Harivamsha Purana
107
अध्याय 107 / 318

Parva 2, Adhyāya 52

51 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ51 श्लोक

अध्याय 107

श्लोक 1

शाल्वस्य कथनानुसारेण जरासन्धादिभिः नरेशेभिः शाल्वमेव कालयवनसमीपे दूतरूपेण प्रेषणं ततः प्रयाते वसुदेवपुत्रे नराधिपा भूषणभूषिताङ्गाः ।सभां समाजग्मुः सुरेन्द्रकल्पाः प्रबोधनार्थं गमनोत्सवास्ते

śālvasya kathanānusāreṇa jarāsandhādibhiḥ nareśebhiḥ śālvameva kālayavanasamīpe dūtarūpeṇa preṣaṇaṃ tataḥ prayāte vasudevaputre narādhipā bhūṣaṇabhūṣitāṅgāḥ | sabhāṃ samājagmuḥ surendrakalpāḥ prabodhanārthaṃ gamanotsavāste

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वसुदेवपुत्र श्रीकृष्णके वहाँसे चले जानेपर सब राजा अपने अड्ञॉंको आभूषणोंसे विभूषित करके देवेन्द्रके समान सज-धजकर राजा भीष्मककी सभामें उन्हें समझानेके लिये गये। श्रीकृष्णके चले जानेसे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई थी

अध्याय 107

श्लोक 2

सभागतान् सोमरविप्रकाशान् सुखोपविष्टान् रुचिरासनेषु ।समीक्ष्य राजा सुनयार्थवादी जगाद वाक्यं नरराजसिंहः

sabhāgatān somaraviprakāśān sukhopaviṣṭān rucirāsaneṣu | samīkṣya rājā sunayārthavādī jagāda vākyaṃ nararājasiṃhaḥ

हिन्दी अर्थ

सभामें आकर सुन्दर सिंहासनों पर सुखपूर्वक बैठे हुए सोम और सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले राजाओंको देखकर उत्तम नीतिके अनुकूल युक्तियुक्त बात कहनेवाले नरेशोंमें सिंहके समान पराक्रमी राजा भीष्मक इस प्रकार बोले

अध्याय 107

श्लोक 3

स्वयंवरकृतं दोषं विदित्वा वो नराधिपाः ।क्षन्तव्यो मम वृद्धस्य दुर्दग्धस्य फलोदयम्

svayaṃvarakṛtaṃ doṣaṃ viditvā vo narādhipāḥ | kṣantavyo mama vṛddhasya durdagdhasya phalodayam

हिन्दी अर्थ

नरेश्वरो! स्वयंवरके द्वारा जो श्रीकृष्ण- विरोधरूपी दोष सम्पादित हो रहा था, उसे जानकर (मैंने इसे स्थगित कर दिया।) आपलोग मुझ वृद्धके अपराधको क्षमा करें। जिसे दैवरूपी दावानलने अच्छी तरह जला दिया हो, उस वृक्षसे फलकी प्राप्ति कैसे हो सकती है (जिस स्वयंवरमें भगवद्विरोधकी सम्भावना हो, वह सफल नहीं हो सकता)

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श्लोक 4

एवमाभाष्य तान् सर्वान् सत्कृत्य च यथाविधि ।ततो विसर्जयामास नृपांस्तान् मध्यदेशजान्

evamābhāṣya tān sarvān satkṛtya ca yathāvidhi | tato visarjayāmāsa nṛpāṃstān madhyadeśajān

श्लोक 4–12 का हिन्दी अर्थ

भीष्मक बोले—राजाओ! आप सब पृथ्वीपतियोंकी भोर देखकर और आपके द्वारा कहे गये नीतियुक्त ्चनको सुनकर मैंने ऐसा कार्य किया है। आप सब नोग सत्पुरुष हैं; अत: मेरे इस बर्तावकों क्षमापूर्वक सह नेंगे। हम अपनेको सदा अपराधी मानते हैं

