Harivamsha Purana
202
अध्याय 202 / 318

Parva 3, Adhyāya 19

55 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ55 श्लोक

अध्याय 202

श्लोक 1

योगिनः स्थितिः, तस्य समक्षे भविष्ये प्रकटनीयानां विघ्नरूपाणां ऐश्वर्याणां वर्णनं प्राग्वंशं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण महामुने ।आद्ययोर्युगयोर्ब्रह्मन् ब्रह्मप्राप्तस्य सर्वशः

yoginaḥ sthitiḥ, tasya samakṣe bhaviṣye prakaṭanīyānāṃ vighnarūpāṇāṃ aiśvaryāṇāṃ varṇanaṃ prāgvaṃśaṃ śrotumicchāmi vistareṇa mahāmune | ādyayoryugayorbrahman brahmaprāptasya sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

+ ९९७ $ध्याय: स्स्‍्स्‍्स्‍्स्‍्स्‍्स्‍्स्‍्स्‍सणा आानेवाले विध्वरूप ऐश्वर्योंका वर्णन जनमेजयने कहा—ब्रहानू! महामुने! दोनों आदि युगोंमें ब्रह्मभावको प्राप्त हुए योगी ब्रह्माकी पहले जो क्रार्य-संतति रही है, उसका मैं पूर्णत: विस्तारके साथ वर्णन सुनना चाहता हूँ

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श्लोक 2

शृणु विस्तरशः सर्वं यन्मां पृच्छसि मेधया ।उपपन्नेन मनसा दैवप्रत्ययसाधिना

śṛṇu vistaraśaḥ sarvaṃ yanmāṃ pṛcchasi medhayā | upapannena manasā daivapratyayasādhinā

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—राजन्‌! तुम बुद्धिके द्वारा पुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब दिव्य ज्ञानकी ग्राप्तिकि साधनमें लगे हुए अपने योगयुक्त मनके द्वारा विस्तारपूर्वक सुनो

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श्लोक 3

ऋद्धि प्राप्तस्तु भगवान् योगात्मा ब्रह्मसम्भवः ।भूतानां बहुलत्वं च चकारेहेश्वरः प्रभुः

ṛddhi prāptastu bhagavān yogātmā brahmasambhavaḥ | bhūtānāṃ bahulatvaṃ ca cakāreheśvaraḥ prabhuḥ

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

भारत! जिनका मन योगमें लगा हुआ था, जो साक्षात्‌ परब्रह्म परमात्मासे उत्पन्न हुए थे, जिनमें करने, न करने और अन्यथा करनेकी शक्ति दे तथा जो अत्यन्त प्रभावशाली हैं, वे भगवान्‌ ब्रह्मा जब पमृद्धिको प्राप्त होकर दूँठकी भाँति अविचल भावसे प्रह्मासनपर विराजमान हुए, उस समय सहसा रजोगुणने डन्हें विक्षित कर दिया। अतः: उन्होंने सृष्टि-रचनाद्वारा यहाँ भूतोंका बाहुल्य (विस्तार) किया

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श्लोक 4

स्थितो ब्रह्मासने ब्रह्मा विक्षिप्तः सहसा प्रभुः ।अचलेनैव भावेन स्थाणुभूतेन भारत

sthito brahmāsane brahmā vikṣiptaḥ sahasā prabhuḥ | acalenaiva bhāvena sthāṇubhūtena bhārata

अर्थ श्लोक 3 के साथ

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श्लोक 5

रक्तश्च मोक्षविषये स च ज्ञानमये पदे ।यस्मात् पदसहस्राणि प्रभवन्ति भवन्ति च

raktaśca mokṣaviṣaye sa ca jñānamaye pade | yasmāt padasahasrāṇi prabhavanti bhavanti ca

हिन्दी अर्थ

वे मोक्ष डी जिसका लक्ष्य है, उस ज्ञानमय पदमें अनुरक्त थे, जिससे सहस्रों सामर्थ्यशाली पद प्रकट होते हैं (जैसे पौभरि अथवा कर्दम ऋषिने अपनी योगशक्तिके प्रभावसे अनेकानेक वस्तुओंकी रचना की थी।)

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श्लोक 6

ब्रह्मयज्ञं तु यजते योगाद् वेदात्मकं सदा ।ब्रह्मणो विपुलं ज्ञानमैश्वर्यं च प्रवर्तते

brahmayajñaṃ tu yajate yogād vedātmakaṃ sadā | brahmaṇo vipulaṃ jñānamaiśvaryaṃ ca pravartate

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजी पोगयुक्त हो सदा वेदात्मक ब्रह्मयज्ञका अनुष्ठान करते हैं ( अथवा वेदप्रतिपाद्य ब्रह्मरूप यज्ञ-विष्णुका यजन करते हैं ), इसलिये उस योग एवं यजनके प्रभावसे उन्हें वपुल ज्ञान और एऐश्र्य प्राप्त हो जाता है

