अध्याय 161
श्लोक 1
शम्बरासुरप्रद्युम्नानां मायामयं युद्धं, शम्बरस्य चिन्ता, देवराजस्य इन्द्रस्याज्ञया नारदेन प्रद्युम्नं तस्य पूर्वरूपस्य स्मारणं आवश्यकस्य कर्तव्यस्य सुज्ञानं च शम्बरस्तु ततः क्रुद्धः सूतमाह विशाम्पते ।शत्रुप्रमुखतो वीर रथं मे वाहय द्रुतम्
śambarāsurapradyumnānāṃ māyāmayaṃ yuddhaṃ, śambarasya cintā, devarājasya indrasyājñayā nāradena pradyumnaṃ tasya pūrvarūpasya smāraṇaṃ āvaśyakasya kartavyasya sujñānaṃ ca śambarastu tataḥ kruddhaḥ sūtamāha viśāmpate | śatrupramukhato vīra rathaṃ me vāhaya drutam
श्लोक 1–3 का हिन्दी अर्थ
वैशम्पायनजी कहते हैं—प्रजानाथ ! तब शम्बरासुरने कुपित होकर अपने सारथिसे कहा-“वीर! तुम शीघ्र ही मेरे रथको शत्रुके सामने ले चलो, जिससे अपना अप्रिय करनेवाले इस प्रद्युम्मको मैं अपने बाणोंसे मार डालूँ'। तब स्वामीका यह वचन सुनकर उनका प्रिय करनेवाले सूतने उस सुवर्णभूषित रथको आगे बढ़ाया। उस रथको आते देख प्रद्युम्नके नेत्र हर्षसे खिल उठे