Harivamsha Purana
194
अध्याय 194 / 318

Parva 3, Adhyāya 11

17 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ17 श्लोक

अध्याय 194

श्लोक 1

परमात्मना भूतानां सृष्टिः, ब्रह्माणं प्रकटयितुं तस्य नाभ्या महत् पद्मस्य प्रादुर्भावं आपवः स विभुर्भूत्वा कारयामास वै तपः ।छादयित्वाऽऽत्मनो देहमात्मना कुम्भसम्भवः

paramātmanā bhūtānāṃ sṛṣṭiḥ, brahmāṇaṃ prakaṭayituṃ tasya nābhyā mahat padmasya prādurbhāvaṃ āpavaḥ sa vibhurbhūtvā kārayāmāsa vai tapaḥ | chādayitvā''tmano dehamātmanā kumbhasambhavaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वे हंस- संज्ञक परमात्मा कुम्भयोनि ब्रह्मर्षि वसिष्ट होकर अपनी कुम्भजनित देहको अपने आत्मा (समष्टिके अभिमानी चेतन)-से आच्छादित करके तपस्या करने लगे

अध्याय 194

श्लोक 2

ततो महात्मातिबलो मतिं लोकस्य सर्जने ।महता पञ्चभूतानां विश्वस्तो व्यचिन्तयत्

tato mahātmātibalo matiṃ lokasya sarjane | mahatā pañcabhūtānāṃ viśvasto vyacintayat

हिन्दी अर्थ

उस समय उन अत्यन्त शक्तिशाली विश्वरूप महात्माने भौतिक जगत्‌ तथा उसके उपादानभूत पश्नमहाभूतोंकी सृष्टिका विचार किया

अध्याय 194

श्लोक 3

तस्य चिन्तयतस्तत्र तपसा भावितात्मनः ।निराकाशे तोयमये सूक्ष्मे जगति गह्वरे

tasya cintayatastatra tapasā bhāvitātmanaḥ | nirākāśe toyamaye sūkṣme jagati gahvare

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

आकाशरहित जलस्वरूप सूक्ष्म गुफामें जगत्‌के नीन हो जानेपर वहाँ उस समय तपस्यासे भावित अन्त:करणवाले वे परमेश्वर जब इस प्रकार चिन्तन कर हे थे, तब सलिलराशिमें स्थित हुए उन्होंने उस एकार्णव्में कुछ क्षोभ (हलचल) उत्पन्न कर दिया। दनन्तर उनके मनमें जो सृष्टिविषयक संकल्पकी दूसरी रंग उठी, उससे उस जलमें सूक्ष्म छिद्र (आकाश पा अवकाश) प्रकट हो गया

अध्याय 194

श्लोक 4

ईषत्सङ्क्षोभयामास सोऽर्णवं सलिले स्थितः ।सोऽनन्तरोर्मिणा सूक्ष्ममथ च्छिद्रमभूत्तदा

īṣatsaṅkṣobhayāmāsa so'rṇavaṃ salile sthitaḥ | so'nantarormiṇā sūkṣmamatha cchidramabhūttadā

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 194

श्लोक 5

तत्र शब्दगतिर्भूत्वा मारुतद्रवसम्भवः ।स लब्ध्वाऽऽन्तरमक्षोभ्यो व्यवर्धत समीरणः

tatra śabdagatirbhūtvā mārutadravasambhavaḥ | sa labdhvā''ntaramakṣobhyo vyavardhata samīraṇaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर जो पकल्पकी पुन: तीसरी तरंग उठी, उससे उस आकाशभें गब्दकी गति हुई अर्थात्‌ वे ईश्वर ही वहाँ शब्दरूपसे ततिशील हुए। उनके इस प्रकार गतिशील होनेमें वायुका तेग ही कारण था। यदि कहें उस समय वहाँ वायु कहाँ थी तो इसका उत्तर सुनो-वे ईश्वर वह छिद्र मा अवकाश पाते ही अक्षोभ्य होकर भी स्वयं वायुरूपमें [कट हो वहाँ बढ़ने लगे (तात्पर्य यह है कि आकाशके भनन्तर उत्पन्न हुई वायु शब्द और गतिकी अभिव्यक्तिमें कारण हुई)

अध्याय 194

श्लोक 6

विवर्धता बलवता तेन संशोभितोऽर्णवः ।अन्योन्यवेगाभिहता ममन्थुश्चोर्मयो भृशम्

vivardhatā balavatā tena saṃśobhito'rṇavaḥ | anyonyavegābhihatā mamanthuścormayo bhṛśam

