Harivamsha Purana
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अध्याय 150 / 318

Parva 2, Adhyāya 95

39 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ39 श्लोक

अध्याय 150

श्लोक 1

प्रद्युम्नेन प्रभावत्यां वर्षायाः वर्णनं कुर्वन्तं स्वकुलस्य परिचयदानं नभो नभस्येऽथ निरीक्ष्य मासि कामस्तदा तोयदवृन्दकीर्णम् ।प्रभावतीं चारुविशालनेत्रामुवाच पूर्णेन्दुनिकाशवक्त्रः

pradyumnena prabhāvatyāṃ varṣāyāḥ varṇanaṃ kurvantaṃ svakulasya paricayadānaṃ nabho nabhasye'tha nirīkṣya māsi kāmastadā toyadavṛndakīrṇam | prabhāvatīṃ cāruviśālanetrāmuvāca pūrṇendunikāśavaktraḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले प्रद्युम्नने भाद्रपदमासमें आकाशको मेघोंकी घटासे आच्छन्न हुआ देख उस समय मनोहर एवं विशाल नेत्रोंबाली प्रभावतीसे कहा—

अध्याय 150

श्लोक 2

तवाननाभो वरगात्रि चन्द्रो न दृश्यते सुन्दरि चारुबिम्बः ।त्वत्केशपाशप्रतिमैर्निरुद्धो बलाहकैश्चारुनिरन्तरोरु

tavānanābho varagātri candro na dṛśyate sundari cārubimbaḥ | tvatkeśapāśapratimairniruddho balāhakaiścārunirantaroru

हिन्दी अर्थ

मनोहर एवं परस्पर सटी हुई जाँघोंवाली वराड़ी ! सुन्दरि! इस समय सुन्दर बिम्बवाला चन्द्रमा, जो तुम्हारे मुखके समान मनोरम जान पड़ता था, नहीं दिखायी देता है। तुम्हारे इन केशपाशोंके समान काले बादलोंने उसे छिपा दिया है

अध्याय 150

श्लोक 3

सन्दृश्यते सुभ्रु तडिद् घनस्था त्वं हेमचार्वाभरणान्वितेव ।मुञ्चन्ति धाराश्च घना नदन्तस्त्वद्धारयष्टेः सदृशा वराङ्गि

sandṛśyate subhru taḍid ghanasthā tvaṃ hemacārvābharaṇānviteva | muñcanti dhārāśca ghanā nadantastvaddhārayaṣṭeḥ sadṛśā varāṅgi

हिन्दी अर्थ

सुन्दर भौंहोंवाली सुन्दरि! यह जो. मेघोंके अड्में विद्युत्‌ दिखायी देती है, वह सोनेके मनोहर आशभूषणोंसे भूषित हुई तुम-जैसी ही प्रतीत होती है और ये गरजते हुए मेघ तुम्हारे मौक्तिक हारोंके समान जलकी स्वच्छ धाराएँ गिरा रहे हैं

अध्याय 150

श्लोक 4

घनप्रदेशेषु बलाकपङक्तयस्त्वद्दन्तपङ्क्तिप्रतिमाविभान्ति ।निमग्नपद्मानि सरित्सु सुभ्रु न भान्ति तोयानि रयाकुलानि

ghanapradeśeṣu balākapaṅaktayastvaddantapaṅktipratimāvibhānti | nimagnapadmāni saritsu subhru na bhānti toyāni rayākulāni

हिन्दी अर्थ

सुभ्रु! आकाशमें जहाँ बादल घिरे हुए हैं, उन प्रदेशोंमें बगुलोंकी पंक्तियाँ तुम्हारे दाँतोंकी श्रेणियोंके समान सुशोभित हो रही हैं। सरिताओंके जलोंमें कमलोंके समूह डूब गये हैं और वे जल महान्‌ वेगसे व्याप्त हैं; अत: उनकी विशेष शोभा नहीं हो रही है

अध्याय 150

श्लोक 5

अमी घना वायुवशोपयाता बलाकमालामलचारुदन्ताः ।अन्योन्यमभ्याहनितुं प्रवृत्ता वनेषु नागा इव शुक्लदन्ताः

amī ghanā vāyuvaśopayātā balākamālāmalacārudantāḥ | anyonyamabhyāhanituṃ pravṛttā vaneṣu nāgā iva śukladantāḥ

