Harivamsha Purana
187
अध्याय 187 / 318

Parva 3, Adhyāya 4

53 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ53 श्लोक

अध्याय 187

श्लोक 1

कलियुगस्य वर्णनं एवं विलुलिते लोके मनुष्याः केन पालिताः ।निवत्स्यन्ति किमाचाराः किमाहारविहारिणः

kaliyugasya varṇanaṃ evaṃ vilulite loke manuṣyāḥ kena pālitāḥ | nivatsyanti kimācārāḥ kimāhāravihāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

पाय: * ९१४४५ बाय: सा वर्णन जनमेजयने पूछा—मुने! इस प्रकार अनाचारसे लड़ित हुए जगतमें मनुष्य किससे सुरक्षित हो वास करेंगे ? उनके आचार तथा आहार-विहार कैसे गि2

English

*1.F.4.* Except for the limited right of replacement or refund set forth in paragraph 1.F.3, this work is provided to you 'AS-IS,' WITH NO OTHER

अध्याय 187

श्लोक 2

किङ्कर्माणः किमीहन्तः किम्प्रमाणाः किमायुषः ।कां च काष्ठां समासाद्य प्रपत्स्यन्ति कृतं युगम्

kiṅkarmāṇaḥ kimīhantaḥ kimpramāṇāḥ kimāyuṣaḥ | kāṃ ca kāṣṭhāṃ samāsādya prapatsyanti kṛtaṃ yugam

हिन्दी अर्थ

उनका कर्म कया होगा? वे कैसी चेष्टा रेंगे ? उनके शरीरकी लम्बाई या ऊँचाई कितनी होगी ? नकी आयु कितने वर्षोकी होगी तथा वे किस गमातक पहुँचकर सत्ययुग प्राप्त करेंगे ?

अध्याय 187

श्लोक 3

अत ऊर्ध्वं च्युते धर्मे गुणहीनाः प्रजास्ततः ।शीलव्यसनमासाद्य प्राप्स्यन्ते ह्रासमायुषः

ata ūrdhvaṃ cyute dharme guṇahīnāḥ prajāstataḥ | śīlavyasanamāsādya prāpsyante hrāsamāyuṣaḥ

हिन्दी अर्थ

व्यासजीने कहा—जनमेजय! इसके बाद धर्मके छ हो जानेपर गुणहीन हुई सारी प्रजा अपना शील कर अल्पायु हो जायगी

अध्याय 187

श्लोक 4

आयुर्हान्या बलग्लानिर्बलग्लान्या विवर्णता ।वैवर्ण्याद्व्याधिसम्पीडा निर्वेदो व्याधिपीडनात्

āyurhānyā balaglānirbalaglānyā vivarṇatā | vaivarṇyādvyādhisampīḍā nirvedo vyādhipīḍanāt

हिन्दी अर्थ

आयुकी हानि होनेसे नका बल क्षीण हो जायगा, बलके क्षीण होनेसे उनकी ज़कान्ति फीकी पड़ जायगी, कान्तिमें विकार आनेसे नके शरीरमें रोगजनित पीड़ा होगी तथा रोगजनित ड़ासे उनके मनमें निर्वेद (वैराग्यपूर्ण खेद) होगा

अध्याय 187

श्लोक 5

निर्वेदादात्मसम्बोधः सम्बोधाद् धर्मशीलता ।एवं गत्वा परां काष्ठां प्रपत्स्यन्ति कृतं युगम्

nirvedādātmasambodhaḥ sambodhād dharmaśīlatā | evaṃ gatvā parāṃ kāṣṭhāṃ prapatsyanti kṛtaṃ yugam

हिन्दी अर्थ

र्वेदसे उन्हें आत्मबोध प्राप्त होगा, उस बोधसे उनमें मशीलता आयेगी और इस प्रकार धर्मशीलताकी चरम माको पहुँचकर वे सत्ययुग प्राप्त कर लेंगे

अध्याय 187

श्लोक 6

उद्देशतो धर्मशीलाः केचिन्मध्यस्थतां गताः ।विमर्षशीलाः केचित् तु हेतुवादकुतूहलाः

uddeśato dharmaśīlāḥ kecinmadhyasthatāṃ gatāḥ | vimarṣaśīlāḥ kecit tu hetuvādakutūhalāḥ

हिन्दी अर्थ

कलियुगमें) कुछ लोग लेशमात्र धर्मका पालन करनेवाले गि, कुछ लोग धर्मकी ओरसे तटस्थ या उदासीन रहेंगे और कुछ लोग विवेकशील होनेपर भी धर्मके समर्थनमें च्छी-अच्छी युक्ति देनेके लिये ही उत्सुक रहेंगे, स्वयं स धर्मका आचरण नहीं करेंगे