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श्लोक 7

ततः प्रथममैश्वर्यं युञ्जानेन प्रवर्तितम् ।ब्रह्मणा ब्रह्मभूतेन भूतानां हितमिच्छता

tataḥ prathamamaiśvaryaṃ yuñjānena pravartitam | brahmaṇā brahmabhūtena bhūtānāṃ hitamicchatā

हिन्दी अर्थ

फिर पोगयुक्त एवं ब्रह्मभूत हुए ब्रह्माने समस्त प्राणियोंके हेतकी इच्छा रखकर उस प्रथम प्राप्त हुए ऐश्वर्यका इन्हीं की भलाईके लिये उपयोग किया

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श्लोक 8

तदा त्वाकाशमैश्वर्यं युञ्जानस्य प्रवर्तते ।ब्रह्मणो ब्रह्मभूतस्य निर्विकारेण कर्मणा

tadā tvākāśamaiśvaryaṃ yuñjānasya pravartate | brahmaṇo brahmabhūtasya nirvikāreṇa karmaṇā

हिन्दी अर्थ

उस नर्विकार (परम शुद्ध) कर्मद्वारा योगपरायण ब्रह्मीभूत ्रह्माको उस समय आकाशस्वरूप ( अव्याकृत) ऐश्वर्य पाप्त हुआ

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श्लोक 9

तदान्तरिक्षं सम्प्राप्तं निर्मलं ब्रह्म चाव्ययम् ।संहारः सर्वभूतानां नराणां ब्रह्मवादिनाम् ।ध्रुवमैश्वर्ययोगानां प्रतिपद्यन्ति देहिनः

tadāntarikṣaṃ samprāptaṃ nirmalaṃ brahma cāvyayam | saṃhāraḥ sarvabhūtānāṃ narāṇāṃ brahmavādinām | dhruvamaiśvaryayogānāṃ pratipadyanti dehinaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय उनकी दृष्टिमें सारा आकाश नर्मल एवं अविनाशी ब्रह्मभावको प्राप्त हो गया। उस भवस्थामें समस्त ज्ञानवान्‌ मनुष्य यह जान लेते हैं के समस्त प्राणियों, मनुष्यों तथा ऐश्वर्ययुक्त ब्रह्मवादी पोगियोंका भी लयस्थान कूटस्थ ब्रह्म ही है

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श्लोक 10

आकाशैश्वर्यभूतेन संयुगे ब्रह्मवादिना ।प्रवर्तमानमैश्वर्यं वायुभूतं करोति च ।विकारैर्बहुभिः प्राप्तैः सम्पतद्भिर्महाबलैः

ākāśaiśvaryabhūtena saṃyuge brahmavādinā | pravartamānamaiśvaryaṃ vāyubhūtaṃ karoti ca | vikārairbahubhiḥ prāptaiḥ sampatadbhirmahābalaiḥ

हिन्दी अर्थ

उस योगयज्में संलग्न हो आकाशरूप अथवा अव्याकृत ऐश्वर्यको प्राप्त हुए ब्रह्मवादी ब्रह्माके रूपमें प्रवृत्तिरायण हुआ ब्रह्म सब ओरसे आकर प्राप्त होनेवाले बहुसंख्यक महाबली विकारोंके साथ वायुरूप अथवा व्याकृत ऐश्वर्यको प्रकट करता है

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श्लोक 11

एतैर्विकारैः संवृत्तैर्निरुद्धैश्च समन्ततः ।ध्रुवमैश्वर्यमापन्नः सिद्धो भवति ब्राह्मणः

etairvikāraiḥ saṃvṛttairniruddhaiśca samantataḥ | dhruvamaiśvaryamāpannaḥ siddho bhavati brāhmaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

इन प्राप्त होनेवाले समस्त विकारोंके सब ओरसे अवरुद्ध हो जानेपर सिद्ध हुआ ब्रह्मवेत्ता योगी ध्रुव ऐश्वर्य (कूटस्थ-ब्रह्म)-को प्राप्त हो जाता है

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श्लोक 12

शरीरादभिनिष्क्रम्य आकाशेन प्रधावति ।निरालम्बो निरालम्बान्नालम्ब्य मनसा ततः

śarīrādabhiniṣkramya ākāśena pradhāvati | nirālambo nirālambānnālambya manasā tataḥ

श्लोक 12–13 का हिन्दी अर्थ

वह सिद्ध योगी शरीरसे निकलकर बिना किसी अवलम्बके आकाशमें दौड़ता है, स्वप्रसदृश मन:कल्पित निरालम्ब भावोंका आश्रय लेकर वहाँ विचरता है। ब्रह्मैधचर्यसे सम्पन्न हुए उस भूतात्मा योगीको आकाशमें विचरते समय इन्द्र-जैसे लोग भी अपने बहुसंख्यक नेत्रोंद्वारा भी नहीं देख पाते हैं

