Harivamsha Purana
209
अध्याय 209 / 318

Parva 3, Adhyāya 26

55 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ55 श्लोक

अध्याय 209

श्लोक 1

मधोः विष्णोश्च घोरं युद्धं, देवेभिः ऋषिभिश्च श्रीविष्णोः स्तुतिः, हयग्रीवरूप धारकस्य विष्णुना मधोः वधं, पृथिव्या मेदिनी नाम प्राप्तिः बलवान् स तु दैतेयो मधुर्भीमपराक्रमः ।बबन्ध पाशैर्निशितैर्महेन्द्रं पर्वतान्तरे

madhoḥ viṣṇośca ghoraṃ yuddhaṃ, devebhiḥ ṛṣibhiśca śrīviṣṇoḥ stutiḥ, hayagrīvarūpa dhārakasya viṣṇunā madhoḥ vadhaṃ, pṛthivyā medinī nāma prāptiḥ balavān sa tu daiteyo madhurbhīmaparākramaḥ | babandha pāśairniśitairmahendraṃ parvatāntare

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भयंकर पराक्रमी बलवान्‌ मधु दैत्यने प्रह्मादके कहनेसे देवराज इन्द्रको पर्वतके भीतर तीखे पाशोंसे बाँध लिया। भारत ! वह लक्षणोंका ज्ञाता था, परंतु उसकी बुद्धि मारी गयी थी; इसलिये उसने भविष्यमें इन्द्रके ऐश्र्यकी अभिलाषा रखकर उन्हें बाँधा था

अध्याय 209

श्लोक 2

तं वै प्रह्लादवचनाल्लक्षणज्ञश्च भारत ।ऐश्वर्यमैन्द्रमाकाङ्क्षन्भविष्यं बुद्धिसङ्क्षयात्

taṃ vai prahlādavacanāllakṣaṇajñaśca bhārata | aiśvaryamaindramākāṅkṣanbhaviṣyaṃ buddhisaṅkṣayāt

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 209

श्लोक 3

बद्ध्वेन्द्रं सहसा मध्ये पाशैर्मर्मविवर्जितैः ।आयसैर्बहुभिश्चित्रैर्बलवद्भिर्विदारणैः

baddhvendraṃ sahasā madhye pāśairmarmavivarjitaiḥ | āyasairbahubhiścitrairbalavadbhirvidāraṇaiḥ

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

लोहेके बने हुए बहुसंख्यक विचित्र प्रबल और विदीर्ण करनेवाले मर्मरहित पाशोंसे इन्द्रकी कमरको सहसा बाँधकर दैत्योंके अगुआ युद्धकुशल मधुने, जो कालके वशीभूत हो गया था, समस्त गणोंके बीच रुद्रस्वरूप भगवान्‌ विष्णुको ही ललकारा

अध्याय 209

श्लोक 4

विष्णुमेवाग्रणी रुद्रमाह्वयद् युद्धकोविदः ।मध्ये गणानां सर्वेषां कालस्य वशमागतः

viṣṇumevāgraṇī rudramāhvayad yuddhakovidaḥ | madhye gaṇānāṃ sarveṣāṃ kālasya vaśamāgataḥ

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 209

श्लोक 5

द्वैधीभूताः काश्यपेया मधोर्वशमुपागताः ।युद्धार्थमभ्यधावन्त प्रगृह्य विपुला गदाः

dvaidhībhūtāḥ kāśyapeyā madhorvaśamupāgatāḥ | yuddhārthamabhyadhāvanta pragṛhya vipulā gadāḥ

हिन्दी अर्थ

कश्यपके पुत्र दो भागोंमें विभक्त हो मधुके वशमें आकर बड़ी-बड़ी गदाएँ हाथमें लिये देवताओंके साथ युद्ध करनेके लिये दौड़े

अध्याय 209

श्लोक 6

गन्धर्वाः किन्नराश्चैव वाद्ये गीते च कोविदाः ।प्रनृत्यन्ति प्रगायन्ति प्रहसन्ति च सर्वशः

gandharvāḥ kinnarāścaiva vādye gīte ca kovidāḥ | pranṛtyanti pragāyanti prahasanti ca sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

वाद्य और गीतमें कुशल गन्धर्व और किन्नर सब प्रकारसे नाचते, गाते तथा हँसते थे

अध्याय 209

श्लोक 7

तन्त्रीभिः सुप्रयुक्ताभिर्मधुराभिः स्वभावतः ।मनो मधोर्विधुन्वन्ति युध्यमानस्य रागिणः

tantrībhiḥ suprayuktābhirmadhurābhiḥ svabhāvataḥ | mano madhorvidhunvanti yudhyamānasya rāgiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

स्वभावत: मधुर एवं सुन्दर ढंगसे बजायी गयी वीणाके तारोंसे मोहक ध्वनि उत्पन्न करके वे युद्धमें लगे हुए रागी मधुके मनको विचलित कर देते थे

