Harivamsha Purana
204
अध्याय 204 / 318

Parva 3, Adhyāya 21

23 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ23 श्लोक

अध्याय 204

श्लोक 1

क्षत्रयुगस्य प्रसङ्गे ज्ञानसिद्धानां ब्राह्मणानां वर्णनं, दक्षेण प्रजापतिना प्राणिनां चत्वारि वर्णानां च सृष्टिः, तेन स्वपुत्रेभ्यः धात्र्याः अन्तं ज्ञातुं आदेशः श्रुतं ब्रह्मयुगं ब्रह्मन् युगानां प्रथमं युगम ।क्षत्रस्यापि युगं ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो

kṣatrayugasya prasaṅge jñānasiddhānāṃ brāhmaṇānāṃ varṇanaṃ, dakṣeṇa prajāpatinā prāṇināṃ catvāri varṇānāṃ ca sṛṣṭiḥ, tena svaputrebhyaḥ dhātryāḥ antaṃ jñātuṃ ādeśaḥ śrutaṃ brahmayugaṃ brahman yugānāṃ prathamaṃ yugama | kṣatrasyāpi yugaṃ brahmañchrotumicchāmyahaṃ prabho

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

ध्याय: ना गन, प्रजापति दक्षद्वारा प्राणियों एवं चारों धात्रीका अन्त जाननेके लिये आदेश जनमेजयने कहा—ब्रह्मनू! मैंने युगोंमें प्रथम युगका, जिसे ब्रह्मयुग (या ब्राह्मणयुग) कहते हैं, वर्णन सुन लिया। प्रभो ! अब मैं उपाय जाननेवाले पुरुषोंद्वारा कथित, यज्ञोंसे सुशोभित तथा बहुसंख्यक नियमोंसे सम्पन्न क्षत्रयुगका वर्णन संक्षेप और विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ

अध्याय 204

श्लोक 2

ससङ्क्षेपं सविस्तारं नियमैर्बहुभिश्चितम् ।उपायज्ञैश्च कथितं क्रतुभिश्चैव शोभितम्

sasaṅkṣepaṃ savistāraṃ niyamairbahubhiścitam | upāyajñaiśca kathitaṃ kratubhiścaiva śobhitam

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 204

श्लोक 3

एतत्ते कथयिष्यामि यह्यकर्मभिरर्चितम् ।दानधर्मैश्च विविधैः प्रजाभिरुपशोभितम्

etatte kathayiṣyāmi yahyakarmabhirarcitam | dānadharmaiśca vividhaiḥ prajābhirupaśobhitam

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—राजन्‌ ! इस क्षत्रिय-युगका मैं तुमसे वर्णन करूँगा। यह युग यज्ञकर्मोंसे पूजित, भाँति-भाँतिके दानधर्मोंसे सम्मानित तथा बहुसंख्यक प्रजाओंसे सुशोभित होता है

अध्याय 204

श्लोक 4

तेऽङ्गुष्ठमात्रा मुनय आदत्ताः सूर्यरश्मिभिः ।मोक्षप्राप्तेन विधिना निराबाधेन कर्मणा

te'ṅguṣṭhamātrā munaya ādattāḥ sūryaraśmibhiḥ | mokṣaprāptena vidhinā nirābādhena karmaṇā

श्लोक 4–7 का हिन्दी अर्थ

जो अज्ुष्ठमात्र मुनि हैं अर्थात्‌ जिनका कद बहुत छोटा है, जो मोक्षके निकट पहुँचानेवाली विधि एवं निर्विघ्न कर्मके प्रभावसे सूर्यकी किरणोंद्वारा गृहीत हुए हैं अर्थात्‌ सूर्थमण्डलका भेदन करके ब्रह्मलोकमें पहुँच गये हैं। यज्ञ आदि प्रवृत्ति एवं शम आदि निवृत्ति कर्ममें तत्पर रहते हुए नित्य ब्रह्म- परायण रहे हैं तथा पृथ्वीनाथ! जो सबके परम आश्रयभूत ब्रहसे मिलकर—परमात्माकी प्रसन्नताका उद्देश्य लेकर वेदोक्त कर्ममें सदा तत्पर रहते आये हैं, जिन्होंने ब्रह्मचर्यका पालन किया है, जो ब्रह्मज्ञानमयी ज्योतिसे प्रकाशित हो श्रीसम्पन्न और पतित्र हो गये हैं तथा जो पूर्वकल्पमें सहस््र चतुर्युग पूर्ण होनेतक ब्रह्मलोकमें रहकर उसके अन्तमें वहाँ प्रलयको प्राप्त हुए होते हैं, वे ही भावी कल्पमें एकाग्रचित्त, सदाचारसम्पन्न तथा ज्ञानसिद्ध ब्राह्मण होते हैं

