद *गरुत्मानू' पद वाँ गरुत्मानू हदयाय नम: अज्ुष्ठयो:' (ऐसा कहकर दोनों गरुत्मान्‌ शिरसे स्वाहा तर्जन्यो: ' (ऐसा कहकर दोनों हाथोंके शखाये वषट्‌ मध्यमयो: ' (ऐसा कहकर दोनों हाथोंके अज्ुष्ठोंसे हुम्‌ अनामिकयो: ' (पूर्ववत्त्‌ अज्भुष्ठोंसे अनामिका अज्भुलियोंका से कनिष्टिका अज्ुलियोंका स्पर्श) ' 3 व: गरुत्मान्‌ अस्त्राय गसे पृष्ठभागका स्पर्श करे।) यह करन्यास हुआ। अज्भन्यास नाम हटा देनेपर वे ही अज़न्यास वाक्य हो जायँगे। अज्न्यासमें न्यास किया जाता है। इसीमें छठा अस्त्रन्यास है। अंगूठेको ये। अंगूठेको अंदर करके मुट्ठी बाँधकर शिखाका स्पर्श करना चन्यासमें दायें हाथकी सभी अज्भुलियोंसे बायीं भुजाका और ये। दो नेत्रोंके अतिरिक्त तीसरा नेत्र ललाठमें होता है। इसका पमासे ललाटका एक साथ स्पर्श करना चाहिये। अस्त्रन्यासमें ताली बजायी जाती है। कुछ लोगोंका मत है कि नाराचमुद्रासे चारों ओर करतलध्वनि करनी चाहिये। के तान्त्रिक पद्धतिसे मूलमन्त्रका वर्णन है। आचार्य नीलकण्ठने | है—'वं हर; लं वषट्‌' इस मन्त्रका विनियोग इस प्रकार देवता वं बीज॑ हर: शक्ति: लं॑ कीलकं विप्ननाशने विनियोग: ।—वे अपने फैले हुए विकसित पंखोंके भारसे पृथ्वी और आकाशको व्याप्त करके स्थित हैं, इस वसुधापर (तथा शरीरमें भी अन्तर्यामीरूपसे ) विराजमान हैं तथा उनके बहुसंख्यक एवं विचित्र पंखोंसे पृथ्वीतलकी बड़ी शोभा होती है। (यह गरुडजीका ध्यान है)

अध्याय 211

श्लोक 40

येन वृत्तेन जीवेयुः सर्वभूतानि भारत ।इह लोके मनुष्येन्द्र देवलोके च भारत ।द्यौरिवाचितनक्षत्रा मही तलविसर्पिभिः

yena vṛttena jīveyuḥ sarvabhūtāni bhārata | iha loke manuṣyendra devaloke ca bhārata | dyaurivācitanakṣatrā mahī talavisarpibhiḥ

हिन्दी अर्थ

(अब मन्त्रका माहात्म्य बताते हैं—). भरतनन्दन! नरेन्द्र! गरुडमन्त्रके जपसे इहलोक तथा देवलोकके भी सभी प्राणी जीवित हो सकते हैं । नीचेकी ओर जानेवाले प्राणियों (तथा इन्द्रिय आदि)-के साथ यह पृथ्वी (एवं देह) विषरहित हो नक्षत्रोंसे व्याप्त हुए आकाशकी भाँति शोभा पाती है

अध्याय 211

श्लोक 41

हिमवान् हिमसम्पाते भवत्येकचरो वशी ।पुष्कराम्भसि धर्मात्मा मत्स्योल्लिखितमूर्धजः

himavān himasampāte bhavatyekacaro vaśī | puṣkarāmbhasi dharmātmā matsyollikhitamūrdhajaḥ

हिन्दी अर्थ

धर्मात्मा हिमवान्‌ भी हेमन्त और शिशिर-क्तुमें पुष्करके जलमें खड़े हो तपस्या करते थे, उस समय उस सरोवरके मत्स्य उनके सिरके बालोंमें उलझ जाते थे। वे मन और इन्द्रियोंको वशमें करके अकेले ही वहाँ विचरते और तप करते थे

अध्याय 211

श्लोक 42

अथ स्वबलमाक्रम्य पृथिवीं प्रांशुद्वाहिनीम् ।तपश्चरति धर्मात्मा बाहुमुद्यम्य दक्षिणम्

atha svabalamākramya pṛthivīṃ prāṃśudvāhinīm | tapaścarati dharmātmā bāhumudyamya dakṣiṇam

हिन्दी अर्थ

वे धर्मात्मा हिमवानू अपने बलसे ऊँचे शरीरवाली पृथ्वीको दबाकर दाहिनी बाँह ऊपर उठाये तपस्यामें संलग्न रहते थे ॥ '

अध्याय 211

श्लोक 43

साग्रं वर्षसहस्रं च शतमेकं च सुव्रत ।तपश्चरति संयोगाद् वायुभक्षः समाहितः

sāgraṃ varṣasahasraṃ ca śatamekaṃ ca suvrata | tapaścarati saṃyogād vāyubhakṣaḥ samāhitaḥ

