Harivamsha Purana
147
अध्याय 147 / 318

Parva 2, Adhyāya 92

63 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ63 श्लोक

अध्याय 147

श्लोक 1

हंसानां वज्रपुरे निवासः, हंस्या प्रभावतीं प्रद्युम्नस्य प्रति अनुरक्तकरणं, प्रभावत्या हंस्यां प्रद्युम्नस्य प्राप्तिकरणस्य अनुरोधं, हंस्याः वज्रनाभेन सह संवादं, हंसानां मुखतः सर्वं समाचारं श्रुत्वा श्रीकृष्णेन नटवेषे प्रद्युम्नादि यादवानां वज्रपुरे प्रेषणं ते वासववचः श्रुत्वा हंसा वज्रपुरं ययुः ।पूर्वोचितं हि गमनं तेषां तत्र जनाधिप

haṃsānāṃ vajrapure nivāsaḥ, haṃsyā prabhāvatīṃ pradyumnasya prati anuraktakaraṇaṃ, prabhāvatyā haṃsyāṃ pradyumnasya prāptikaraṇasya anurodhaṃ, haṃsyāḥ vajranābhena saha saṃvādaṃ, haṃsānāṃ mukhataḥ sarvaṃ samācāraṃ śrutvā śrīkṛṣṇena naṭaveṣe pradyumnādi yādavānāṃ vajrapure preṣaṇaṃ te vāsavavacaḥ śrutvā haṃsā vajrapuraṃ yayuḥ | pūrvocitaṃ hi gamanaṃ teṣāṃ tatra janādhipa

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजा जनमेजय ! इन्द्रकी यह बात सुनकर वे हंस वज़पुरमें गये। वहाँका मार्ग उनके लिये पूर्व-परिचित था

अध्याय 147

श्लोक 2

ते दीर्घिका सु रम्यासु निपेतुर्वीर पक्षिणः ।पद्मोत्पलैरावृतासु काञ्चनैः स्पर्शनक्षमैः

te dīrghikā su ramyāsu nipeturvīra pakṣiṇaḥ | padmotpalairāvṛtāsu kāñcanaiḥ sparśanakṣamaiḥ

हिन्दी अर्थ

वीर! वे पक्षी वहाँके रमणीय सरोवरोंमें, जो स्पर्शके योग्य सुवर्णमय कमलोंसे आवृत थे, जाकर बैठे

अध्याय 147

श्लोक 3

ते वै नदन्तो मधुरं संस्कृतापूर्वभाषिणः ।पूर्वमप्यागतास्ते तु विस्मयं जनयन्ति हि

te vai nadanto madhuraṃ saṃskṛtāpūrvabhāṣiṇaḥ | pūrvamapyāgatāste tu vismayaṃ janayanti hi

हिन्दी अर्थ

वे हंस आपूर्व संस्कृत भाषा बोलते और मधुर कलरव करते थे। यद्यपि वे उस नगरमें पहले भी आ चुके थे, तथापि नये आये हुएके समान वहाँके निवासियोंको आश्चर्यमें डाल रहे थे

अध्याय 147

श्लोक 4

अन्तःपुरोपभोग्यासु चेरुर्वापीषु ते नृप ।दृष्टास्ते वज्रनाभस्य त्रिविष्टपनिवासिनः

antaḥpuropabhogyāsu cerurvāpīṣu te nṛpa | dṛṣṭāste vajranābhasya triviṣṭapanivāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

नरेथ्वर! वे अन्त:पुरके उपभोगमें आनेवाली बावड़ियोंमें चरने लगे । उन स्वर्गवासी हंसोंपर वज़नाभकी भी दृष्टि पड़ी

अध्याय 147

श्लोक 5

आलपन्तः सुमधुरं धार्तराष्ट्रा जनेश्वर ।स तानुवाच दैतेयो धार्तराष्ट्रानिदं वचः

ālapantaḥ sumadhuraṃ dhārtarāṣṭrā janeśvara | sa tānuvāca daiteyo dhārtarāṣṭrānidaṃ vacaḥ

हिन्दी अर्थ

जनेश्वर! वे हंस अत्यन्त मधुर बोली बोल रहे थे। उन्हें देखकर उस दैत्यने उनसे इस प्रकार कहा—

अध्याय 147

श्लोक 6

त्रिविष्टपे नित्यरता भवन्तश्चारुभाषिणः ।यदैवेहोन्सवोऽस्माकं भवद्भिरवगम्यते

triviṣṭape nityaratā bhavantaścārubhāṣiṇaḥ | yadaivehonsavo'smākaṃ bhavadbhiravagamyate

श्लोक 6–7 का हिन्दी अर्थ

हंसो ! तुमलोग सदा स्वर्गलोकमें [मते और मनोहर बोली बोलते हो। जब कभी यहाँ हमलोगोंके घर उत्सव हो और तुम्हें इसका पता लग जाय, तब तुम अवश्य यहाँ पधारना। यह तुम्हारा अपना ही घर है। स्वर्गनिवासी हंसोंको यहाँ निर्भय होकर प्रवेश करना चाहिये '