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श्लोक 13

ऐश्वर्यभूतो भूतात्मा चरन् दिवि न दृश्यते ।चक्षुर्भिर्बहुभिर्लोकैः पुरन्दरसमैरपि

aiśvaryabhūto bhūtātmā caran divi na dṛśyate | cakṣurbhirbahubhirlokaiḥ purandarasamairapi

अर्थ श्लोक 12 के साथ

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श्लोक 14

ओङ्कारं ये त्वधीयन्ते मनसा ब्रह्मसत्तमाः ।विमुक्ताः सर्वकर्मभ्यस्ते तं पश्यन्ति साधवः

oṅkāraṃ ye tvadhīyante manasā brahmasattamāḥ | vimuktāḥ sarvakarmabhyaste taṃ paśyanti sādhavaḥ

हिन्दी अर्थ

जो ब्राह्मणशिरोमणि साधु मनके द्वारा 3£कारका चिन्तन करते हैं, वे ही समस्त कर्मोके बन्धनसे मुक्त हो उस (ब्रह्मीभूत आकाशचारी) योगीका दर्शन कर पाते हैं

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श्लोक 15

एतद्धि परमं ब्रह्म ब्राह्मणानां मनीषिणाम् ।अन्तश्चरति भूतानां विद्धि चेतनया सह

etaddhi paramaṃ brahma brāhmaṇānāṃ manīṣiṇām | antaścarati bhūtānāṃ viddhi cetanayā saha

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! यह 3ऊकार प्रणवसंज्ञक परब्रह्म है, जो मनीषी ब्राह्मणोंके चिन्तनका विषय है। वह प्रणववाच्य परब्रह्म परमात्मा समस्त प्राणियोंके भीतर उनकी चेतनाके साथ विचरता है, ऐसा जानो

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श्लोक 16

एष शब्दो महानादः पुराणो ब्रह्मसम्भवः ।वायुभूतोऽक्षरं प्राप्तो वदन्त्येवं द्विजातयः

eṣa śabdo mahānādaḥ purāṇo brahmasambhavaḥ | vāyubhūto'kṣaraṃ prāpto vadantyevaṃ dvijātayaḥ

हिन्दी अर्थ

यह 3#कार समस्त वर्णोंका अभिव्यज्क होनेसे महानाद है, पुराण अर्थात्‌ नित्य है, इसका अवलम्बन करनेसे साधककी ब्रह्मके साथ एकता हो जाती है। यह वायुभूत होकर अक्षरभावको प्रा हुआ है—ऐसा द्विजाति (ब्राह्मण) कहते हैं

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श्लोक 17

अरूपी रूपसम्पन्नो धातुभिः सह सङ्गतः ।अन्तश्चरति भूतेषु कामकारकरो वशी

arūpī rūpasampanno dhātubhiḥ saha saṅgataḥ | antaścarati bhūteṣu kāmakārakaro vaśī

हिन्दी अर्थ

यह प्रणव रूपरहित होकर भी तेज, जल और अन्न—इन तीन धातुओंसे संयुक्त हो* रूपसे सम्पन्न (अर्थात्‌ वैखरी वाणीके रूपमें प्रकट) होता है । यही जीवात्मारूपसे समस्त प्राणियोंके भीतर विचरता, इच्छानुसार काम करता और समस्त इन्द्रियोंको अपने वशमें रखता है

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श्लोक 18

एतत् पूर्वमनुध्याय मनसाऽऽपूरयन्निव ।वेदात्मकं तदा यज्ञं चिन्तयन्तो मनीषिणः

etat pūrvamanudhyāya manasā''pūrayanniva | vedātmakaṃ tadā yajñaṃ cintayanto manīṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें इस प्रणवका शास्त्र और आचार्यसे उपदेश पाकर इसके निरन्तर चिन्तनपूर्वक वेदात्मक यज्ञ (योग)-की भावना करते हुए मनीषी पुरुषोंने अपने मनके द्वारा सबको व्याप्त कर लिया था

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श्लोक 19

ब्राह्मणाः शुचयो दान्ता यशोयुञ्जस्तदन्वयाः ।ब्रह्मलोकं काङ्क्षमाणा वैष्णवं पदमुत्तमम्

brāhmaṇāḥ śucayo dāntā yaśoyuñjastadanvayāḥ | brahmalokaṃ kāṅkṣamāṇā vaiṣṇavaṃ padamuttamam