हिन्दी अर्थ

सुब्रत ! वायुका ही आहार करते हुए एकाग्रचित्त हो उत्तम योगका आश्रय ले हिमवानूने ग्यारह सौ वर्षोतक तपस्या की

अध्याय 211

श्लोक 44

समाधियोगात् सङ्गाद् वा ब्रह्मयोगस्य भारत ।येनेयं पृथिवी राजन् धार्यते ब्रह्मयोनिना

samādhiyogāt saṅgād vā brahmayogasya bhārata | yeneyaṃ pṛthivī rājan dhāryate brahmayoninā

श्लोक 44–45 का हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! राजन्‌! जो ब्रह्माजीके उत्पत्तिस्थान हैं, अनादि, अनन्त और नित्य हैं तथा जीवरूपसे सर्वत्र विषयका अनुसंधान करनेवाले हैं, जो समाधियोग अथवा प्रणवके जप एवं चिन्तनसे विशिष्ट हो यह सारी पृथ्वी धारण करते हैं, वे साक्षात्‌ परमात्मा विष्णु हैं (वे ही कूर्म आदिरूपसे इस वसुधाको धारण करते हैं) । उनका स्वरूप अगाध है तथा वे निराकार ब्रह्म हैं

अध्याय 211

श्लोक 45

अनाद्यन्तेन नित्येन सर्वत्र विषयैषिणा ।योऽसौ विष्णुरगाधात्मा परमात्मा निराकृतिः

anādyantena nityena sarvatra viṣayaiṣiṇā | yo'sau viṣṇuragādhātmā paramātmā nirākṛtiḥ

अर्थ श्लोक 44 के साथ

अध्याय 211

श्लोक 46

दिने निषण्णो भवति रात्रौ भवति वै स्थिरः ।सत्यसन्धः स धर्मात्मा कामकारकरो भवेत्

dine niṣaṇṇo bhavati rātrau bhavati vai sthiraḥ | satyasandhaḥ sa dharmātmā kāmakārakaro bhavet

हिन्दी अर्थ

वे दिनमें बैठे होते हैं ( अर्थात्‌ विद्याके द्वारा प्राप्य हैं) और रातमें खड़े रहते हैं (अर्थात्‌ अविद्यासे ऊपर उठे हुए हैं) । वे सत्य- प्रतिज्ञ धर्मात्मा श्रीहरि इच्छानुसार (लीलापूर्वक) कार्य करते हैं

अध्याय 211

श्लोक 47

तस्य यः सोद्यतः पाणिः पृथिव्यां पृथिवीसमः ।रात्रौ स तपनो भवति मण्डलं विपुलं नभः

tasya yaḥ sodyataḥ pāṇiḥ pṛthivyāṃ pṛthivīsamaḥ | rātrau sa tapano bhavati maṇḍalaṃ vipulaṃ nabhaḥ

हिन्दी अर्थ

राज वसुधा चैव पर्णैरबहुविचित्रितै: ॥ फौर आकाशको व्याप्त करके स्थित हैं, जो भूतलपर (और विचित्र पंखोंसे पृथ्वीकी बड़ी शोभा हो रही है (उन गरुडदेवका द्ध हो जाता है। श्०३३ उन भगवान्‌ विष्णुका जो हाथ भक्तोंका उद्धार करनेके लिये उठा हुआ है, वह इस भूतलपर धर्म कहा या है। पृथ्वीकी भाँति वही सबको धारण करनेवाला दै। वह रात्रि (अविद्या)-में प्रकाश या विवेक प्रदान करनेवाला है तथा वही विशाल आकाशमण्डलमें व्यात्त ब्रह्म है

अध्याय 211

श्लोक 48

स चन्द्रविषयं राजञ्छमयामास रुन्धति ।ग्रहाणां गतयश्चैव ताराणां च विशेषतः

sa candraviṣayaṃ rājañchamayāmāsa rundhati | grahāṇāṃ gatayaścaiva tārāṇāṃ ca viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! वह धर्म चन्द्रमा अर्थात्‌ मनको नाँधनेवाले राग आदि दोषोंको शान्त करता है तथा क्षुद्र ग्रहों एवं ताराओंके तुल्य जो नेत्र आदि इन्द्रियाँ हैं, उन्हें वेषयोंकी ओर जानेसे रोकता है

अध्याय 211

श्लोक 49

तां छायामाक्षिपन् सोमात्स्रवद्भिर्मण्डलेन वै ।पृथिव्यां दक्षिणो हस्तो महायोगी महामनाः

tāṃ chāyāmākṣipan somātsravadbhirmaṇḍalena vai | pṛthivyāṃ dakṣiṇo hasto mahāyogī mahāmanāḥ

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीपर जो भगवान्‌का दाहिना हाथ धर्म है, वह चन्द्रमासे झरनेवाली ज्ाकी धाराओं और चन्द्रमण्डलके द्वारा अविद्याका गश करता हुआ साधकको महायोगी एवं महामना बना देता है। (तात्पर्य यह कि गड्ाजीके सेवन और चन्द्रमामें की हुई धारणासे अविद्याका निवारण होता है तथा धर्मका आश्रय लेनेसे ज्ञान और योगकी प्राप्तिकि साथ- पाथ मोक्ष सुलभ हो जाता है।)

