Harivamsha Purana
161
अध्याय 161 / 318

Parva 2, Adhyāya 106

58 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ58 श्लोक

अध्याय 161

श्लोक 1

शम्बरासुरप्रद्युम्नानां मायामयं युद्धं, शम्बरस्य चिन्ता, देवराजस्य इन्द्रस्याज्ञया नारदेन प्रद्युम्नं तस्य पूर्वरूपस्य स्मारणं आवश्यकस्य कर्तव्यस्य सुज्ञानं च शम्बरस्तु ततः क्रुद्धः सूतमाह विशाम्पते ।शत्रुप्रमुखतो वीर रथं मे वाहय द्रुतम्

śambarāsurapradyumnānāṃ māyāmayaṃ yuddhaṃ, śambarasya cintā, devarājasya indrasyājñayā nāradena pradyumnaṃ tasya pūrvarūpasya smāraṇaṃ āvaśyakasya kartavyasya sujñānaṃ ca śambarastu tataḥ kruddhaḥ sūtamāha viśāmpate | śatrupramukhato vīra rathaṃ me vāhaya drutam

श्लोक 1–3 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—प्रजानाथ ! तब शम्बरासुरने कुपित होकर अपने सारथिसे कहा-“वीर! तुम शीघ्र ही मेरे रथको शत्रुके सामने ले चलो, जिससे अपना अप्रिय करनेवाले इस प्रद्युम्मको मैं अपने बाणोंसे मार डालूँ'। तब स्वामीका यह वचन सुनकर उनका प्रिय करनेवाले सूतने उस सुवर्णभूषित रथको आगे बढ़ाया। उस रथको आते देख प्रद्युम्नके नेत्र हर्षसे खिल उठे

अध्याय 161

श्लोक 2

यावदेनं शरैर्हन्मि मम विप्रियकारकम् ।ततो भर्तृवचः श्रुत्वा सूतस्तत्प्रियकारकः

yāvadenaṃ śarairhanmi mama vipriyakārakam | tato bhartṛvacaḥ śrutvā sūtastatpriyakārakaḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 3

रथं सञ्चोदयामास चामीकरविभूषितम् ।तं दृष्ट्वा रथमायान्तं प्रद्युम्नः फुल्ललोचनः

rathaṃ sañcodayāmāsa cāmīkaravibhūṣitam | taṃ dṛṣṭvā rathamāyāntaṃ pradyumnaḥ phullalocanaḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 4

सन्दधे चापमादाय शरं कनकभूषितम् ।तेनाहनत् सुसङ्क्रुद्धः कोपयञ्शम्बरं रणे

sandadhe cāpamādāya śaraṃ kanakabhūṣitam | tenāhanat susaṅkruddhaḥ kopayañśambaraṃ raṇe

हिन्दी अर्थ

उन्होंने अत्यन्त कुपित हो धनुष लेकर उसपर एक सुवर्णभूषित बाण रखा और उस बाणसे शम्बरासुरका क्रोध बढ़ाते हुए उसे रणभूमिमें घायल कर दिया

अध्याय 161

श्लोक 5

हृदये ताडितस्तेन देवशत्रुः सुविक्लवः ।रथशक्तिं समाश्रित्य तस्थौ सोऽथ विचेतनः

hṛdaye tāḍitastena devaśatruḥ suviklavaḥ | rathaśaktiṃ samāśritya tasthau so'tha vicetanaḥ

हिन्दी अर्थ

उस बाणने उसकी छातीमें चोट पहुँचायी थी, इससे वह देवशत्नु शम्बर अत्यन्त व्याकुल हो अचेत हो गया और रथशक्तिका सहारा लेकर टिका रहा

अध्याय 161

श्लोक 6

स चेतनां पुनः प्राप्य धनुरादाय शम्बरः ।विव्याध कार्ष्णिं कुपितः सप्तभिर्निशितैः शरैः

sa cetanāṃ punaḥ prāpya dhanurādāya śambaraḥ | vivyādha kārṣṇiṃ kupitaḥ saptabhirniśitaiḥ śaraiḥ

हिन्दी अर्थ

फिर होशमें आनेपर कुपित हुए शम्बरासुरने धनुष हाथमें ले सात पैंने बाणोंद्वारा श्रीकृष्णकुमारपर प्रहार किया

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श्लोक 7

तानप्राप्ताञ्शरान् सोऽथ सप्तभिः सप्तधाच्छिनत् ।शम्बरं च जघानाथ सप्तत्या निशितैः शरैः

tānaprāptāñśarān so'tha saptabhiḥ saptadhācchinat | śambaraṃ ca jaghānātha saptatyā niśitaiḥ śaraiḥ