अध्याय 209

श्लोक 8

मधोर्बलार्थं मधुनो नियोगात् पद्मयोनिनः ।एतान्विकरान्कुर्वन्ति गन्धर्वाः सत्यवादिनः

madhorbalārthaṃ madhuno niyogāt padmayoninaḥ | etānvikarānkurvanti gandharvāḥ satyavādinaḥ

हिन्दी अर्थ

तम:प्रधान मधुका बल क्षीण करनेके लिये पद्मयोनि ब्रह्माजीकी आज्ञासे सत्यवादी गन्धर्व ये विकार प्रकट करते थे

अध्याय 209

श्लोक 9

तत्र शक्तो हिं गान्धर्वे तस्मिञ्छब्दे मधुर्मनः ।दानवाश्चासुराश्चैव प्रत्यक्षं यान्ति प्राणदन्

tatra śakto hiṃ gāndharve tasmiñchabde madhurmanaḥ | dānavāścāsurāścaiva pratyakṣaṃ yānti prāṇadan

हिन्दी अर्थ

शक्तिशाली मधुने उस संगीतके शब्दमें मन लगाया। दानव और असुर उसके सामने जाते और गर्जना करते थे

अध्याय 209

श्लोक 10

मधोश्च मन आक्षिप्य पश्यन् योगेन चक्षुषा ।मन्दरं प्रयते विष्णुर्गूढोऽग्निरिव दारुषु

madhośca mana ākṣipya paśyan yogena cakṣuṣā | mandaraṃ prayate viṣṇurgūḍho'gniriva dāruṣu

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार मधुके मनको विषयों में विश्िप्त करके योग-दृष्टिसे देखनेवाले भगवान्‌ विष्णु सहसा मन्दराचलकी ओर चल दिये, मानो अग्नि काष्ठोंमें छिप गयी हो

अध्याय 209

श्लोक 11

ऋषयो दीप्तमनसं किञ्चिद् व्यथितमानसाः ।पितामहं पुरस्कृत्य क्षणेनान्तरधीयत

ṛṣayo dīptamanasaṃ kiñcid vyathitamānasāḥ | pitāmahaṃ puraskṛtya kṣaṇenāntaradhīyata

हिन्दी अर्थ

उस समय ऋषियोंके मनमें कुछ व्यथा हुई । वे संतप्तचित्त पितामहको आगे करके क्षणभरमें वहाँसे अन्तर्धान हो गये

अध्याय 209

श्लोक 12

विष्णुं सोऽभ्यहनत् क्रुद्धो मधुर्मधुनिभेक्षणः ।भुजेन शङ्खदेशान्ते न चकम्पे पदात्पदम्

viṣṇuṃ so'bhyahanat kruddho madhurmadhunibhekṣaṇaḥ | bhujena śaṅkhadeśānte na cakampe padātpadam

हिन्दी अर्थ

इधर क्रोधमें भरे हुए मधु-जैसे पिज़ल नेत्रवाले मधुने भगवान्‌ विष्णुके पास पहुँचकर अपने हाथसे उनकी कनपटीपर प्रहार किया; परंतु वे एक पग भी विचलित नहीं हुए

अध्याय 209

श्लोक 13

विष्णुश्चाभ्यहनद् दैत्यं कराग्रेण स्तनान्तरे ।स पपात महीं तूर्णं जानुभ्यां रुधिरं वमन्

viṣṇuścābhyahanad daityaṃ karāgreṇa stanāntare | sa papāta mahīṃ tūrṇaṃ jānubhyāṃ rudhiraṃ vaman

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ विष्णुने भी अपने हाथके अग्रभागसे उस दैत्यकी छातीमें चोट की; फिर तो वह रक्त वमन करता हुआ घुटनोंके बल तुरंत पृथ्वीपर गिर पड़ा

अध्याय 209

श्लोक 14

न चैनं पतितं हन्ति विष्णुर्युद्धविशारदः ।बाहुयुद्धे हि समयं मत्वाचिन्त्यपराक्रमः

na cainaṃ patitaṃ hanti viṣṇuryuddhaviśāradaḥ | bāhuyuddhe hi samayaṃ matvācintyaparākramaḥ

हिन्दी अर्थ

अचिन्त्य पराक्रमी युद्धविशारद भगवान्‌ विष्णुने बाहुयुद्धका अवसर उपस्थित जानकर पृथ्वीपर गिरे हुए उस दैत्यको नहीं मारा

अध्याय 209

श्लोक 15

इन्द्रध्वज इवोत्तिष्ठञ्जानुभ्यां स महीतलात् ।मधु रोषपरीतात्मा निर्दहन्निव चक्षुषा

indradhvaja ivottiṣṭhañjānubhyāṃ sa mahītalāt | madhu roṣaparītātmā nirdahanniva cakṣuṣā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर मधुका हृदय रोषसे भर गया। वह घुटनोंके सहारे पृथ्वीतलसे उठकर खड़ा हो गया, मानो किसीने इन्द्रध्वज फहरा दिया हो। उस समय वह विष्णुकी ओर इस तरह देख रहा था, मानो अपने नेत्रसे उन्हें जला देगा