अध्याय 211

श्लोक 50

सैषा छाया शशीभूता शशिमण्डलमाविशत् ।अलिङ्गा पृथिवीलिङ्गादद्भुतादक्षया दिवि

saiṣā chāyā śaśībhūtā śaśimaṇḍalamāviśat | aliṅgā pṛthivīliṅgādadbhutādakṣayā divi

हिन्दी अर्थ

यह अविद्यामयी त्रिरूपा छाया लिज़रहित (प्रमाणशून्य—मिथ्या) है। परह अद्भुत पृथ्वीरूप शरीर धारण करके वृत्तिकी एकाग्रतासे घन्द्रस्वरूप हो आकाशस्थ चन्द्रमण्डलमें प्रवेश कर जाती है। मिथ्या होनेके कारण ही यह अक्षय (मृगतृष्णाके परोवरकी भाँति क्षयरहित) है

अध्याय 211

श्लोक 51

अङ्गाङ्गान्युपगृह्यैव तपश्चरति निश्चयात् ।प्रोक्ष्य पादौ तु सतलौ पृथिवी तपसि स्थिता

aṅgāṅgānyupagṛhyaiva tapaścarati niścayāt | prokṣya pādau tu satalau pṛthivī tapasi sthitā

हिन्दी अर्थ

यह पृथ्वी तलुऑसहित गेनों पैरोंको धोकर (विविध तीर्थोंमें स्ान करके) सारे भड़्ोंको समेटकर (विषयोंकी ओरसे हटाकर) दृढ़ नेश्नयके साथ तपस्या करने लगी और दीर्घकालतक उसमें स्थिर रही (इसी तपस्याके प्रभावसे जलके प्रनीभावरूप चन्द्रमाके आकारमें परिणत हुई पृथ्वी घन्द्रमण्डलमें प्रविष्ट हुई)

अध्याय 211

श्लोक 52

सूर्यार्चिभिः पीयमानादाक्षिप्यत मही तले ।महीमिवाम्बुवसनां युगान्ते विष्णुतेजसा

sūryārcibhiḥ pīyamānādākṣipyata mahī tale | mahīmivāmbuvasanāṃ yugānte viṣṇutejasā

हिन्दी अर्थ

फिर सूर्यकी किरणोंद्वारा पेये जाते हुए जलके साथ पृथ्वी भी उनके समीप खींच नी गयी, जैसे युगान्तकालमें रसातलके भीतर डूबी हुई पलिलवसना पृथ्वीको वराहरूपधारी भगवान्‌ विष्णुने भपने तेजसे ऊपरको खींच लिया था

अध्याय 211

श्लोक 53

रराज सूर्यरश्मिभिर्व्यतिषिक्ता महानदी ।स्फाटिकेव शुभा सैषा काञ्चनैर्धातुभिर्वृता

rarāja sūryaraśmibhirvyatiṣiktā mahānadī | sphāṭikeva śubhā saiṣā kāñcanairdhātubhirvṛtā

हिन्दी अर्थ

सूर्यकी केरणोंसे मिश्रित हुई पृथ्वी एक महानदीके रूपमें परिणत ही गयी। उस समय वह सुवर्णमय धातुओंसे घिरी हुई पुन्दर स्फटिकशिलाकी भाँति सुशोभित हो रही थी

अध्याय 211

श्लोक 54

आदित्येन समादत्ता रश्मितेजोऽभिसम्भवैः ।मण्डलान्तर्गता देवी चक्षुषा नोपलभ्यते

ādityena samādattā raśmitejo'bhisambhavaiḥ | maṇḍalāntargatā devī cakṣuṣā nopalabhyate

हिन्दी अर्थ

यूर्यके द्वारा गृहीत होनेपर किरणोंके तेजसे एकीभावको पास हो सूर्यमण्डलके भीतर स्थित हुई पृथ्वीदेवी नेत्रोंसे मदृश्य हो गयीं

अध्याय 211

श्लोक 55

रश्मिभिः पुनरुत्तीर्णा ततो योगेन धावति ।आकाशगङ्गा संवृत्ता विपुलैरम्बुविग्रहैः

raśmibhiḥ punaruttīrṇā tato yogena dhāvati | ākāśagaṅgā saṃvṛttā vipulairambuvigrahaiḥ

हिन्दी अर्थ

सूर्यकिरणोंसे उत्तीर्ण हो अगाध नलमय विग्रह धारण करके वे आकाशगड्गा बन गयीं पर वहाँसे वेगपूर्वक दौड़ीं

अध्याय 211

श्लोक 56

शीतच्छायैश्च तरुभिर्लताभिश्च सुगन्धिभिः ।पद्मखण्डैश्च विविधैः शुशुभे दिव्यगन्धिभिः

śītacchāyaiśca tarubhirlatābhiśca sugandhibhiḥ | padmakhaṇḍaiśca vividhaiḥ śuśubhe divyagandhibhiḥ