हिन्दी अर्थ

ये बादल वायुके अधीन हो रहे हैं। बगुलोंकी पंक्तियाँ उनके निर्मल एवं मनोहर दाँतोंके समान शोभा पाती हैं। ये वनोंमें सफेद दाँतवाले हाथियोंके समान एक- दूसरेसे टक्कर लेनेके लिये उद्यत हैं

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श्लोक 6

धनुस्त्रिवर्णं वरगात्रि पश्य कृतं तवापाङ्गमिवाननस्थम् ।विभूषयन्तं गगनं घनाश्च प्रहर्षणं कामिजनस्य कान्ते

dhanustrivarṇaṃ varagātri paśya kṛtaṃ tavāpāṅgamivānanastham | vibhūṣayantaṃ gaganaṃ ghanāśca praharṣaṇaṃ kāmijanasya kānte

हिन्दी अर्थ

सुन्दर अड्ञोंवाली प्राणवल्लभे ! वह इन्द्र-धनुष देखो, जो तुम्हारे मुखमण्डलमें स्थित नेत्रोंके कोणभाग-सा तिरंगा बना हुआ है। वह आकाश और बादलोंकी शोभा बढ़ाता हुआ कामीजनोंको महान्‌ हर्ष प्रदान करता है

अध्याय 150

श्लोक 7

घनान् नदन्तः प्रतिनर्दमानान् निरीक्ष्यसुश्रोणि शिखीन्प्रहृष्टान् ।समादृतानुद्धतपिच्छभारान् प्रियाभिरामानुपनृत्यमानान्

ghanān nadantaḥ pratinardamānān nirīkṣyasuśroṇi śikhīnprahṛṣṭān | samādṛtānuddhatapicchabhārān priyābhirāmānupanṛtyamānān

हिन्दी अर्थ

अपनी बोली बोलते हुए मोर बादलोंको गरजते देख अत्यन्त हर्षमें भरकर नृत्य-कलाके प्रति आदरभाव रखते हुए पंखोंके भारोंको ऊपर उठाकर आस-पास ही नृत्य कर रहे हैं; इस अवस्थामें ये बहुत ही प्रिय एवं मनोहर प्रतीत होते हैं। तुम इनकी ओर दृष्टिपात करो

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श्लोक 8

हर्म्येषु चान्ये शशिपाण्डुरेषु यजन्ति सुश्रोणि मयूरसङ्घाः ।मुहूर्तशोभामतिचारुरूपां दत्त्वा पतन्तो वलभीपुटेषु

harmyeṣu cānye śaśipāṇḍureṣu yajanti suśroṇi mayūrasaṅghāḥ | muhūrtaśobhāmaticārurūpāṃ dattvā patanto valabhīpuṭeṣu

हिन्दी अर्थ

मोडध्याय: + ७४९ अट्टालिकाऑपर बैठे हुए दूसरे मयूर-समुदाय वहाँ दो घड़ीके लिये अत्यन्त मनोहर शोभा प्रदान करके छजों पर उड़ते हुए बड़ी शोभा पा रहे हैं

अध्याय 150

श्लोक 9

प्रक्लिन्नपक्षास्तरुमस्तकेषु मुहूर्तचूडामणितां विधाय ।प्रयान्ति भूमिं नवशाद्वलानामाशङ्कमाना धृतचारुदेहाः

praklinnapakṣāstarumastakeṣu muhūrtacūḍāmaṇitāṃ vidhāya | prayānti bhūmiṃ navaśādvalānāmāśaṅkamānā dhṛtacārudehāḥ

हिन्दी अर्थ

मनोहर देह धारण करनेवाले मोर वृक्षोंकी सर्वोच्च शिखाओंपर बैठे हैं। उनकी पाँखें भींग गयी हैं और वे दो घड़ीके लिये उन वृक्षोंके सिरोंपर चूड़ामणिकी-सी शोभाकी सृष्टि करके नयी-नयी घासोंसे ढकी हुई भूमिपर जा रहे हैं। उनके मनमें यह शड्डा है कि ये घासें भूमिसे भिन्न हैं या अभिन्न

अध्याय 150

श्लोक 10

प्रवाति धारान्तरनिःसृतश्च सुखोऽनिलश्चन्दनपङ्कशीतः ।कदम्बसर्जार्जुनपुष्पभूतं समावहन् गन्धमनङ्गबन्धुम्

pravāti dhārāntaraniḥsṛtaśca sukho'nilaścandanapaṅkaśītaḥ | kadambasarjārjunapuṣpabhūtaṃ samāvahan gandhamanaṅgabandhum