English

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अध्याय 187

श्लोक 7

प्रत्यक्षमनुमानं च प्रमाणं चेति निश्चिताः ।प्रमाणैकं करिष्यन्ति नेति पण्डितमानिनः

pratyakṣamanumānaṃ ca pramāṇaṃ ceti niścitāḥ | pramāṇaikaṃ kariṣyanti neti paṇḍitamāninaḥ

हिन्दी अर्थ

कुछ लोग दृढ़ श्रयके साथ केवल प्रत्यक्ष और अनुमानको ही प्रमाण नेंगे (वेद अथवा शब्दको प्रमाण नहीं मानेंगे ), कुछ ण्डितमानी पुरुष एकमात्र प्रत्यक्षको ही प्रमाण मानेंगे, सरे किसी प्रमाणको नहीं स्वीकार करेंगे॥ '

अध्याय 187

श्लोक 8

अप्रमाणं करिष्यन्ति वेदोक्तमपरे जनाः ।तदा मुखभगाश्चैव भविष्यन्ति स्त्रियोऽपराः

apramāṇaṃ kariṣyanti vedoktamapare janāḥ | tadā mukhabhagāścaiva bhaviṣyanti striyo'parāḥ

हिन्दी अर्थ

दूसरे ऐग वेदोक्त मतको प्रामाणिक नहीं मानेंगे। कलियुगमें कतनी ही स्त्रियाँ मुखसे ही भगका काम लेनेवाली ंगी

अध्याय 187

श्लोक 9

नास्तिक्यपरमाश्चापि केचिद् धर्मविलोपकाः ।भविष्यन्ति नरा मूढा मन्दाः पण्डितमानिनः

nāstikyaparamāścāpi kecid dharmavilopakāḥ | bhaviṣyanti narā mūḍhā mandāḥ paṇḍitamāninaḥ

हिन्दी अर्थ

कितने ही पण्डितमानी मन्दबुद्धि मूढ़ मानव स्तिकतामें प्रवृत्त होकर धर्मका लोप करनेवाले होंगे

English

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अध्याय 187

श्लोक 10

तदात्वमात्रे श्रद्धेयाः शास्त्रज्ञानबहिष्कृताः ।दाम्भिकास्ते भविष्यन्ति वादशीलकुतूहलाः

tadātvamātre śraddheyāḥ śāstrajñānabahiṣkṛtāḥ | dāmbhikāste bhaviṣyanti vādaśīlakutūhalāḥ

हिन्दी अर्थ

वर्तमान कालकी प्रत्यक्ष बातोंपर ही श्रद्धा या विश्वास ररनेवाले, शास्त्रज्ञानसे रहित और पाखण्डी होंगे, र्मकी चर्चा और आचरण दोनों ही उनके लिये पाश्चर्यकी वस्तु होंगे (अर्थात्‌ वे धर्मकी चर्चा भी नहीं रेंगे, फिर आचरणकी तो बात ही क्या है?)

अध्याय 187

श्लोक 11

तदा विचलिते धर्मे जनाः शेषपुरस्कृताः ।शुभान्येवाचरिष्यन्ति दानसत्यसमन्विताः

tadā vicalite dharme janāḥ śeṣapuraskṛtāḥ | śubhānyevācariṣyanti dānasatyasamanvitāḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय धर्मके विचलित हो जानेपर लोग भगवत्स्मरण आदि अवशिष्ट धर्मको सामने रखते हुए दान और सत्यसे संयुक्त हो दया आदि शुभकर्मोका ही आचरण करेंगे

English

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अध्याय 187

श्लोक 12

सर्वभक्षो ह्यसङ्गुप्तो निर्गुणो निरपत्रपः ।भविष्यति तदा लोकस्तत्कषायस्य लक्षणम्

sarvabhakṣo hyasaṅgupto nirguṇo nirapatrapaḥ | bhaviṣyati tadā lokastatkaṣāyasya lakṣaṇam

हिन्दी अर्थ

उस समयके लोग सर्वभक्षी, अजितेद्द्रिय, गुणहीन और निर्लज् होंगे, यही कलिकालजनित कलुषका लक्षण है

अध्याय 187

श्लोक 13

विप्राणां शाश्वतीं वृत्तिं यदा वर्णावरा जनाः ।प्रतिपत्स्यन्ति वृत्यर्थं तत् कषायस्य लक्षणम्

viprāṇāṃ śāśvatīṃ vṛttiṃ yadā varṇāvarā janāḥ | pratipatsyanti vṛtyarthaṃ tat kaṣāyasya lakṣaṇam

हिन्दी अर्थ

जब क्षत्रिय आदि वर्णोके लोग जीविकाके लिये ब्राह्मणोंकी सनातन वृत्तिको अपना लेंगे, तब वही कलिके कालुष्यका सूचक होगा