हिन्दी अर्थ

मार्गमें शीतल छायावाले वृक्षों, लताओं, सुगन्धित कुसुमों तथा भाँति-भाँतिके दिव्य गन्धवाले पद्मसमूहों से उसकी बड़ी शोभा हो रही थी

अध्याय 211

श्लोक 57

काञ्चनापीडजघना स्फाटिकान्तरमेखला ।पद्मरेणुसिता पीता चक्रवाकावतंसिका

kāñcanāpīḍajaghanā sphāṭikāntaramekhalā | padmareṇusitā pītā cakravākāvataṃsikā

श्लोक 57–58 का हिन्दी अर्थ

वह महानदी आगे बढ़ती हुई वस्त्राभूषणोंसे विभूषित युवती स्त्रीकी भाँति शोभा पा रही थी । सुवर्णमय कमल मानो उसके कटिप्रदेशके आभूषण थे। स्फटिकमणिकी शिलाएँ मेखलाकी भाँति शोभा दे रही थीं। कमलोंके परागका अद्धराग धारण करनेके कारण उसकी कान्ति श्वेत और पीत दिखायी देती थी। चक्रवाक उसके कानोंके आभूषण-से प्रतीत होते थे। जलके भीतर उगे हुए नीलकमल उसके सुन्दर केशकलापका श्रम उत्पन्न कर देते थे। वह ढेर-के-ढेर पुष्पोंसे व्याप्त हो रही थी

अध्याय 211

श्लोक 58

नीलगर्भसुकेशान्ता पुष्पसञ्चयसङ्कुला ।शोभते विप्रसर्पन्ति प्रमदेव विभूषिता

nīlagarbhasukeśāntā puṣpasañcayasaṅkulā | śobhate viprasarpanti pramadeva vibhūṣitā

अर्थ श्लोक 57 के साथ

अध्याय 211

श्लोक 59

सैषा गङ्गा फलं लेभे पुष्करेण समाहिता ।सुतपा चन्द्रविहिता लोकानां धारणे रता

saiṣā gaṅgā phalaṃ lebhe puṣkareṇa samāhitā | sutapā candravihitā lokānāṃ dhāraṇe ratā

हिन्दी अर्थ

वही यह सम्पूर्ण लोकोंको धारण करनेवाली पृथ्वी सुन्दर तपस्या करके पहले चन्द्रमारूपमें परिणत हुई, फिर गड़ाभावको प्रात हुई। उसने पुष्करतीर्थके सम्पर्कसे परमात्माके ध्यानमें एकाग्रचित्त हो उत्कृष्ट तपस्याका फल प्राप्त किया

अध्याय 211

श्लोक 60

सरस्वती स्वरैर्व्यक्तैरधीते ब्रह्मवादिनी ।पृष्ठात् प्रयाता शैलेन्द्रे मन्दरे मन्दगामिनी

sarasvatī svarairvyaktairadhīte brahmavādinī | pṛṣṭhāt prayātā śailendre mandare mandagāminī

हिन्दी अर्थ

लोकधात्री पृथ्वी गड्ाभावको प्रात हो पुष्करमें सरस्वती होकर व्यक्त स्वरोंमें वेदका पाठ करती हुई स्वाध्यायमें तत्पर रहती है। वह सरस्वती मेरुपृष्ठसे मन्दगतिसे चलती हुई गिरिराज मन्दराचलपर जा पहुँचीं

अध्याय 211

श्लोक 61

ऋङ्मयांश्चतुरो वेदान् पादैश्चतुर्भिरावृतान् ।यजुर्भिः सामभिश्चैव ग्रथिताञ्छिक्षया तदा

ṛṅmayāṃścaturo vedān pādaiścaturbhirāvṛtān | yajurbhiḥ sāmabhiścaiva grathitāñchikṣayā tadā

हिन्दी अर्थ

उस समय वह ऋषियोंके साथ शिक्षासे ग्रथित, चार पादोंसे युक्त, ऋक्प्रधान एवं यजुष्‌ तथा साममन्त्रोंसे युक्त चारों वेदोंका स्पष्ट स्वरोंमें पाठ करने लगीं

अध्याय 211

श्लोक 62

ऋषिभिर्ज्वलनप्रख्यैस्तपसा दग्धकिल्बिषैः ।सुपार्श्वस्य गिरेः पादे परिदायैः सुपारणैः

ṛṣibhirjvalanaprakhyaistapasā dagdhakilbiṣaiḥ | supārśvasya gireḥ pāde paridāyaiḥ supāraṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

जिन ऋषियोंके साथ सरस्वती वेदपाठ करती थीं, वे अग्रिके समान तेजस्वी थे। तपस्यासे उनके सारे पाप भस्म हो गये थे । वे सुपार्श्वगिरिके चरणप्रान्तमें बैठकर शिष्योंको ब्रह्मका उपदेश देते थे और दूसरेंका उद्धार करनेमें समर्थ थे

अध्याय 211

श्लोक 63

निःस्वनं सर्वभूतानि नियमैश्च न शृण्वते ।मन्दराग्रे विसर्पन्तं जगत्कृत्स्नमतीन्द्रियम्

niḥsvanaṃ sarvabhūtāni niyamaiśca na śṛṇvate | mandarāgre visarpantaṃ jagatkṛtsnamatīndriyam