हिन्दी अर्थ

उन बाणोंको अपने पास पहुँचनेसे पहले ही प्रयुम्नने सात सायकोंसे मारकर सात बार खण्डित किया, साथ ही सत्तर तीखे बाणोंसे शम्बरासुरको घायल कर दिया

अध्याय 161

श्लोक 8

पुनः शरसहस्रेण कङ्कबर्हिणवाससा ।अहनच्छम्बरं क्रोधाद् धाराभिरिव पर्वतम्

punaḥ śarasahasreṇa kaṅkabarhiṇavāsasā | ahanacchambaraṃ krodhād dhārābhiriva parvatam

हिन्दी अर्थ

इसके बाद गीध और मोरकी पाँख लगे हुए एक हजार बाणोंकी क्रोधपूर्वक वर्षा करके उन्होंने पुन: शम्बरासुरको आहत कर दिया, ठीक उसी तरह जैसे मेघ जलकी धाराओंसे पर्वतको आप्लावित कर देता है

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श्लोक 9

प्रदिशो विदिशश्चैव शरधारासमावृताः

pradiśo vidiśaścaiva śaradhārāsamāvṛtāḥ

श्लोक 9–17 का हिन्दी अर्थ

समस्त दिशाएँ और विदिशाएँ बाणधारासे आवृत हो गयीं । आकाशमें अन्धकार छा गया। दिनकर सूर्यका दीखना बंद हो गया । तब शम्बरासुरने वैद्युतास्त्रका प्रयोग करके अन्धकारका निवारण कर दिया और प्रदयुम्नके रथकी बैठकमें बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी। राजनू्‌ ! प्रद्युम्नने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए झुकी हुई गाँठवाले बाणसे शत्रुके उस अस्त्रजालको अनेक टुकड़ोंमें छिन्न-भिन्न कर दिया। श्रीकृष्णकुमारद्वारा जब बाणोंकी वह महावृष्टि शान्त कर दी गयी, तब कालशम्बरने मायाद्वारा वृक्षोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। वृक्षोंकी उस वर्षाको बढ़ती देख प्रद्युम्न क्रोधसे मूर्च्छित-से हो गये, फिर तो उन्होंने आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया और उसके द्वारा समस्त वृक्षोंका नाश कर डाला। वृक्षोंकी वर्षा नष्ट हो जानेपर उसने शिलासमूह बरसाना आरम्भ किया, परंतु प्रदयुम्नने युद्धस्थलमें वायव्यास्त्रका प्रयोग करके उन शिलाओंको दूर हटा दिया। प्रजानाथ! तब प्रतापी देवशत्रु शम्बरने दूसरी माया प्रकट की। उसने धनुष तानकर प्रद्युम्नके रथपर सिंह, व्याघ्र, वराह, तसक्षु (सेई), रीछ, वानर, मेघोंके समान काले-काले हाथी, घोड़े और ऊँटके रूपोंमें बाणोंका प्रहार किया । प्रद्युम्नने गान्धर्वास्त्रका प्रयोग करके उन सबके टुकड़े-टुकड़े कर डाले

अध्याय 161

श्लोक 10

अन्धकारीकृतं व्योम दिनकर्ता न दृश्यते ।ततोऽन्धकारमुत्सार्य वैद्युतास्त्रेण शम्बरः

andhakārīkṛtaṃ vyoma dinakartā na dṛśyate | tato'ndhakāramutsārya vaidyutāstreṇa śambaraḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 11

प्रद्युम्नस्य रथोपस्थे शरवर्षं मुमोच ह ।तदस्त्रजालं प्रद्युम्नः शरेणानतपर्वणा

pradyumnasya rathopasthe śaravarṣaṃ mumoca ha | tadastrajālaṃ pradyumnaḥ śareṇānataparvaṇā

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 12

चिच्छेद बहुधा राजन्दर्शयन् पाणिलाघवम् ।हते तस्मिन् महावर्षे शराणां कार्ष्णिना तदा

ciccheda bahudhā rājandarśayan pāṇilāghavam | hate tasmin mahāvarṣe śarāṇāṃ kārṣṇinā tadā

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 13

द्रुमवर्षं मुमोचाथ मायया कालशम्बरः ।द्रुमवर्षोच्छ्रितं दृष्ट्वा प्रद्युम्नः क्रोधमूर्च्छितः

drumavarṣaṃ mumocātha māyayā kālaśambaraḥ | drumavarṣocchritaṃ dṛṣṭvā pradyumnaḥ krodhamūrcchitaḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 14