अध्याय 209

श्लोक 16

परुषाभिस्ततो वाग्भिरन्योन्यमभिगर्जतुः ।समीयतुर्बाहुयुद्धे परस्परवधैषिणौ

paruṣābhistato vāgbhiranyonyamabhigarjatuḥ | samīyaturbāhuyuddhe parasparavadhaiṣiṇau

श्लोक 16–17 का हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ वे दोनों कठोर बातें कहते हुए एक-दूसरेके सामने गर्जने लगे; फिर दोनों दोनोंके वधकी इच्छासे बाहुयुद्धमें परस्पर गुँथ गये। वे दोनों ही बाहुबलसे युक्त और युद्धकलाके विशेषज्ञ थे। दोनों तपस्याके प्रभावसे शान्तचित्त हो गये थे और दोनों ही यथार्थरूपसे पराक्रम प्रकट कर रहे थे

अध्याय 209

श्लोक 17

उभौ तौ बाहुबलिनावुभौ युद्धविशारदौ ।उभौ च तपसा शान्तावुभौ सत्यपराक्रमौ

ubhau tau bāhubalināvubhau yuddhaviśāradau | ubhau ca tapasā śāntāvubhau satyaparākramau

अर्थ श्लोक 16 के साथ

अध्याय 209

श्लोक 18

दृढप्रहारिणौ वीरावन्योन्यं विचकर्षतुः ।शैलेन्द्राविव युद्ध्यन्तौ पक्षैः पाषाणसन्निभैः

dṛḍhaprahāriṇau vīrāvanyonyaṃ vicakarṣatuḥ | śailendrāviva yuddhyantau pakṣaiḥ pāṣāṇasannibhaiḥ

हिन्दी अर्थ

दृढ़तापूर्वक प्रहार करनेवाले वे दोनों वीर एक-दूसरेको खींचने लगे, मानो पाषाण-सदूश पंखोंसे युक्त दो पर्वतराज परस्पर युद्ध कर रहे हों

अध्याय 209

श्लोक 19

विकर्षन्तौ वमन्तौ च अन्योन्यं वसुधातले ।गजाविव विषाणाग्रैर्नखाग्रैश्च विचेरतुः

vikarṣantau vamantau ca anyonyaṃ vasudhātale | gajāviva viṣāṇāgrairnakhāgraiśca viceratuḥ

हिन्दी अर्थ

जैसे दो हाथी अपने दाँतों और नखोंके अग्रभागसे परस्पर प्रहार करते हुए युद्धस्थलमें विचरते हैं, उसी प्रकार वे दोनों वीर मधु और श्रीविष्णु एक-दूसरेको खींचते और रक्त-वमन करते हुए भूतलपर विचर रहे थे

अध्याय 209

श्लोक 20

ततो व्रणमुखैश्चैव सुस्राव रुधिरं बहु ।ग्रीष्मान्ते धातुसंसृष्टं शैलेभ्य इव काञ्चनम्

tato vraṇamukhaiścaiva susrāva rudhiraṃ bahu | grīṣmānte dhātusaṃsṛṣṭaṃ śailebhya iva kāñcanam

हिन्दी अर्थ

पी डध्याय: + श्०्श९ तदनन्तर एक-दूसरेके प्रहारसे जो घाव हो गये थे, उनके छिद्रोंसे बहुत रक्त बहने लगा। ठीक उसी तरह, जैसे वर्षा-ऋतुमें पर्वतोंसे गैरिक धातुमिश्रित काज्चन-रस झरता हो

अध्याय 209

श्लोक 21

संसिक्तौ रुधिरौघैश्च स्रवद्भिः समरञ्जितौ ।अथाद्यतैः पदाग्रैश्च तौ व्यदारयतां महीम्

saṃsiktau rudhiraughaiśca sravadbhiḥ samarañjitau | athādyataiḥ padāgraiśca tau vyadārayatāṃ mahīm

हिन्दी अर्थ

वे दोनों झरते हुए रक्तके प्रवाहोंसे भीगकर समानरूपसे रक्तरज्ित हो गये। फिर उठते-गिरते हुए पैरोंके अग्रभागोंसे उन दोनोंने वहाँकी भूमि विदीर्ण कर डाली

अध्याय 209

श्लोक 22

अभिहत्य तु तौ वीरौ परस्परमनैकधा ।पतङ्गाविव युध्येतां पक्षाभ्यां मांसगृद्धिनौ

abhihatya tu tau vīrau parasparamanaikadhā | pataṅgāviva yudhyetāṃ pakṣābhyāṃ māṃsagṛddhinau