हिन्दी अर्थ

जलकी धाराओंके बीचसे निकलकर सुखदायिनी हवा चल रही है, जो चन्दनपड़के समान शीतल प्रतीत होती है। यह कदम्ब, सर्ज और अर्जुनके फूलोंकी सुगन्ध लिये आ रही है। वह सुगन्ध क्रामोद्दीपनमें सहायक हो रही है

अध्याय 150

श्लोक 11

रतिश्रमस्वेदविनाशहेतुर्नवोदभारानयने च हेतुः ।न मारुतः स्याद् यदि चारुगात्रि न मेघकालो मम वल्लभः स्यात्

ratiśramasvedavināśaheturnavodabhārānayane ca hetuḥ | na mārutaḥ syād yadi cārugātri na meghakālo mama vallabhaḥ syāt

हिन्दी अर्थ

मनोहर अज्ञोंवाली प्रिये! यदि इस समय रतिके श्रमसे प्रकट होनेवाले पसीनोंको मिटाने और नूतन जलके भारको वींच लानेमें सहायक यह वायु न चलती होती तो यह वर्षाकाल मुझे अधिक प्यारा न लगता

अध्याय 150

श्लोक 12

एवंविधेषु प्रियसङ्गमेषु रतावसाने यदुपैति वायुः ।रतिश्रमस्वेदहरः सुगन्धी ततः परं किं सुखमस्ति लोके

evaṃvidheṣu priyasaṅgameṣu ratāvasāne yadupaiti vāyuḥ | ratiśramasvedaharaḥ sugandhī tataḥ paraṃ kiṃ sukhamasti loke

हिन्दी अर्थ

जब दस प्रकार प्रियजनोंके समागम प्राप्त हों, उस अवसरपर तिक्रीड़ाके अन्तमें जो रतिश्रमजनित स्वेदबिन्दुओंको हर लेनेवाली सुगन्धित वायु अपने पास आती है, उससे बढ़कर सुख इस संसारमें दूसरा कौन है?

अध्याय 150

श्लोक 13

जलाप्लुतानीक्ष्य महानदीनां सुगात्रि हंसाः पुलिनानि हृष्टाः ।गताः भ्रमं मानसवासलुब्धाः ससारसाः क्रौञ्चगणानुविद्धाः

jalāplutānīkṣya mahānadīnāṃ sugātri haṃsāḥ pulināni hṛṣṭāḥ | gatāḥ bhramaṃ mānasavāsalubdhāḥ sasārasāḥ krauñcagaṇānuviddhāḥ

हिन्दी अर्थ

सुन्दर अद्भवाली प्राणवल्लभे! बड़ी-बड़ी नदियोंके टोंको जलमें निमग्न देख सारस और क्रौज्ञोंसहित रस मानसरोवरमें निवासके लिये लुब्ध हो बड़े हर्षके पाथ वहाँतक जानेका परिश्रम स्वीकार करते हैं

अध्याय 150

श्लोक 14

न भान्ति नद्यो न सरांसि चैव हतत्विषीवायतचारुनेत्रे ।गतेषु हंसेष्वथ सारसेषु रथाङ्गतुल्याह्वयनेषु चैव

na bhānti nadyo na sarāṃsi caiva hatatviṣīvāyatacārunetre | gateṣu haṃseṣvatha sāraseṣu rathāṅgatulyāhvayaneṣu caiva

हिन्दी अर्थ

विशाल एवं मनोहर नेत्रवाली प्रिये ! हंसों, सारसों और त्रक्रवाकोंके चले जानेपर नदी और तालाब श्रीहीन- पे प्रतीत होते हैं। उनके बिना न तो नदियाँ अच्छी नगती हैं और न सरोवर ही

अध्याय 150

श्लोक 15

भोगैकदेशेन शुभं शयानं ध्रुवं जगन्नाथमुपेन्द्रमीशम् ।निद्राभ्युपेता वरकालतज्ज्ञा श्रियं प्रणम्योत्तरचारुरूपाम्

bhogaikadeśena śubhaṃ śayānaṃ dhruvaṃ jagannāthamupendramīśam | nidrābhyupetā varakālatajjñā śriyaṃ praṇamyottaracārurūpām

हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ वर्षाकाल पर उसमें शयन करनेवाले भगवान्‌ विष्णुको जाननेवाली गोगनिद्रा निश्चय ही लोकोत्तर मनोहर रूप धारण ररनेवाली श्रीदेवीको प्रणाम करके शेषके शरीरके एक रशमें सोये हुए मज़लमय ईश्वर जगन्नाथ उपेन्द्रके निकट आयी है

अध्याय 150

श्लोक 16

निद्रायमाणे भगवत्युपेन्द्रे मेघाम्बराक्रान्तनिशाकरोऽद्य ।पद्मामलाभः कमलायताक्षि कृष्णस्य वक्त्रानुकृतिं करोति

nidrāyamāṇe bhagavatyupendre meghāmbarākrāntaniśākaro'dya | padmāmalābhaḥ kamalāyatākṣi kṛṣṇasya vaktrānukṛtiṃ karoti

हिन्दी अर्थ

प्रफुछ कमलके समान विशाल नेत्रोिंवाली प्रियतमे ! भगवान्‌ उपेन्द्रके योगनिद्राको स्वीकार कर लेनेपर श्वेत कमलके समान अमल कान्तिवाले चन्द्रमा अब मेघरूपी अम्बर (वस्त्र)-से आच्छादित हो भगवान्‌ श्रीकृष्णके मुखका अनुकरण कर रहे हैं

अध्याय 150

श्लोक 17

कदम्बनीपार्जुनकेतकानां स्रजो ध्रुवं कृष्णमुपानयन्ति ।पुष्पाणि चान्यान्यृतवः समस्ताः कृष्णात् प्रसादानभिकाङ्क्षमाणाः

kadambanīpārjunaketakānāṃ srajo dhruvaṃ kṛṣṇamupānayanti | puṣpāṇi cānyānyṛtavaḥ samastāḥ kṛṣṇāt prasādānabhikāṅkṣamāṇāḥ

हिन्दी अर्थ

सारी तऋ्तुएँ भगवान्‌ श्रीकृष्णसे कृपाप्रसाद पानेकी अभिलाषा रखकर निश्चय ही उनकी सेवामें कदम्ब, नीप, अर्जुन और केवड़ोंके गजरे तथा दूसरे-दूसरे पुष्प ले आती हैं

अध्याय 150

श्लोक 18

नागाश्चरन्तो विषदिग्धवक्त्राः स्पृशन्ति पुष्पाण्यपि पादपान्यान् ।पेपीयमानान् भ्रमरैर्जनानां कौतूहलं ते जनयन्त्यतीव

nāgāścaranto viṣadigdhavaktrāḥ spṛśanti puṣpāṇyapi pādapānyān | pepīyamānān bhramarairjanānāṃ kautūhalaṃ te janayantyatīva

हिन्दी अर्थ

जिन सुकुमारतर वृक्षों एवं फूलोंके रस शभ्रमर बारम्बार पीते हैं, उन्हें विषपूर्ण मुखवाले सर्प स्वच्छन्द विचरते हुए जब छू देते हैं, तब उनके स्पर्शमात्रसे वे कुम्हला जाते हैं। इस प्रकार वे लोगोंको अत्यन्त आश्चर्यमें डाल रहे हैं

अध्याय 150

श्लोक 19

तोयातिभाराम्बुदवृन्दनद्धं नभः पतिष्यन्तमिवाभिवीक्ष्य ।निपानगम्भीरमभिन्नवृष्टं मनोहरं चारुमुखस्तनोरु

toyātibhārāmbudavṛndanaddhaṃ nabhaḥ patiṣyantamivābhivīkṣya | nipānagambhīramabhinnavṛṣṭaṃ manoharaṃ cārumukhastanoru

हिन्दी अर्थ

निपान*-सदूश गम्भीर आकाशको जलके भारी भारसे युक्त मेघोंकी घटाद्वारा बँंधकर गिरता हुआ- सा देख तुम्हारे मनोहर एवं सुन्दर मुख, स्तन और ऊरु कामोद्रेकवश पसीनेसे भर गये हैं

अध्याय 150

श्लोक 20

बलाकमालाकुलमाल्यदाम्ना निरीक्ष रम्यं घनवृन्दमेतत् ।सस्यानि भूमावभिवर्षमाणं जगद्धितार्थं विमलाङ्गयष्टे

balākamālākulamālyadāmnā nirīkṣa ramyaṃ ghanavṛndametat | sasyāni bhūmāvabhivarṣamāṇaṃ jagaddhitārthaṃ vimalāṅgayaṣṭe