आग्नेयास्त्रं मुमोचाथ तेन वृक्षाननाशयत् ।भस्मीभूते वृक्षवर्षे शिलासङ्घातमुत्सृजत्

āgneyāstraṃ mumocātha tena vṛkṣānanāśayat | bhasmībhūte vṛkṣavarṣe śilāsaṅghātamutsṛjat

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 15

प्रद्युम्नस्तं तु वायव्यैः प्रोत्सारयत संयुगे ।ततो मायां परां चक्रे देवशत्रुः प्रतापवान्

pradyumnastaṃ tu vāyavyaiḥ protsārayata saṃyuge | tato māyāṃ parāṃ cakre devaśatruḥ pratāpavān

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 16

सिंहान्व्याघ्रान् वराहांश्च तरक्षूनृक्षवानरान् ।वारणान् वारिदप्रख्यान्हयानुष्ट्रान्विशाम्पते

siṃhānvyāghrān varāhāṃśca tarakṣūnṛkṣavānarān | vāraṇān vāridaprakhyānhayānuṣṭrānviśāmpate

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 17

मुमोच धनुरायम्य प्रद्युम्नस्य रथोपरि ।गान्धर्वास्त्रेण चिच्छेद सर्वांस्तान्खण्डशस्तदा

mumoca dhanurāyamya pradyumnasya rathopari | gāndharvāstreṇa ciccheda sarvāṃstānkhaṇḍaśastadā

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 18

प्रद्युम्नेन तु सा माया हता तां वीक्ष्य शम्बरः ।अन्यां मायां मुमोचाथ शम्बरः क्रोधमूर्च्छितः

pradyumnena tu sā māyā hatā tāṃ vīkṣya śambaraḥ | anyāṃ māyāṃ mumocātha śambaraḥ krodhamūrcchitaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रद्युम्नने वह माया नष्ट कर दी, यह देखकर क्रोधसे मूर्च्छित हुए शम्बरासुरने दूसरी मायाका प्रयोग किया

अध्याय 161

श्लोक 19

गजेन्द्रान् भिन्नवदनान् षष्टिहायनयौवनान् ।महामात्रोत्तमारूढान् कल्पितान् रणकोविदान्

gajendrān bhinnavadanān ṣaṣṭihāyanayauvanān | mahāmātrottamārūḍhān kalpitān raṇakovidān

हिन्दी अर्थ

ततमो 5ध्याय: + ७९७ उसने साठ वर्षोंकी अवस्थावाले नवयौवनसम्पन्न बहुत-से गजराज प्रकट किये, जिनके मस्तकसे मदकी धारा फूट रही थी। उनके ऊपर अच्छे-अच्छे महावत बैठे थे। उन्हें युद्धकी सज्जासे सजाया गया था। वे सब-के-सब युद्धकी कलामें चतुर जान पड़ते थे

अध्याय 161

श्लोक 20

तामापतन्तीं मायां तु कार्ष्णिः कमललोचनः ।सैंहीं मायां समुत्स्रष्टुं चक्रे बुद्धिं महामनाः

tāmāpatantīṃ māyāṃ tu kārṣṇiḥ kamalalocanaḥ | saiṃhīṃ māyāṃ samutsraṣṭuṃ cakre buddhiṃ mahāmanāḥ

हिन्दी अर्थ

उस गजाकार मायाको अपनी ओर आती देख कमलनयन महामना श्रीकृष्णकुमारने सिंहरूपिणी मायाके प्रयोगका विचार किया

अध्याय 161

श्लोक 21

सा सृष्टा सिंहमाया तु रौक्मिणेयेन धीमता ।माया नागवती नष्टा आदित्येनेव शर्वरी

sā sṛṣṭā siṃhamāyā tu raukmiṇeyena dhīmatā | māyā nāgavatī naṣṭā ādityeneva śarvarī

हिन्दी अर्थ

बुद्धिमान्‌ रुक्मिणीनन्दनके द्वारा जब वह सिंहमयी माया रची गयी, तब जैसे सूर्योदयसे रात्रिका अन्धकार नष्ट होता है, उसी प्रकार वह हाथियोंसे युक्त माया विलीन हो गयी

अध्याय 161

श्लोक 22

निहतां हस्तिमायां तु तां समीक्ष्य महासुरः ।अन्यां सम्मोहिनीं मायां सोऽसृजद् दानवोत्तमः

nihatāṃ hastimāyāṃ tu tāṃ samīkṣya mahāsuraḥ | anyāṃ sammohinīṃ māyāṃ so'sṛjad dānavottamaḥ