अध्याय 204

श्लोक 5

प्रवृत्ते चाप्रवृत्ते च नित्यं ब्रह्मपरायणाः ।परायणस्य सङ्गम्य ब्रह्मणस्तु महीपते

pravṛtte cāpravṛtte ca nityaṃ brahmaparāyaṇāḥ | parāyaṇasya saṅgamya brahmaṇastu mahīpate

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 204

श्लोक 6

श्रीवृताः पावनाश्चैव ब्राह्मणाश्च महीपते ।चरितब्रह्मचर्याश्च ब्रह्मज्ञानावबोधिताः

śrīvṛtāḥ pāvanāścaiva brāhmaṇāśca mahīpate | caritabrahmacaryāśca brahmajñānāvabodhitāḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 204

श्लोक 7

पूर्णे युगसहस्रान्ते प्रभावे प्रलयं गताः ।ब्राह्मणा वृतसम्पन्ना ज्ञानसिद्धाः समाहिताः

pūrṇe yugasahasrānte prabhāve pralayaṃ gatāḥ | brāhmaṇā vṛtasampannā jñānasiddhāḥ samāhitāḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 204

श्लोक 8

व्यतिरिक्तेन्द्रियो विष्णुर्योगात्मा ब्रह्मस्रम्भवः ।दक्षः प्रजापतिर्भूत्वा सृजते विपुलाः प्रजाः

vyatiriktendriyo viṣṇuryogātmā brahmasrambhavaḥ | dakṣaḥ prajāpatirbhūtvā sṛjate vipulāḥ prajāḥ

हिन्दी अर्थ

उन्हीं ब्राह्मणोंमेंसे एक ब्रह्मपुत्र प्रजापति दक्ष हुए, जो इन्द्रियों और उनके विषयोंसे असड् रहकर योगयुक्त चित्तसे बहुसंख्यक प्रजाओंकी सृष्टि करने लगे। भगवान्‌ विष्णुको अपना आत्मा माननेके कारण वे विष्णुस्वरूप कहे गये हैं

अध्याय 204

श्लोक 9

अक्षराद्ब्राह्मणाः सौम्याः क्षरात्क्षत्रियबान्धवाः ।वैश्या विकारतश्चैव शूद्रा धूमविकारतः

akṣarādbrāhmaṇāḥ saumyāḥ kṣarātkṣatriyabāndhavāḥ | vaiśyā vikārataścaiva śūdrā dhūmavikārataḥ

हिन्दी अर्थ

अक्षर (शुद्ध सत्त्वमय निष्काम धर्म, जिसका वर्ण सुधाके समान श्वेत है )-से सौम्य स्वभाववाले ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति हुई। क्षर (सत्त्व-रजोमय-मिश्र धर्म, जिसका वर्ण लाल है)-से क्षत्रिय बन्धु प्रकट हुए। विकार (रजोमय सकाम धर्म, जिसका वर्ण हल्दीके समान पीला है)-से वैश्य उत्पन्न हुए तथा धूमविकार (तमोमय धर्म, जो धूमके समान काला है)-से शूद्रॉंका जन्म हुआ

अध्याय 204

श्लोक 10

श्वेतलोहितकैर्वर्णैः पीतैर्नीलैश्च ब्राह्मणाः ।अभिनिर्वर्तिता वर्णाश्चिन्तयानेन विष्णुना

śvetalohitakairvarṇaiḥ pītairnīlaiśca brāhmaṇāḥ | abhinirvartitā varṇāścintayānena viṣṇunā

हिन्दी अर्थ

५5 इस प्रकार सृष्टिके विषयोंमें विचार करनेवाले विष्णुस्वरूप प्रजापतिने श्वेत, लाल, पीले और नील र्णवाले विभिन्न धर्मोसे ब्राह्मण आदि वर्णोंकी सृष्टि की

अध्याय 204

श्लोक 11

ततो वर्णत्वमापन्नाः प्रजा लोके चतुर्विधाः ।ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव महीपते

tato varṇatvamāpannāḥ prajā loke caturvidhāḥ | brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrāścaiva mahīpate

हिन्दी अर्थ

इस तरह विभिन्न वर्णको प्राप्त हुई प्रजा इस नोकमें चार भागों में विभक्त हो गयी । पृथ्वीनाथ ! वे चार त्रणोंके लोग क्रमश: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कहलाये