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श्लोक 5

पूर्वपश्चिमजांश्चैव उत्तरापथिकानपि ।येऽपि सर्वे महेष्वासाः प्रहृष्टमनसो नराः

pūrvapaścimajāṃścaiva uttarāpathikānapi | ye'pi sarve maheṣvāsāḥ prahṛṣṭamanaso narāḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 107

श्लोक 6

यथार्हेण च सम्पूज्य जग्मुस्ते नरपुङ्गवाः ।जरासन्धः सुनीथश्च दन्तवक्त्रश्च वीर्यवान्

yathārheṇa ca sampūjya jagmuste narapuṅgavāḥ | jarāsandhaḥ sunīthaśca dantavaktraśca vīryavān

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 7

शाल्वः सौभपतिश्चैव महाकूर्मश्च पार्थिवः ।क्रथकैशिकमुख्याश्च नृपाः प्रवरवंशजाः

śālvaḥ saubhapatiścaiva mahākūrmaśca pārthivaḥ | krathakaiśikamukhyāśca nṛpāḥ pravaravaṃśajāḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 8

वेणुदारिश्च राजर्षिः काश्मीराधिपतिस्तथा ।एते चान्ये च बहवो दक्षिणापथिका नृपाः

veṇudāriśca rājarṣiḥ kāśmīrādhipatistathā | ete cānye ca bahavo dakṣiṇāpathikā nṛpāḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 9

श्रोतुकामा रहो वाक्यं स्थिता वै भीष्मकान्तिके ।तान् वै समीक्ष्य राजेन्द्रः स राजा भीष्मको बली

śrotukāmā raho vākyaṃ sthitā vai bhīṣmakāntike | tān vai samīkṣya rājendraḥ sa rājā bhīṣmako balī

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 10

स्नेहपूर्णेन मनसा स्थितांस्तानवनीश्वरान् ।त्रिवर्गसहितं श्लक्ष्णं षड्गुणालङ्कृतं शुभम्

snehapūrṇena manasā sthitāṃstānavanīśvarān | trivargasahitaṃ ślakṣṇaṃ ṣaḍguṇālaṅkṛtaṃ śubham

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 11

उवाच नयसम्पन्नं स्निग्धगम्भीरया गिरा ।भवतामवनीशानां समालोक्य नयान्वितम

uvāca nayasampannaṃ snigdhagambhīrayā girā | bhavatāmavanīśānāṃ samālokya nayānvitama

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 12

वचनं व्याहृतं श्रुत्वा कृतवान् कार्यमीदृशम् ।सद्भिर्भवद्भिः क्षन्तव्यं वयं नित्यापराधिनः

vacanaṃ vyāhṛtaṃ śrutvā kṛtavān kāryamīdṛśam | sadbhirbhavadbhiḥ kṣantavyaṃ vayaṃ nityāparādhinaḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 13

एवमुक्त्वा तु राजा स भीष्मको नयकोविदः ।उवाच सुतमुद्दिश्य वचनं राजसंसदि

evamuktvā tu rājā sa bhīṣmako nayakovidaḥ | uvāca sutamuddiśya vacanaṃ rājasaṃsadi

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर ति-निपुण विद्वान्‌ राजा भीष्मक उस राजसभामें अपने त्रको लक्ष्य करके बोले

अध्याय 107

श्लोक 14

पुत्रस्य चेष्टामालोक्य त्रासाकुलितलोचनः ।मन्ये बालानिमाँल्लोकान् स एष पुरुषः परः

putrasya ceṣṭāmālokya trāsākulitalocanaḥ | manye bālānimā~llokān sa eṣa puruṣaḥ paraḥ

हिन्दी अर्थ

भीष्पकने कहा—राजाओ ! अपने पुत्रकी चेष्टाको देखकर मेंरे नेत्र भयसे व्याकुल हो उठे हैं। मैं इन नोगोंको (रुक्मी आदिको) बालक (विवेकशून्य) पानता हूँ। मेरी दृष्टिमें ये भगवान्‌ श्रीकृष्ण परम पुरुष