श्लोक 19–20 का हिन्दी अर्थ

एण:, तेजोमयी वाकू (मन अन्नमय, प्राण जलमय तथा वाक्‌ मारुतम्‌' इत्यादि शिक्षाके वचनसे शब्दकी उत्पत्तिमें मन और तीन धातुओंके सहयोगसे ही शब्द प्रकट होता है। यश:स्वरूप ब्रह्मसे युक्त तथा उस ब्रहसे ही प्रकट हुए पवित्र जितेन्द्रिय ब्राह्मण ब्रह्मललोक एवं उत्तम वैष्णवपदकी इच्छा रखकर उस पदकी प्राप्तिके लिये ही निश्चिन्तभावसे सारी क्रियाएँ करते हैं। भारत ! ये पुनर्जन्म ग्रहण करनेके लिये नहीं संसारमें आना चाहते हैं, अपितु जानकी प्राप्तिक लिये ही यहाँ जन्म पानेकी इच्छा करते हैं

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श्लोक 20

पदहेतोः क्रियाः सर्वाः कुर्वन्ति विगतज्वराः ।न ह्येते प्रसवादाने भवमिच्छन्ति भारत

padahetoḥ kriyāḥ sarvāḥ kurvanti vigatajvarāḥ | na hyete prasavādāne bhavamicchanti bhārata

अर्थ श्लोक 19 के साथ

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श्लोक 21

त्रिभिर्माल्योपहारैश्च प्रतिभावैश्च वै द्विजाः ।यजन्ति परमात्मानं विष्णुं सत्यपराक्रमम्

tribhirmālyopahāraiśca pratibhāvaiśca vai dvijāḥ | yajanti paramātmānaṃ viṣṇuṃ satyaparākramam

हिन्दी अर्थ

वे द्विजगण (प्रातः, मध्याह् और सायंकालमें) तीन बार माल्योपहार समर्पण तथा प्रतिभाव ( ध्यान)- के द्वारा उन सत्यपराक्रमी परमात्मा श्रीविष्णुका यजन करते हैं

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श्लोक 22

यजनं विक्रमं चैव ब्रह्मपूर्वाः प्रचक्रिरे ।ब्रह्मापि वैष्णवं तेजो वेदोक्तैर्वचनैर्नृप

yajanaṃ vikramaṃ caiva brahmapūrvāḥ pracakrire | brahmāpi vaiṣṇavaṃ tejo vedoktairvacanairnṛpa

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! वेदको ही प्रमुख प्रमाण मानते हुए उन ब्रह्मवेत्ता योगियोंने यजन (योगाभ्यास) और विक्रम (योगैश्चर्यलाभ) किया वेदोक्त * वचनोंके अनुसार ब्रह्मवेत्ता योगी भी वैष्णवतेज (ब्रह्म) ही है

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श्लोक 23

ब्राह्मणैर्ब्रह्मविद्भिश्च ब्रह्मज्ञैर्ब्रह्मवादिभिः ।शुचिभिः कर्मनिर्मुक्तैः सत्यव्रतपरायणैः

brāhmaṇairbrahmavidbhiśca brahmajñairbrahmavādibhiḥ | śucibhiḥ karmanirmuktaiḥ satyavrataparāyaṇaiḥ

श्लोक 23–26 का हिन्दी अर्थ

जो ब्रह्मवेत्ता, ब्रह्मज़, ब्रह्मवादी, कर्मोके बन्धनसे मुक्त, पवित्र एवं सत्यव्रतपरायण ब्राह्मण हैं, वे ही तेज, जल और अन्नरूप धातुओंसे मोक्षकालमें उस परमात्मस्वरूप महात्माका दर्शन करते हैं । वह परमात्मा ही परब्रह्म है, वही परम अद्भुत वैष्णव तेज है तथा वही रसात्मक (परमानन्दस्वरूप) ऐश्वर्य है। पूर्वोक्त विकारोंका विलय हो जानेपर ही उसका दर्शन होता है। भयंकर रूपवाले जो तामस विकार हैं, वे उस महात्मा योगीको व्यधित करते हैं। वे विकार उसे अत्यन्त जलसे आच्छादित करके घबराहटमें डाल देते हैं। वह क्षुब्ध एवं अचेत हो जाता है। बहुत-सी लहरें उसे आच्छादित कर लेती हैं, उनमेंसे कुछ तो शीतल होती हैं और कुछ उष्ण; इस प्रकार वह विकारग्रस्त हो जाता है

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श्लोक 24

धातुभिर्मोक्षकाले च महात्मा सम्प्रदृश्यते ।तदेव परमं ब्रह्म वैष्णवं परमाद्भुतम्

dhātubhirmokṣakāle ca mahātmā sampradṛśyate | tadeva paramaṃ brahma vaiṣṇavaṃ paramādbhutam

अर्थ श्लोक 23 के साथ

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श्लोक 25

रसात्मकं तदैश्वर्यं विकारान्ते प्रदृश्यते ।घोररूपा विकारास्ते व्यथयन्ति महात्मनः

rasātmakaṃ tadaiśvaryaṃ vikārānte pradṛśyate | ghorarūpā vikārāste vyathayanti mahātmanaḥ