हिन्दी अर्थ

उस हस्तिमयी मायाका नाश हुआ देख महान्‌ असुर दानव- राज शम्बरने दूसरी सम्मोहिनी नामक मायाका प्रयोग किया

अध्याय 161

श्लोक 23

तां दृष्ट्वा मोहिनीं नाम मायां मयविनिर्मिताम् ।संज्ञास्त्रेण तु प्रद्युम्नो नाशयामास वीर्यवान्

tāṃ dṛṣṭvā mohinīṃ nāma māyāṃ mayavinirmitām | saṃjñāstreṇa tu pradyumno nāśayāmāsa vīryavān

हिन्दी अर्थ

मयद्वारा निर्मित उस मोहिनी मायाको देखकर पराक्रमी प्रद्युम्नने संज्ञास्त्रके द्वारा उसका नाश कर डाला

अध्याय 161

श्लोक 24

शम्बरस्तु ततः क्रुद्धो हतया मायया तदा ।सैंहीं मायां महातेजाः सोऽसृजद् दानवेश्वरः

śambarastu tataḥ kruddho hatayā māyayā tadā | saiṃhīṃ māyāṃ mahātejāḥ so'sṛjad dānaveśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

जब वह माया भी नष्ट हो गयी, तब कुषपित हुए महातेजस्वी दानवराज शम्बरने सिंहमयी मायाकी सृष्टि की

अध्याय 161

श्लोक 25

सिंहानापततो दृष्ट्वा रौक्मिणेयः प्रतापवान् ।अस्त्रं गान्धर्वमादाय शरभानसृजत् तदा

siṃhānāpatato dṛṣṭvā raukmiṇeyaḥ pratāpavān | astraṃ gāndharvamādāya śarabhānasṛjat tadā

हिन्दी अर्थ

सिंहको अपने ऊपर आते देख प्रतापी रुक्मिणीकुमारने गान्धर्वास्त्र लेकर शरभोंकी सृष्टि की

अध्याय 161

श्लोक 26

तेऽष्टापदा बलोदग्रा नखदंष्ट्रायुधा रणे ।सिंहान् विद्रावयामासुर्वायुर्जलधरानिव

te'ṣṭāpadā balodagrā nakhadaṃṣṭrāyudhā raṇe | siṃhān vidrāvayāmāsurvāyurjaladharāniva

हिन्दी अर्थ

वे आठ पैरोंवाले तथा प्रचण्ड बलशाली थे। नख और दाढ़ें ही उनके आयुध थीं। जैसे वायु बादलोंको उड़ा देती है, उसी प्रकार उन शरभोंने शत्रुके उन सिंहोंको मार भगाया

अध्याय 161

श्लोक 27

सिंहान् विद्रवतो दृष्ट्वा माययाष्टापदेन वै ।शम्बरश्चिन्तयामास कथमेनं निहन्मि वै ।अहो मूर्खस्वभावोऽहं यन्मया न हतः शिशुः

siṃhān vidravato dṛṣṭvā māyayāṣṭāpadena vai | śambaraścintayāmāsa kathamenaṃ nihanmi vai | aho mūrkhasvabhāvo'haṃ yanmayā na hataḥ śiśuḥ

हिन्दी अर्थ

शरभमयी मायासे सिंहोंको भागते देख शम्बरासुर इस चिन्तामें पड़ा कि मैं किस प्रकार प्रधयुम्मका वध करूँ। अहो! मैं बड़े मूर्खस्वभावका हूँ, क्योंकि मैंने बाल्यावस्थामें ही इसका वध नहीं कर डाला

अध्याय 161

श्लोक 28

प्राप्तयौवनदेहस्तु कृतास्त्रश्चापि दुर्मतिः ।तत् कथं निहनिष्यामि शत्रुं रणशिरःस्थितम्

prāptayauvanadehastu kṛtāstraścāpi durmatiḥ | tat kathaṃ nihaniṣyāmi śatruṃ raṇaśiraḥsthitam

हिन्दी अर्थ

अब तो जवानीका शरीर पाकर यह दुर्बुद्धि शत्रु सम्पूर्ण अस्त्रोंका ज्ञाता भी हो चुका है। अत: युद्धके मुहानेपर खड़े हुए इस शत्रुका मैं किस प्रकार वध करूँगा

अध्याय 161

श्लोक 29

माया सा तिष्ठते तीव्रा पन्नगी नाम भीषणा ।दत्ता मे देवदेवेन हरेणासुरघातिना

māyā sā tiṣṭhate tīvrā pannagī nāma bhīṣaṇā | dattā me devadevena hareṇāsuraghātinā