हिन्दी अर्थ

एक-दूसरेपर बारम्बार चोट करके वे दोनों वीर पंखोंसे लड़नेवाले दो मांस- लोलुप पश्षियोंकी भाँति युद्ध करने लगे

अध्याय 209

श्लोक 23

शुश्रुवुश्चान्तरिक्षेऽथ सर्वभूतानि पुष्करे ।सिद्धानां वदनोन्मुक्ताः परया वर्णसम्पदा

śuśruvuścāntarikṣe'tha sarvabhūtāni puṣkare | siddhānāṃ vadanonmuktāḥ parayā varṇasampadā

श्लोक 23–28 का हिन्दी अर्थ

इसी समय पुष्करके आकाशमें सम्पूर्ण भूतोंने भगवान्‌ विष्णुसे सम्बन्ध रखनेवाली स्तुतियाँ सुनी, जो उन सत्यपराक्रमी भगवानमें यथार्थरूपसे घटित हो रही थीं। वे स्तुतियाँ सिद्धोंके मुखोंसे निकली थीं और उत्तमोत्तम वर्ण-सम्पत्तिसे सुशोभित थीं । यह शरीर तेज, जल और अन्न-इन तीन धातुओंका अथवा रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्ञा और शुक्र-इन सात धातुओंका संयोगरूप है। यह चेतनसे संयुक्त है। वह चेतन तेजोभूत सनातन ब्रह्म ही है। जो इन्द्रियोंसे युक्त होकर जीव कहलाता है। शरीरका आरम्भ करनेवाले वे स्थूलभूत प्रलयके अधिष्टानभावको प्राप्त हुए सूक्ष्म-कारणमें निश्चय ही स्थित होते हैं। फिर सूक्ष्म ही अनेक रूप धारण करके बास्म्बार प्रकट होता है। सबकी कामनाओंको देनेवाले तथा सबको वशमें रखनेवाले असज्ञ॒ परमात्मा तीनों लोकोंमें भूतोंको उनके स्वरूपका बोध कराकर स्वयं सुन्दर रूप धारण करके उन अनेक रूपवाले लोकोंमें विचरते रहते हैं । योगात्मा ईश्वर, जो देवलोकको धारण करनेवाले हैं, सूक्ष्मरूपसे अपने-आपको शेषनागके रूपसे प्रकट करके पृथ्वीको धारण करते हुए विचरते हैं। वे दुष्टनिग्रह और साधु-संरक्षण आदि अनेक कारणोंसे मानसशरीर—शेष, कूर्म आदि रूप धारण करके जगत्‌की रक्षा करते हैं। वे ही वेद, जरायुज आदि चार प्रकारके प्राणिसमुदाय तथा दूसरे जडभूतोंको धारण करते हैं

अध्याय 209

श्लोक 24

स्तुतयो विष्णुसंयुक्ताः सत्याः सत्यपराक्रमे ।शरीरं धातुसंयुक्तं संयुक्तं चेतनेन च

stutayo viṣṇusaṃyuktāḥ satyāḥ satyaparākrame | śarīraṃ dhātusaṃyuktaṃ saṃyuktaṃ cetanena ca

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 209

श्लोक 25

तद् ब्रह्म इन्द्रियैर्युक्तं तेजोभूतं सनातनम् ।ध्रुवं तिष्ठन्ति भूतास्ते सूक्ष्मे प्रलयतां गते

tad brahma indriyairyuktaṃ tejobhūtaṃ sanātanam | dhruvaṃ tiṣṭhanti bhūtāste sūkṣme pralayatāṃ gate

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 209

श्लोक 26

पुनश्चोद्भवते सूक्ष्मं बहुरूपमनेकधा ।प्रबोध्य भावं भूतानां त्रिषु लोकेषु कामदः

punaścodbhavate sūkṣmaṃ bahurūpamanekadhā | prabodhya bhāvaṃ bhūtānāṃ triṣu lokeṣu kāmadaḥ

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 209

श्लोक 27

सुरूपो बहुरूपांस्ताँल्लोकान् सञ्चरते वशी ।मानसीं तनुमास्थाय बहुभिः कारणान्तरैः

surūpo bahurūpāṃstā~llokān sañcarate vaśī | mānasīṃ tanumāsthāya bahubhiḥ kāraṇāntaraiḥ

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 209

श्लोक 28

योगात्मा धारयन्नुर्वीं नागात्मानं दिवन्धरः ।ब्रह्म भूतं परं चैव सूक्ष्मेणात्मानमीश्वरः

yogātmā dhārayannurvīṃ nāgātmānaṃ divandharaḥ | brahma bhūtaṃ paraṃ caiva sūkṣmeṇātmānamīśvaraḥ

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 209

श्लोक 29

ब्राह्मेण विप्रान् वसति युद्धेनैव च क्षत्रियान् ।प्रदानकर्मणा वैश्याञ्छूद्रान् परिचरेण च

brāhmeṇa viprān vasati yuddhenaiva ca kṣatriyān | pradānakarmaṇā vaiśyāñchūdrān paricareṇa ca