अध्याय 187

श्लोक 14

कषायोपप्लवे लोके ज्ञानविद्याप्रणाशने ।सिद्धिं स्वल्पेन कालेन यास्यन्ति निरुपस्कृताः

kaṣāyopaplave loke jñānavidyāpraṇāśane | siddhiṃ svalpena kālena yāsyanti nirupaskṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

संसारमें कलिकालके कलुषका उपद्रव बढ़ जानेपर जब ज्ञान (शास्त्रीय बोध) और विद्या (आत्मदर्शन)-का लोप हो जायगा, तब परिग्रहशून्य हुए मनुष्य केवल त्यागमात्रसे थोड़े ही समयमें सिद्धि (मोक्ष) प्राप्त कर लेंगे

अध्याय 187

श्लोक 15

महायुद्धं महावातं महावर्षं महाभयम् ।भविष्यति युगे क्षीणे तत्कषायस्य लक्षणम्

mahāyuddhaṃ mahāvātaṃ mahāvarṣaṃ mahābhayam | bhaviṣyati yuge kṣīṇe tatkaṣāyasya lakṣaṇam

हिन्दी अर्थ

युगान्तकालमें महान्‌ युद्ध, प्रचण्ड आँधी, बड़ी भारी वर्षा और महान्‌ भय उपस्थित होगा, वह कलिकालके कलुषका लक्षण है

English

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अध्याय 187

श्लोक 16

विप्ररूपाणि रक्षांसि राजानः कर्णवेदिनः ।पृथिवीमुपभोक्ष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते

viprarūpāṇi rakṣāṃsi rājānaḥ karṇavedinaḥ | pṛthivīmupabhokṣyanti yugānte samupasthite

हिन्दी अर्थ

युगान्तकाल उपस्थित होनेपर यहाँ ब्राह्मणोंके रूपमें राक्षस निवास करेंगे, राजालोग कानोंसे सुनी हुई बातको ही ठीक मानेंगे और चुगलखोरोंके साथ रहकर ही पृथ्वीका उपभोग करेंगे

अध्याय 187

श्लोक 17

निःस्वाध्यायवषट्कारा अनयाश्चाभिमानिनः ।विप्राः क्रव्यादरूपेण सर्वभक्षा वृथाव्रताः

niḥsvādhyāyavaṣaṭkārā anayāścābhimāninaḥ | viprāḥ kravyādarūpeṇa sarvabhakṣā vṛthāvratāḥ

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मण स्वाध्याय और वषट्कारसे दूर हो नीतिशून्य और अभिमानी होकर राक्षसोंके समान सब कुछ भक्षण करेंगे और व्यर्थ (पाखण्डपूर्ण) ब्रतका पालन करनेवाले होंगे

अध्याय 187

श्लोक 18

मूर्खाः स्वार्थपरा लुब्धाः क्षुद्राः क्षुद्रपरिच्छदा ॥ व्यवहारोपवृत्ताश्च च्युता धर्माच्च शाश्वतात्

mūrkhāḥ svārthaparā lubdhāḥ kṣudrāḥ kṣudraparicchadā || vyavahāropavṛttāśca cyutā dharmācca śāśvatāt

हिन्दी अर्थ

वे मूर्ख, स्वार्थपरायण, लोभी और नीच विचारके होंगे; उनके आश्रित रहनेवाले लोग भी वैसे ही होंगे, वे सनातन धर्मसे भ्रष्ट होकर केवल भोजनाच्छादनादि व्यवहारमें ही तत्पर रहेंगे

English

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अध्याय 187

श्लोक 19

हर्तारः पररत्नानां परदारापहारकाः ।कामात्मानो दुरात्मानः सोपधाः प्रियसाहसाः

hartāraḥ pararatnānāṃ paradārāpahārakāḥ | kāmātmāno durātmānaḥ sopadhāḥ priyasāhasāḥ

हिन्दी अर्थ

उस समयके मनुष्य पराये रत्नों और परायी स्त्रियोंका | अपहरण करनेवाले होंगे, उन सबके चित्त कामसे कलुषित होंगे, वे दुरात्मा, कपटी और दुःसाहसको पसंद करनेवाले होंगे

अध्याय 187

श्लोक 20

तेषु प्रभवमाणेषु तुल्यशीलेषु सर्वतः ।अभाविनो भविष्यन्ति मुनयो बहुरूपिणः

teṣu prabhavamāṇeṣu tulyaśīleṣu sarvataḥ | abhāvino bhaviṣyanti munayo bahurūpiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

एक समान शीलवाले और प्रभुतासे सम्पन्न वे दुष्ट मनुष्य जब सब ओर फैल जायेँगे, तब अनेक रूपधारी एवं आत्माके अभावका प्रतिपादन करनेवाले बहुत-से (वैनाशिक मतावलम्बी ) मुनि प्रकट हो जायँगे