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श्लोक 15

कीर्तिः कीर्तिमतां श्रेष्ठो यशश्च विपुलं तथा ।स्थापितं भुवि मर्त्येऽस्मिन् स्वबाहुबलमूर्जितम्

kīrtiḥ kīrtimatāṃ śreṣṭho yaśaśca vipulaṃ tathā | sthāpitaṃ bhuvi martye'smin svabāhubalamūrjitam

हिन्दी अर्थ

ये कीर्तिमानोंमें श्रेष्ठ हैं। इन्होंने इस मर्त्य- नोकमें भूतलपर अपनी उत्तम कीर्ति और सुयशकी थापना की है तथा अपने ओजस्वी बाहुबलका भी रिचय दिया है

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श्लोक 16

धन्या खलु महाभागा देवकी योषितां वरा ।पुत्रं त्रिभुवनश्रेष्ठं कृत्वा गर्भेण केशवम्

dhanyā khalu mahābhāgā devakī yoṣitāṃ varā | putraṃ tribhuvanaśreṣṭhaṃ kṛtvā garbheṇa keśavam

श्लोक 16–17 का हिन्दी अर्थ

धन्य हैं नारियोंमें श्रेष्ठ महाभागा वकी, जो तीनों लोकोंमें सबसे श्रेष्ठ, शोभाके पुज्ज, वपूजित, कमलदललोचन केशव कृष्णको पुत्ररूपसे भें रखकर जन्म देनेके पश्चात्‌ सदा ख्ेहपूर्ण नेत्रोंसे नके मुखारविन्दको निहारा करती हैं

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श्लोक 17

कृष्णं कमलपत्राक्षं श्रीपुञ्जममरार्चितम् ।नेत्राभ्यां स्नेहपूर्णाभ्यां वीक्षते मुखपङ्कजम्

kṛṣṇaṃ kamalapatrākṣaṃ śrīpuñjamamarārcitam | netrābhyāṃ snehapūrṇābhyāṃ vīkṣate mukhapaṅkajam

अर्थ श्लोक 16 के साथ

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श्लोक 18

एवं लालप्यमानं तु राजानं राजसंसदि ।उवाच श्लक्ष्णया वाचा शाल्वराजो महाद्युतिः

evaṃ lālapyamānaṃ tu rājānaṃ rājasaṃsadi | uvāca ślakṣṇayā vācā śālvarājo mahādyutiḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजसभामें जा भीष्मकको इस प्रकार बारम्बार बोलते देख महातेजस्वी ाल्वराजने सान्त्वनापूर्ण मधुर वाणीमें कहा

अध्याय 107

श्लोक 19

अलं खेदेन राजेन्द्र सुताय रिपुमर्दिने ।क्षत्रियस्य रणे राजन् ध्रुवं जयपराजयौ

alaṃ khedena rājendra sutāya ripumardine | kṣatriyasya raṇe rājan dhruvaṃ jayaparājayau

हिन्दी अर्थ

शाल्व बोला—राजेन्द्र। (आप खेद क्यों प्रकट रते हैं) आपका पुत्र शन्रुओंका मान मर्दन करनेवाला '।। इसके लिये खेद करना व्यर्थ है (इसपर तो आपको व॑ होना चाहिये) । राजन्‌! रणभूमिमें क्षत्रियको जय थवा पराजय अवश्य प्राप्त होती है

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श्लोक 20

नियता गति मर्त्यानामेष धर्मः सनातनः ।बलकेशवयोरन्यस्तृतीयः कः पुमानिह

niyatā gati martyānāmeṣa dharmaḥ sanātanaḥ | balakeśavayoranyastṛtīyaḥ kaḥ pumāniha