हिन्दी अर्थ

वे भगवान्‌ वेदमयरूपसे ब्राह्मणों का आश्रय लेकर रहते हैं । युद्धरूपसे क्षत्रियोंमें स्थित होते हैं । दानकर्म अथवा वस्तुओंके आदान-प्रदानवाले वाणिज्य कर्मके रूपमें वैश्योंमें निवास करते हैं तथा त्रैवर्णिकों की सेवाके रूपमें वे शूद्रोंका आश्रय लेकर रहते हैं

अध्याय 209

श्लोक 30

गावः क्षीरप्रदानेन अश्वान् यज्ञेषु प्रोक्षणैः ।पितरश्चोष्मणैवेह हविर्भागेन देवताः

gāvaḥ kṣīrapradānena aśvān yajñeṣu prokṣaṇaiḥ | pitaraścoṣmaṇaiveha havirbhāgena devatāḥ

हिन्दी अर्थ

वे गौओंका आश्रय लेकर दुग्ध प्रदानके द्वारा तुम सबकी रक्षा करते हैं। यज्ञोमें अश्वों (यज्ञसम्बन्धी उपकरणों )-का आश्रय लेकर प्रोक्षण (फलरूप अमृतके अभिषेक) -द्वारा तुमलोगोंकी रक्षा करते हैं। पकाये जाने- वाले हविष्यके गर्म-गर्म भापसे पितरोंको तथा यश्चोंमें हविष्यका भाग अर्पित करके देवताओंको तृप्त करते हैं

अध्याय 209

श्लोक 31

चतुर्भिर्व्यतिरिक्ताङ्गैस्त्रिभिरन्यैश्च धातुभिः ।सप्तभिः पितृभिर्नित्यैस्त्रीँल्लोकान् परिरक्षति

caturbhirvyatiriktāṅgaistribhiranyaiśca dhātubhiḥ | saptabhiḥ pitṛbhirnityaistrī~llokān parirakṣati

हिन्दी अर्थ

पृथक्‌-पृथकू अज्ञवाले चार धातुओं (दर्श, पौर्णमास, पितृयज्ञ तथा साधारण चार प्रकारके अन्नों )- से तथा दूसरे तीन धातुओं (मन, वाकू और प्राण) से—इस तरह सात प्रकारके नित्य अर्पण करने योग्य अन्नोंद्वारा वे भगवान्‌ विष्णु पितरोंसहित तीनों लोकोंकी रक्षा करते हैं (अथवा उक्त अन्नों तथा कव्यवाट्‌ अनल, यम, सोम, अर्यमा, अग्िष्वात्त, सोमप तथा बर्हिषदू—इन सात प्रकारके नित्य तर्पणीय पितरोंद्वारा वे तीनों लोकोंकी रक्षा करते हैं)

अध्याय 209

श्लोक 32

चन्द्रसूर्यात्मकं नित्यं यथात्मनिहतात्मकम् ।प्रकाश चाप्रकाशं च निगूढं स्वेन तेजसा

candrasūryātmakaṃ nityaṃ yathātmanihatātmakam | prakāśa cāprakāśaṃ ca nigūḍhaṃ svena tejasā

हिन्दी अर्थ

इन सातोंका समुदाय चन्द्रसूर्यात्मक है अर्थात्‌ उनमेंसे तीन सूर्यस्वरूप और चार चन्द्रस्वरूप हैं। ये यथायोग्य प्रकाश (शुक्लमार्ग) तथा अप्रकाश (धूम या कृष्णमार्ग) रूप हैं, ये कष्ट- साध्य होनेके कारण शरीरकों संकटमें डाले रहते हैं, ये सभी अपने तेज (चिन्मय प्रकाश) -से व्यास हैं

अध्याय 209

श्लोक 33

त्रयस्तु पितरो नित्यं वर्धयन्ति दिवाकरम् ।चतुर्भिः पितृभिश्चैव चन्द्रो वर्धति मण्डले

trayastu pitaro nityaṃ vardhayanti divākaram | caturbhiḥ pitṛbhiścaiva candro vardhati maṇḍale

हिन्दी अर्थ

तीन पितर सदा सूर्यदेवकी वृद्धि करते हैं और चार पितरोंके साथ चन्द्रमा अपने मण्डलमें बढ़ते हैं

अध्याय 209

श्लोक 34

त्रयः पितृगणा नित्यं पिण्डान् पश्चाददन्ति ते ।चत्वारोऽन्ये पितृगणाः सिद्धाः पञ्च क आददे

trayaḥ pitṛgaṇā nityaṃ piṇḍān paścādadanti te | catvāro'nye pitṛgaṇāḥ siddhāḥ pañca ka ādade