अध्याय 147

श्लोक 7

आगन्तव्यं जालपादाः स्वमिदं भवतां गृहम् ।विस्रब्धं च प्रवेष्टव्यं त्रिविष्टपनिवासिभिः

āgantavyaṃ jālapādāḥ svamidaṃ bhavatāṃ gṛham | visrabdhaṃ ca praveṣṭavyaṃ triviṣṭapanivāsibhiḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 8

ते तथोक्ताः शकुनयो वज्रनाभेन भारत ।तथेत्युक्त्वा हि विविशुर्दानवेन्द्रनिवेशनम्

te tathoktāḥ śakunayo vajranābhena bhārata | tathetyuktvā hi viviśurdānavendraniveśanam

हिन्दी अर्थ

भारत ! वज़नाभके ऐसा कहनेपर उन पक्षियोंने 'तथास्तु' कहकर उसकी बात मान ली और उस दानवराजके महलमें प्रवेश किया

अध्याय 147

श्लोक 9

चक्रुः परिचयं ते च देवकार्यव्यपेक्षया ।मानुषालापिनस्ते तु कथाश्चक्रुः पृथग्विधाः

cakruḥ paricayaṃ te ca devakāryavyapekṣayā | mānuṣālāpinaste tu kathāścakruḥ pṛthagvidhāḥ

हिन्दी अर्थ

उन्होंने देवताओंके कार्यको सिद्ध करनेकी इच्छासे वहाँ सबसे परिचय प्राप्त किया। वे मनुष्योंकी-सी बोली बोलते और भाँति-भाँतिकी कथाएँ कहते थे

अध्याय 147

श्लोक 10

वंशबद्धाः काश्यपानां सर्वकल्याणभागिनाम् ।स्त्रियो रेमुर्विशेषेण शृण्वन्त्यः सङ्गताः कथाः

vaṃśabaddhāḥ kāśyapānāṃ sarvakalyāṇabhāginām | striyo remurviśeṣeṇa śṛṇvantyaḥ saṅgatāḥ kathāḥ

हिन्दी अर्थ

समस्त कल्याणमय पदार्थोका उपभोग करनेवाले कश्यपवंशी दानवोंकी स्त्रियाँ अपने वंशसे सम्बन्ध रखनेवाली सुसड्त कथाएँ सुनती हुई उनमें विशेषरूपसे रम जाती थीं

अध्याय 147

श्लोक 11

विचरन्तस्ततो हंसा ददृशुश्चारुहासिनीम् ।प्रभावतीं वरारोहां वज्रनाभसुतां तदा

vicarantastato haṃsā dadṛśuścāruhāsinīm | prabhāvatīṃ varārohāṃ vajranābhasutāṃ tadā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर वहाँ विचरते हुए हंसोंने उस समय वज़नाभकी पुत्री मनोहर मुसकानवाली सुन्दरी प्रभावतीको देखा

अध्याय 147

श्लोक 12

हंसाः परिचितां चक्रुस्तां ततश्चारुहासिनीम् ।सखीं शुचिमुखीं चक्रे हंसीं राजसुता तदा

haṃsāḥ paricitāṃ cakrustāṃ tataścāruhāsinīm | sakhīṃ śucimukhīṃ cakre haṃsīṃ rājasutā tadā

हिन्दी अर्थ

फिर उन सभी हंसोंने उस चारुहासिनी राजकुमारीसे परिचय कर लिया। राजकुमारी प्रभावतीने उस समय शुचिमुखी नामवाली हंसीको अपनी सखी बना लिया

अध्याय 147

श्लोक 13

सा तां कचित्पप्रच्छ वज्रनाभसुतां सखीम् ।विश्रम्भितां पृथक्सूक्तैराख्यानकशतैर्वराम्

sā tāṃ kacitpapraccha vajranābhasutāṃ sakhīm | viśrambhitāṃ pṛthaksūktairākhyānakaśatairvarām

हिन्दी अर्थ

एक दिनकी बात है, शुचिमुखीने सैकड़ों कथाएँ तथा भाँति-भाँतिकी सुन्दर उक्तियाँ सुनाकर अपनी श्रेष्ठ सखी वज़नाभकुमारी प्रभावतीके मनमें पूर्ण विश्वास पैदा कर लिया। तत्पश्चात्‌ उससे पूछा—

अध्याय 147

श्लोक 14

त्रैलोक्यसुन्दरीं वेद्मि त्वामहं हि प्रभावति ।रूपशीलगुणैर्देवि किञ्चित् त्वां वक्तुमुत्सहे

trailokyasundarīṃ vedmi tvāmahaṃ hi prabhāvati | rūpaśīlaguṇairdevi kiñcit tvāṃ vaktumutsahe

हिन्दी अर्थ

प्रभावति ! मैं तुम्हें त्रभुवनकी अद्वितीय सुन्दरी मानती हूँ। देवि! तुम रूप, शील और गुर्णोंमें श्रेष्ठ हो, इसलिये मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ

अध्याय 147

श्लोक 15

व्यतिक्रामति ते भीरु यौवनं चारुहासिनि ।यदतीतं पुनर्नैति गतं स्रोत इवाम्भसः

vyatikrāmati te bhīru yauvanaṃ cāruhāsini | yadatītaṃ punarnaiti gataṃ srota ivāmbhasaḥ