हिन्दी अर्थ

सरस्वतीका यह ब्रह्मोष समस्त प्राणी नियमपूर्वक (अथवा नियमोंद्वारा भी) नहीं सुन पाते, क्योंकि वह इन्द्रियोंसे अतीत है। मन्दराचलके आगे फैलता हुआ वह शब्द सम्पूर्ण जगतमें व्याप्त हो रहा है (वह वैखरी शब्द ही है, किंतु सूक्ष्म होनेके कारण दुर्ग्ाह्ि है)

अध्याय 211

श्लोक 64

विरामनियमे प्राप्ते तूष्णीम्भूता बभूव ह ।न वाचमीरयेद् देवी नियमात् सत्यवादिनी

virāmaniyame prāpte tūṣṇīmbhūtā babhūva ha | na vācamīrayed devī niyamāt satyavādinī

हिन्दी अर्थ

विरामका नियम प्रात होनेपर वाग्देवी चुप हो गयीं। उस अवस्थामें वे सत्यवादिनी देवी नियमत: वाणीका उच्चारण नहीं कर सकतीं (तुरीय ब्रह्मपदका निरूपण करते समय ' यतो वाचो निवर्तन्ते ' इत्यादि श्रुतिके अनुसार वाग्देवीका मौन होना उचित ही है)

अध्याय 211

श्लोक 65

अथ भूतानि सर्वाणि तूष्णीम्भूतानि सर्वशः ।न शेकुरभिधानार्थं व्याहर्तुं वदनैर्बलात्

atha bhūtāni sarvāṇi tūṣṇīmbhūtāni sarvaśaḥ | na śekurabhidhānārthaṃ vyāhartuṃ vadanairbalāt

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर सभी प्राणी सर्वथा चुप हो गये। वे अपने मुखोंसे बलपूर्वक कुछ कहनेके लिये बोल न सके

अध्याय 211

श्लोक 66

विभज्य योगं मनसा सर्वभूतेष्वनुग्रहम् ।सरस्वती तीरयुता व्याजहार महास्वनम्

vibhajya yogaṃ manasā sarvabhūteṣvanugraham | sarasvatī tīrayutā vyājahāra mahāsvanam

हिन्दी अर्थ

5ध्याय; * १०३५ समस्त प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये मनके द्वारा योगका विभाजन करके तटपर खड़ी हुई सरस्वती - रैवीने पुन: महान्‌ शब्दका उच्चारण किया (तात्पर्य पह कि ब्रह्मका साक्षात्‌ प्रतिपादन करनेमें असमर्थ शीनेपर भी वाग्देवी तटस्थ लक्षणद्वारा उनके तत्त्वका नरूपण कर सकती हैं)

अध्याय 211

श्लोक 67

सरस्वत्या समायुक्तां शिक्षां गृह्णन्ति देहिनः ।तस्मिन्नेवाथ ते सर्वे गानं गायन्ति शिक्षया

sarasvatyā samāyuktāṃ śikṣāṃ gṛhṇanti dehinaḥ | tasminnevātha te sarve gānaṃ gāyanti śikṣayā

हिन्दी अर्थ

सरस्वतीद्वारा दी हुई शक्षाको दूसरे देहधारी भी ग्रहण करते हैं। वे सब सी पदमें स्थित होकर शिक्षाके अनुसार मन्त्रोंका गान करते हैं

अध्याय 211

श्लोक 68

आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्चाश्विभिः सह ।जटिलाश्चीरवसना मुञ्जमेखलधारिणः

ādityā vasavo rudrā marutaścāśvibhiḥ saha | jaṭilāścīravasanā muñjamekhaladhāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्ण और भथ्विनीकुमार—ये सब जटा रखाये, चीरवस्त्र पहने और मूँजकी मेखला धारण किये उसी शिक्षाके अनुसार न्त्रोंका गान करते हैं

अध्याय 211

श्लोक 69

गन्धर्वाः किन्नराश्चैव सनागाः सह चाम्भसः ।तपश्चरन्ति सहिताः पुष्करेषु मनीषिणः

gandharvāḥ kinnarāścaiva sanāgāḥ saha cāmbhasaḥ | tapaścaranti sahitāḥ puṣkareṣu manīṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

गन्धर्व, किन्न, नाग और रुण भी उसी शिक्षाके अनुसार गाते हैं। ये सभी पनीषी पुरुष एक साथ होकर पुष्करमें तपस्या करते ं

अध्याय 211

श्लोक 70

अपि कीटपतङ्गैश्च सह सर्वैः सरीसृपैः ।शोषयन्ति शरीराणि तपसोग्रेण यत्नतः

api kīṭapataṅgaiśca saha sarvaiḥ sarīsṛpaiḥ | śoṣayanti śarīrāṇi tapasogreṇa yatnataḥ

हिन्दी अर्थ

और उस उम्र तपस्याके द्वारा यत्रपूर्वक कीट- ततंगों तथा समस्त सँप-बिच्छुओंके साथ अपने गरीरोंको सुखाते हैं