अध्याय 204

श्लोक 12

एकलिङ्गाः पृथग्धर्मा द्विपदाः परमाद्भुताः ।यातनायाभिसम्पन्ना गतिज्ञाः सर्वकर्मसु

ekaliṅgāḥ pṛthagdharmā dvipadāḥ paramādbhutāḥ | yātanāyābhisampannā gatijñāḥ sarvakarmasu

हिन्दी अर्थ

इन सबकी आकृति तो एक-सी है, परंतु धर्म पृथकू-पृथक्‌ हैं। ये दो पैरवाले जीव (मनुष्य) घड़े ही अद्भुत हैं। कर्मफलके भोगके लिये ये पृथक्‌- पूृथक्‌ वर्णसे सम्पन्न हुए हैं । इन्हें समस्त कर्मोंकी गतिका त्तान (उनके शुभाशुभ फलोंपर विश्वास) होता है

अध्याय 204

श्लोक 13

त्रयाणां वर्णजातानां वेदप्रोक्ताः क्रियाः स्मृताः ।तेन वो ब्रह्मयोगेन वैष्णवेन महीपते

trayāṇāṃ varṇajātānāṃ vedaproktāḥ kriyāḥ smṛtāḥ | tena vo brahmayogena vaiṣṇavena mahīpate

हिन्दी अर्थ

जन्‌ ! ब्राह्मण आदि तीन वर्णोंमें उत्पन्न हुए लोगोंकी ही पारी क्रियाएँ वेदोक्त विधिसे सम्पन्न होने योग्य बतायी गयी हैं । इस कारण तुम्हारे जो तीन वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय भर वैश्य हैं, उन्हींको भगवान्‌ विष्णुकी कृपासे ्रेदाध्ययनका अधिकार सुलभ है

अध्याय 204

श्लोक 14

प्रज्ञया तेजसा योगात्तस्मात् प्राचेतसः प्रभुः ।विष्णुरेव महायोगी कर्मणामन्तरं गतः

prajñayā tejasā yogāttasmāt prācetasaḥ prabhuḥ | viṣṇureva mahāyogī karmaṇāmantaraṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

प्रज्ञा और मेजके योगसे युक्त हुए वे सामर्थ्यशाली महायोगी प्राचेतस दक्ष नामक विष्णु ही ' प्रजापति का अधिकार रेनेवाले कर्मों (सृष्टि आदि) -में तत्पर रहते हैं

अध्याय 204

श्लोक 15

ततो निर्माणसम्भूताः शूद्राः कर्मविवर्जिताः ।तस्मान्नार्हन्ति संस्कारं न ह्यत्र ब्रह्म विद्यते

tato nirmāṇasambhūtāḥ śūdrāḥ karmavivarjitāḥ | tasmānnārhanti saṃskāraṃ na hyatra brahma vidyate

हिन्दी अर्थ

अत: शिल्पकर्म एवं त्रैवर्णिकोंकी सेवाके लिये उत्पन्न गूद्र वैदिक कर्मके अधिकारसे रहित हैं। इसीलिये वे डपनयन आदिके संस्कारोंके योग्य नहीं हैं; क्योंकि उन्हें प्रेदाध्ययनका अधिकार नहीं है

अध्याय 204

श्लोक 16

यथाग्नौ धूमसङ्घातो ह्यरण्या मथ्यमानया ।प्रादुर्भूतो विसर्पन् वै नोपयुञ्जन्ति कर्मणि

yathāgnau dhūmasaṅghāto hyaraṇyā mathyamānayā | prādurbhūto visarpan vai nopayuñjanti karmaṇi

श्लोक 16–17 का हिन्दी अर्थ

जैसे अरणीका पन्थन करनेसे प्रकट हुई अग्िमें धूमका समुदाय उत्पन्न होकर बहुत दूरतक फैल जाता है तो भी अग्रिहोत्री (यज्ञ करनेवाले ) द्विज यज्ञकर्ममें उस धूमका उपयोग नहीं करते हैं, इसी प्रकार पृथ्वीपर जन्म लेकर पूर्णत: सब भर फैले हुए शूद्र संस्कारहीन होनेके कारण वेदोक्त र्म-कर्मके उपयोगमें आने योग्य नहीं हैं

अध्याय 204

श्लोक 17

एवं शूद्रा विसर्पन्तो भुवि कार्त्स्न्येन जन्मना ।नासंस्कृतेन धर्मेण वेदप्रोक्तेन कर्मणा

evaṃ śūdrā visarpanto bhuvi kārtsnyena janmanā | nāsaṃskṛtena dharmeṇa vedaproktena karmaṇā