हिन्दी अर्थ

निर्मल अज््यष्टिवाली सुन्दरि! जो बगुलोंकी पाँतसे परिपूर्ण होकर मानो श्रेत पुष्पहारसे अलंकृत हुआ है, उस रमणीय मेघसमूहकी ओर तो देखो; यह जगत्‌के हितके लिये पृथ्वीपर मानो अन्नकी वर्षा करता है

अध्याय 150

श्लोक 21

जलावलम्बाम्बुदवृन्दकर्षी घनैर्घनान् योधयतीव वायुः ।प्रवृत्तचक्रो नृपतिर्वनस्थान् गजान्गजैः स्वैरिव वीर्यदृप्तान्

jalāvalambāmbudavṛndakarṣī ghanairghanān yodhayatīva vāyuḥ | pravṛttacakro nṛpatirvanasthān gajāngajaiḥ svairiva vīryadṛptān

हिन्दी अर्थ

पानीके आधारभूत मेघसमूहोंको अपने साथ खींच लानेवाला पावससमीर बादलोंसे बादलोंको लड़ाता-सा जान पड़ता है; मानो कोई चक्रवर्ती नरेश बलके मदसे उन्मत्त हुए जंगली हाथियोंको अपने गजराजोंके साथ लड़ा रहा हो

अध्याय 150

श्लोक 22

अभौममम्भो विसृजन्ति मेघाः पूतं पवित्रं पवनैः सुगन्धि ।हर्षावहं चातकबर्हिणानां वराण्डजानां जलदप्रियाणाम्

abhaumamambho visṛjanti meghāḥ pūtaṃ pavitraṃ pavanaiḥ sugandhi | harṣāvahaṃ cātakabarhiṇānāṃ varāṇḍajānāṃ jaladapriyāṇām

हिन्दी अर्थ

ये मेघ शुद्ध, पतरित्र और सुगन्धित वायुसे सुवासित उस दिव्य जलकी वर्षा करते हैं, जो मेघोंके प्रेमी चातक और मोर आदि श्रेष्ठ पक्षियोंको हर्ष प्रदान करता है

अध्याय 150

श्लोक 23

प्लवङ्गमः पोडशपक्षशायी विरौति गोष्ठः सहकामिनीभिः ।ऋचो द्विजातिः प्रियसत्यधर्मा यथा सुशिष्यैः परिवार्यमाणः

plavaṅgamaḥ poḍaśapakṣaśāyī virauti goṣṭhaḥ sahakāminībhiḥ | ṛco dvijātiḥ priyasatyadharmā yathā suśiṣyaiḥ parivāryamāṇaḥ

हिन्दी अर्थ

जो बरसातके पहले सोलह पक्षों (आठ महीनों )-तक कहीं बिलमें शयन करता रहता है, वही मेढक बरसातके आठ पक्षोंमें गोष्ठ (गोसमुदाय)-की भाँति अपनी स्त्रियोंके साथ आर्तनाद- सा करता है; मानो सत्य और धर्मसे प्रेम रखनेवाला कोई विद्वान्‌ ब्राह्मण अपने अच्छे शिष्योंसे घिरकर वेदकी ऋचाओंका पाठ कर रहा हो

अध्याय 150

श्लोक 24

गुणो महांस्तोयदकालजोऽयमबुद्धमेघस्वनभीषितानाम् ।परिष्वजन्तः परिवर्द्धयन्ति विनापि शय्यासमयं प्रियाणाम्

guṇo mahāṃstoyadakālajo'yamabuddhameghasvanabhīṣitānām | pariṣvajantaḥ parivarddhayanti vināpi śayyāsamayaṃ priyāṇām

हिन्दी अर्थ

सा जलकुण्ड बनाया जाता है, उसे *निपान' कहते हैं। “वर्षाकालका यह एक महान्‌ गुण है कि अज्ञात मेघ-गर्जनाको सहसा सुनकर भयभीत हुई प्रियतमाओंको प्रेमी पुरुष हृदयसे लगाकर शयनकालके बिना भी उनकी कामवासनाओंको बढ़ा देते हैं

अध्याय 150

श्लोक 25

दोषोऽयमेकः सलिलागमस्य मां प्रत्युदारान्वयवर्णशीले ।न दृश्यते यत् तव वक्त्रतुल्यो धनग्रहग्रस्ततनुः शशाङ्कः

doṣo'yamekaḥ salilāgamasya māṃ pratyudārānvayavarṇaśīle | na dṛśyate yat tava vaktratulyo dhanagrahagrastatanuḥ śaśāṅkaḥ