English

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अध्याय 187

श्लोक 21

उत्पन्ना ये कृतयुगे प्रधानपुरुषाश्रयाः ।कथायोगेन तान्सर्वान्पूजयिष्यन्ति मानवाः

utpannā ye kṛtayuge pradhānapuruṣāśrayāḥ | kathāyogena tānsarvānpūjayiṣyanti mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

सत्ययुगमें ईश्वरका आश्रय लेनेवाले जो भक्त पैदा हो गये हैं, उन सबकी कलियुगके मनुष्य कथावातकि प्रसज्भमें पूजा करेंगे (उनके प्रति आदरका भाव प्रकट करेंगे, परंतु स्वयं उनके-जैसा आचरण नहीं करेंगे)

English

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अध्याय 187

श्लोक 22

सस्यचौरा भविष्यन्ति तथा चैलापहारिणः ।भक्ष्यभोज्यापहाराश्च करण्डानां च हारिणः

sasyacaurā bhaviṣyanti tathā cailāpahāriṇaḥ | bhakṣyabhojyāpahārāśca karaṇḍānāṃ ca hāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

कलिकालके मनुष्य खेतोंमें लगी हुई खेतीकी चोरी करेंगे, दूसरोंके वस्त्र चुरा लेंगे, खाने-पीनेकी वस्तुएँ हड़प लेंगे, कंडों अथवा बाँसकी पिटारियोंको भी उड़ा ले जायँगे

अध्याय 187

श्लोक 23

चौराश्चौरस्य हर्तारो हन्ता हन्तुर्भविष्यति ।चौरैश्चौरक्षये चापि कृते क्षेमं भविष्यति

caurāścaurasya hartāro hantā hanturbhaviṣyati | cauraiścaurakṣaye cāpi kṛte kṣemaṃ bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

उस समयके चोर चोरके घरमें भी चोरी करेंगे, हत्यारिेकी भी हत्या करनेवाले पैदा हो जायँगे, इस प्रकार जब चोरोंके द्वारा चोरोंको विनाश कर दिया जायगा, तब जगत्‌का कल्याण होगा

अध्याय 187

श्लोक 24

निःसारे क्षुभिते लोके निष्क्रिये व्यन्तरे स्थिते ।नराः श्रयिष्यन्ति वनं करभारप्रपीडिताः

niḥsāre kṣubhite loke niṣkriye vyantare sthite | narāḥ śrayiṣyanti vanaṃ karabhāraprapīḍitāḥ

हिन्दी अर्थ

जब सारा संसार निर्धन, संध्या- वन्दन आदि सत्क्मोंसे रहित तथा वर्णभेदसे शून्य हो जायगा, उस समय करोंके भारसे अत्यन्त पीड़ित हुए मनुष्य वनका आश्रय लेंगे

English

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अध्याय 187

श्लोक 25

पितॄनाज्ञापयिष्यन्ति पुत्राः कर्मणि सर्वशः ।स्नुषा श्वश्रूस्तथा चैव युगान्ते प्रत्युपस्थिते

pitṝnājñāpayiṣyanti putrāḥ karmaṇi sarvaśaḥ | snuṣā śvaśrūstathā caiva yugānte pratyupasthite

हिन्दी अर्थ

युगान्तकाल उपस्थित होनेपर पुत्र पिताओंको सभी कर्म करनेके लिये आदेश दिया करेंगे; इसी तरह बहुएँ अपनी सासोंपर हुक्म चलाया करेंगी

अध्याय 187

श्लोक 26

वाक्छरैरर्दयिष्यन्ति गुरूञ्छिष्याः समन्ततः ।यज्ञकर्मण्युपरते रक्षांसि श्वापदानि च ।कीटमूषकसर्पाश्च धर्षयिष्यन्ति मानवान्

vākcharairardayiṣyanti gurūñchiṣyāḥ samantataḥ | yajñakarmaṇyuparate rakṣāṃsi śvāpadāni ca | kīṭamūṣakasarpāśca dharṣayiṣyanti mānavān

हिन्दी अर्थ

सब ओर शिष्य गुरुजनोंको वाग्बाणोंसे पीड़ित करेंगे । यज्ञकर्म बंद हो जानेपर राक्षस, हिंसक जन्तु तथा कीड़े, चूहे और सर्प मनुष्योंपर आक्रमण करेंगे

अध्याय 187

श्लोक 27

क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं सामग्र्यं वापि बन्धुषु ।उद्देशतो नरश्रेष्ठ भविष्यन्ति युगक्षये

kṣemaṃ subhikṣamārogyaṃ sāmagryaṃ vāpi bandhuṣu | uddeśato naraśreṣṭha bhaviṣyanti yugakṣaye

हिन्दी अर्थ

नस्त्रेष्ठ! कलियुगमें क्षेम, सुभिक्ष, आरोग्य और भाई- बन्धुओंमें मेल-मिलाप या बन्धु-बान्धवोंकी पूर्णता आदि बातें बहुत कम हो जायँगी