हिन्दी अर्थ

उस बढ़ती हुई प्रबल वायुसे वह [कार्णवका जल सब ओरसे क्षुब्ध हो उठा। उसमें हुत-सी तरंगें उठकर परस्पर वेगसे टकराती हुई उस हहासागरको मथने लगीं

अध्याय 194

श्लोक 7

महार्णवस्य क्षुब्धस्य तस्मिन् नम्भसि मथ्यति ।कृष्णवर्त्मा समभवत्प्रभुर्वैश्वानरोऽर्चिमान्

mahārṇavasya kṣubdhasya tasmin nambhasi mathyati | kṛṣṇavartmā samabhavatprabhurvaiśvānaro'rcimān

हिन्दी अर्थ

उस क्षुब्ध महासागरका नल जब इस प्रकार मथा जाने लगा, तब उससे चालामालाओंसे युक्त शक्तिशाली कृष्णवर्त्मा अग्रिका ादुर्भाव हुआ

अध्याय 194

श्लोक 8

तत्र संशोषयामास पावकः सलिलं बहु ।क्षयाज्जलनिधेश्छिद्रमभवन्निःसृतं नभः

tatra saṃśoṣayāmāsa pāvakaḥ salilaṃ bahu | kṣayājjalanidheśchidramabhavanniḥsṛtaṃ nabhaḥ

हिन्दी अर्थ

उस अग्रिने वहाँ फैली हुई अगाध नलराशिको सोख लिया। उस जलराशिके क्षीण हो नानेसे वहाँका स्थान खाली हो गया और आकाश निकल आया

अध्याय 194

श्लोक 9

आत्मतेजोद्भवाः पुण्या आपोऽमृतरसोपमाः ।आकाशं छिद्रसम्भूतं वायुराकाशसम्भवः

ātmatejodbhavāḥ puṇyā āpo'mṛtarasopamāḥ | ākāśaṃ chidrasambhūtaṃ vāyurākāśasambhavaḥ

हिन्दी अर्थ

अमृतरसके समान मधुर एवं पवित्र नल परमात्माके तेजसे प्रकट हुआ है। उस जलमें जो छेद्र प्रकट हुआ, उससे आकाशका आविर्भाव हुआ मौर आकाशसे वायुकी उत्पत्ति हुई

अध्याय 194

श्लोक 10

आज्यसङ्घर्षणोद्भूतं पावकं चाज्यसम्भवम् ।दृष्ट्वा प्रीतियुतो देवो महाभूतादिभावनः

ājyasaṅgharṣaṇodbhūtaṃ pāvakaṃ cājyasambhavam | dṛṣṭvā prītiyuto devo mahābhūtādibhāvanaḥ

हिन्दी अर्थ

घीके समान वस्वरूप जो जल है, उसके पारस्परिक संघर्षसे [थ्वीका प्रादुर्भाव हुआ। उस पृथ्वी या पार्थिव शरीरमें नठरानलका प्राकट्य हुआ, जो परम्परया जलसे ही त्पन्न है । उसे देखकर महाभूतोंके आदिस्तष्टा परमात्मदेव हुत प्रसन्न हुए

अध्याय 194

श्लोक 11

दृष्ट्वा भूतानि भगवाँल्लोकसृष्ट्यर्थतत्त्ववित् ।ब्रह्मणो जन्म स हितं बहुरूपो विचिन्वति

dṛṣṭvā bhūtāni bhagavā~llokasṛṣṭyarthatattvavit | brahmaṇo janma sa hitaṃ bahurūpo vicinvati

हिन्दी अर्थ

लोकसृष्टिके प्रयोजन और त््तको जाननेवाले अनेक रूपधारी वे भगवान्‌ प्रत्येक ल्पमें इस प्रकार भूतोंका प्राकट्य देखकर सुृष्टि- वस्तारके लिये हितकर ब्रह्माजीके जन्मका चिन्तन रते हैं ( अर्थात्‌ मानसिक संकल्पसे ब्रह्माजीको उत्पन्न ररते हैं)

अध्याय 194

श्लोक 12

चतुर्युगादिसङ्ख्यान्ते सहस्रयुगपर्यये ।यत्पृथिव्यां द्विजेन्द्राणां तपसा भावितात्मनाम्

caturyugādisaṅkhyānte sahasrayugaparyaye | yatpṛthivyāṃ dvijendrāṇāṃ tapasā bhāvitātmanām