हिन्दी अर्थ

अच्छा, वह पन्नगी नामक अत्यन्त दुःसह एवं भीषण माया अभी मेरे पास मौजूद है, जिसे असुरघाती देवाधिदेव महादेवजीने मुझे दिया था

अध्याय 161

श्लोक 30

तां सृजामि महामायामाशीविषसमाकुलाम् ।तया दह्येत दुष्टात्मा ह्येष मायामयो बली

tāṃ sṛjāmi mahāmāyāmāśīviṣasamākulām | tayā dahyeta duṣṭātmā hyeṣa māyāmayo balī

हिन्दी अर्थ

विषधर सर्पोंसे युक्त उस महामायाकी मैं सृष्टि करता हूँ, उससे यह बलवान्‌ मायामय दुष्टात्मा शत्रु अवश्य दग्ध हो जायगा

अध्याय 161

श्लोक 31

सा सृष्टा पन्नगी माया विषज्वालासमाकुला ।तया पन्नगमय्या तु सरथं सहवाजिनम्

sā sṛṣṭā pannagī māyā viṣajvālāsamākulā | tayā pannagamayyā tu sarathaṃ sahavājinam

श्लोक 31–35 का हिन्दी अर्थ

ऐसा सोचकर उस असुरने पन्नगी मायाकी सृष्टि की, जो विषकी ज्वालाओंसे याप्त थी। उस सर्पमयी मायासे शम्बरने रथ, घोड़े और सारथिसहित प्रद्युम्नको सर्पाकार बाणोंके बन्धनोंद्वारा बाँध लिया । अपनेको सर्पोंसे बद्ध होते देख वृष्णिवंशी प्र्युम्नने सर्पोको नाश करनेवाली सौपर्णी (गरुड़्सम्बन्धिनी ) मायाका चिन्तन किया। महात्मा प्रद्युम्नने ज्यों ही उस महामायाका चिन्तन किया, त्यों ही वहाँ बहुत-से गरुड़ पक्षी आकर विचरने लगे और वे महाविषधर सर्प नष्ट हो गये। उस सर्पमयी मायाके नष्ट होनेपर देवता और असुर सभी प्रदयुम्मकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे, *रुक्मिणीका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु वीर! तुमने बहुत अच्छा किया। तुम्हारे द्वारा जो इस मायाकी पराजय हुई है, इससे हम बहुत संतुष्ट हैं'

अध्याय 161

श्लोक 32

ससूत स हि प्रद्युम्नं बबन्ध शरबन्धनैः ।बध्यमानं तदा दृष्ट्वा आत्मानं वृष्णिवंशजः

sasūta sa hi pradyumnaṃ babandha śarabandhanaiḥ | badhyamānaṃ tadā dṛṣṭvā ātmānaṃ vṛṣṇivaṃśajaḥ

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 33

मायां सञ्चिन्तयामास सौपर्णीं सर्पनाशिनीम् ।सा चिन्तिता महामाया प्रद्युम्नेन महात्मना

māyāṃ sañcintayāmāsa sauparṇīṃ sarpanāśinīm | sā cintitā mahāmāyā pradyumnena mahātmanā

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 34

सुपर्णा विचरन्ति स्म सर्पा नष्टा महाविषाः ।भग्नायां सर्पमायायां प्रशंसन्ति सुरासुराः

suparṇā vicaranti sma sarpā naṣṭā mahāviṣāḥ | bhagnāyāṃ sarpamāyāyāṃ praśaṃsanti surāsurāḥ

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 35

साधु वीर महाबाहो रुक्मिण्यानन्दवर्धन ।यत्त्वया धर्षिता माया तेन स्म परितोषिताः

sādhu vīra mahābāho rukmiṇyānandavardhana | yattvayā dharṣitā māyā tena sma paritoṣitāḥ

अर्थ श्लोक 31 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 36

हतायां सर्पमायायां शम्बरोऽचिन्तयत् पुनः ।अस्ति मे कालदण्डाभो मुद्गरो हेमभूषितः

hatāyāṃ sarpamāyāyāṃ śambaro'cintayat punaḥ | asti me kāladaṇḍābho mudgaro hemabhūṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

उस सर्पमयी मायाके नष्ट होनेपर शम्बरासुरने पुन: सोचा * अभी मेरे पास सुवर्णभूषित मुदूगर है, जो कालदण्डके समान भयंकर है

अध्याय 161

श्लोक 37

तमप्रतिहतं युद्धे देवदानवमानवैः ।पुरा यो मम पार्वत्या दत्तः परमतुष्टया

tamapratihataṃ yuddhe devadānavamānavaiḥ | purā yo mama pārvatyā dattaḥ paramatuṣṭayā