हिन्दी अर्थ

भीरु! चारुहासिनि! तुम्हारी जवानी व्यर्थ बीती जा रही है। जैसे जलका बहता हुआ ख्रोत फिर पीछे नहीं लौटता, उसी प्रकार जो अवस्था बीत गयी, वह फिर वापिस नहीं आती है

अध्याय 147

श्लोक 16

कामोपभोगतुल्या हि रतिर्देवि न विद्यते ।स्त्रीणां जगति कल्याणि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते

kāmopabhogatulyā hi ratirdevi na vidyate | strīṇāṃ jagati kalyāṇi satyametad bravīmi te

हिन्दी अर्थ

देवि! कल्याणि ! संसारमें स्त्रियोंके लिये कामोपभोगके समान दूसरा कोई सुख नहीं है; यह मैं तुमसे सत्य कहती हूँ

अध्याय 147

श्लोक 17

स्वयंवरे च न्यस्ता त्वं पित्रा सर्वाङ्गशोभने ।न च कांश्चिद् वरयसे देवासुरकुलोद्भवान्

svayaṃvare ca nyastā tvaṃ pitrā sarvāṅgaśobhane | na ca kāṃścid varayase devāsurakulodbhavān

हिन्दी अर्थ

सर्वाज्शोभने ! तुम्हारे पिताने तुम्हें स्वयंवरमें उपस्थित किया, परंतु तुम देवताओं तथा असुरोंके कुलमें उत्पन्न हुए किन्हीं योग्य पुरुषका वरण ही नहीं करती हो (इसका क्या कारण है?)

अध्याय 147

श्लोक 18

व्रीडिता यान्ति सुश्रोणि प्रत्याख्यातास्त्वया शुभे ।रूपशौर्यगुणैर्युक्तान् सदृशांस्त्वं कुलस्य हि

vrīḍitā yānti suśroṇi pratyākhyātāstvayā śubhe | rūpaśauryaguṇairyuktān sadṛśāṃstvaṃ kulasya hi

श्लोक 18–20 का हिन्दी अर्थ

शुभे! सुश्रोणि! तुम्हारे इनकार कर देनेपर ब्याहके लिये आये हुए पुरुष लज्जित होकर लौट जाते हैं। देवि! जो रूप और शौर्य आदि गुर्णोंसे युक्त हैं तथा तुम्हारे कुलके सर्वथा अनुरूप हैं, ऐसे कुल और रूपमें अपने ही समान पुरुषोंके आनेपर भी तुम उन्हें वरण करना नहीं चाहती (ऐसा क्यों करती हो ?) जिनके रूप और कुलकी समानता करनेवाला त्रिलोकीमें दूसरा कोई नहीं है। शुभे ! सर्वाज्औसुन्दरि ! वे गुणों अथवा शौर्यमें भी सबसे बढ़कर हैं

अध्याय 147

श्लोक 19

इहैष्यति किमर्थं त्वां प्रद्युम्नो रुक्मिणीसुतः

ihaiṣyati kimarthaṃ tvāṃ pradyumno rukmiṇīsutaḥ

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 20

त्रैलोक्ये यस्य रूपेण सदृशो न कुलेन वा ।गुणैर्वा चारुसर्वाङ्गि शौर्येणाप्यति वा शुभे

trailokye yasya rūpeṇa sadṛśo na kulena vā | guṇairvā cārusarvāṅgi śauryeṇāpyati vā śubhe

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 21

देवेषु देवः सुश्रोणि दानवेषु च दानवः ।मानुषेष्वपि धर्मात्मा मनुष्यः स महाबलः

deveṣu devaḥ suśroṇi dānaveṣu ca dānavaḥ | mānuṣeṣvapi dharmātmā manuṣyaḥ sa mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

सुश्रोणि! वे महाबली प्रद्युम्न देवताओंमें देवता, दानवोंमें दानव और मनुष्योंमें भी धर्मात्मा मनुष्य हैं

अध्याय 147

श्लोक 22

यं सदा देवि दृष्ट्वा हि स्रवन्ति जघनानि हि ।आपीनानीव धेनूनां स्रोतांसि सरितामिव

yaṃ sadā devi dṛṣṭvā hi sravanti jaghanāni hi | āpīnānīva dhenūnāṃ srotāṃsi saritāmiva

हिन्दी अर्थ

मो 5ध्याय: + ७३५ देवि! जैसे दूध देनेवाली गौओंकि थन और सरिताओंके स्रोत टपकते हैं, उसी तरह उन प्रद्युम्नको देखकर सदा ही स्त्रियोंके जघनप्रदेश आर्द्र हो जाते हैं

अध्याय 147

श्लोक 23

न पूर्णचन्द्रेण मुखं नयने वा कुशेशयैः ।उत्सहे नोपमातुं हि मृगेन्द्रेणाथ वा गतिम्

na pūrṇacandreṇa mukhaṃ nayane vā kuśeśayaiḥ | utsahe nopamātuṃ hi mṛgendreṇātha vā gatim