अर्थ श्लोक 23 के साथ

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श्लोक 26

सञ्छाद्यातीव तोयेन क्षुभ्यमाणो विचेतनः ।ऊर्मिभिश्छाद्यते चैव शीतोष्णाभिर्विकारतः

sañchādyātīva toyena kṣubhyamāṇo vicetanaḥ | ūrmibhiśchādyate caiva śītoṣṇābhirvikārataḥ

अर्थ श्लोक 23 के साथ

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श्लोक 27

महार्णवगतश्चैव दह्यते न च मज्जते ।मग्नश्चैव महानद्याः सलिले नैव सीदति

mahārṇavagataścaiva dahyate na ca majjate | magnaścaiva mahānadyāḥ salile naiva sīdati

श्लोक 27–28 का हिन्दी अर्थ

वह महासागरमें पड़कर दग्ध होने लगता है, किंतु उसमें डूबता नहीं है। कभी-कभी महानदीके जलमें डूब जाता है, परंतु जलके भीतर वह अधिक कष्ट नहीं पाता है और कभी-कभी जब वह जलमें कष्ट पाता है, तब उसे बलपूर्वक अधिक शीतल जलमें गिरा दिया जाता है। आसन और आच्छादनसे भी वद्चित होकर वह अचेत- सा हो जाता है

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श्लोक 28

सीदमानश्च सलिले स शीते पात्यते बलात् ।व्यसनाच्छादनाच्चैव मुच्यमानो विचेतनः

sīdamānaśca salile sa śīte pātyate balāt | vyasanācchādanāccaiva mucyamāno vicetanaḥ

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 202

श्लोक 29

श्वभ्रे प्रपद्यमानश्च तोयेन परिषिच्यते ।शुक्लवर्णेन बहुना स्रोतसा मूर्ध्नि सर्वशः

śvabhre prapadyamānaśca toyena pariṣicyate | śuklavarṇena bahunā srotasā mūrdhni sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

कभी गड़्ढेमें गिरकर जलसे भीग जाता है। उसके मस्तकपर चारों ओरसे जलके बहुत-से श्वेत प्रवाह गिरने लगते हैं

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श्लोक 30

ऊर्ध्वं ज्योतिरवेक्षंश्च शुक्लैः पीतैश्च बाध्यते ।वारिदपूर्णैः सुगम्भीरैर्विद्युद्भिरिव भासितैः

ūrdhvaṃ jyotiravekṣaṃśca śuklaiḥ pītaiśca bādhyate | vāridapūrṇaiḥ sugambhīrairvidyudbhiriva bhāsitaiḥ

हिन्दी अर्थ

ही ब्रह्मको प्राप्त होता है।)' इत्यादि वचन ही ब्रह्मवेत्ताके वह ऊपर ज्योतिका दर्शन करता है और जलसे भरे हुए अत्यन्त गम्भीर श्वेत और पीत रंगके बादल जो बिजलियोंसे उद्धासित-से होते रहते हैं, उसे पग-पगपर बाधा देने लगते हैं

अध्याय 202

श्लोक 31

एतैर्विकारैः संवृत्तैनिर्रुद्धैश्चैव सर्वशः ।ध्रुवमैश्वर्यमासाद्य सिद्धो भवति ब्राह्मणः

etairvikāraiḥ saṃvṛttainirruddhaiścaiva sarvaśaḥ | dhruvamaiśvaryamāsādya siddho bhavati brāhmaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

इन विकारोंके प्राप्त होने और सब प्रकारसे इनका निरोध हो जानेपर अटल ब्रहौश्चर्यको पाकर वह ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता योगी) सिद्ध हो जाता है

अध्याय 202

श्लोक 32

रसात्मकं तदैश्वर्यं जिह्वाग्रादभिनिःसृतम् ।सहस्रधारं विततं मेघत्वं समुपागतम्

rasātmakaṃ tadaiśvaryaṃ jihvāgrādabhiniḥsṛtam | sahasradhāraṃ vitataṃ meghatvaṃ samupāgatam

हिन्दी अर्थ

उसके रसास्वादसे अनेक प्रकारका रसात्मक ऐश्वर्य प्रकट होता है, जो सहस््र धाराओंमें फैलकर मेघरूपमें परिणत हो जाता है

अध्याय 202

श्लोक 33

रसांश्च विविधान् योगात् संसिद्धः सृजते प्रभुः ।धात्वर्थं सर्वभूतानां योगप्राप्तेन हेतुना

rasāṃśca vividhān yogāt saṃsiddhaḥ sṛjate prabhuḥ | dhātvarthaṃ sarvabhūtānāṃ yogaprāptena hetunā

हिन्दी अर्थ

वह सामर्थ्यशाली सिद्ध योगी योगसे नाना प्रकारके रसोंकी सृष्टि करता है तथा योगप्राप्त-हेतुसे समस्त प्राणियोंके शरीरके उपयोगके लिये विविध ऐश्वर्यको प्रकट करता है