हिन्दी अर्थ

वह युद्धमें देवता, दानवों और मानवोंके द्वारा भी प्रतिहत होनेवाला नहीं है, मैं उसीका प्रयोग करूँगा । पूर्वकालमें परम संतुष्ट हुई पार्वतीदेवीने मुझे वह मुदूगर दिया और इस प्रकार कहा—

अध्याय 161

श्लोक 38

गृहाण शम्बरेमं त्वं मुद्गरं हेमभूषितम् ।मया सृष्टं स्वदेहे वै तपः परमदुश्चरम्

gṛhāṇa śambaremaṃ tvaṃ mudgaraṃ hemabhūṣitam | mayā sṛṣṭaṃ svadehe vai tapaḥ paramaduścaram

हिन्दी अर्थ

शम्बर! तू यह सुवर्णभूषित मुदूगर ग्रहण कर। मैंने अपने शरीरसे अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके इसकी सृष्टि की है

अध्याय 161

श्लोक 39

मायान्तकरणं नाम सर्वासुरविनाशनम् ।अनेन दानवौ रौद्रौ बलिनौ कामरूपिणौ

māyāntakaraṇaṃ nāma sarvāsuravināśanam | anena dānavau raudrau balinau kāmarūpiṇau

श्लोक 39–40 का हिन्दी अर्थ

यह मायाओंका अन्त करनेवाला तथा समस्त असुरोंका विनाशक है। इसके द्वारा मैंने इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले दो बलवान्‌ एवं भयंकर दानव शुम्भ और निशुम्भका उनके सैनिकगणोंसहित संहार किया है। प्राणसंकटकी स्थिति आनेपर ही तुझे अपने शत्रुपर इस मुदूगरका प्रयोग करना चाहिये

अध्याय 161

श्लोक 40

शुम्भश्चैव निशुम्भश्च सगणौ सूदितौ मया ।प्राणसंशयमापन्ने त्वया मोक्ष्यः स शत्रवे

śumbhaścaiva niśumbhaśca sagaṇau sūditau mayā | prāṇasaṃśayamāpanne tvayā mokṣyaḥ sa śatrave

अर्थ श्लोक 39 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 41

इत्युक्त्वा पार्वती देवी तत्रैवान्तरधीयत ।तदहं मुद्गरं श्रेष्ठं मोचयिष्यामि शत्रवे

ityuktvā pārvatī devī tatraivāntaradhīyata | tadahaṃ mudgaraṃ śreṣṭhaṃ mocayiṣyāmi śatrave

हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर पार्वतीदेवी वहीं अन्तर्धान हो गयी थीं, अत: मैं उसी श्रेष्ठ मुद्गरका अपने शत्रुपर प्रहार करूँगा

अध्याय 161

श्लोक 42

तस्य विज्ञाय चित्तं तु देवराजोऽभ्यभाषत ।गच्छ नारद शीघ्रं त्वं प्रद्युम्नस्य रथं प्रति

tasya vijñāya cittaṃ tu devarājo'bhyabhāṣata | gaccha nārada śīghraṃ tvaṃ pradyumnasya rathaṃ prati

श्लोक 42–45 का हिन्दी अर्थ

उस समय उसके मनोभावको जानकर देवराज इन्द्रने नारदजीसे कहा—नारदजी! आप शीघ्र ही प्रद्युम्नके रथके पास चले जाइये और उन महाबाहु वीरको समझाइये तथा उन्हें उनके पूर्वजन्मका स्मरण दिलाइये। साथ ही शम्बरासुरके वधके लिये उन्हें वैष्णवास्त्र प्रदान कीजिये । असुरसंहारके कर्ममें लगे हुए इन्हें अभेद्य कवच भी दीजिये । इन्द्रके ऐसा कहनेपर नारदजी बड़ी उतावलीके साथ वहाँ गये और आकाशमें खड़े होकर मकरध्वज कामसे इस प्रकार बोले-' कुमार! देखो, मैं देवगन्धर्व नारद यहाँ आया हूँ। देवराज इन्द्रने मुझे तुमको समझानेके लिये यहाँ भेजा है'

अध्याय 161

श्लोक 43

सम्बोधय महाबाहुं पूर्वजातिं च मोक्षय ।वैष्णवास्त्रं प्रयच्छास्मै वधार्थं शम्बरस्य च

sambodhaya mahābāhuṃ pūrvajātiṃ ca mokṣaya | vaiṣṇavāstraṃ prayacchāsmai vadhārthaṃ śambarasya ca