हिन्दी अर्थ

उनके मुखकी पूर्ण चन्द्रसे, नयनोंकी नीलकमलसे अथवा गति (चाल) -की सिंहसे मैं उपमा नहीं दे सकती (क्योंकि ये सब हीन प्रतीत होते हैं)

अध्याय 147

श्लोक 24

जगतः सारमुद्धृत्य पुत्रः स विहितः शुभे ।कृत्यानङ्गं वरे साङ्गं विष्णुना प्रभविष्णुना

jagataḥ sāramuddhṛtya putraḥ sa vihitaḥ śubhe | kṛtyānaṅgaṃ vare sāṅgaṃ viṣṇunā prabhaviṣṇunā

हिन्दी अर्थ

शुभे! सुन्दरि! प्रभावशाली भगवान्‌ विष्णुने सारे जगत्‌का सार निकालकर अनज्को सा करके अपने उस पुत्रका निर्माण किया है

अध्याय 147

श्लोक 25

हृतेन शम्बरो बाल्ये येन पापो निबर्हितः ।मायाश्च सर्वाः सम्प्राप्ता न च शीलं विनाशितम्

hṛtena śambaro bālye yena pāpo nibarhitaḥ | māyāśca sarvāḥ samprāptā na ca śīlaṃ vināśitam

हिन्दी अर्थ

बाल्यावस्थामें उन्हें शम्बरासुरने हर लिया था; परंतु उन्होंने बड़े होनेपर उस पापीको मार डाला! उसकी सारी मायाएँ प्राप्त कर लीं; फिर भी किसीके शीलका विनाश नहीं किया

अध्याय 147

श्लोक 26

यान्यान्गुणान्पृथुश्रोणि मनसा कल्पयिष्यसि ।एष्टव्यास्त्रिषु लोकेषु प्रद्युम्ने सर्व एव ते

yānyānguṇānpṛthuśroṇi manasā kalpayiṣyasi | eṣṭavyāstriṣu lokeṣu pradyumne sarva eva te

हिन्दी अर्थ

पृथुश्रोणि! तुम मनसे जिन-जिन उत्तम गुणोंकी कल्पना करोगी अथवा तीनों लोकोंमें जो-जो श्रेष्ठ गुण वाज्छनीय हैं, वे सब- के-सब प्रद्युम्नमें वर्तमान हैं

अध्याय 147

श्लोक 27

रुच्या वह्निप्रतीकाशः क्षमया पृथिवीसमः ।तेजसा सूर्यसदृशो गाम्भीर्येण ह्रदोपमः ।प्रभावतीं शुचिमुखीं त्वितीहोवाच भामिनी

rucyā vahnipratīkāśaḥ kṣamayā pṛthivīsamaḥ | tejasā sūryasadṛśo gāmbhīryeṇa hradopamaḥ | prabhāvatīṃ śucimukhīṃ tvitīhovāca bhāminī

हिन्दी अर्थ

वे कान्तिमें अग्निके समान, क्षमामें पृथ्वीके तुल्य, तेजमें सूर्यके सदूश तथा गम्भीरतामें सागरके समान हैं'। यह सुनकर भामिनी प्रभावतीने शुचिमुखीसे इस प्रकार कहा

अध्याय 147

श्लोक 28

विष्णुर्मानुषलोकस्थः श्रुतः सुबहुशो मया ।पितुः कथयतः सौम्ये नारदस्य च धीमतः

viṣṇurmānuṣalokasthaḥ śrutaḥ subahuśo mayā | pituḥ kathayataḥ saumye nāradasya ca dhīmataḥ

हिन्दी अर्थ

प्रभावती बोली—सौम्ये ! मैंने बुद्धिमान्‌ नारदजी तथा अपने पिताके मुखसे कई बार सुना है कि भगवान्‌ विष्णु इस समय मनुष्यलोकमें अवतीर्ण होकर विराज रहे हैं

अध्याय 147

श्लोक 29

शत्रुः किल स दैत्यानां वर्जनीयः सदानघे ।कुलानि किल दैत्यानां तेन दग्धानि मानिनि

śatruḥ kila sa daityānāṃ varjanīyaḥ sadānaghe | kulāni kila daityānāṃ tena dagdhāni mānini