अध्याय 202

श्लोक 34

तेजसो रूपमैश्वर्यं विकारैः सह वर्धते ।आत्मनो विघ्नजननं स्वस्थो ब्राह्मणकारणे

tejaso rūpamaiśvaryaṃ vikāraiḥ saha vardhate | ātmano vighnajananaṃ svastho brāhmaṇakāraṇe

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मवेत्ता योगीके मोक्षसाधन योगमें उसके स्वस्थ आत्माके समक्ष विघ्न उपस्थित करनेके लिये तैजस रूपैथर्य प्रकट होकर अपने विकारोंके साथ वृद्धिको प्राप्त होता है

अध्याय 202

श्लोक 35

उप्ररूपैर्विरूपैश्च हन्यते दण्डपाणिभिः ।घोररूपैः सुगम्भीरैः पिङ्गाक्षैर्नरविग्रहैः

uprarūpairvirūpaiśca hanyate daṇḍapāṇibhiḥ | ghorarūpaiḥ sugambhīraiḥ piṅgākṣairnaravigrahaiḥ

हिन्दी अर्थ

उग्र, घोर एवं विकराल रूपवाले, गम्भीर एवं पिड्ल-नेत्रोंसे युक्त नराकार प्राणी हाथमें डंडे लेकर उस योगीको पीटने लगते हैं

अध्याय 202

श्लोक 36

नेत्रं समुद्धरन् भीमो जिह्वाग्रं चास्य विन्दति ।नदन्ति युगपन्नादं जृम्भमाणाः पुनः पुनः

netraṃ samuddharan bhīmo jihvāgraṃ cāsya vindati | nadanti yugapannādaṃ jṛmbhamāṇāḥ punaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

कोई भयानक पुरुष उसके नेत्र उखाड़ने लगता है, कोई उसकी जिह्वाके टुकड़े-टुकड़े कर डालता है तथा बहुत-से विप्नकारी पुरुष बारम्बार जँभाई लेते हुए एक साथ जोर-जोरसे कोलाहल करने लगते हैं

अध्याय 202

श्लोक 37

पुनरेव तदा भूत्वा बहुरूपास्तदाभवन् ।नृत्यमानाः प्रगायन्ति तर्पयन्तो विशेषतः

punareva tadā bhūtvā bahurūpāstadābhavan | nṛtyamānāḥ pragāyanti tarpayanto viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

फिर वे तत्काल ही बहुत-से रूप धारण कर लेते हैं और उस योगी पुरुषको विशेष संतुष्ट करनेके लिये नाचने-गाने लगते हैं

अध्याय 202

श्लोक 38

स्त्रीभूताश्च ततः सर्वे युञ्जानाश्चावलम्बिरे ।कण्ठेऽस्य बहुरूपत्वाद् विघ्नैश्चैव प्रलोभयन्

strībhūtāśca tataḥ sarve yuñjānāścāvalambire | kaṇṭhe'sya bahurūpatvād vighnaiścaiva pralobhayan

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ वे सब-के-सब स्त्रियोंके रूप धारणकर योगीसे संयुक्त हो जाते और उसके गलेमें लिपटने या लटकने लगते हैं । वे अनेक रूप धारण करनेके कारण उसे नाना विश्वोंद्वारा ही प्रलोभनमें डालते हैं

अध्याय 202

श्लोक 39

मधुरैरभिधानैश्च व्याहरन्ति न भीतवत् ।पतन्ति युगपत् सर्वे पादयोर्मूर्धभिर्युताः

madhurairabhidhānaiśca vyāharanti na bhītavat | patanti yugapat sarve pādayormūrdhabhiryutāḥ

हिन्दी अर्थ

वे स्त्रीरूपधारी विश्न निडर-से होकर मधुरवाणीमें नाम ले-लेकर उसे पुकारते हैं और सभी एक साथ योगीके चरणोंमें मस्तक रखकर उसे प्रणाम करते हैं

अध्याय 202

श्लोक 40

प्रसादं काङ्क्षमाणाश्च योगस्यान्तरविघ्नतः ।बहुप्रकारं कथयन् नृत्यन्ति च तरन्ति च

prasādaṃ kāṅkṣamāṇāśca yogasyāntaravighnataḥ | bahuprakāraṃ kathayan nṛtyanti ca taranti ca

हिन्दी अर्थ

वे योगमें विप्न उपस्थित करनेके लिये ही उस योगीका कृपाप्रसाद चाहते हैं । उससे अनेक प्रकारकी बातें करते और नाचते हैं। ऐसा करके वे कभी-कभी योगीको जीत भी लेते हैं