श्लोक 20–28 का हिन्दी अर्थ

यह मनुष्योंकी ययत गति है। यह सनातन धर्म है। बलराम और ीकृष्णके सिवा इस भूतलपर तीसरा कौन ऐसा पुरुष , जो समराजणमें आपके महाबली पुत्रका सामना कर के। यह महाबाहु वीर हाथमें धनुष लेकर अकेला युद्धक्षेत्रमें रथियों और अतिरथियोंके समूहका मना करने और शत्रुओंको बाधा पहुँचानेमें समर्थ है । नस समय यह अपने बाहुबलसे देवताओंके लिये यहाँ विभक्तिका लोप आर्ष माना है। पी + ५२९ भी दुर्जय महाभयंकर भार्गवास्त्रका प्रयोग करेगा, उस समय इस वीरका आक्रमण कौन पुरुष सह सकेगा? पे श्रीकृष्ण तो अनादि, अनन्त और अविनाशी पुरुष ं। इस नरलोकमें: साक्षात्‌ त्रिशूलधारी भगवान्‌ श्र भी उन्हें जीत नहीं सकते। महाराज! आपका. पुत्र सम्पूर्ण शास्त्रोंका तत्त्ववेत्ता है। यह श्रीकृष्णको देवता और ईधर समझकर ही उनसे युद्ध नहीं करता है। रिश्वर ! आजकल युद्धमें श्रीकृष्णपर विजय पानेवाला केवल कालयवन है, जो यवनोंका अधिपति है। वह ग्रीकृष्णके लिये अवध्य है । गार्ग्यमुनिने अत्यन्त दुष्कर, पयंकर एवं दारुण तपस्या करके बारह वर्षोतक पुत्रकी कामनासे रुद्रदेवकी आराधना की थी। वे उन दिनों केवल लोहेका चूर्ण खाकर रहते थे। इस प्रकार द्रदेवको संतुष्ट करके उन्होंने उनसे एक पुत्र माँगा था भगवान्‌ शड्डरसे यह भी प्रार्थना की कि मेरा त्र माथुरों (मधुरामें उत्पन्न हुए लोगों) -के लिये अवध्य गो । तब रुद्रदेवने *एवमस्तु' कहकर मुनिको वैसा पुत्र दान कर दिया

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श्लोक 21

रणे योधयितुं शक्तस्तव पुत्रं महाबलम् ।रथातिरथवृन्दानामेक एव रणाजिरे

raṇe yodhayituṃ śaktastava putraṃ mahābalam | rathātirathavṛndānāmeka eva raṇājire

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 107

श्लोक 22

रिपून् बाधयितुं शक्तो धनुर्गृह्य महाभुजः ।भार्गवास्त्रं महारौद्रं देवैरपि दुरासदम्

ripūn bādhayituṃ śakto dhanurgṛhya mahābhujaḥ | bhārgavāstraṃ mahāraudraṃ devairapi durāsadam

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 107

श्लोक 23

सृजतो बाहुवीर्येण कः पुमान् प्रसहिष्यति ।अयं तु पुरुषः कृष्णो ह्यनादिनिधनोऽव्ययः

sṛjato bāhuvīryeṇa kaḥ pumān prasahiṣyati | ayaṃ tu puruṣaḥ kṛṣṇo hyanādinidhano'vyayaḥ

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 107

श्लोक 24

तं विजेता नृलोकेऽस्मिन् नापि शूलधरः स्वयम् ।तव पुत्रो महाराज सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित्

taṃ vijetā nṛloke'smin nāpi śūladharaḥ svayam | tava putro mahārāja sarvaśāstrārthatattvavit

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 107

श्लोक 25

विदित्वा देवमीशानं न योधयति केशवम् ।अद्य तस्य रणे जेता यवनाधिपतिर्नृप

viditvā devamīśānaṃ na yodhayati keśavam | adya tasya raṇe jetā yavanādhipatirnṛpa

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 107

श्लोक 26

स कालयवनो नाम अवध्यः केशवस्य ह ।तप्त्वा सुदारुणं घोरं तपः परमदुश्चरम्

sa kālayavano nāma avadhyaḥ keśavasya ha | taptvā sudāruṇaṃ ghoraṃ tapaḥ paramaduścaram

