Harivamsha Purana
207
अध्याय 207 / 318

Parva 3, Adhyāya 24

15 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ15 श्लोक

अध्याय 207

श्लोक 1

चतुर्षु आश्रमेषु स्थितानां ब्राह्माणानां ब्रह्मणः यज्ञस्थलस्य पुण्यप्रदेशे वस्तुं कामना बलिर्होमाश्च वर्धन्ते अहन्यहनि भारत ।द्विजानां तपसाढ्यानां गृहधर्मेषु तिष्ठताम्

caturṣu āśrameṣu sthitānāṃ brāhmāṇānāṃ brahmaṇaḥ yajñasthalasya puṇyapradeśe vastuṃ kāmanā balirhomāśca vardhante ahanyahani bhārata | dvijānāṃ tapasāḍhyānāṃ gṛhadharmeṣu tiṣṭhatām

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन! तभीसे वे तपोधन ब्रह्मवेत्ता द्विज गृहस्थधर्ममें स्थित हो गये। उनके घरमें प्रतिदिन बलिवैश्वदेव और होम आदि कर्मोका विस्तार होने लगा । राजन्‌! तभीसे उन ब्रह्मवादियोंद्वारा भूतलपर देवप्रतिमाओंकी पूजा भी की जाने लगी

अध्याय 207

श्लोक 2

देवतार्चाश्च पूज्यन्ते तदा प्रभृति भारत ।तेषां ब्रह्मविदां राजन् पृथिव्यां ब्रह्मवादिभिः

devatārcāśca pūjyante tadā prabhṛti bhārata | teṣāṃ brahmavidāṃ rājan pṛthivyāṃ brahmavādibhiḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 207

श्लोक 3

तत्रैव ब्रह्मसदने समे निस्तृणकण्टके ।प्राज्येन्धनतृणे देशे पुण्ये पर्वतरोधसि

tatraiva brahmasadane same nistṛṇakaṇṭake | prājyendhanatṛṇe deśe puṇye parvatarodhasi

श्लोक 3–5 का हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीके निवासस्थानभूत उस पुण्य प्रदेशमें ही पूर्वोक्त पर्वतके समतल तटपर, जहाँ कँटेदार तृणोंका अभाव है तथा ईंधन और घास आदि प्रचुर मात्रामें उपलब्ध होते हैं; भगवान्‌ ब्रह्माका वह यज्ञकर्म देखकर त्रे तपस्याकी कामनावाले महाभाग ब्राह्मण ब्रह्मचर्य- त्रतके पालनमें तत्पर रहकर निवास करने लगे। कुछ ब्राह्मण शुद्ध चित्तसे गृहस्थधर्मके अनुष्ठानमें संलग्न हो त्रहाँ वास करने लगे तथा आकाड्क्षाका परित्याग करनेवाले यतियोंके मनमें भी वहाँ धर्मपूर्वक निवास करनेकी अभिलाषा जाग्रतू हो गयी

अध्याय 207

श्लोक 4

वासं यत्र प्रकुर्वन्ति दृष्ट्वा भगवतः क्रियाम् ।तपोऽर्थिनो महाभागा ब्रह्मचर्यव्रते स्थिताः

vāsaṃ yatra prakurvanti dṛṣṭvā bhagavataḥ kriyām | tapo'rthino mahābhāgā brahmacaryavrate sthitāḥ

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 207

श्लोक 5

गृहस्थधर्मनिरता दानप्राप्तेन चेतसा ।यतयश्चापि काङ्क्षन्ति धर्मेणेह विकाङ्क्षिणः

gṛhasthadharmaniratā dānaprāptena cetasā | yatayaścāpi kāṅkṣanti dharmeṇeha vikāṅkṣiṇaḥ

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 207

श्लोक 6

वन्यैः कर्मफलैश्चैव रता ब्राह्मणपुङ्गवाः ।अग्निहोत्रव्रतस्नाता जितक्रोधाः समाहताः

vanyaiḥ karmaphalaiścaiva ratā brāhmaṇapuṅgavāḥ | agnihotravratasnātā jitakrodhāḥ samāhatāḥ

हिन्दी अर्थ

श्०१५ जो जंगली फल-मूलोंसे जीवन-निर्वाह करते हुए वानप्रस्थोचित कर्म करते थे, अग्रिहोत्रके नियममें निष्णात थे, क्रोधको जीतकर चित्तको एकाग्र रखनेवाले थे, वे ब्राह्मणशिरोमणि भी वहीं रहनेकी इच्छा करने लगे

अध्याय 207

श्लोक 7

दैवयुक्तेन वा युक्ताः कर्मणा ब्रह्मसत्तमाः ।चीरवल्कलसंवीता नियता नियतेन्द्रियाः

daivayuktena vā yuktāḥ karmaṇā brahmasattamāḥ | cīravalkalasaṃvītā niyatā niyatendriyāḥ

श्लोक 7–9 का हिन्दी अर्थ

जो दैवात्‌ प्राप्त हुए (बिना माँगे मिले हुए) अथवा याचनाकर्मसे उपलब्ध हुए अन्नसे जीवन-निर्वाह करते थे, चीर और वल्कल पहनते थे तथा नियमपरायण होकर इन्द्रियोंको संयममें रखते थे, वे श्रेष्ठ ब्राह्मण भी वहीं रहनेकी इच्छा करने लगे। जो कठोर ब्रतका आश्रय ले ब्रह्मचर्यका पालन करते थे, उन्हें भी वहीं रहनेकी इच्छा हुई। राजन्‌! इस विधिसे क्रमश: प्राप्त आश्रमधर्मका पूर्णत: पालन करते हुए जिन लोगोंने प्राचीन ब्रह्मवादी मुनियोंद्वरा आचरणमें लाये हुए पतित्र सनातन वेद-संस्कारको क्रमसे उपलब्ध किया था, वे भी वहीं रहनेकी इच्छा करने लगे