अध्याय 211

श्लोक 71

विष्णुर्विष्णुत्वमापन्नो देहान्तरविसृष्टवान् ।संरक्षति महायोगी सर्वांस्तान् सहचारिणः

viṣṇurviṣṇutvamāpanno dehāntaravisṛṣṭavān | saṃrakṣati mahāyogī sarvāṃstān sahacāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

परमात्मा विष्णु व्यापक पवरूपको प्राप्त होकर भी दूसरे चिन्मय विग्रह (चतुर्भुज वरूप)-से युक्त होते हैं। उसी स्वरूपसे वे महायोगी विष्णु उन समस्त सहचारियों (आदित्य आदि देवों )- का संरक्षण करते हैं

अध्याय 211

श्लोक 72

पुष्करे रमते विष्णुर्विष्णुरेव द्विधा कृतः ।दीप्यमानः स्वतेजोभिर्विधूम इव पावकः

puṣkare ramate viṣṇurviṣṇureva dvidhā kṛtaḥ | dīpyamānaḥ svatejobhirvidhūma iva pāvakaḥ

हिन्दी अर्थ

पुष्कर अर्थात्‌ सम्पूर्ण कार्यात्मक जगतमें व्याप्त हुए भगवान्‌ विष्णु ही नर- एारायण आदिके रूपमें एक-से दो हो गये हैं और भूमरहित अग्रिकी भाँति अपने तेजसे देदीप्यमान होकर 'प आदिकी लीला करते हैं

अध्याय 211

श्लोक 73

सोऽग्निर्मनःसमुद्भूतः पृथिवीं तापयन्निव ।प्रधावति समं तेन मण्डलं दशयोजनम्

so'gnirmanaḥsamudbhūtaḥ pṛthivīṃ tāpayanniva | pradhāvati samaṃ tena maṇḍalaṃ daśayojanam

हिन्दी अर्थ

वे विष्णु ही मन:कल्पित गाहपत्यादि अग्रिरूप होकर पृथ्वीके भभिमानी देवताको ताप देते (तपाकर सुवर्णके समान ुद्ध करते) हुए उसके साथ दस योजन ब्रह्माण्ड- ण्डलमें दौड़ते हैं (अर्थात्‌ उसके कर्मोका फल देनेके लिये उसके साथ-साथ रहते हैं)

अध्याय 211

श्लोक 74

विरराजार्चिभिर्दीप्तैः पृष्ठतश्चावलम्बिभिः ।विशीर्णपार्थिविभवैर्मयूखैरिव दीपितः

virarājārcibhirdīptaiḥ pṛṣṭhataścāvalambibhiḥ | viśīrṇapārthivibhavairmayūkhairiva dīpitaḥ

हिन्दी अर्थ

जिन्होंने हात्मवादीकी सामर्थ्यको नष्ट कर दिया है, उन आगे- गीछे सब ओर फैली हुई उद्दीद लपटों अथवा किरणोंसे काशित हुए अग्रिदेव बड़ी ही शोभा पाते हैं

अध्याय 211

श्लोक 75

तस्याग्नेर्विस्फुलिङ्गानां न शेकुर्लङ्घने रताः ।विप्रकीर्णस्य वसुधामर्यादामिव भास्करम्

tasyāgnervisphuliṅgānāṃ na śekurlaṅghane ratāḥ | viprakīrṇasya vasudhāmaryādāmiva bhāskaram

हिन्दी अर्थ

से विषयासक्त मनुष्य पृथ्वीकी मर्यादा बने हुए—सका परिच्छेद करनेवाले सूर्यदेवको लाँघ नहीं सकते, सी प्रकार वे सब ओर फैले हुए अग्निस्वरूप विष्णुकी चनगारियोंके समान जो ब्रह्मा आदि हैं, उनका भी ड्डन नहीं कर सकते

अध्याय 211

श्लोक 76

सोऽग्निर्दीप्य विभज्यांशून्विधूम इव पावकः ।ऋत्विग्भिर्ज्वलनप्रख्यैर्विक्रीयत इवाध्वरे

so'gnirdīpya vibhajyāṃśūnvidhūma iva pāvakaḥ | ṛtvigbhirjvalanaprakhyairvikrīyata ivādhvare

हिन्दी अर्थ

वे अग्निदेव उद्दीप्त हो अपनी किरणोंको अनेक रूपोंमें विभक्त करके धूमरहित पावकके समान स्थित होकर अग्नितुल्य तेजस्वी ऋत्विजोंद्वारा यज्ञमें विविध रूपोंगें खरीदे जाते हैं (सोमरस खरीदनेवाले सोमके रूपमें उन्हींकी खरीद करते हैं)

अध्याय 211

श्लोक 77

सोऽग्निर्धूमगतस्तत्र तिष्ठते विपुलं तदा ।यावद्विष्णुक्रमः प्राप्तो नियमस्य समापनात्

so'gnirdhūmagatastatra tiṣṭhate vipulaṃ tadā | yāvadviṣṇukramaḥ prāpto niyamasya samāpanāt