श्लोक 12–13 का हिन्दी अर्थ

इध्याय: + ९६९ एक सहसख्र चतुर्युग बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है (और इसी दिनसे वे सौ वर्षोतक जीवित रहते हैं) | वे ब्रह्मा पूर्वकल्पमें इस पृथ्वीपर तपस्यासे शुद्ध अन्त:करणवाले द्विजराजोंमें श्रेष्ठ, ब्रह्मके उपासक, यत्रशील, अनेक जन्मोंतक चित्तवृत्तियोंका निरोध करनेवाले, ज्ञानवान्‌, विश्वात्माका साक्षात्कार करनेवाले और योगियोंमें सर्वश्रेष्ठ योगवेत्ता रहे होते हैं

अध्याय 194

श्लोक 13

बहुजन्मनिरुद्धात्मा ब्राह्मणो यतिरुत्तमः ।ज्ञानवान् दृष्टविश्वात्मा योगिनां योगवित्तमः

bahujanmaniruddhātmā brāhmaṇo yatiruttamaḥ | jñānavān dṛṣṭaviśvātmā yogināṃ yogavittamaḥ

अर्थ श्लोक 12 के साथ

अध्याय 194

श्लोक 14

तं योगवन्तं विज्ञेयं सम्पूर्णैश्वर्यविक्रमम् ।देवो ब्रह्मणि विश्वे च नियोजयति योगवित्

taṃ yogavantaṃ vijñeyaṃ sampūrṇaiśvaryavikramam | devo brahmaṇi viśve ca niyojayati yogavit

हिन्दी अर्थ

योगवेत्ता विश्वेश्वरदेव उन योगवानू, सबके लिये उपास्य तथा सम्पूर्ण ऐश्वर्य और विक्रमसे सम्पन्न ब्रह्माजीको वेद और जगत्‌की परम्परा बनाये रखनेके कार्यमें नियुक्त करते हैं

अध्याय 194

श्लोक 15

ततस्तस्मिन् महातोये हविषो हरिरच्युतः ।स्वपन् क्रीडंश्च विविधं मोदते चैष पावकिः

tatastasmin mahātoye haviṣo hariracyutaḥ | svapan krīḍaṃśca vividhaṃ modate caiṣa pāvakiḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीको नियुक्त करनेके अनन्तर भगवान्‌ श्रीहरि अपने स्वरूपभूत उस महान्‌ जलमें अच्युतरूपसे स्थित होते हैं और ये नियुक्त हुए तैजस ब्रह्मा प्राणियोंके कर्मवश उनके कर्मोंसे उपरत होनेपर सोते तथा सबके कर्मोके उद्धव होनेपर नाना प्रकारसे क्रीडाएँ करते हुए आनन्दमग्र होते हैं

अध्याय 194

श्लोक 16

पद्मं नाभ्युद्भवं चैकं समुत्पादितवांस्तदा ।सहस्रपत्रं विरजो भास्कराभं हिरण्मयम्

padmaṃ nābhyudbhavaṃ caikaṃ samutpāditavāṃstadā | sahasrapatraṃ virajo bhāskarābhaṃ hiraṇmayam

हिन्दी अर्थ

उस समय जब कि ब्रह्माके जन्मका समय उपस्थित हुआ था, भगवान्‌ श्रीहरिने अपनी नाभिसे एक सहस््रदल कमल प्रकट किया, जो रजोगुण या रजसे रहित सूर्यके समान तेजस्वी तथा सुवर्णमय था

अध्याय 194

श्लोक 17

हुताशनज्वलितशिखोज्ज्वलप्रभं सुगन्धिनं शरदमलार्कतेजसम् ।विराजते कमलमुदारवर्चसं महात्मनस्तनुरुहचारुदर्शनम्

hutāśanajvalitaśikhojjvalaprabhaṃ sugandhinaṃ śaradamalārkatejasam | virājate kamalamudāravarcasaṃ mahātmanastanuruhacārudarśanam

हिन्दी अर्थ

महात्मा श्रीहरिके शरीरसे प्रकट हो अत्यन्त मनोहर दिखायी देनेवाला वह अतिशय कान्तिमान्‌ सुगन्धित कमल बड़ी शोभा पा रहा था। वह आगकी प्रज्वलित शिखाके समान अपनी उज्चल प्रभासे प्रकाशित हो रहा था। उसका तेज शरत्कालके निर्मल सूर्यकी भाँति उद्घासित होता था

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.