हिन्दी अर्थ

उत्तम वंश, सुन्दर वर्ण और अच्छे स्वभाववाली प्रिये! मुझे अपने लिये वर्षाकालका यही एक दोष प्रतीत होता है कि तुम्हारे मुखके समान शोभा पानेवाला चन्द्रमा मेघरूपी ग्रहसे ग्रस्त होकर (मेघोंकी घटाओंमें छिपकर ) दिखायी नहीं देता है

अध्याय 150

श्लोक 26

प्रदृश्यते भीरु यदा शशाङ्को घनान्तरस्थो जगतः प्रदीपः ।तदानुपश्यन्ति जनाः प्रहृष्टा बन्धुं प्रवासादिव सन्निवृत्तम्

pradṛśyate bhīru yadā śaśāṅko ghanāntarastho jagataḥ pradīpaḥ | tadānupaśyanti janāḥ prahṛṣṭā bandhuṃ pravāsādiva sannivṛttam

हिन्दी अर्थ

भीरु! जब जगत्‌को प्रकाशित करनेवाला चन्द्रमा मेघोंके भीतर दीख जाता है, तब सब लोग परदेशसे लौटे हुए प्रेमी बन्धुकी भाँति उसे बड़े हर्षमें भरकर बारम्बार देखने लगते हैं

अध्याय 150

श्लोक 27

विलापसाक्षी प्रियहीनितानां सन्दृश्यते भीरु यदा शशाङ्कः ।नेत्रोत्सवः प्रोषितकामुकानां दृष्ट्वैव कान्तं भवतीत्यवैमि

vilāpasākṣī priyahīnitānāṃ sandṛśyate bhīru yadā śaśāṅkaḥ | netrotsavaḥ proṣitakāmukānāṃ dṛṣṭvaiva kāntaṃ bhavatītyavaimi

हिन्दी अर्थ

भीरु! प्रियवियोगिनी वनिताओंके विलापका साक्षीभूत चन्द्रमा जब दृष्टिगोचर होता है, तब जिनके पति परदेशमें रहकर लौटे हैं, उन कामिनियोंके नेत्रोंमें अपने प्रियतमका दर्शन करके ही आनन्दोत्सव प्रतीत होता है, ऐसा मैं समझता हूँ

अध्याय 150

श्लोक 28

नेत्रोत्सवः कान्तसमागतानां दावाग्नितुल्यः प्रियहीनितानाम् ।तेनैव देहेन वराङ्गनानां चन्द्रोऽपि तावत्प्रियविप्रियश्च

netrotsavaḥ kāntasamāgatānāṃ dāvāgnitulyaḥ priyahīnitānām | tenaiva dehena varāṅganānāṃ candro'pi tāvatpriyavipriyaśca

हिन्दी अर्थ

यह नेत्रोत्सव उन्हींको प्रतीत होता है, जिन्हें अपने प्रियतमका संयोग प्राप्त है; प्रियवियोगिनी अबलाओंके लिये तो यह चन्द्रमा दावाग्निके तुल्य दाहक प्रतीत होता है। इस प्रकार चन्द्रमा आह्वादक होनेपर भी संयोग और वियोग- अवस्थाके भेदसे अपने उसी शरीरद्वारा श्रेष्ठ नारियोंको प्रिय और अप्रिय प्रतीत होता है

अध्याय 150

श्लोक 29

विनापि चन्द्रेण पुरे पितुस्ते यतः प्रभा चन्द्रगभस्तिगौरी ।गुणागुणांश्चन्द्रमसा न वेद्मि यतस्ततोऽहं प्रशशंसयिष्ये

vināpi candreṇa pure pituste yataḥ prabhā candragabhastigaurī | guṇāguṇāṃścandramasā na vedmi yatastato'haṃ praśaśaṃsayiṣye

हिन्दी अर्थ

प्रिये! तुम्हारे पिताके इस नगरमें तो चन्द्रमाके बिना भी चन्द्रकिरणोंके समान गौर प्रकाश छाया रहता है। अतः मुझे यहाँ चन्द्रमाके होने और न होनेके गुण-अवगुणका पता नहीं लगता; इसलिये मैं बास्म्बार इस बातकी चर्चा करूँगा