श्लोक 29–38 का हिन्दी अर्थ

पापरहित मानिनि! शाखानगरके प्रदेशों में जो असुर निवास करते हैं, उन्हें मेरे पिता दानवराज वज़नाभ भगवान्‌ विष्णुके विषयमें इस प्रकार संदेश दिया करते हैं—' विष्णु दैत्योंके शत्रुके रूपमें प्रसिद्ध हैं, अत: उन्हें सदाके लिये त्याग देना चाहिये। उन्होंने अपने तेजस्वी चक्र, शा धनुष तथा कौमोदकी गदाके द्वारा दैत्योंके बहुत-से कुल दग्ध कर डाले हैं'। पवित्र मुसकानवाली हंसी! प्राय: सभी स््त्रियोंका ऐसा ही मनोरथ होता है कि मेरा पतिकुल पितूकुलसे श्रेष्ठ हो। यदि प्रद्युम्नके यहाँ आनेके लिये कोई उपाय हो सके तो यह मुझपर तुम्हारा महान्‌ अनुग्रह होगा और मेरा कुल पवित्र हो जायगा। पवित्र वार्ता करनेवाली हंसी ! मैंने तुमसे कार्यसिद्धिका उपाय पूछा है। वह उपाय तुम मुझे प्रदान करो । वृष्णिवंशावतंस प्रद्युप्न जिस प्रकार मेरे पति हो सकें, वैसा यत्र करो। मैंने असुरोंकी बड़ी -बूढ़ी स्त्रियोंके मुखसे यह बात सुनी है कि भगवान्‌ विष्णु दैत्योंके अत्यन्त वैरी और उन्हें उद्देगमें डालनेवाले हैं । प्र्युम्मके जन्मका वृत्तान्त मैंने पहले भी सुना है। जिस प्रकार उनके द्वारा बलवानू कालशम्बर मारा गया था, वह प्रसद्ध भी मेरे सुननेमें आया है। साध्वीशिरोमणे ! प्र्युम्न सदा मेरे हृदयमें विद्यमान रहते हैं; परंतु ऐसी कोई युक्ति या साधन नहीं है, जिससे उनके साथ मेरा समागम हो सके। आदरणीया सखी! मैं तुम्हारी दासी हूँ और तुम्हें दूतीके कामपर नियुक्त करती हूँ। तुम विदुषी हो। मेरे और प्रद्युम्मके मिलनका कोई उपाय बताओ। तब हंसीने उसे सान्त्वना देकर हँसते हुए कहा

अध्याय 147

श्लोक 30

प्रदीप्तेन रथाङ्गेन शार्ङ्गेण गदया तथा ।शाखानगरदेशेषु वसन्ति किल येऽसुराः

pradīptena rathāṅgena śārṅgeṇa gadayā tathā | śākhānagaradeśeṣu vasanti kila ye'surāḥ

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 31

इत्येते दानवेन्द्रेण सन्दिश्यन्ते हि तं प्रति ।मनोरथो हि सर्वासां स्त्रीणामेव शुचिस्मिते

ityete dānavendreṇa sandiśyante hi taṃ prati | manoratho hi sarvāsāṃ strīṇāmeva śucismite

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 32

भवेद्धि मे पतिकुलं श्रेष्ठं पितृकुलादिति ।यदि नामाभ्युपायः स्यात् तस्येहागमनं प्रति

bhaveddhi me patikulaṃ śreṣṭhaṃ pitṛkulāditi | yadi nāmābhyupāyaḥ syāt tasyehāgamanaṃ prati

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 33

महाननुग्रहो मे स्यात्कुलं स्यात्पावितं च मे ।समर्थनां मे पृष्टा त्वं प्रयच्छ शुचिलापिनि

mahānanugraho me syātkulaṃ syātpāvitaṃ ca me | samarthanāṃ me pṛṣṭā tvaṃ prayaccha śucilāpini

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 34

प्रद्युम्नः स्याद्यथा भर्ता स मे वृष्णिकुलोद्भवः ।अत्यन्तवैरी दैत्यानामुद्वेजनकरो हरिः

pradyumnaḥ syādyathā bhartā sa me vṛṣṇikulodbhavaḥ | atyantavairī daityānāmudvejanakaro hariḥ

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 35

असुराणां स्त्रियो वृद्धाः कथयन्त्यो मया श्रुताः ।प्रद्युम्नस्य तथा जन्म पुरस्तादपि मे श्रुतम्

asurāṇāṃ striyo vṛddhāḥ kathayantyo mayā śrutāḥ | pradyumnasya tathā janma purastādapi me śrutam

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 36

यथा च तेन निहतो बलवान् कालशम्बरः ।हृदि मे वर्तते नित्यं प्रद्युम्नः खलु सत्तमे

yathā ca tena nihato balavān kālaśambaraḥ | hṛdi me vartate nityaṃ pradyumnaḥ khalu sattame

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 37

हेतुः स नास्ति स्यात् तेन यथा मम समागमः ।दासी तवाहं सख्यार्हे दूत्ये त्वां च विसर्जये

hetuḥ sa nāsti syāt tena yathā mama samāgamaḥ | dāsī tavāhaṃ sakhyārhe dūtye tvāṃ ca visarjaye

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 38

पण्डितासि वदोपायं मम तस्य च सङ्गमे ।ततस्तां सान्त्वयित्वा सा प्रहसन्तीदमब्रवीत्

paṇḍitāsi vadopāyaṃ mama tasya ca saṅgame | tatastāṃ sāntvayitvā sā prahasantīdamabravīt

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 39

तत्र दूती गमिष्यामि तवाहं चारुहासिनि ।इमां भक्तिं तवोदारां प्रवक्ष्यामि शुचिस्मिते

tatra dūtī gamiṣyāmi tavāhaṃ cāruhāsini | imāṃ bhaktiṃ tavodārāṃ pravakṣyāmi śucismite