हिन्दी अर्थ

तीन पितृगण सदा फलभोगके पश्चात्‌ पिण्डों (स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों )-का संहार करते हैं और चार अन्य पितृगण सिद्धरूप हो पज्नविषय आदि हो जाते हैं, जिन्हें यजमान प्रजापतिने स्वीकार किया है

अध्याय 209

श्लोक 35

त्वमेव पञ्च तान्धर्मांस्त्वमेवापञ्च तान्विभो ।सनातनमयो दिव्यः शाश्वतो ब्रह्मसम्भवः

tvameva pañca tāndharmāṃstvamevāpañca tānvibho | sanātanamayo divyaḥ śāśvato brahmasambhavaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! आप ही उन पाँच धर्मों (पश्लीकृत भूतों ) -को और आप ही अपज्लीकृत भूतोंको प्रकट करते हैं । आप सनातनमय, दिव्य, शाश्वत एवं वेदोंके आविर्भावके स्थान हैं

अध्याय 209

श्लोक 36

यस्मात्त्वत्तेज आदत्ते अग्निर्वायुश्च सर्वशः ।अतस्त्वं कर्मणा तेन आदित्यः समपद्यत

yasmāttvatteja ādatte agnirvāyuśca sarvaśaḥ | atastvaṃ karmaṇā tena ādityaḥ samapadyata

हिन्दी अर्थ

अग्नि और वायु भी सब प्रकारसे आपके ही तेजका आदान (ग्रहण) करते हैं। इसलिये उस आदानरूप कर्मसे आप *आदित्य' कहलाते हैं (आप ही सबके प्रकाशक स्वयं प्रकाशरूप हैं )

अध्याय 209

श्लोक 37

यदादत्सि जगत् सर्वं रश्मिभिः प्रदहन्निव ।युगान्तकाले सम्प्राप्ते परां सिद्धिमुपागतः

yadādatsi jagat sarvaṃ raśmibhiḥ pradahanniva | yugāntakāle samprāpte parāṃ siddhimupāgataḥ

हिन्दी अर्थ

आप युगान्तकाल आनेपर अपनी किरणोंसे सम्पूर्ण जगत्‌को दग्ध करते हुए-से उसका आदान (ग्रहण) करते हैं, इसलिये भी 'आदित्य' कहलाते हैं। आप सदा परम सिद्धिको प्राप्त हैं

अध्याय 209

श्लोक 38

पक्षसन्धावमावास्यां लोकं चरसि मानुषम् ।ऋषिभिः सह गूढात्मा सूर्येन्दुवसुसम्भवैः

pakṣasandhāvamāvāsyāṃ lokaṃ carasi mānuṣam | ṛṣibhiḥ saha gūḍhātmā sūryenduvasusambhavaiḥ

हिन्दी अर्थ

आप अपने स्वरूपको छिपाकर सूर्य, चन्द्रमा और वसुओंसे उत्पन्न हुए ऋषियोंके साथ पूर्णिमा और अमावास्याको (पूर्णमास और दर्श नामक यागोंको ग्रहण करनेके लिये) मनुष्यलोकमें विचरते हैं

अध्याय 209

श्लोक 39

सफलं कर्म कर्तॄणां यजतां पुष्टिवर्धनः ।हेतूनामविकाराय मा भूत् कर्मविपर्ययः

saphalaṃ karma kartṝṇāṃ yajatāṃ puṣṭivardhanaḥ | hetūnāmavikārāya mā bhūt karmaviparyayaḥ

हिन्दी अर्थ

आप सकल कर्म करनेवाले यजमानोंकी पुष्टि (सुख-समृद्धि)-को बढ़ानेवाले हैं । स्वर्ग आदिके साधनभूत जो कर्म हैं उनमें विकृति न हो-वे व्यर्थ न होने पायें और काललोपसे धर्मसम्बन्धी कृत्योंका लोप न हो जाय, इसकी देख-भालके लिये भी आप मनुष्यलोकमें विचरते हैं

अध्याय 209

श्लोक 40

वनस्पत्यौषधीश्चैव युगपत् प्रतिपद्यसे ।बालभावाय वसुधां पक्षे पक्षे जनिस्तव

vanaspatyauṣadhīścaiva yugapat pratipadyase | bālabhāvāya vasudhāṃ pakṣe pakṣe janistava

हिन्दी अर्थ

आप ही अमावास्याको चन्द्रमारूपसे एक ही साथ वनस्पतियों, ओषधियों और वसुधामें वास करते हैं । पुन: बालरूपसे उत्पन्न होनेके लिये ही आप ऐसा करते हैं। प्रत्येक शुक्लपक्षमें आपका नूतन जन्म होता है

अध्याय 209

श्लोक 41

भूतानां भुवि भूतेश भाव्यर्थे वसुधातले ।वसु यद् भुवि किञ्चिच्च सर्वं तत्त्वन्मयं विभो

bhūtānāṃ bhuvi bhūteśa bhāvyarthe vasudhātale | vasu yad bhuvi kiñcicca sarvaṃ tattvanmayaṃ vibho