हिन्दी अर्थ

वे विष्णुरूप निर्धूम अग्निदेव उस यज्में, जबतक उसकी समासि नहीं हो जाती तबतक द्रव्य-देवता आदि विपुल रूपोंमें प्रकाशित होते हैं। फिर वे ही अग्नि देवता फलरूपसे वहाँतक पहुँचते हैं, जहाँतक (वामनसे विराट्-रूप धारण करनेवाले) भगवान्‌ विष्णुके तीनों पग पहुँचे थे

अध्याय 211

श्लोक 78

रक्षां कृत्वा स्थितं विद्याद् विष्णुर्विष्णुपराक्रमः ।भूत्वा शतशरीरो वै नागो बालाहकोऽभवत्

rakṣāṃ kṛtvā sthitaṃ vidyād viṣṇurviṣṇuparākramaḥ | bhūtvā śataśarīro vai nāgo bālāhako'bhavat

हिन्दी अर्थ

सबकी रक्षा करके स्थित हुए उन भगवान्‌ विष्णुको जानना चाहिये। वे व्यापक पराक्रमी भगवान्‌ विष्णु (ऐश्वर्ययोगसे ) सैकड़ों शरीरोंमें प्रकट हों बालाहक नाग (मेघोंका भेदन करनेवाला ऐरावत हाथी) हुए

अध्याय 211

श्लोक 79

तमग्निमात्मसंसृष्टं लेलिहानं महामतिम् ।प्रतिप्रवृत्तं तेजोभिर्भूतानां हितकाम्यया

tamagnimātmasaṃsṛṣṭaṃ lelihānaṃ mahāmatim | pratipravṛttaṃ tejobhirbhūtānāṃ hitakāmyayā

श्लोक 79–80 का हिन्दी अर्थ

शरीरके भीतर जठरानलरूपसे स्थित हुए उन विष्णु- स्वरूप अग्रिदेवको, जो अपनी लपलपाती हुई लपयेंसे सबको चाट लेनेमें समर्थ, महामति (दिव्य ज्ञान देनेवाले ) तथा समस्त भूतोंके हितकी कामनासे तेजस्वी रूप धारण करके कर्ममें प्रवृत्त हुए थे; प्राणियोंके प्राणोंकी पुष्टि करनेवाले बालाहक नागने उस समय वहाँ सुखद शीतलजलसे अभिषिक्त किया

अध्याय 211

श्लोक 80

वारिणा सुखशीतेन प्राणिनां प्राणवर्धनः ।न्यषिञ्चद् दहनं तत्र नागो बालाहकस्तदा

vāriṇā sukhaśītena prāṇināṃ prāṇavardhanaḥ | nyaṣiñcad dahanaṃ tatra nāgo bālāhakastadā

अर्थ श्लोक 79 के साथ

अध्याय 211

श्लोक 81

ततः सिद्धगणैर्जुष्टः पुष्करे तप्यते तपः ।संहृत्य मनसाऽऽत्मानं महायोगी महाबलः

tataḥ siddhagaṇairjuṣṭaḥ puṣkare tapyate tapaḥ | saṃhṛtya manasā''tmānaṃ mahāyogī mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर सिद्धगणोंसे सेवित वे महायोगी, महावैराग्यवान्‌ अग्निदेव मन (बुद्धि)-के द्वारा मनको अपनेमें विलीन करके पुष्करमें तपस्या करने लगे

अध्याय 211

श्लोक 82

पादगात्राणि संहृत्य मनो मूर्ध्नि विधारयन् ।अचलं स्थानमासाद्य तूष्णीभूतो बभूव ह

pādagātrāṇi saṃhṛtya mano mūrdhni vidhārayan | acalaṃ sthānamāsādya tūṣṇībhūto babhūva ha

हिन्दी अर्थ

वे नीचेके अज्ञोंका ऊपरके अज्लोंमें लय करते हुए मनको मूर्धथा (सहस्रारचक्र) - में स्थापित करके अविचल स्थान (ब्रह्मपद)- को पाकर मौन हो गये

अध्याय 211

श्लोक 83

एष धर्मो हि धर्माणां नोपधानविकल्पितः ।हितः सर्वेषु भूतेषु इह चामुत्र चोभयोः

eṣa dharmo hi dharmāṇāṃ nopadhānavikalpitaḥ | hitaḥ sarveṣu bhūteṣu iha cāmutra cobhayoḥ

हिन्दी अर्थ

यही सब धर्मोका धर्म है। इसमें उपाधिजनित विकल्प नहीं है। यह इहलोक और परलोक—दोनोंमें सभी प्राणियोंके लिये हिंतकर है

अध्याय 211

श्लोक 84

अथ दैत्या हतास्तत्र समागम्योद्यतायुधाः ।मायाप्राप्तैर्बहुविधैर्नगरैरभिसंवृताः

atha daityā hatāstatra samāgamyodyatāyudhāḥ | māyāprāptairbahuvidhairnagarairabhisaṃvṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर वे दैत्य जो पहले मार खाकर पराजित हो गये थे, पुन: हाथोंमें आयुध लिये वहाँ आ गये। वे नाना प्रकारके मायामय नगरोंसे घिरे हुए थे