हिन्दी अर्थ

शुचिमुखी बोली—चारुहासिनि! शुचिस्मिते! मैं वहाँ तुम्हारी दूती बनकर जाऊँगी और प्रच्युम्नसे तुम्हारी इस उदार भक्तिका वर्णन करूँगी

अध्याय 147

श्लोक 40

तथा चैव करिष्यामि यथैष्यति तवान्तिकम् ।साक्षात्कामेन सुश्रोणि भविष्यति सकामिनी

tathā caiva kariṣyāmi yathaiṣyati tavāntikam | sākṣātkāmena suśroṇi bhaviṣyati sakāminī

हिन्दी अर्थ

सुश्रोणि! मैं ऐसा प्रयत्र भी करूँगी, जिससे वे तुम्हारे निकट पधरेंगे और तुम साक्षात्‌ कामसे मिलकर अपनी कामना सफल करोगी

अध्याय 147

श्लोक 41

इति मे भाषितं नित्यं स्मरेथाः शुचिलोचने ।कथाकुशलतां पित्रे कथयस्वायतेक्षणे

iti me bhāṣitaṃ nityaṃ smarethāḥ śucilocane | kathākuśalatāṃ pitre kathayasvāyatekṣaṇe

श्लोक 41–46 का हिन्दी अर्थ

पवित्र नेत्रॉंवाली राजकुमारी ! विशाललोचने ! मेरी इस बातको तुम सदा याद रखना। अपने पिताके . सामने बराबर मेरे कथा-कौशलकी चर्चा करती हुई यह कहना कि शुचिमुखी कथा कहनेमें बहुत ही कुशल है। देवि! वहाँ पिताके निकट तुम सदा मेरे हित-साधनका ध्यान रखना। शुचिमुखीके ऐसा कहनेपर प्रभावतीने वैसा ही किया, जैसा कि उस (हंसी)-ने उससे कहा था। उस समय दानवराज वज़नाभने अन्तःपुरमें उस हंसीसे पूछा—'शुचिमुखि ! प्रभावतीने बताया है कि तुम कथा कहनेमें बड़ी चतुर हो। अत: उत्तम पक्षिणि! तुम कोई कथा कहो, क्योंकि योग्यतामें बड़ी हो । बताओ, संसारमें तुमने कौन-सी आश्चर्यकी बात देखी है? अनिन्दिते! जिसे दूसरोंने पहले कभी नहीं देखा हो, ऐसी कोई योग्य या अयोग्य आश्चर्यकी बात तुमने देखी हो तो बताओ ' । नरेशशिरोमणे ! तब हंसीने महातेजस्वी दानवराज वज़नाभको सम्बोधित करके कहा—सुनिये-'दानवश्रेष्ठ ! मैंने मेरगिरिके पार्थभागमें साध्वी मनस्विनी शाण्डिलीको देखा है, जो वहाँ आश्चर्यजनक कार्य करती हैं

अध्याय 147

श्लोक 42

मम त्वं तत्र मे देवि हितं सम्यक् प्रपत्स्यसे ।इत्युक्ता सा तथा चक्रे यत्तत् सा तामथाब्रवीत्

mama tvaṃ tatra me devi hitaṃ samyak prapatsyase | ityuktā sā tathā cakre yattat sā tāmathābravīt

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 43

दानवेन्द्रश्च तां हंसीं पप्रच्छान्तःपुरे तदा ।प्रभावत्या समाख्याता कथाकुशलता तव

dānavendraśca tāṃ haṃsīṃ papracchāntaḥpure tadā | prabhāvatyā samākhyātā kathākuśalatā tava

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 44

तत्त्वं शुचिमुखि ब्रूहि कथां योग्यतया वरे ।किं त्वया दृष्टमाश्चर्यं जगत्युत्तमपक्षिणि

tattvaṃ śucimukhi brūhi kathāṃ yogyatayā vare | kiṃ tvayā dṛṣṭamāścaryaṃ jagatyuttamapakṣiṇi

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 45

अदृष्टपूर्वमन्यैर्वा योग्यायोग्यमनिन्दिते ।सोवाच वज्रनाभं तु हंसी नरवरोत्तम

adṛṣṭapūrvamanyairvā yogyāyogyamanindite | sovāca vajranābhaṃ tu haṃsī naravarottama

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 46

श्रूयतामित्यथामन्त्र्य दानवेन्द्रं महाद्युतिम् ।दृष्टा मे शाण्डिली नाम साध्वी दानवसत्तम ।आश्चर्यं कर्म कुर्वन्ती मेरुपार्श्वे मनस्विनी

śrūyatāmityathāmantrya dānavendraṃ mahādyutim | dṛṣṭā me śāṇḍilī nāma sādhvī dānavasattama | āścaryaṃ karma kurvantī merupārśve manasvinī

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 47

सुमनाश्चैव कौशल्या सर्वभूतहिते रता ।कथञ्चिद् वरशाण्डिल्याः शैलपुत्र्याः शुभा सखी

sumanāścaiva kauśalyā sarvabhūtahite ratā | kathañcid varaśāṇḍilyāḥ śailaputryāḥ śubhā sakhī