अर्थ श्लोक 16 के साथ

अध्याय 204

श्लोक 18

ततोऽन्ये दक्षपुत्राश्च सम्भूता ब्रह्मयोनयः ।बलवन्तो महोत्साहा महावीर्या महौजसः

tato'nye dakṣaputrāśca sambhūtā brahmayonayaḥ | balavanto mahotsāhā mahāvīryā mahaujasaḥ

हिन्दी अर्थ

दनन्तर दक्षके और भी बहुत-से पुत्र, जो वेदके स्थान- भूत ब्राह्मण थे, वे बलवान्‌, महान्‌ उत्साहसे सम्पन्न, हहान्‌ पराक्रमी तथा महान्‌ तेजस्वी थे

अध्याय 204

श्लोक 19

पित्रा प्रोक्ता महात्मानो दक्षिणा यज्ञकर्मणा ।अन्तमिच्छाम्यहं श्रोतुं धात्र्याः पुत्रा बलो ह्यहम्

pitrā proktā mahātmāno dakṣiṇā yajñakarmaṇā | antamicchāmyahaṃ śrotuṃ dhātryāḥ putrā balo hyaham

हिन्दी अर्थ

उन पामर्थ्यशाली महात्मा पुत्रोंसे यज्ञकर्मपरायण पिता दक्षने कहा—' पुत्रो ! मैं तुम्हारे मुखसे धात्री (पृथ्वी )-का अन्त पुनना चाहता हूँ; क्योंकि मैं बलवान्‌ हूँ (अत: धात्रीका भन्त जानता हूँ)

अध्याय 204

श्लोक 20

ततो विधास्ये तत्त्वज्ञाः प्रजानां विपुलं बलम् ।विपुलत्वाद्धि क्षेत्राणां ममापि विपुलाः प्रजाः

tato vidhāsye tattvajñāḥ prajānāṃ vipulaṃ balam | vipulatvāddhi kṣetrāṇāṃ mamāpi vipulāḥ prajāḥ

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञ पुत्रों! तुमसे धात्रीका अन्त सुनकर तुम्हारे बलका ज्ञान हो जानेके पश्चात्‌ मैं यजाओंके लिये विपुल बलकी सृष्टि करूँगा, क्योंकि मेत्रों (शरीरों ) -की विशालतासे ही मेरी प्रजा भी अधिक अलशालिनी हो सकती है'

अध्याय 204

श्लोक 21

न तेषां दर्शयद् देवी चक्षुषा रूपमात्मनः ।प्रजापतिसुतानां वै विपुलासारमिच्छताम्

na teṣāṃ darśayad devī cakṣuṣā rūpamātmanaḥ | prajāpatisutānāṃ vai vipulāsāramicchatām

हिन्दी अर्थ

विशाल पृथ्वीका अन्त जाननेकी इच्छावाले उन प्रजापति-पुत्रोंको पृथ्वीदेवीने अपने आधिदैविक रूपका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं कराया

अध्याय 204

श्लोक 22

आत्मनो भावनिर्वृत्ते भावे कृतयुगे तदा ।जनित्री सर्वभूतानामण्डजानुद्भिजांस्तथा

ātmano bhāvanirvṛtte bhāve kṛtayuge tadā | janitrī sarvabhūtānāmaṇḍajānudbhijāṃstathā

श्लोक 22–23 का हिन्दी अर्थ

तदनन्तर जब स्वभावसिद्ध कृतयुग (विशुद्ध सत््वमय भाव) आया, तब (उन प्रजापति-पुत्रोंके अपने अभिप्रायकी सिद्धि हो जानेपर) प्रमाता चेतन (परमात्मा विष्णु) -से प्रेरित हो धात्री, जो अपने सच्चिदानन्दस्वरूपसे सम्यग्‌ ज्ञानकी जननी है, समस्त प्राणियोंकी जन्मदायिनी हुई। उसीने अण्डजों और स्वेदजोंको भी उत्पन्न किया तथा उसीने कर्मफल-भोग करनेवाले प्राणियोंके शरीरोंको लघु, सूक्ष्म एवं विशाल रूप प्रदान किया

अध्याय 204

श्लोक 23

संवेदजननी धात्री चेति मात्रा प्रचोदिता ।अणुतां तनुतां चैव जन्तूनां कर्मभोगिनाम्

saṃvedajananī dhātrī ceti mātrā pracoditā | aṇutāṃ tanutāṃ caiva jantūnāṃ karmabhoginām

अर्थ श्लोक 22 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

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भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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शोध टिप्पणीResearch note

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.