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 107

श्लोक 27

रुद्रमाराधयामास द्वादशाब्दानयोऽशनः ।पुत्रकामेन मुनिना तोष्य रुद्रात्सुतो वृतः

rudramārādhayāmāsa dvādaśābdānayo'śanaḥ | putrakāmena muninā toṣya rudrātsuto vṛtaḥ

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 107

श्लोक 28

माथुराणामवध्योऽयं भवेदिति च शङ्करात् ।एवमस्त्विति रुद्रोऽपि प्रददौ मुनये सुतम्

māthurāṇāmavadhyo'yaṃ bhavediti ca śaṅkarāt | evamastviti rudro'pi pradadau munaye sutam

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 107

श्लोक 29

एवं गार्ग्यस्य तनयः श्रीमान् रुद्रवरोद्भवः ।माथुराणामवध्योऽयं मथुरायां विशेषतः

evaṃ gārgyasya tanayaḥ śrīmān rudravarodbhavaḥ | māthurāṇāmavadhyo'yaṃ mathurāyāṃ viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

इस तरह गार्ग्यका वह जस्वी पुत्र रुद्रदेवके वरसे उत्पन्न हुआ है और वशेषत: माथुरों (मथुरामें पैदा हुए वीरों)-के लिये मवध्य है

अध्याय 107

श्लोक 30

कृष्णोऽपि बलवानेष माथुरो जातवानयम् ।स जेष्यति रणे कृष्णं मथुरायां समागतः

kṛṣṇo'pi balavāneṣa māthuro jātavānayam | sa jeṣyati raṇe kṛṣṇaṃ mathurāyāṃ samāgataḥ

हिन्दी अर्थ

ये श्रीकृष्ण बलवानू होनेपर भी थुरामें जन्म लेनेके कारण माथुर ही हैं । अत: मधुरामें माया हुआ कालयवन रणभूमिमें श्रीकृष्णको अवश्य पीत लेगा

अध्याय 107

श्लोक 31

मन्यध्वं यदि वा युक्तां नृपा वाचं मयेरिताम् ।तत्र दूतं विसृजध्वं यवनेन्द्रपुरं प्रति

manyadhvaṃ yadi vā yuktāṃ nṛpā vācaṃ mayeritām | tatra dūtaṃ visṛjadhvaṃ yavanendrapuraṃ prati

हिन्दी अर्थ

नरपतियो ! यदि आपलोग मेरी कही ई इस बातको उचित समझें तो यवनराजके नगरको त भेज दें

अध्याय 107

श्लोक 32

श्रुत्वा सौभपतेर्वाक्यं सर्वे ते नृपसत्तमाः ।कुर्म इत्यब्रुवन् हृष्टा जरासन्धं महाबलम्

śrutvā saubhapatervākyaṃ sarve te nṛpasattamāḥ | kurma ityabruvan hṛṣṭā jarāsandhaṃ mahābalam

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सौभ विमानके मधिपति राजा शाल्वकी बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ नरेश र्षमें भरकर महाबली जरासंधसे बोले-' हमलोग अवश्य सा ही करें'

अध्याय 107

श्लोक 33

स तेषां वचनं क्षुत्वा जरासन्धो महीपतिः ।बभूव विमना राजन् ब्रह्मणो वचनं स्मरन्

sa teṣāṃ vacanaṃ kṣutvā jarāsandho mahīpatiḥ | babhūva vimanā rājan brahmaṇo vacanaṃ smaran

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! उन राजाओंकी बात सुनकर माकाशवाणीकी बात याद करके पृथ्वीपति जरासंधका [न उदास हो गया

अध्याय 107

श्लोक 34

मां समाश्रित्य पूर्वस्मिन् नृपा नृपभयार्दिताः ।प्राप्नुवन्ति हृतं राज्यं सभृत्यबलवाहनम्

māṃ samāśritya pūrvasmin nṛpā nṛpabhayārditāḥ | prāpnuvanti hṛtaṃ rājyaṃ sabhṛtyabalavāhanam