हिन्दी अर्थ

समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाली कौशल्या सुमनाका भी किसी प्रकार दर्शन किया है, जो शैलपुत्री श्रेष्ठ शाण्डिलीकी शुभ सखी हैं

अध्याय 147

श्लोक 48

नटश्चैव मया दृष्टो मुनिदत्तवरः शुभः ।कामरूपी च भोज्यश्च त्रैलोक्ये नित्यसम्मतः

naṭaścaiva mayā dṛṣṭo munidattavaraḥ śubhaḥ | kāmarūpī ca bhojyaśca trailokye nityasammataḥ

हिन्दी अर्थ

एक नटको भी मैंने देखा है, जिसे मुनियोंने अभीष्ट वर दे रखा है। वह शुभलक्षण नट इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला, भोजनीय तथा त्रिभुवनमें सबको सदा ही प्रिय है

अध्याय 147

श्लोक 49

कुरून् यात्युत्तरान् वीर कालाम्रद्वीपमेव च ।भद्राश्वान् केतुमालांश्च द्वीपानन्यांस्तथानघ

kurūn yātyuttarān vīra kālāmradvīpameva ca | bhadrāśvān ketumālāṃśca dvīpānanyāṃstathānagha

हिन्दी अर्थ

इध्याय: + ७३७ “वीर! वह उत्तर कुरुमें जाता तथा कालाम्रद्वीपकी भी यात्रा करता है। अनघ ! वह भद्राथ, केतुमाल तथा अन्य ट्वीपोंमें भी जाया करता है

अध्याय 147

श्लोक 50

देवगन्धर्वगेयानि नृत्यानि विविधानि च ।स वेत्ति देवान् नृत्येन विस्मापयति सर्वथा

devagandharvageyāni nṛtyāni vividhāni ca | sa vetti devān nṛtyena vismāpayati sarvathā

हिन्दी अर्थ

देवता और गन्धर्व ही जिन्हें गाते हैं, उन गीतोंको भी वह गाता है तथा भाँति- भाँतिके नृत्योंको भी जानता है। वह अपने नृत्योंसे देवताओंको भी सर्वथा आश्चर्यचकित कर देता है '

अध्याय 147

श्लोक 51

श्रुतमेतन्मया हंसि न चिरादिव विस्तरम् ।चारणानां कथयतां सिद्धानां च महात्मनाम्

śrutametanmayā haṃsi na cirādiva vistaram | cāraṇānāṃ kathayatāṃ siddhānāṃ ca mahātmanām

हिन्दी अर्थ

वज़नाभ बोला—हंसी! थोड़े ही दिन हुए मैंने भी महात्मा, सिद्धों और चारणोंके मुखसे यह नटविषयक प्रमाचार विस्तारपूर्वक सुना है

अध्याय 147

श्लोक 52

कुतूहलं ममाप्यस्ति सर्वथा पक्षिनन्दिनि ।नटे दत्तवरे तस्मिन् संस्तवस्तु न विद्यते

kutūhalaṃ mamāpyasti sarvathā pakṣinandini | naṭe dattavare tasmin saṃstavastu na vidyate

हिन्दी अर्थ

पक्षिनन्दिनि ! मुझे भी उस वरप्राप्त नटको देखनेके लिये सर्वथा उत्कण्ठा हो रही है; परंतु मालूम होता है, मेरी प्रसिद्धि उसके क्रानोंतक नहीं गयी है (इसीलिये वह अबतक यहाँ नहीं आ सका है)

अध्याय 147

श्लोक 53

सप्तद्वीपान् विचरति नटः स दितिजोत्तम ।गुणवन्तं जनं श्रुत्वा गुणकार्यः स सर्वथा

saptadvīpān vicarati naṭaḥ sa ditijottama | guṇavantaṃ janaṃ śrutvā guṇakāryaḥ sa sarvathā

श्लोक 53–54 का हिन्दी अर्थ

हंसीने कहा—दैत्यप्रवर! वह नट सातों द्वीपोंमें वेचरता है और गुणवान्‌ पुरुषका नाम सुनकर उसके पास जाता है। उसके कार्य सर्वथा गुणयुक्त होते हैं । त्रीर महासुर! यदि वह तुम्हारे श्रेष्ठ एवं विस्तृत पुणोंको सुन ले तो उसे अपने नगरमें आया हुआ ही पमझो

अध्याय 147

श्लोक 54

तव चेच्छृणुयाद् वीर सद्भूतं गुणविस्तरम् ।नटं तदागतं विद्धि पुरं तव महासुर

tava cecchṛṇuyād vīra sadbhūtaṃ guṇavistaram | naṭaṃ tadāgataṃ viddhi puraṃ tava mahāsura

अर्थ श्लोक 53 के साथ

अध्याय 147

श्लोक 55

उपायः सृजतां हंसि येनेह स नटः शुभे ।आगच्छेन्मम भद्रं ते विषयं पक्षिनन्दिनि

upāyaḥ sṛjatāṃ haṃsi yeneha sa naṭaḥ śubhe | āgacchenmama bhadraṃ te viṣayaṃ pakṣinandini