अध्याय 207

श्लोक 8

चरन्तो ब्रह्मचर्यं च व्रतमास्थाय दारुणम् ।अनेन विधिना राजन् कर्मप्राप्तेन सर्वशः

caranto brahmacaryaṃ ca vratamāsthāya dāruṇam | anena vidhinā rājan karmaprāptena sarvaśaḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

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श्लोक 9

क्रमाद्ये वेदसंस्कारं पुण्यं प्राप्ताः सनातनम् ।पूर्वैराचरितं राजन् मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः

kramādye vedasaṃskāraṃ puṇyaṃ prāptāḥ sanātanam | pūrvairācaritaṃ rājan munibhirbrahmavādibhiḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 207

श्लोक 10

नावेदविद्वानागच्छेन्नापि रौद्रं व्रतं चरेत् ।न च त्यागेन गच्छेत गृहधर्मं न च त्यजेत्

nāvedavidvānāgacchennāpi raudraṃ vrataṃ caret | na ca tyāgena gaccheta gṛhadharmaṃ na ca tyajet

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्राप्त किये बिना मनुष्यको (ब्रह्मचर्याश्रमसे ) गृहस्थाश्रममें नहीं आना चाहिये। वह कठोर ब्रत (वानप्रस्थोचित तप) भी न करे। संन्यास-मार्गका भी अवलम्बन न करे और न गृहस्थधर्मका परित्याग ही करे (वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके विवेकपूर्वक ही उसे एक आश्रमका त्याग और दूसरेका ग्रहण करना चाहिये)

अध्याय 207

श्लोक 11

नैव गच्छेत दुःस्थानमप्राप्तो वेदसञ्चयम् ।ऋचश्च सञ्चयः पूर्वः सामगानां च भारत

naiva gaccheta duḥsthānamaprāpto vedasañcayam | ṛcaśca sañcayaḥ pūrvaḥ sāmagānāṃ ca bhārata

हिन्दी अर्थ

भारत ! वैदिक ज्ञानराशिको उपलब्ध किये बिना किसीको, जिसमें स्थिर रहना कठिन है, उस चतुर्थ आश्रममें भी नहीं जाना चाहिये । बहवृचों, सामगों और यजुर्वेदियोंको भी पहले ऋचाओंके ही ज्ञानका संचय करना चाहिये

अध्याय 207

श्लोक 12

ये चापि पुत्रिणो न स्युः श्रुत्यापि प्राप्नुयुः फलम् ।ब्राह्मणास्तपसा श्रान्ता गुरोश्च परिचर्यया

ye cāpi putriṇo na syuḥ śrutyāpi prāpnuyuḥ phalam | brāhmaṇāstapasā śrāntā gurośca paricaryayā

हिन्दी अर्थ

जो लोग पुत्रवान्‌ नहीं हुए हैं अर्थात्‌ जिन्होंने गृहस्थाश्रममें प्रवेश नहीं किया है, वे लोग वेदान्त-श्रवण करके भी उसके फलस्वरूप ज्ञानको प्राप्त कर सकते हैं। तपस्या तथा गुरुकी सेवाका श्रम स्वीकार करनेवाले ब्राह्मण भी वेदान्त-श्रवण करके उसके फलस्वरूप ज्ञानको पा सकते हैं

अध्याय 207

श्लोक 13

यस्य नैव श्रुतं ब्रह्म न गृहीतं विशाम्पते ।काम तं धार्मिको राजा शूद्रकर्माणि कारयेत्

yasya naiva śrutaṃ brahma na gṛhītaṃ viśāmpate | kāma taṃ dhārmiko rājā śūdrakarmāṇi kārayet

हिन्दी अर्थ

प्रजानाथ! जिसने गुरुके मुखसे वेदका श्रवण और उसके ज्ञानको ग्रहण नहीं किया, उस ब्राह्मणसे धर्मात्मा राजा अपनी इच्छाके अनुसार शूद्रोचित कर्म कराये

अध्याय 207

श्लोक 14

अथवा नैव विद्येत यद् ब्रह्म नाद्रियेद् द्विजः ।द्वाभ्यां तु श्रोत्रविषये मनः पूर्वं समाहितम्

athavā naiva vidyeta yad brahma nādriyed dvijaḥ | dvābhyāṃ tu śrotraviṣaye manaḥ pūrvaṃ samāhitam

हिन्दी अर्थ

अथवा यदि द्विज ब्राह्मण होकर भी वेदका आदर न करे तो उसमें ब्राह्मणत्व है ही नहीं । जिसने ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य दोनों अवस्थाओंमें श्रवण करने योग्य धर्म एवं ब्रह्ममें पहलेसे ही ( अध्ययनाध्यापनके समयसे ही) मन एकाग्र किया है, वही ब्राह्मण है (अत: राजाको उसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये)

अध्याय 207

श्लोक 15

एवं सर्वेन्द्रियारम्भान् वेदपूर्वान् समाचरेत् ।ब्राह्मणो भूतिसम्पन्नो य इच्छेद् भूतिमात्मनः

evaṃ sarvendriyārambhān vedapūrvān samācaret | brāhmaṇo bhūtisampanno ya icched bhūtimātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

अतः: जो वैभवसम्पन्न ब्राह्मण अपना कल्याण चाहता हो, वह इस प्रकार सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे आरम्भ होनेवाले कार्योको वेदाध्ययनपूर्वक ही करे

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

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