अर्थ श्लोक 42 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 44

अभेद्यं कवचं चास्य प्रयच्छासुरसूदने ।एवमुक्तो मघवता नारदः प्रययौ त्वरम्

abhedyaṃ kavacaṃ cāsya prayacchāsurasūdane | evamukto maghavatā nāradaḥ prayayau tvaram

अर्थ श्लोक 42 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 45

आकाशेऽधिष्ठितोऽवोचन्मकरध्वजकेतनम् ।कुमार पश्य मां प्राप्तं देवगन्धर्वनारदम् ।प्रेषितं देवराजेन तव सम्बोधनाय वै

ākāśe'dhiṣṭhito'vocanmakaradhvajaketanam | kumāra paśya māṃ prāptaṃ devagandharvanāradam | preṣitaṃ devarājena tava sambodhanāya vai

अर्थ श्लोक 42 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 46

स्मर त्वं पूर्वकं भावं कामदेवोऽसि मानद ।हरकोपानलाद् दग्धस्तेनानङ्ग इहोच्यसे

smara tvaṃ pūrvakaṃ bhāvaṃ kāmadevo'si mānada | harakopānalād dagdhastenānaṅga ihocyase

हिन्दी अर्थ

ततमोउध्याय: + ७९९ 'मानद! तुम अपने पूर्वजन्मका स्मरण करो। तुम साक्षात्‌ कामदेव हो। भगवान्‌ शड्धरकी क्रोधाग्निसे दग्ध हो गये थे, इसलिये इस जगतमें अनड् कहलाते हो

अध्याय 161

श्लोक 47

त्वं वृष्णिवंशजातोऽसि रुक्मिण्या गर्भसम्भवः ।जातोऽसि केशवेन त्वं प्रद्युम्न इति कीर्त्यसे

tvaṃ vṛṣṇivaṃśajāto'si rukmiṇyā garbhasambhavaḥ | jāto'si keśavena tvaṃ pradyumna iti kīrtyase

हिन्दी अर्थ

तुम्हारा वर्तमान जन्म वृष्णिवंशमें हुआ हैं । तुम रुक्मिणीदेवीके गर्भसे उत्पन्न हुए हो। साक्षात भगवान्‌ केशवने तुम्हें जन्म दिया है। तुम प्रद्युम्न नामसे पुकारे जाते हो

अध्याय 161

श्लोक 48

आहृत्य शम्बरेण त्वमिहानीतोऽसि मानद ।सप्तरात्रे त्वसम्पूर्णे सूतिकागारमध्यतः

āhṛtya śambareṇa tvamihānīto'si mānada | saptarātre tvasampūrṇe sūtikāgāramadhyataḥ

हिन्दी अर्थ

मानद! तुम्हारे जन्मकी सातवों रात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि शम्बरासुर तुम्हें सूतिकागारसे हरकर यहाँ उठा लाया

अध्याय 161

श्लोक 49

वधार्थं शम्बरस्य त्वं ह्रियमाणो ह्युपेक्षितः ।केशवेन महाबाहो देवकार्यार्थसिद्धये

vadhārthaṃ śambarasya tvaṃ hriyamāṇo hyupekṣitaḥ | keśavena mahābāho devakāryārthasiddhaye

हिन्दी अर्थ

महावाहं देवताओंका कार्य सिद्ध करने और शम्बरासुरको मारनक लिये ही भगवान्‌ श्रीकृष्णने तुम्हारे अपहरणकी उप की

अध्याय 161

श्लोक 50

यैषा मायावती नाम भार्या वै शम्बरस्य तु ।रतिं तां विद्धि कल्याणीं तव भार्यां पुरातनीम्

yaiṣā māyāvatī nāma bhāryā vai śambarasya tu | ratiṃ tāṃ viddhi kalyāṇīṃ tava bhāryāṃ purātanīm

हिन्दी अर्थ

यह जो मायावती नामसे प्रसिद्ध शम्बरासुरको भार्या बनी बैठी है, इसे तुम अपनी कल्याणमयी पुर पत्नी रति समझो

अध्याय 161

श्लोक 51

तव संरक्षणार्थाय शम्बरस्य गृहेऽवसत् ।मायां शरीरजां तस्य मोहनार्थं दुरात्मनः

tava saṃrakṣaṇārthāya śambarasya gṛhe'vasat | māyāṃ śarīrajāṃ tasya mohanārthaṃ durātmanaḥ