हिन्दी अर्थ

वज़नाभ बोला—शुभे! पक्षिनन्दिनी हंसि ! तुम्हारा पला हो। तुम ऐसा कोई उपाय करो, जिससे वह नट परे राज्यमें आ जाय

अध्याय 147

श्लोक 56

ते हंसा वज्रनाभेन कार्यहेतोर्विसर्जिताः ।देवेन्द्रायाथ कृष्णाय शशंसुः सर्वमेव तत्

te haṃsā vajranābhena kāryahetorvisarjitāḥ | devendrāyātha kṛṣṇāya śaśaṃsuḥ sarvameva tat

हिन्दी अर्थ

वज़नाभद्वारा अपने कार्यकी सद्धिकि लिये भेजे गये उन हंसोंने देवराज इन्द्र तथा भगवान्‌ श्रीकृष्णसे वह सब समाचार कह सुनाया

अध्याय 147

श्लोक 57

अधोक्षजेन प्रद्युम्नो नियुक्तस्तत्र कर्मणि ।प्रभावत्याश्च संसर्गे वज्रनाभवधे तथा

adhokṣajena pradyumno niyuktastatra karmaṇi | prabhāvatyāśca saṃsarge vajranābhavadhe tathā

हिन्दी अर्थ

ब॒ भगवान्‌ श्रीकृष्णने प्रद्युप्रको उस कार्यमें नियुक्त केया। उनका काम था प्रभावतीसे मेल-जोल बढ़ाना और वज़नाभका वध करना

अध्याय 147

श्लोक 58

दैवीं मायां समाश्रित्य संविधाय हरिर्नटम् ।नटवेषेण भैमानां प्रेषयामास भारत

daivīṃ māyāṃ samāśritya saṃvidhāya harirnaṭam | naṭaveṣeṇa bhaimānāṃ preṣayāmāsa bhārata

हिन्दी अर्थ

श्रीहरिने दैवी माया- का आश्रय लेकर प्रद्युम्नको नट बनाकर भेजा। भारत! न्होंने नटके वेषमें ही मुख्य-मुख्य यादवोंको वहाँ भेज देया

अध्याय 147

श्लोक 59

प्रद्युम्नं नायकं कृत्वा साम्बं कृत्वा विदूषकम् ।पारिपार्श्वे गदं वीरमन्यान् भैमांस्तथैव च

pradyumnaṃ nāyakaṃ kṛtvā sāmbaṃ kṛtvā vidūṣakam | pāripārśve gadaṃ vīramanyān bhaimāṃstathaiva ca

हिन्दी अर्थ

उन्होंने प्रद्युम्नको नायक, साम्बको विदूषक और वीरवर गदको पारिपार्थिक बनाकर अन्यान्य आादवोंको भी उसी तरह विभिन्न भूमिकाओंमें सजाकर पेजा

अध्याय 147

श्लोक 60

वारमुख्या नटीः कृत्वा तत्तूर्यसदृशास्तदा ।तथैव भद्रं भद्रस्य सहायांश्च तथाविधान्

vāramukhyā naṭīḥ kṛtvā tattūryasadṛśāstadā | tathaiva bhadraṃ bhadrasya sahāyāṃśca tathāvidhān

हिन्दी अर्थ

मुख्य-मुख्य वाराज़नाओंको नटी बनाकर, नो उस नृत्य, गीत एवं वाद्यके अनुरूप थीं, भेजा। सी तरह भद्र और उसके सहायकोंको भी तदनुरूप षोंमें भेज दिया

अध्याय 147

श्लोक 61

प्रद्युम्नविहितं रम्यं विमानं ते महारथाः ।जग्मुरारुह्य कार्यार्थं देवानाममितौजसाम्

pradyumnavihitaṃ ramyaṃ vimānaṃ te mahārathāḥ | jagmurāruhya kāryārthaṃ devānāmamitaujasām

हिन्दी अर्थ

वे महारथी वीर प्रद्युम्नके बनाये ए रमणीय विमानपर आरूढ़ हो महातेजस्वी देवताओंके रर्यकी सिद्धिके लिये वहाँ गये

अध्याय 147

श्लोक 62

एकैकस्य समा रूपे पुरुषाः पुरुषस्य ते ।स्त्रीणां च सदृशाः सर्वे ते स्वरूपैर्नराधिपाः

ekaikasya samā rūpe puruṣāḥ puruṣasya te | strīṇāṃ ca sadṛśāḥ sarve te svarūpairnarādhipāḥ

हिन्दी अर्थ

वे सभी पुरुष रूपमें एक-एक पुरुषके अनुरूप तथा वे सभी राजकुमार अपने रूप-सौन्दर्यद्वारा त्रयोंकी भी समानता करते थे

अध्याय 147

श्लोक 63

ते वज्रनगरस्याथ शाखानगरमुत्तमम् ।जग्मुर्दानवसङ्कीर्णं सुपुरं नाम नामतः

te vajranagarasyātha śākhānagaramuttamam | jagmurdānavasaṅkīrṇaṃ supuraṃ nāma nāmataḥ

हिन्दी अर्थ

वे सब-के- ब वज़पुरके उत्तम शाखानगर सुपुरमें, जो दानवोंसे रा-पूरा था, गये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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