हिन्दी अर्थ

जरासंध बोला—आजसे पहले सब राजा दूसरे राजाओंके भयसे पीड़ित होनेपर मेरी शरणमें आते थे और भृत्य, सेना तथा वाहनोंसहित अपने खोये हुए राज्यको मेरे सहयोगसे पुन: प्राप्त कर लेते थे

अध्याय 107

श्लोक 35

इह सञ्चोद्यते भूपैः परसंश्रयहेतुना ।कन्येव स्वपतिद्वेषादन्यं रतिपरायणा

iha sañcodyate bhūpaiḥ parasaṃśrayahetunā | kanyeva svapatidveṣādanyaṃ ratiparāyaṇā

हिन्दी अर्थ

इस समय यहाँ सब राजा मुझे दूसरेका आश्रय लेनेके लिये प्रेरित कर रहे हैं। जैसे रतिलोलुप नारी अपने पतिके प्रति द्वेष होनेसे उसे छोड़कर दूसरे पुरुषका आश्रय लेती है, (उसी प्रकार मैं अपने बलका आश्रय न लेकर दूसरेका सहारा लेनेको उद्यत हुआ हूँ)

अध्याय 107

श्लोक 36

अहो सुबलवद् दैवमशक्यं विनिवर्तितुम् ।यदहं कृष्णभीतोऽन्यं संश्रयामि बलाधिकम्

aho subalavad daivamaśakyaṃ vinivartitum | yadahaṃ kṛṣṇabhīto'nyaṃ saṃśrayāmi balādhikam

हिन्दी अर्थ

अहो! दैव बड़ा प्रबल है। उसे लौटाया नहीं जा सकता; क्योंकि आज मैं श्रीकृष्णसे डरकर दूसरे अधिक बलशाली राजाका आश्रय ग्रहण कर रहा हूँ

अध्याय 107

श्लोक 37

नूनं योगविहीनोऽहं कारयिष्ये पराश्रयम् ।श्रेयो हि मरणं मह्यं न चान्यं संश्रये नृपाः

nūnaṃ yogavihīno'haṃ kārayiṣye parāśrayam | śreyo hi maraṇaṃ mahyaṃ na cānyaṃ saṃśraye nṛpāḥ

हिन्दी अर्थ

निश्चय ही मैं निरुपाय हो गया हूँ, अत: मुझे दूसरेका आश्रय लेना पड़ेगा; परंतु ऐसे जीवनसे तो मेरा मर जाना ही अच्छा है। नरपतियो! मैं दूसरेकी शरण नहीं लूँगा

अध्याय 107

श्लोक 38

कृष्णो वा बलदेवो वा योवासौ वा नराधिपः ।हन्तारं प्रतियोत्स्यामि यथा ब्राह्मप्रचोदितः

kṛṣṇo vā baladevo vā yovāsau vā narādhipaḥ | hantāraṃ pratiyotsyāmi yathā brāhmapracoditaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण हों, बलदेव हों अथवा जो कोई भी राजा क्यों न हो, जो मुझे मारेगा, उसका मैं डटकर सामना करूँगा। जैसा कि आकाशवाणीने कहा है कि मुझे कोई दूसरा मारनेवाला है

अध्याय 107

श्लोक 39

एषा मे निश्चिता बुद्धिरेतत्सत् पुरुषव्रतम् ।अतोऽन्यथा न शक्तोऽहं कर्तुं परसमाश्रयम्

eṣā me niścitā buddhiretatsat puruṣavratam | ato'nyathā na śakto'haṃ kartuṃ parasamāśrayam

हिन्दी अर्थ

यही मेरी बुद्धिका निश्चय है, यही सत्पुरुषका व्रत है। इसके विपरीत मैं दूसरेका आश्रय लेनेमें असमर्थ हूँ