अध्याय 187

श्लोक 28

स्वयम्पालाः स्वयञ्चौरा युगसम्भारसम्भृताः ।मण्डलैः प्रचलिष्यन्ति देशे देशे पृथक्पृथक्

svayampālāḥ svayañcaurā yugasambhārasambhṛtāḥ | maṇḍalaiḥ pracaliṣyanti deśe deśe pṛthakpṛthak

हिन्दी अर्थ

उस समयके लोग स्वयं ही रक्षक और स्वयं ही चोर होंगे तथा युगकी आवश्यकताके अनुरूप उपकरणोंसे सम्पन्न हो पृथक्‌- पृथक्‌ झुंड बनाकर देश-देशमें घूमते फिरेंगे

अध्याय 187

श्लोक 29

स्वदेशेभ्यः परिभ्रष्टा निःसाराः सह बन्धुभिः ।नराः सर्वे भविष्यन्ति तदा कालपरिक्षयात्

svadeśebhyaḥ paribhraṣṭā niḥsārāḥ saha bandhubhiḥ | narāḥ sarve bhaviṣyanti tadā kālaparikṣayāt

हिन्दी अर्थ

उस समय कालवश अपनी अवनति होनेके कारण सब मनुष्य अपने-अपने देशोंसे निर्वासित होकर बन्धुओं- सहित निःसार (निर्धन) हो जायेँगे

अध्याय 187

श्लोक 30

तदा स्कन्धे समाधाय कुमारान्विद्रुता भयात् ।कौशिकीं प्रतरिष्यन्ति नराः क्षुद्भयपीडिताः

tadā skandhe samādhāya kumārānvidrutā bhayāt | kauśikīṃ pratariṣyanti narāḥ kṣudbhayapīḍitāḥ

हिन्दी अर्थ

उन दिनों भूखके भयसे पीड़ित हुए मनुष्य बच्चोंको कंधेपर रखकर आतड्ूवश भागकर कोसी नदीको पार कर जायँगे

अध्याय 187

श्लोक 31

अङ्गान्वङ्गान्कलिङ्गांश्च काश्मीरानथ मेकलान् ।ऋषिकान्तगिरिद्रोणीः संश्रयिष्यन्ति मानवाः

aṅgānvaṅgānkaliṅgāṃśca kāśmīrānatha mekalān | ṛṣikāntagiridroṇīḥ saṃśrayiṣyanti mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

लोग जीविकाके लिये अज्भ, वद्ध, कलिऑ्ज, काश्मीर, मेकल तथा ऋषिक आदि देशोंके भीतर चले जायँँगे और पर्वतकी घाटियोंका आश्रय लेंगे

English

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अध्याय 187

श्लोक 32

कृत्स्नं वा हिमवत्पार्श्वं कूलं च लवणाम्भसः ।अरण्येषु च वत्स्यन्ति नरा म्लेच्छगणैः सहः

kṛtsnaṃ vā himavatpārśvaṃ kūlaṃ ca lavaṇāmbhasaḥ | araṇyeṣu ca vatsyanti narā mlecchagaṇaiḥ sahaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समयके मनुष्य म्लेच्छोंके साथ समूचे हिमालयके पार्धभागमें, लवणसमुद्रके तटपर तथा वनोंमें निवास करेंगे

अध्याय 187

श्लोक 33

नैव शून्या न चाशून्या भविष्यति वसुन्धरा ।गोप्तारश्चाप्यगोप्तारः प्रभविष्यन्ति शस्त्रिणः

naiva śūnyā na cāśūnyā bhaviṣyati vasundharā | goptāraścāpyagoptāraḥ prabhaviṣyanti śastriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

पृथ्वी न तो मनुष्योंसे सूनी होगी और न भरी ही रहेगी। हाथमें शस्त्र लेकर रक्षाके कार्यमें नियुक्त हुए पुरुष भी किसीकी रक्षा नहीं कर सकेंगे

अध्याय 187

श्लोक 34

मृगैर्मत्स्यैर्विहङ्गैश्च श्वापदैः सर्पकीटकैः ।मधुशाकफलैर्मूलैर्वर्तयिष्यन्ति मानवाः

mṛgairmatsyairvihaṅgaiśca śvāpadaiḥ sarpakīṭakaiḥ | madhuśākaphalairmūlairvartayiṣyanti mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

कलियुगके धर्मश्रष्ट मनुष्य मृग, मत्स्य, पक्षी, हिंसक जन्तु, सर्प, कीट, मधु, शाक, फल और मूलसे जीवन-निर्वाह करेंगे

अध्याय 187

श्लोक 35

चीरं पर्णं च बहुलं वल्कलान्यजिनानि च ।स्वयङ्कृतानि वत्सन्ति यथा मुनिजनास्तथा

cīraṃ parṇaṃ ca bahulaṃ valkalānyajināni ca | svayaṅkṛtāni vatsanti yathā munijanāstathā