अध्याय 211

श्लोक 85

अग्निं दैत्याः पर्वताग्रैरभिघ्नन्ति परन्तप ।ज्वलन्तं ज्वलनप्रख्या महाकाया महाबलाः

agniṃ daityāḥ parvatāgrairabhighnanti parantapa | jvalantaṃ jvalanaprakhyā mahākāyā mahābalāḥ

हिन्दी अर्थ

शत्रुओंको संताप देनेवाले जनमेजय! वे अग्निके समान तेजस्वी महाकाय एवं महाबली दैत्य तेजसे प्रज्वलित होनेवाले अग्रिदेवको पर्वतशिखरोंसे चोट पहुँचाने लगे

अध्याय 211

श्लोक 86

मेघीभूताश्च मायाभिर्वर्षन्ति बलदर्पिताः ।तस्मिन्नेवाभिसङ्घाते ससङ्घातं महाबलम्

meghībhūtāśca māyābhirvarṣanti baladarpitāḥ | tasminnevābhisaṅghāte sasaṅghātaṃ mahābalam

हिन्दी अर्थ

वे उस' संघर्षमें बलके घमंडमें भरकर मेघरूप धारण करके मायाद्वारा सेवकसमूह-सहित महाबली अग्रिपर प्रस्तरोंकी वर्षा करने लगे

अध्याय 211

श्लोक 87

ते शैलास्त्वर्षिषा दग्धाः शतशोऽथ सहस्रशः ।युगान्ते प्रभुरादित्यः प्रजा इव दिधक्षति

te śailāstvarṣiṣā dagdhāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ | yugānte prabhurādityaḥ prajā iva didhakṣati

हिन्दी अर्थ

परंतु जैसे भगवान्‌ सूर्य प्रलयकालमें समस्त प्रजाओंको दग्ध कर देना चाहते हैं, उसी प्रकार उन अग्रिदेवके तेजसे उस समय दैत्योंद्वारा गिराये हुए वे सैकड़ों -हजारों पर्वत-खण्ड जलकर भस्म हो गये

अध्याय 211

श्लोक 88

न शेकुरग्निं दैत्यास्ते मायाभिर्मुखमुद्यतम् ।आदित्यमिव दीप्यन्तं नभः सूर्योदये यथा

na śekuragniṃ daityāste māyābhirmukhamudyatam | ādityamiva dīpyantaṃ nabhaḥ sūryodaye yathā

हिन्दी अर्थ

देवताओंके मुखस्वरूप उद्दीत हुए अग्निदेवको वे दैत्य अपनी मायाओंद्वारा पराजित न कर सके। ठीक उसी तरह, जैसे मंदेह नामक राक्षस सूर्योदयकालमें आकाशको प्रकाशित करते हुए सूर्यदेवको दबा नहीं पाते हैं

अध्याय 211

श्लोक 89

विहितैरुद्यमैः सर्वे देत्या भग्नपराक्रमाः ।गन्धमादनमासाद्य निषण्णा नगमूर्धनि

vihitairudyamaiḥ sarve detyā bhagnaparākramāḥ | gandhamādanamāsādya niṣaṇṇā nagamūrdhani

हिन्दी अर्थ

सारे उद्यम करके भी दैत्योंका पराक्रम भंग हो गया। वे हताश हो गन्धमादन पर्वतके शिखरपर जा बैठे

अध्याय 211

श्लोक 90

स चाग्निर्वैष्णवैर्लोकैर्विद्युद्भिः सह सङ्गतः ।अन्तरिक्षचरान् दैत्यान् निर्दहन्व्यचरद् दिवि

sa cāgnirvaiṣṇavairlokairvidyudbhiḥ saha saṅgataḥ | antarikṣacarān daityān nirdahanvyacarad divi

हिन्दी अर्थ

वे अग्रिदेव वैष्णवजनों तथा बिजलियोंसे मिलकर अन्तरिक्षचारी दैत्योंको दग्ध करते हुए आकाशमें विचरने लगे

अध्याय 211

श्लोक 91

नागो बालाहकश्चैव मेघैः सङ्घातमागतः ।मुमोच सलिलं भूमौ पर्जन्य इव वृष्टिमान्

nāgo bālāhakaścaiva meghaiḥ saṅghātamāgataḥ | mumoca salilaṃ bhūmau parjanya iva vṛṣṭimān

हिन्दी अर्थ

उस समय मेघोंके साथ संघभावको प्राप्त हुए बालाहक नाग (ऐरावत) -ने वर्षा करनेवाले मेघकी भाँति भूमिपर पानी बरसाया

अध्याय 211

श्लोक 92

मन्त्रैः सञ्चोदितो नागो द्विजेभ्यो वदनोद्गतैः ।मुमोच तोयसङ्घातं मानयन् विप्रजं जनम्

mantraiḥ sañcodito nāgo dvijebhyo vadanodgataiḥ | mumoca toyasaṅghātaṃ mānayan viprajaṃ janam

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणोंके मुखोंसे उच्चारित हुए मन्त्रोंद्वारा प्रेरित हुए उस नागने ब्राह्मण-संततिका समादर करते हुए वहाँ जलसमूहकी वर्षा की

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.