अध्याय 107

श्लोक 40

भवतां साधुवृत्तानामाबाधं न करोति सः ।तेन दूतं प्रदास्यामि नृपाणां रक्षणाय वै

bhavatāṃ sādhuvṛttānāmābādhaṃ na karoti saḥ | tena dūtaṃ pradāsyāmi nṛpāṇāṃ rakṣaṇāya vai

हिन्दी अर्थ

आप सदाचारी नरेशोंको श्रीकृष्ण बाधा न पहुँचायें, इस उद्देश्यसे राजाओंकी रक्षाके लिये मैं दूत दूँगा अर्थात्‌ दूत भेजना स्वीकार करूँगा

अध्याय 107

श्लोक 41

व्योममार्गेण यातव्यं यथा कृष्णो न बाधते ।गच्छन्तमनुचिन्त्यैवं प्रेषयध्वं नृपोत्तमाः

vyomamārgeṇa yātavyaṃ yathā kṛṣṇo na bādhate | gacchantamanucintyaivaṃ preṣayadhvaṃ nṛpottamāḥ

हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ राजाओ! उस दूतको आकाशमार्गसे जाना चाहिये, जिससे यहाँसे जाते समय उसे श्रीकृष्ण बाधा न दे सकें । इसपर भलीभाँति विचार करके ही तुमलोग दूत भेजो

अध्याय 107

श्लोक 42

अयं सौभपतिः श्रीमाननलार्केन्दुविक्रमः ।रथेनादित्यवर्णेन प्रयाति स्वपुरं बली

ayaṃ saubhapatiḥ śrīmānanalārkenduvikramaḥ | rathenādityavarṇena prayāti svapuraṃ balī

हिन्दी अर्थ

ये श्रीमान्‌ सौभपति बलवान्‌ राजा शाल्व अग्रि, सूर्य और चन्द्रमाके समान पराक्रमी हैं। ये सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ (विमान) -द्वारा अपने नगरको जाते हैं

अध्याय 107

श्लोक 43

यवनेन्द्रो यथाभ्येति नरेन्द्राणां समागमम् ।वचनं च तथास्माभिर्दूत्ये नः कृष्णविग्रहे

yavanendro yathābhyeti narendrāṇāṃ samāgamam | vacanaṃ ca tathāsmābhirdūtye naḥ kṛṣṇavigrahe

हिन्दी अर्थ

ये दूतकर्म करते समय हमलोगोंकी ओरसे जैसी बात कहनी चाहिये, वैसी ही कहें, जिससे श्रीकृष्णके साथ हम लोगोंका युद्ध उपस्थित होनेपर वह यवनराज कालयवन हम नरेशोंकी मण्डलीसे आकर मिल जाय

अध्याय 107

श्लोक 44

पुनरेवाब्रवीद् राजा सौभस्य पतिमूर्जितम ।गच्छ सर्वनरेन्द्राणां साहाय्यं कुरु मानद

punarevābravīd rājā saubhasya patimūrjitama | gaccha sarvanarendrāṇāṃ sāhāyyaṃ kuru mānada

श्लोक 44–45 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! फिर राजा जरासंधने सौभविमानके स्वामी बलवान्‌ राजा शाल्वसे कहा-'मानद! जाओ, सम्पूर्ण नरेशोंकी सहायता करो ॥ ढढ ॥ “तुम ऐसी नीतिका प्रयोग करो, जिससे यवनराज चढ़ाई करे, श्रीकृष्णको जीते और हमलोगोंको संतोष हो '

अध्याय 107

श्लोक 45

यवनेन्द्रो यथा याति यथा कृष्णं विजेष्यति ।यथा वयं च तुष्यामस्तथा नीतिर्विधीयताम्

yavanendro yathā yāti yathā kṛṣṇaṃ vijeṣyati | yathā vayaṃ ca tuṣyāmastathā nītirvidhīyatām