हिन्दी अर्थ

लोग ऋषि-मुनियोंकी भाँति चिथड़ों, पत्तों, वल्कलों, हिरनके चमड़ों तथा अपने बनाये हुए अन्य वस्त्रोंको धारण करेंगे

अध्याय 187

श्लोक 36

बीजानामाकृतिं निम्नेष्वीहन्तः काष्ठशङ्कुभिः ।अजैष्ठकं खरोष्ट्रं च पालयिष्यन्ति यत्नतः

bījānāmākṛtiṃ nimneṣvīhantaḥ kāṣṭhaśaṅkubhiḥ | ajaiṣṭhakaṃ kharoṣṭraṃ ca pālayiṣyanti yatnataḥ

हिन्दी अर्थ

कितने ही मनुष्य पर्वतकी कन्दरा आदि निम्न स्थानोंमें रहकर ग्रामीण और जज़ली बीजों ( अनाजों)- की प्राप्तिकि लिये चेष्टा करते हुए काठके खूटोंमें बकरों और भेड़ोंको तथा काश्मीर आदि अन्य स्थानोंके लोग गधों और ऊँटोंको बाँधकर उनका यत्रपूर्वक पालन करेंगे

अध्याय 187

श्लोक 37

नदीस्रोतांसि रोत्स्यन्ति तोयार्थं कूलमाश्रिताः ।पक्वान्नव्यवहारेण विपणन्तः परस्परम्

nadīsrotāṃsi rotsyanti toyārthaṃ kūlamāśritāḥ | pakvānnavyavahāreṇa vipaṇantaḥ parasparam

श्लोक 37–41 का हिन्दी अर्थ

कलियुगके मनुष्य जलके लिये तटपर आकर नदीके प्रवाहको रोकेंगे। वे आपसमें पके-पकाये अन्नके लेन- देनका व्यवसाय करेंगे। जैसे अपने शरीरसे उत्पन्न हुई संतानोंके निमित्तसे लोग आपसमभें लड़ते हैं, उसी प्रकार मूलधनके सहित सूदको छिपानेके कारण आपसमें विवाद करते हुए लोग परस्पर लेन-देनका व्यवहार करेंगे। उन दिनों कालसे प्रेरित हुए कुछ मनुष्य तो अधिक संतानवाले होंगे और कुछ लोगोंको एक भी संतान नहीं होगी। इसी तरह प्राय: सब लोग कुलोचित शुभ लक्षणोंसे हीन होंगे। उस समयकी प्रजा हीन- से-हीन धर्मका अनुसरण करेगी तथा उन दिनों मनुष्योंकी आयु अधिक-से-अधिक तीस वर्षकी होगी। सब लोग दुर्बल, विषयसेवनके कारण कृश तथा रजोगुणसे अभिव्याप् होंगे। उस समय रोगोंके कारण उनकी इन्द्रियाँ क्षीण हो जायँगी, आयुके क्षय एवं निरोधसे उनके मनमें विषाद होगा

English

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अध्याय 187

श्लोक 38

तनूरुहैर्यथा जातैः समूलान्तरसंवृतैः ।बह्वपत्याः प्रजाहीनाः कुललक्षणवर्जिताः

tanūruhairyathā jātaiḥ samūlāntarasaṃvṛtaiḥ | bahvapatyāḥ prajāhīnāḥ kulalakṣaṇavarjitāḥ

अर्थ श्लोक 37 के साथ

अध्याय 187

श्लोक 39

एवं भविष्यन्ति तदा मनुष्याः कालकारिताः ।हीनाद्धीनं तदा धर्मं प्रजाः समनुवर्त्स्यति

evaṃ bhaviṣyanti tadā manuṣyāḥ kālakāritāḥ | hīnāddhīnaṃ tadā dharmaṃ prajāḥ samanuvartsyati

अर्थ श्लोक 37 के साथ

अध्याय 187

श्लोक 40

आयुस्तत्र च मर्त्यानां परं त्रिंशद् भविष्यति ।दुर्बला विषयग्लाना रजसा समभिप्लुताः

āyustatra ca martyānāṃ paraṃ triṃśad bhaviṣyati | durbalā viṣayaglānā rajasā samabhiplutāḥ

अर्थ श्लोक 37 के साथ

English

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अध्याय 187

श्लोक 41

भविष्यति तदा तेषां रोगैरिन्द्रियसङ्क्षयः ।आयुःप्रक्षयसंरोधाद् विषादः प्रभविष्यति

bhaviṣyati tadā teṣāṃ rogairindriyasaṅkṣayaḥ | āyuḥprakṣayasaṃrodhād viṣādaḥ prabhaviṣyati

अर्थ श्लोक 37 के साथ

अध्याय 187

श्लोक 42

शुश्रूषवो भविष्यन्ति साधूनां दर्शने रताः ।सत्यं च प्रतिपत्स्यन्ति व्यवहारोपसङ्क्षयात्