अध्याय 150

श्लोक 30

अवाप यो ब्राह्मणराज्यमीड्यो दुरापमन्यैः सुकृतैस्तपोभिः ।गायन्ति विप्राः पवमानसंज्ञं समागताः पर्वणि चाप्युदारम्

avāpa yo brāhmaṇarājyamīḍyo durāpamanyaiḥ sukṛtaistapobhiḥ | gāyanti viprāḥ pavamānasaṃjñaṃ samāgatāḥ parvaṇi cāpyudāram

श्लोक 30–31 का हिन्दी अर्थ

है, उस ब्राह्मणराज्यको जिन्होंने अनायास ही प्राप्त कर लिया, जो स्तवन करनेके योग्य हैं, यज्ञमें एकत्र हुए ब्राह्मण पवमान नामवाले जिन उदार सोमदेवके गुण गाते हैं, वे उन बुधके पिता हैं, जिनके पुत्र लोकोत्तर बल और पराक्रमसे सम्पन्न राजा पुरूरवा हैं। वे प्राणाग्निस्वरूप और स्तुति करनेके योग्य हैं, (ओषधियों और वनस्पतियोंके स्वामी होनेके कारण) उन्होंने नष्ट हुई अग्निको अध्त्थके उत्पादनद्वारा शमीके गर्भसे प्रकट किया। वे रुद्रस्वरूप हैं

अध्याय 150

श्लोक 31

पिता बुधस्योत्तरवीर्यकर्मा पुरूरवा यस्य सुतो नृदेवः ।प्राणाग्निरीड्योऽग्निमजीजनद् यो नष्टं शमीगर्भभवं भवात्मा

pitā budhasyottaravīryakarmā purūravā yasya suto nṛdevaḥ | prāṇāgnirīḍyo'gnimajījanad yo naṣṭaṃ śamīgarbhabhavaṃ bhavātmā

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 150

श्लोक 32

तथैव पश्चाच्चकमे महात्मा पुरोर्वशीमप्सरसां वरिष्ठाम् ।पीतः पुरा योऽमृतसर्वदेहो मुनिप्रवीरैर्वरगात्रि घोरैः

tathaiva paścāccakame mahātmā purorvaśīmapsarasāṃ variṣṭhām | pītaḥ purā yo'mṛtasarvadeho munipravīrairvaragātri ghoraiḥ

हिन्दी अर्थ

चन्द्रदेवने पूर्वकालमें अप्सराओंमें श्रेष्ठ उर्वशीकी (पुरूरवारूपसे ) कामना की थी। उनका सारा शरीर ही अमृतमय है । पहले कभी घोर स्वभाववाले श्रेष्ठ मुनियोंने उन अमृतमय चन्द्रमाको पी लिया था

अध्याय 150

श्लोक 33

नृपः कुशाग्रैः पुनरेव यश्च धीमानतोऽग्निर्दिवि पूज्यते च ।आयुश्च वंशे नहुषश्च यस्य यो देवराजत्वमवाप वीरः

nṛpaḥ kuśāgraiḥ punareva yaśca dhīmānato'gnirdivi pūjyate ca | āyuśca vaṃśe nahuṣaśca yasya yo devarājatvamavāpa vīraḥ

हिन्दी अर्थ

उन्हींके वंशज बुद्धिमानू राजा पुरूरवा हुए, जो कुशाग्रोंद्वारा आरम्भ करके अनेकानेक यज्ञॉंका सम्पादन कर स्वर्गमें अग्नितुल्य तेजस्वी रूपसे प्रतिष्ठित हो पूजित होते हैं। पुरूरवाके वंशमें आयु हुए, जिनके पुत्र नहुष थे। उन वीर नहुषने देवराजपद प्राप्त कर लिया था

अध्याय 150

श्लोक 34

देवातिदेवो भगवान् प्रसूतो वंशे हरिर्यत्र जगत्प्रणेता ।भैमः प्रवीरः सुरकार्यहेतोर्यः सुभ्रुदक्षस्य वृतः सुताभिः

devātidevo bhagavān prasūto vaṃśe hariryatra jagatpraṇetā | bhaimaḥ pravīraḥ surakāryahetoryaḥ subhrudakṣasya vṛtaḥ sutābhiḥ

हिन्दी अर्थ

देवताओंके लिये भी उत्कृष्ट देवता, जगत्स्रष्टा भगवान्‌ श्रीहरि देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये चन्द्रमाके ही वंशमें प्रमुख भीमवंशी वीरके रूपमें प्रकट हुए हैं । सुभ्रु! उन चन्द्रमाको नक्षत्रस्वरूपा दक्षकी कन्याओंने पतिरूपसे वरण किया है