अध्याय 202

श्लोक 41

एतैर्विकारैः संवृत्तैर्निरुद्धैश्चैव सर्वशः ।भुवमैश्वर्यमासाद्य सिद्धो भवति ब्राह्मणः

etairvikāraiḥ saṃvṛttairniruddhaiścaiva sarvaśaḥ | bhuvamaiśvaryamāsādya siddho bhavati brāhmaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

इन विकारोंके प्राप्त होने और इन सबका पूर्णरूपसे निरोध हो जानेपर अटल एऐश्र्यको पाकर वह ब्रह्मवेत्ता योगी सिद्ध हो जाता है

अध्याय 202

श्लोक 42

तदर्चिष इवाग्नेया आदित्यस्येव रश्मयः ।तेजोरूपकमैश्वर्यं जनितास्तेजबिन्दवः

tadarciṣa ivāgneyā ādityasyeva raśmayaḥ | tejorūpakamaiśvaryaṃ janitāstejabindavaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर अग्िकी लपटों और सूर्यकी किरणोंके समान उसे तेजोरूप ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। फिर तो उसके शरीरसे तेजोबिन्दु प्रकट होने लगती हैं

अध्याय 202

श्लोक 43

ज्योतींषि चैव संवृत्ता आकाशे गुणसंवृताः ।चरन्ति लोके सततं सूर्याचन्द्रमसोर्गतिम्

jyotīṃṣi caiva saṃvṛttā ākāśe guṇasaṃvṛtāḥ | caranti loke satataṃ sūryācandramasorgatim

हिन्दी अर्थ

सत्त्वादि गुणोंसे घिरे हुए वे योगी आकाशमें ज्योति: - स्वरूप होकर लोकमें सदा ही चन्द्रमा और सूर्यके मार्गपर विचरते हैं

अध्याय 202

श्लोक 44

चन्द्रसूर्यात्मकं दिव्यं ज्योतिः सघनमुत्तमम् ।एतद् विभ्राजते लोके कालचक्रं ध्रुवं वरम्

candrasūryātmakaṃ divyaṃ jyotiḥ saghanamuttamam | etad vibhrājate loke kālacakraṃ dhruvaṃ varam

हिन्दी अर्थ

चन्द्र-सूर्यस्वरूप होकर मेघमण्डलसहित उत्तम दिव्य ज्योति कालचक्र एवं श्रेष्ठ ध्रुवस्थानमें विचरता हुआ वह वही-वही रूप धारण करके इस लोकमें प्रकाशित होता है

अध्याय 202

श्लोक 45

अर्धमासाश्च मासाश्च ऋतुसंवत्सराण्यथ ।क्षणा लवा मुहूर्ताश्च कलाः काष्ठास्तथैव च

ardhamāsāśca māsāśca ṛtusaṃvatsarāṇyatha | kṣaṇā lavā muhūrtāśca kalāḥ kāṣṭhāstathaiva ca

श्लोक 45–46 का हिन्दी अर्थ

यह योगी ही पक्ष, मास, ऋतु, संवत्सर, क्षण, लव, मुहूर्त, कला, काष्ठा, दिन-रात्रिका प्रमाण, निमेष, उन्मेष, ताराओं तथा विशेषतः ग्रहोंकी गति इत्यादि सब कुछ हो जाता है

अध्याय 202

श्लोक 46

अहोरात्रप्रमाणं च निमिषोन्मेषणं तथा ।ताराणां गतयश्चैव ग्रहाणां च विशेषतः

ahorātrapramāṇaṃ ca nimiṣonmeṣaṇaṃ tathā | tārāṇāṃ gatayaścaiva grahāṇāṃ ca viśeṣataḥ

अर्थ श्लोक 45 के साथ

अध्याय 202

श्लोक 47

अथ पार्थिवमैश्वर्यं विकारग्रहसम्भवम् ।योगयुक्तास्त्वभिग्रस्ताः पात्यन्ते ह्यचलासनात्

atha pārthivamaiśvaryaṃ vikāragrahasambhavam | yogayuktāstvabhigrastāḥ pātyante hyacalāsanāt

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर विकारोंको स्वीकार करनेके कारण योगीको पार्थिव ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है, उससे ग्रस्त हुए योगी सिद्धिकि अविचल सिंहासनसे नीचे गिरा दिये जाते हैं

अध्याय 202

श्लोक 48

अलोभाच्छिद्यते सद्यो वेपमानोऽनुकीर्त्यते ।सीदते वसुधामध्ये भिद्यमानः पुनः पुनः

alobhācchidyate sadyo vepamāno'nukīrtyate | sīdate vasudhāmadhye bhidyamānaḥ punaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

लोभका त्याग करनेसे वह विज्नस्वरूप ऐश्वर्य तत्काल छिन्न-भिन्न हो जाता है; विघ्नसे काँपने और डरनेवाला योगी जगतमें निन्दनीय होता है। वह भूमण्डलमें बारम्बार विश्नोंसे आहत होकर कष्ट पाता रहता है