हिन्दी अर्थ

भूतेश्वर ! विभो! इस भूतलपर भूत और भविष्य प्राणियोंकी पुष्टिके लिये जो कुछ भी धन संचित है, वह सब आपका ही स्वरूप है

अध्याय 209

श्लोक 42

त्वमेव विविधं धर्मं शाश्वतं वसुधातले ।देवयज्ञं मन्त्रवाक्यमात्मयज्ञं समानुषम्

tvameva vividhaṃ dharmaṃ śāśvataṃ vasudhātale | devayajñaṃ mantravākyamātmayajñaṃ samānuṣam

हिन्दी अर्थ

आप ही भूतलपर नाना प्रकारके सनातनधर्म-सम्बन्धी कर्म हैं और आप ही देवयज्ञ, मन्त्रवाक्य, आत्मयज्ञ तथा उसके अधिकारी मनुष्य हैं

अध्याय 209

श्लोक 43

द्विविधः स्वर्गमार्गश्च सूर्यश्चन्द्रश्च निर्मलः ।चन्द्रमाः पितृयानश्च देवयानश्च भास्करः

dvividhaḥ svargamārgaśca sūryaścandraśca nirmalaḥ | candramāḥ pitṛyānaśca devayānaśca bhāskaraḥ

हिन्दी अर्थ

आप ही स्वर्गलोकके द्विविध मार्ग निर्मल सूर्य और चन्द्रमा हैं । इनमें चन्द्रमा पितृयान ( धूममार्ग) हैं और सूर्य देवयान (शुक्लमार्ग) हैं

अध्याय 209

श्लोक 48

त्वमेव वसुधायुक्तो विश्वं चरसि सीमया ।एकीकृत्य गणान्सर्वान् सङ्क्षिप्यामुत्र सम्भवः

tvameva vasudhāyukto viśvaṃ carasi sīmayā | ekīkṛtya gaṇānsarvān saṅkṣipyāmutra sambhavaḥ

श्लोक 48–49 का हिन्दी अर्थ

इस प्रकार नित्य पापरहित, जितेन्द्रिय, शत्रु और मित्रमें समानभावसे स्रेह रखनेवाले तथा सत्कर्मोद्वारा सत्यको प्राप्त हुए मुनिगण जब श्रीहरिकी सेवा कर रहे थे और देवता तथा सिद्ध महर्षि उनकी स्तुति कर रहे थे, उस समय महान्‌ देव श्रीहरिने अपने हयग्रीव नामक विशाल शरीरका स्मरण किया

अध्याय 209

श्लोक 45

एकस्त्वमसि सम्भूतः पुराणपुरुषो विराट् ।अक्षयश्चाप्रमेयश्च कर्मकारकरो वशी

ekastvamasi sambhūtaḥ purāṇapuruṣo virāṭ | akṣayaścāprameyaśca karmakārakaro vaśī

हिन्दी अर्थ

एकमात्र आप पुराणपुरुष ही विराट्रूपमें प्रकट हैं। आप अविनाशी, अप्रमेय, सबको वशमें रखनेवाले और नाना प्रकारकी लीलाएँ करनेवाले हैं

अध्याय 209

श्लोक 46

मूर्तस्तेजसि सम्भूतो वायुः पर्येति खेचरः ।सप्तभी रूपसंस्थानैर्नित्यमावृत्य तिष्ठति

mūrtastejasi sambhūto vāyuḥ paryeti khecaraḥ | saptabhī rūpasaṃsthānairnityamāvṛtya tiṣṭhati

हिन्दी अर्थ

आप ही तेजस्तत्त्वमें 'रूप' होकर प्रकट हुए हैं, (इसीलिये तैजस नेत्रके द्वारा रूपका ग्रहण होता है), आप ही वायु बनकर आकाशमें सब ओर विचरण करते हैं । महत्तत््व, अहंकार और पश्न तन्मात्रा—इन सात रूपसंस्थानोंके द्वारा आप सदा सबको व्याप्त करके स्थित हैं

अध्याय 209

श्लोक 47

साधने चापि निर्वाणे संहारे प्रलये तथा ।धाता धारणकाले च दिशश्चक्षुषि धारिणि

sādhane cāpi nirvāṇe saṃhāre pralaye tathā | dhātā dhāraṇakāle ca diśaścakṣuṣi dhāriṇi

हिन्दी अर्थ

साधनकालमें जीवरूपसे, निर्वाण (कैवल्य मोक्ष )-की अवस्थामें शुद्धरूपसे, दैनिक और ब्राह्म प्रलयमें रुद्ररूपसे तथा धारण (पोषण) कालमें धाता (पालक) विष्णुरूपसे आप ही स्थित हैं । दिशाएँ—वर्णाश्रम-धर्मकी मर्यादाएँ आप ही विषयोंको धारण करनेवाली नेत्र आदि इन्द्रियोंमें इनके अधिष्ठाता चेतनके रूपमें विराजमान हैं

