Harivamsha Purana
109
अध्याय 109 / 318

Parva 2, Adhyāya 54

10 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ10 श्लोक

अध्याय 109

श्लोक 1

राजानां अनुरोधं स्वीकृत्वा श्रीकृष्णोपरि विजयं प्राप्तुं कालयवनस्य प्रस्थानं एवं कथयमानं तं शाल्वराजं नृपाज्ञया ।उवाच परमप्रीतो यवनाधिपतिर्नृपः

rājānāṃ anurodhaṃ svīkṛtvā śrīkṛṣṇopari vijayaṃ prāptuṃ kālayavanasya prasthānaṃ evaṃ kathayamānaṃ taṃ śālvarājaṃ nṛpājñayā | uvāca paramaprīto yavanādhipatirnṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! नरेशोंकी भाज्ञाके अनुसार शाल्वराजने जब उपर्युक्त बात कही, ॑ब यवनोंके अधिपति राजा कालयवनने अत्यन्त प्रसन्न कर कहा

अध्याय 109

श्लोक 2

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि सफलं जीवितं मम ।कृष्णनिग्रहहेतोर्यन्नियुक्तो बहुभिर्नृपैः

dhanyo'smyanugṛhīto'smi saphalaṃ jīvitaṃ mama | kṛṣṇanigrahahetoryanniyukto bahubhirnṛpaiḥ

हिन्दी अर्थ

कालयवन बोला—बहुत-से राजाओंने मिलकर गो मुझे श्रीकृष्णके निग्रहके लिये नियुक्त किया है, इससे ं धन्य हो गया। यह उन सबका मुझपर महान्‌ अनुग्रह । आज मेरा जीवन सफल हो गया

अध्याय 109

श्लोक 3

दुर्जयस्त्रिषु लोकेषु सुरासुरगणैरपि ।तस्य निग्रहहेतोर्मामवधार्य जयाशिषम्

durjayastriṣu lokeṣu surāsuragaṇairapi | tasya nigrahahetormāmavadhārya jayāśiṣam

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

जो तीनों नोकोंमें देवताओं और असुरोंके लिये भी दुर्जय हैं, न्हींके निग्रहके लिये मुझे भेजनेका निश्चय किया गया गौर मुझे विजयसूचक आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ। हर्षमें रे हुए उन राजसिंहोंने यदि मेरी विजयका निश्चय किया ' तो उनके वचनामृतकी वर्षासे मेरी जीत अवश्य गगी

अध्याय 109

श्लोक 4

प्रहृष्टै राजसिंहैस्तैरवधार्यो जयो मम ।तेषां वाचाम्बुवर्षेण विजयो मे भविष्यति

prahṛṣṭai rājasiṃhaistairavadhāryo jayo mama | teṣāṃ vācāmbuvarṣeṇa vijayo me bhaviṣyati

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 109

श्लोक 5

करिष्ये वचनं तेषां नृपसत्तमचोदितम् ।पराजयोऽपि राजेन्द्र जयेन सदृशो मम

kariṣye vacanaṃ teṣāṃ nṛpasattamacoditam | parājayo'pi rājendra jayena sadṛśo mama

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! मैं नृपश्रेष्ठ जरासंधके कथनानुसार न राजाओंके वचनका पालन अवश्य करूँगा। इस युद्धमें दि मेरी पराजय भी हुई तो वह मेरे लिये विजयके ही मान होगी

अध्याय 109

श्लोक 6

अद्यैव तिथिनक्षत्रं मुहूर्तं करणं शुभम् ।यास्यामि मथुरां राजन् विजेतुं केशवं रणे

adyaiva tithinakṣatraṃ muhūrtaṃ karaṇaṃ śubham | yāsyāmi mathurāṃ rājan vijetuṃ keśavaṃ raṇe

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! मैं आजकी तिथि, नक्षत्र, मुहूर्त गौर करणको शुभ मानकर श्रीकृष्णको युद्धमें जीतनेके लये आज ही मथुराकों प्रस्थान करूँगा

अध्याय 109

श्लोक 7

एवमाभाष्य राजानं सौभस्य पतिमूर्जितम् ।सत्कृत्य च यथान्यायं महार्हमणिभूषणैः

evamābhāṣya rājānaṃ saubhasya patimūrjitam | satkṛtya ca yathānyāyaṃ mahārhamaṇibhūṣaṇaiḥ

श्लोक 7–8 का हिन्दी अर्थ

बैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सौभविमानके पधिपति बलवान्‌ राजा शाल्वसे ऐसा कहकर कालयवनने हुमूल्य मणिमय आभूषणों द्वारा उसका यथोचित सत्कार कया । राजेन्द्र ! तत्पश्चात्‌ उस राजाने सिद्धिसूचक आशीर्वाद प्त करनेके लिये ब्राह्मणोंको धन दान दिया और पुरोहितको हुत-सा धन अर्पित किया

अध्याय 109

श्लोक 8

ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं सिद्धादेशाय वै नृपः ।पुरोहिताय राजेन्द्र प्रददौ बहुशो धनम्

brāhmaṇebhyo dadau vittaṃ siddhādeśāya vai nṛpaḥ | purohitāya rājendra pradadau bahuśo dhanam

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 109

श्लोक 9

हुत्वाग्निं विधिवद् राजा कृतकौतुकमङ्गलः ।प्रस्थानं कृतवान् सम्यग् जेतुकामो जनार्दनम्

hutvāgniṃ vidhivad rājā kṛtakautukamaṅgalaḥ | prasthānaṃ kṛtavān samyag jetukāmo janārdanam

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर विधिपूर्वक रिनमें आहुति करके यात्राकालिक मज़लाचार सम्पन्न रनेके पश्चात्‌ राजा कालयवनने जनार्दन श्रीकृष्णपर लीभाँति विजय पानेके लिये वहाँसे प्रस्थान किया

अध्याय 109

श्लोक 10

शाल्वोऽपि भरतश्रेष्ठ कृतार्थो हृष्टमानसः ।यवनेन्द्रं परिष्वज्य जगाम स्वपुरं नृपः

śālvo'pi bharataśreṣṭha kṛtārtho hṛṣṭamānasaḥ | yavanendraṃ pariṣvajya jagāma svapuraṃ nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

रतश्रेष्ठ ! इधर राजा शाल्व भी कृतार्थ एवं प्रसन्नचित्त हो वनराजको हृदयसे लगाकर अपने नगरको चला गया

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

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