अध्याय 202

श्लोक 49

भूतानां बहुरूपैश्च अन्यैश्च तलवासिभिः ।विषयैर्युज्यते क्षिप्रं सङ्क्षेपात् समवरुद्ध्यते

bhūtānāṃ bahurūpaiśca anyaiśca talavāsibhiḥ | viṣayairyujyate kṣipraṃ saṅkṣepāt samavaruddhyate

हिन्दी अर्थ

प्राणियों के बहुत-से रूपों तथा भूतलवासी अन्य विषयोंसे वह शीघ्र ही सम्बन्ध स्थापित कर लेता है तथा उनके द्वारा विक्षेपमें पड़कर उसकी प्रगति रुक जाती है

अध्याय 202

श्लोक 50

ततः पार्थिवमैश्वर्यं सेवमानश्च सर्वतः ।मूर्तिमद्भिश्च बहुधा धातुभिः स च हन्यते

tataḥ pārthivamaiśvaryaṃ sevamānaśca sarvataḥ | mūrtimadbhiśca bahudhā dhātubhiḥ sa ca hanyate

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर पार्थिव ऐश्वर्यका सेवन करता हुआ वह योगी पुरुष सब ओरसे मूर्तिमान्‌ पार्थिव धातुओंद्वारा बारम्बार मारा जाता है

अध्याय 202

श्लोक 51

शक्तितोमरनिस्त्रिंशैर्गदाभिश्चाप्यनेकधा ।असिभिः पात्यते चैव क्षुरधारैः सहस्रशः

śaktitomaranistriṃśairgadābhiścāpyanekadhā | asibhiḥ pātyate caiva kṣuradhāraiḥ sahasraśaḥ

हिन्दी अर्थ

शक्ति, तोमर, तलवार, गदा तथा छुरेकी-सी धारवाले सहस्रों खड़गोंद्वारा वह अनेकों बार धराशायी किया जाता है

अध्याय 202

श्लोक 52

भिद्यते चैव बाणाग्रैः सुतीक्ष्णैर्मर्मभेदिभिः ।एभिर्विकारैर्निर्वृत्तैर्निरुद्धैश्चैव सर्वशः

bhidyate caiva bāṇāgraiḥ sutīkṣṇairmarmabhedibhiḥ | ebhirvikārairnirvṛttairniruddhaiścaiva sarvaśaḥ

श्लोक 52–54 का हिन्दी अर्थ

अत्यन्त तीखे मर्मभेदी बाणोंके अग्रभागसे विदीर्ण होनेका भी उसे अवसर प्राप्त होता है। इन विकारोंके प्राप्त होने तथा उनका पूर्णत: निरोध हो जानेपर अटल ऐश्र्य (ब्रह्मभाव)-को प्राप्त हुआ योगी सिद्ध हो जाता है । तत्पश्चात्‌ विकारसे मुक्त हुए योगीके समक्ष पार्थिव ऐश्वर्य प्रकट होता है, जब समाधि लग जाती है और विकार लीन हो जाते हैं, तब वह दिव्य गन्धको सूँघकर दिव्य लोकोंकी बातें भी सुनता है

अध्याय 202

श्लोक 53

भुवमैश्वर्यमापन्नः सिद्धो भवति ब्राह्मणः ।ततः पार्थिवमैश्वर्यं निर्मुक्तस्य विकारतः

bhuvamaiśvaryamāpannaḥ siddho bhavati brāhmaṇaḥ | tataḥ pārthivamaiśvaryaṃ nirmuktasya vikārataḥ

अर्थ श्लोक 52 के साथ

अध्याय 202

श्लोक 54

प्रादुर्भवति सञ्जाते समाधौ प्रलयं गते ।दिव्यं गन्धं समाघ्राय दिव्यार्थांस्ताञ्छृणोति च

prādurbhavati sañjāte samādhau pralayaṃ gate | divyaṃ gandhaṃ samāghrāya divyārthāṃstāñchṛṇoti ca

अर्थ श्लोक 52 के साथ

अध्याय 202

श्लोक 55

दिव्यरूपैश्च पुरुषैश्छिद्यते न च भिद्यते ।गच्छन् सुकृतिनां चान्तः प्रधानात्मा क्षरन्निव

divyarūpaiśca puruṣaiśchidyate na ca bhidyate | gacchan sukṛtināṃ cāntaḥ pradhānātmā kṣaranniva

हिन्दी अर्थ

वह शरीर रहनेतक दिव्य पुरुषोंसे भिन्न रहता है और देहपात होनेपर सर्वात्मभावको प्राप्त हो जानेसे वह उन सबसे अभिन्न हो जाता है। अन्तर्जगतमें जाता हुआ वह योगी परिणामको प्राप्त होनेवाले प्रधानकी भाँति पुण्यात्माओंके अन्त:करणमें भी प्रवेश करता है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.