अध्याय 150

श्लोक 35

बभूव राजाथ वसुश्च यस्य वंशे महात्मा शशिवंशदीपः ।यश्चक्रवर्तित्वमवाप वीरः स्वैः कर्मभिः शक्रसमप्रभावः

babhūva rājātha vasuśca yasya vaṃśe mahātmā śaśivaṃśadīpaḥ | yaścakravartitvamavāpa vīraḥ svaiḥ karmabhiḥ śakrasamaprabhāvaḥ

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमाके ही वंशमें शशिकुल-दीपक वीर एवं महात्मा राजा उपरिचर वसु हुए हैं, जो अपने कर्मोंसे चक्रवर्तीपदको प्राप्त हुए। उनका प्रभाव इन्द्रके समान था

अध्याय 150

श्लोक 36

यदुश्च राजा शशिवंशमुख्यो योऽवाप मह्यामधिराजभावम् ।भोजाः कुले यस्य नराधिपस्य वीराः प्रसूताः सुरराजतुल्याः

yaduśca rājā śaśivaṃśamukhyo yo'vāpa mahyāmadhirājabhāvam | bhojāḥ kule yasya narādhipasya vīrāḥ prasūtāḥ surarājatulyāḥ

हिन्दी अर्थ

चन्द्रवंशके प्रधान पुरुष राजा यदु हो गये हैं, जो इस पृथ्वीपर राजाधिराज पदको प्राप्त हुए थे । उन्हीं महाराजके कुलमें देवराज इन्द्रके तुल्य पराक्रमी भोजवंशी वीर प्रकट हुए हैं

अध्याय 150

श्लोक 37

न कूटकृद् यस्य नृपोऽस्ति वंशे न नास्तिको नैष्कृतिकोऽपि वाथ ।अश्रद्दधानोऽप्यथवा कदर्यः शौर्येण वा वारिरुहाक्षि हीनः

na kūṭakṛd yasya nṛpo'sti vaṃśe na nāstiko naiṣkṛtiko'pi vātha | aśraddadhāno'pyathavā kadaryaḥ śauryeṇa vā vāriruhākṣi hīnaḥ

हिन्दी अर्थ

कमललोचने ! यदुकुलमें कोई राजा ऐसा नहीं हुआ है, जो छल- कपटसे काम लेनेवाला हो। उस कुलमें न तो कोई नास्तिक हुआ है न शठ, न श्रद्धाहीन हुआ है न कर्दर्य अथवा शौर्यहीन ही

अध्याय 150

श्लोक 38

वंशे वधूस्त्वं कमलायताक्षि श्लाघ्या गुणानामतिपात्रभूता ।कुरु प्रणामं शिखराग्रदन्ति तस्य त्वमीशस्य सतां प्रियस्य

vaṃśe vadhūstvaṃ kamalāyatākṣi ślāghyā guṇānāmatipātrabhūtā | kuru praṇāmaṃ śikharāgradanti tasya tvamīśasya satāṃ priyasya

हिन्दी अर्थ

कमलके समान विशाल नेत्र और शिखरमणिके तुल्य सुन्दर दाँतोंवाली सुन्दरि! तुम उसी चन्द्रबंश एवं यदुवंशकी वधू हो । तुम सद्गुणोंका अत्यन्त पात्र एवं स्पृहणीय हो। तुम सत्पुरुषोंके प्रिय जगदीश्वर श्रीहरिको प्रणाम करो

अध्याय 150

श्लोक 39

नारायणायात्मभवायनाय लोकायनाय त्रिदशायनाय ।खगेन्द्रकेतोः पुरुषोत्तमाय कुरु प्रणामं श्वशुराय देवि

nārāyaṇāyātmabhavāyanāya lokāyanāya tridaśāyanāya | khagendraketoḥ puruṣottamāya kuru praṇāmaṃ śvaśurāya devi

हिन्दी अर्थ

देवि ! जो स्वयम्भू ब्रह्माजीके आश्रयस्थान हैं, सम्पूर्ण जगत्‌ तथा देवताओंके भी आधार हैं,वे गरुड्ध्वज पुरुषोत्तम भगवान्‌ नारायण तुम्हारे श्रशुर हैं। तुम उन्हें प्रणाम करो'

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.