अध्याय 209

श्लोक 48b

सेव्यमानो मुनिगणैर्नित्यं विगतकिल्बिषैः ।कर्मभिः सत्यमापन्नैः समरागैर्जितेन्द्रियैः

sevyamāno munigaṇairnityaṃ vigatakilbiṣaiḥ | karmabhiḥ satyamāpannaiḥ samarāgairjitendriyaiḥ

अध्याय 209

श्लोक 49

स्तूयमानश्च विबुधैः सिद्धैर्मुनिवरैस्तथा ।सस्मार विपुलं देहं हरिर्हयशिरो महान्

stūyamānaśca vibudhaiḥ siddhairmunivaraistathā | sasmāra vipulaṃ dehaṃ harirhayaśiro mahān

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 209

श्लोक 50

कृत्वा वेदमयं रूपं सर्वदेवमयं वपुः ।शिरोमध्ये महादेवो ब्रह्मा तु हृदये स्थितः

kṛtvā vedamayaṃ rūpaṃ sarvadevamayaṃ vapuḥ | śiromadhye mahādevo brahmā tu hṛdaye sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वदेवमय वेदमय रूप धारण करके भगवान्‌ श्रीहरि वहाँ शोभा पाने लगे। उनके मस्तकमें महादेव शिव और हदयमें ब्रह्मा विराजमान थे

अध्याय 209

श्लोक 51

आदित्यरश्मयो बालाश्चक्षुषी शशिभास्करौ ।जङ्घे तु वसवः साध्याः सर्वसन्धिषु देवताः

ādityaraśmayo bālāścakṣuṣī śaśibhāskarau | jaṅghe tu vasavaḥ sādhyāḥ sarvasandhiṣu devatāḥ

हिन्दी अर्थ

सूर्यकी किरणें उनकी रोमावलियाँ थीं। चन्द्रमा और सूर्य उनके नेत्रके स्थानमें प्रकाशित हो रहे थे। उनकी दोनों पिण्डलियोंकी जगह वसु और साध्यगण विराज रहे थे तथा समस्त पंधि-स्थानोंमें देवताओंका वास था

अध्याय 209

श्लोक 52

जिह्वा वैश्वानरो देवः सत्या देवी सरस्वती ।मरुतो वरुणश्चैव जानुदेशे व्यवस्थिताः

jihvā vaiśvānaro devaḥ satyā devī sarasvatī | maruto varuṇaścaiva jānudeśe vyavasthitāḥ

हिन्दी अर्थ

जिह्ठाके स्थानमें अग्रिदेव थे। सत्या (वेदवाणीस्वरूपा) देवी परस्वती उनकी वाणी थी। मरुद्रण और वरुण देवता उनके जानुदेश (घुटनों )-में स्थित थे

अध्याय 209

श्लोक 53

एवं कृत्वा तथा रूपं सुराणामद्भुतं महत् ।असुरं पीडयामास क्रोधाद् रक्तान्तलोचनः

evaṃ kṛtvā tathā rūpaṃ surāṇāmadbhutaṃ mahat | asuraṃ pīḍayāmāsa krodhād raktāntalocanaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार र्वदेवमय महान्‌ एवं अद्भुत रूप धारण करके, जिनके त्रोंके कोये लाल थे, उन भगवान्‌ हयग्रीवने क्रोधपूर्वक उस असुरको दबाया (इससे मधुका मेदा बाहर निकल भाया)

अध्याय 209

श्लोक 54

मधोर्मेदोऽम्बुपूर्णा च पृथिवी समदृश्यत ।प्रमदेव घना चैव शुक्लांशुकनिवासिनी

madhormedo'mbupūrṇā ca pṛthivī samadṛśyata | pramadeva ghanā caiva śuklāṃśukanivāsinī

हिन्दी अर्थ

उस समय मधुके मेदरूपी जलसे भाच्छादित हुई यह सारी पृथ्वी ऐसी दिखायी देती पी, मानो श्रेत रंगकी साड़ी पहने हुए कोई हृष्ट-पुष्ठ पुवती शोभा पा रही हो

अध्याय 209

श्लोक 55

मेदिनीत्येव शब्दश्च लब्धः पृष्ट्या नरोत्तम ।नामासुरसहस्रेण धरण्यां सम्प्रतिष्ठितम्

medinītyeva śabdaśca labdhaḥ pṛṣṭyā narottama | nāmāsurasahasreṇa dharaṇyāṃ sampratiṣṭhitam

हिन्दी अर्थ

नर्त्रेष्ठ! उस मेदके कारण ही पृथ्वीको ' मेदिनी' नाम प्राप्त हुआ। सहस्रों मसुरोंके द्वारा यह नाम भूतलपर प्रतिष्ठित एवं प्रचारित गो गया

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.