śuśrūṣavo bhaviṣyanti sādhūnāṃ darśane ratāḥ | satyaṃ ca pratipatsyanti vyavahāropasaṅkṣayāt

हिन्दी अर्थ

फिर वे धर्मोपदेश सुननेकी इच्छा रखकर साधु पुरुषोंके दर्शनमें मन लगानेवाले होंगे; व्यवहार या व्यवसाय क्षीण हो जानेके कारण वे सत्यको अपनायेंगे

अध्याय 187

श्लोक 43

भविष्यन्ति च कामानामलाभाद् धर्मशीलिनः ।करिष्यन्ति च सङ्कोचं स्वपक्षक्षयपीडिताः

bhaviṣyanti ca kāmānāmalābhād dharmaśīlinaḥ | kariṣyanti ca saṅkocaṃ svapakṣakṣayapīḍitāḥ

हिन्दी अर्थ

कामनाओंकी प्राप्ति न होनेसे धर्मशील बनेंगे और अपने पक्षके विनाशसे पीड़ित हो दुराचारको संकुचित कर देंगे

अध्याय 187

श्लोक 44

एवं शुश्रूषणे दाने सत्ये प्राणाभिरक्षणे ।चतुष्पादः प्रवृत्तश्च धर्मः श्रेयोऽभिपत्स्यते

evaṃ śuśrūṣaṇe dāne satye prāṇābhirakṣaṇe | catuṣpādaḥ pravṛttaśca dharmaḥ śreyo'bhipatsyate

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार शुश्रूषा, दान, सत्य और प्राणरक्षामें प्रवृत्त हुआ चार चरणोंवाला धर्म श्रेयकी प्रात करायेगा

अध्याय 187

श्लोक 45

तेषां लब्धानुमानानां गुणेषु परिवर्तताम् ।स्वादु किं न्विति विज्ञाय धर्म एवं वदिष्यति

teṣāṃ labdhānumānānāṃ guṇeṣu parivartatām | svādu kiṃ nviti vijñāya dharma evaṃ vadiṣyati

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार जो श्रेयको प्राप्त हुए पुरुष अनुमानसे धर्म और अधर्मके फलको जान गये हैं और शब्दादि विषयोंमें रम रहे हैं, उनके लिये कौन-सी वस्तु स्वादिष्ट या सुखद है—विषयोंमें रमण या धर्मके मार्गपर संचरण, यह संदेह उठाकर तत्त्वका निश्चय करके लोग इस प्रकार कहेंगे

अध्याय 187

श्लोक 46

यथा हानिः क्रमात् प्राप्ता तथा वृद्धिः क्रमाद्गता ।प्रगृहीते यतो धर्मे प्रवत्स्यन्ति कृतं युगम्

yathā hāniḥ kramāt prāptā tathā vṛddhiḥ kramādgatā | pragṛhīte yato dharme pravatsyanti kṛtaṃ yugam

हिन्दी अर्थ

जैसे क्रमश: धर्मकी हानि प्राप्त हुई थी, उसी प्रकार क्रमश: उसकी वृद्धि होगी; क्योंकि धर्मको पूर्णत: अपना लेनेपर मनुष्य सत्ययुगको प्राप्त कर लेंगे

अध्याय 187

श्लोक 47

साधु वृत्तं कृतयुगे कषाये हानिरुच्यते ।एक एव तु कालः स हीनवर्णो यथा शशी

sādhu vṛttaṃ kṛtayuge kaṣāye hānirucyate | eka eva tu kālaḥ sa hīnavarṇo yathā śaśī

हिन्दी अर्थ

सत्ययुगमें सबका बर्ताव उत्तम होता है और कलियुगमें सदाचारकी हानि बतायी जाती है, जैसे एक ही चन्द्रमा कभी कान्तिसे हीन और कभी कान्तिसे पूर्ण होता है, उसी प्रकार एक ही काल कभी कृतयुग और कभी कलियुगके रूपमें दृष्टिगोचर होता है

अध्याय 187

श्लोक 48

छन्नो हि तमसा सोमो यथा कलियुगे तथा ।पूर्णश्च तमसा हीनो यथा कृतयुगे तथा

channo hi tamasā somo yathā kaliyuge tathā | pūrṇaśca tamasā hīno yathā kṛtayuge tathā

हिन्दी अर्थ

जैसे चन्द्रमा अमावास्याको अन्धकारसे आच्छन्न होता है, उसी प्रकार कलियुगमें धर्म आच्छादित हो जाता है और जैसे पूर्णिमाको परिपूर्ण चन्द्रमा अन्धकारसे हीन होता है, उसी प्रकार सत्ययुगमें चारों चरणोंसे युक्त परिपूर्ण धर्म सर्वथा प्रकाशित होता है