अर्थ श्लोक 44 के साथ

अध्याय 107

श्लोक 46

एवं सन्दिश्य सर्वांस्तान् भीष्मकं पूज्य धर्मतः ।प्रययौ स्वपुरं राजा स्वेन सैन्येन संवृतः

evaṃ sandiśya sarvāṃstān bhīṣmakaṃ pūjya dharmataḥ | prayayau svapuraṃ rājā svena sainyena saṃvṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार सबको संदेश देकर और धर्मानुसार भीष्मकका भी सम्मान करके राजा जरासंध अपनी सेनाके साथ अपने नगरको चला गया

अध्याय 107

श्लोक 47

शाल्वोऽपि नृपतिश्रेष्ठस्तांश्च सम्पूज्य धर्मतः ।जगामाकाशमार्गेण रथेनानिलरंहसा

śālvo'pi nṛpatiśreṣṭhastāṃśca sampūjya dharmataḥ | jagāmākāśamārgeṇa rathenānilaraṃhasā

हिन्दी अर्थ

राजाओं में श्रेष्ठ शाल्व भी उन सबका धर्मपूर्क आदर करके तायुके समान वेगशाली विमानद्वारा आकाशमार्गसे चला या

अध्याय 107

श्लोक 48

तेऽपि सर्वे महीपाला दक्षिणापथवासिनः ।अनुव्रज्य जरासन्धं गताः स्वनगरं प्रति

te'pi sarve mahīpālā dakṣiṇāpathavāsinaḥ | anuvrajya jarāsandhaṃ gatāḥ svanagaraṃ prati

हिन्दी अर्थ

दक्षिण भारतके रहनेवाले जो समस्त भूमिपाल तरहाँ उपस्थित थे, वे भी कुछ दूरतक जरासंधके पीछे जाकर फिर अपने नगरको चले गये

अध्याय 107

श्लोक 49

भीष्मकः सह पुत्रेण तावुभौ चिन्त्य दुर्नयम ।स्वे गृहे न्यवसद् दीनः कृष्णमेवानुचिन्तयन्

bhīṣmakaḥ saha putreṇa tāvubhau cintya durnayama | sve gṛhe nyavasad dīnaḥ kṛṣṇamevānucintayan

हिन्दी अर्थ

राजा भीष्मक अपने पुत्र रुक्मीके साथ ही उन दोनों शाल्व और जरासंधका तथा उन सबकी दुर्नीतिका विचार करके श्रीकृष्णका ही चिन्तन करते हुए दीनभावसे अपने घरमें हहने लगे

अध्याय 107

श्लोक 50

विदिता रुक्मिणी साध्वी स्वयंवरनिवर्तनम् ।कृप्णस्यागमनाद्धेतोर्नृपाणां दोषदर्शनम्

viditā rukmiṇī sādhvī svayaṃvaranivartanam | kṛpṇasyāgamanāddhetornṛpāṇāṃ doṣadarśanam

श्लोक 50–51 का हिन्दी अर्थ

सती साध्वी रुक्मिणीको जब यह पता नग गया कि श्रीकृष्णका आगमन होनेसे स्वयंवर स्थगित हो गया तथा राजाओंकी जो दोषदृष्टि थी उसका भी ्तान हो गया, तब वे अपनी सखियोंके बीचमें जाकर नज्जासे सिर झुकाये हुए बोलीं—'सखियो ! मैं कमल- यन श्रीकृष्णको छोड़कर दूसरे नरेशोंकी पत्नी नहीं हो पकती—यह मेरी सच्ची बात है

अध्याय 107

श्लोक 51

गत्वा तु सा सखीमध्ये उवाच व्रीडितानना ।न चान्येषां नरेन्द्राणां पत्नी भवितुमुत्सहे ।कृष्णात् कमलपत्राक्षात्सत्यमेतद् वचो मम

gatvā tu sā sakhīmadhye uvāca vrīḍitānanā | na cānyeṣāṃ narendrāṇāṃ patnī bhavitumutsahe | kṛṣṇāt kamalapatrākṣātsatyametad vaco mama

अर्थ श्लोक 50 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.