श्लोक 51–53 का हिन्दी अर्थ

तुम्हारे शरीरकी रक्षा करनेजे लिये ही इसने शम्बरासुरके घरमें निवास किया है। उच दुरात्मा दैत्यको मोहनेके लिये यह अपने शरीरसे उऊ मायामयी स्त्री प्रकट करके उसकी प्रसन्नताके लिये सदा भेजा करती है। प्रद्युम्न ! यह सब समाचार जानकर ही तुम्हारी पत्नी वहाँ स्थिरतापूर्वक रहती है। वीर! टुन वैष्णवास्त्रके द्वारा युद्धमें शम्बरासुरका वध कर्क अपनी भार्या मायावतीको साथ ले द्वारकाको जानेयग्द हो

अध्याय 161

श्लोक 52

रतेः सम्पादनार्थाय प्रेषयत्यनिशं तदा ।एवं प्रद्युम्न बुद्ध्वा वै तत्र भार्या प्रतिष्ठिता

rateḥ sampādanārthāya preṣayatyaniśaṃ tadā | evaṃ pradyumna buddhvā vai tatra bhāryā pratiṣṭhitā

अर्थ श्लोक 51 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 53

हत्वा तं शम्बरं वीर वैष्णवास्त्रेण संयुगे ।गृह्य मायावतीं भार्यां द्वारकां गन्तुमर्हसि

hatvā taṃ śambaraṃ vīra vaiṣṇavāstreṇa saṃyuge | gṛhya māyāvatīṃ bhāryāṃ dvārakāṃ gantumarhasi

अर्थ श्लोक 51 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 54

गृहाण वैष्णवं चास्त्रं कवचं च महाप्रभम् ।शक्रेण तव सङ्गृह्य प्रेषितं शत्रुसूदन

gṛhāṇa vaiṣṇavaṃ cāstraṃ kavacaṃ ca mahāprabham | śakreṇa tava saṅgṛhya preṣitaṃ śatrusūdana

हिन्दी अर्थ

शत्रुसूदन! यह वैष्णव अस्त्र तथा अत्यन्त कान्तिमान्‌ कवच संग्रह करके इन्द्रने तुम्हर लिये भेजा है। तुम इन्हें ग्रहण करो

अध्याय 161

श्लोक 55

शृणु मे ह्यपरं वाक्यं क्रियतामविशङ्कया ।अस्य देवरिपोस्तात मुद्गरो नित्यमूर्जितः

śṛṇu me hyaparaṃ vākyaṃ kriyatāmaviśaṅkayā | asya devaripostāta mudgaro nityamūrjitaḥ

श्लोक 55–56 का हिन्दी अर्थ

अब टुम मेरी दूसरी बात सुनो और निःशड्ड होकर उसका पालन करो। तात! इस देवद्रोहीका मुदूगर नित्य शक्तिशाली है पार्वतीदेवीने प्रसन्न होकर वह शत्रुनाशक मुदूगर इसे प्रदान किया था। यह संग्राममें देवताओं, दानवों और मानवोंकि लिये भी अमोघ है

अध्याय 161

श्लोक 56

पार्वत्यां परितुष्टायां दत्तः शत्रुनिबर्हणः ।अमोघश्चैव सङ्ग्रामे देवदानवमानवैः

pārvatyāṃ parituṣṭāyāṃ dattaḥ śatrunibarhaṇaḥ | amoghaścaiva saṅgrāme devadānavamānavaiḥ

अर्थ श्लोक 55 के साथ

अध्याय 161

श्लोक 57

तदस्त्रप्रविघातार्थं देवीं त्वं स्मर्तुमर्हसि ।स्तव्या चैव नमस्या च महादेवी रणोत्सुकैः

tadastrapravighātārthaṃ devīṃ tvaṃ smartumarhasi | stavyā caiva namasyā ca mahādevī raṇotsukaiḥ

हिन्दी अर्थ

उस अस्त्रका निवारण करनेके लिये तुम्हें पार्वतीदेवीका स्मरण करना चाहिये । युद्धके लिये उत्सुक रहनेवाले वीरोंको महादेवी पार्वतीको स्तुति और वन्दना अवश्य करनी चाहिये

अध्याय 161

श्लोक 58

तत्र वै क्रियतां यत्नः सङ्ग्रामे रिपुणा सह ।इत्युक्त्वा नारदो वाक्यं प्रययौ यत्र वासवः

tatra vai kriyatāṃ yatnaḥ saṅgrāme ripuṇā saha | ityuktvā nārado vākyaṃ prayayau yatra vāsavaḥ

हिन्दी अर्थ

शत्रुके साथ संग्राम करते समय तुम्हें पार्वतीदेवीकी स्तुतिके लिये भी अवश्य प्रयत्न करना चाहिये।' ऐसा कहकर नारदजी जहाँ इन्द्र थे, वहीं चले गये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.