English

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अध्याय 187

श्लोक 49

अर्थवादः परं ब्रह्म वेदार्थ इति तं विदुः ।अनिर्णिक्तमविज्ञातं दायाद्यमिव धार्यते

arthavādaḥ paraṃ brahma vedārtha iti taṃ viduḥ | anirṇiktamavijñātaṃ dāyādyamiva dhāryate

हिन्दी अर्थ

ध्याय: + ९४९ जो परब्रह्म परमात्मा है, वह भूतार्थवाद है (परब्रह्मके रूपमें वेदके सत्य अर्थका ही प्रतिपादन हुआ) और विद्वान्‌ पुरुष उसीको वेदका मुख्य अर्थ भी मानते हैं। (यदि ऐसी बात है तो वह सर्वव्यापी नित्यसिद्ध परमात्मा सबको प्राप्त क्यों नहीं होता? इसके उत्तरमें कहते हैं—) जैसे पैतृक सम्पत्तिके रूपमें मिला हुआ मलिन सुवर्णखण्ड जबतक उसका मल दूर न हो, तबतक अज्ञात-दशामें ही धारण किया जाता है और उसे धारण करके भी मनुष्य अपनेको दरिद्र ही मानता है, उसी प्रकार अन्तःकरणके मलिन होनेसे परमात्मा अज्ञात- रूपमें ही धारण किया जाता है; जब अन्त:करण शुद्ध होता है, तब वह अपने आत्मासे अभिन्नरूपमें प्रकाशित हो उठता है और उसकी अप्राप्तिका भ्रम दूर हो जाता है

अध्याय 187

श्लोक 50

इष्टवादस्तपो नाम तपो हि स्थावरं कृतम् ।गुणैः कर्माभिनिर्वृत्तिर्गुणास्तथ्येन कर्मणा

iṣṭavādastapo nāma tapo hi sthāvaraṃ kṛtam | guṇaiḥ karmābhinirvṛttirguṇāstathyena karmaṇā

हिन्दी अर्थ

तप (वर्णाश्रमोचित धर्म) स्वर्गादि अभीष्ट 'फलोंका प्रतिपादक है, तप स्थावर-अनादि अर्थात्‌ अमोघ फलका साधक है, ऐसा शास्त्रमें निश्चय किया गया है। गुणों (देह-इन्द्रियादि)-से कर्मकी सिद्धि होती है और यथार्थ कर्मसे गुणों (देह-इन्द्रियादि)-की प्राप्ति होती है (अत: इस शरीर और कर्म आदिके बन्धनोंसे छुटकारा पानेके लिये परमात्माका आश्रय लेना चाहिये)

अध्याय 187

श्लोक 51

आशीस्तु पुरुषं दृष्ट्वा देशाकालानुवर्तिनी ।युगे युगे यथाकालमृषिभिः समुदाहृता

āśīstu puruṣaṃ dṛṣṭvā deśākālānuvartinī | yuge yuge yathākālamṛṣibhiḥ samudāhṛtā

हिन्दी अर्थ

ऋषियोंने पुरुषकी योग्यताको सामने रखकर प्रत्येक युगमें यथासमय आशिष (कर्मफलकी प्राप्ति)-का प्रतिपादन किया है, क्योंकि वह देश-कालका अनुसरण करनेवाली होती है

अध्याय 187

श्लोक 52

इह धर्मार्थकामानां देवतानां प्रतिक्रिया ।आशिषश्च शुभाः पुण्यास्तथैवायुर्युगे युगे

iha dharmārthakāmānāṃ devatānāṃ pratikriyā | āśiṣaśca śubhāḥ puṇyāstathaivāyuryuge yuge

हिन्दी अर्थ

इस मर्त्यलोकमें धर्म, अर्थ और कामसम्बन्धी फल, देवाराधनके फल, शुभ एवं पुण्य आशिष तथा आयु प्रत्येक युगमें मनुष्योंकी श्रद्धाके तारतम्यके अनुसार होती हैं

अध्याय 187

श्लोक 53

यथा युगानां परिवर्तनानि चिरं प्रवृत्तानि विधिस्वभावात् ।क्षणं न सन्तिष्ठति जीवलोकः क्षयोदयाभ्यां परिवर्तमानः

yathā yugānāṃ parivartanāni ciraṃ pravṛttāni vidhisvabhāvāt | kṣaṇaṃ na santiṣṭhati jīvalokaḥ kṣayodayābhyāṃ parivartamānaḥ

हिन्दी अर्थ

जैसे विधाताद्वारा नियत किये हुए स्वभावके अनुसार चिरकालसे युगोंके परिवर्तन होते रहते हैं, उसी प्रकार यह जीव-जगत्‌ हास और वृद्धिकि साथ निरन्तर चक्कर लगाता हुआ कभी क्षणभरके लिये भी स्थिर नहीं रहता

English

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स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.