Garuda Purana
229
अध्याय 229 / 317

Book 1 - Adhyaya 230

54 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ54 श्लोक

अध्याय 229

श्लोक 1

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे विष्णुपूजानिरूपणं नामैकोनत्रिशदुत्तरद्विशततमो ऽध्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- २३० सूत उवाच ।आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा

iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe pūrvakhaṇḍe prathamāṃśākhye ācārakāṇḍe viṣṇupūjānirūpaṇaṃ nāmaikonatriśaduttaradviśatatamo 'dhyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 230 sūta uvāca / ālokya sarvaśāstrāṇi vicārya ca punaḥ punaḥ / idamekaṃ suniṣpannaṃ dhyeyo nārāyaṇaḥ sadā

हिन्दी अर्थ

वैराग्यका मार्ग स्वीकार कर लेते हैं तो आत्यन्तिक लय (मोक्ष)-को प्राप्त करते हैं। अब मैं उस संसारचक्रका वर्णन करूँगा, जिसको जाने बिना पुरुषार्थी परमात्मामें लीन नहीं होते। प्राणके उत्क्रमण कालमें इस शरीरका परित्याग करके मनुष्य दूसरे सूक्ष्म शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है। इस मृत्युलोकसे मृत्युके पश्चात् जीवको यमराजके दूत बारह दिनकी अवधिमें यमलोकको ले जाते

English

He who does not meditate upon Visnu from whom the living beings take their origin and spread everywhere shall be reborn as a worm in the faeces.

अध्याय 229

श्लोक 2

किं तस्य दानैः किन्तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः ।यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः

kiṃ tasya dānaiḥ kintīrthaiḥ kiṃ tapobhiḥ kimadhvaraiḥ / yo nityaṃ dhyāyate devaṃ nārāyaṇamananyadhīḥ

हिन्दी अर्थ

हैं । वहाँपर उस मरे हुए व्यक्तिके बन्धु-बान्धव जो उसके लिये तिलोदक और पिण्डदान देते हैं, वही सब यमलोकके मार्गमें वह खाता-पीता है । पापकर्म करनेके कारण वह नरकलोकमें जाता है और

English

Neither one's own mother nor father nor other kins* men can ever do unto one what Hnikeia (Vifnu) does when propitiated and worshipped faithfully.

अध्याय 229

श्लोक 3

षष्टिस्तीर्थसहस्राणि षष्टिस्तीर्थशतानि च ।नारायणप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्

ṣaṣṭistīrthasahasrāṇi ṣaṣṭistīrthaśatāni ca / nārāyaṇapraṇāmasya kalāṃ nārhanti ṣoḍaśīm

हिन्दी अर्थ

पुण्यकर्म करनेके कारण स्वर्ग अपने उन पाप- पुण्योंके प्रभावसे नरक तथा स्वर्गमें गया हुआ प्राणी पुनः नरक और स्वर्गसे लौटकर स््त्रियोंके गर्भमै आता है। वहाँ विनष्ट न होकर वह दो बीजोंके आकारको धारण कर लेता है। उसके बाद वह कलल फिर बुद्बुदाकार बन जाता है। तत्पश्चात् उस बुद्बुदाकार रक्तसे मांसपेशीका निर्माण होता है। मांसपेशीसे मांस अण्डाकार बन

English

Neither by different kinds of gifts distributed (by the devotee) nor by flowers or unguents offered by him can the noble*soulcd Janardana be propitiated as by devotion.

अध्याय 229

श्लोक 4

प्रयश्चित्तान्यशेषाणि तपः कर्माणि यानि वै ।विद्धि तेषामशेषाणां कृष्णानुस्मरणं परम्

prayaścittānyaśeṣāṇi tapaḥ karmāṇi yāni vai / viddhi teṣāmaśeṣāṇāṃ kṛṣṇānusmaraṇaṃ param

हिन्दी अर्थ

जाता है। वह एक पल (परिमाण-विशेष)-के समान होता है। उसी अण्डेसे अंकुर बनता है। उस

English

Salvation or identity (with the Supreme Soul) can¬ not be secured through riches, affluence or greatness or by a series of religious rites* The root cause for the same is the worship of Hari.

अध्याय 229

श्लोक 5

कृतपापे ऽनुरक्तिश्च यस्य पुंसः प्रजायते ।प्रायश्चित्तन्तु तस्यैकं हरेः संस्मरणं परम्

kṛtapāpe 'nuraktiśca yasya puṃsaḥ prajāyate / prāyaścittantu tasyaikaṃ hareḥ saṃsmaraṇaṃ param

हिन्दी अर्थ

निकलने लगते हैं। इस प्रकार गर्भमें विकसित होता हुआ यह जीव नौ मासतक अधोमुख स्थित रहकर दसवें मासमें जन्म लेता है। तदनन्तर संसारको अत्यन्त मोहित करनेवाली भगवान् विष्णुकी वैष्णवी माया उसे आवृत कर लेती है। यह जीव

English

Salvation or identity (with the Supreme Soul) can¬ not be secured through riches, affluence or greatness or by a series of religious rites* The root cause for the same is the worship of Hari.

अध्याय 229

श्लोक 6

मुहूर्तमपि यो ध्यायेन्नारायणमतन्द्रितः ।सो ऽपि स्वर्गतिमाप्नोति किं पुनस्तत्परायणः

muhūrtamapi yo dhyāyennārāyaṇamatandritaḥ / so 'pi svargatimāpnoti kiṃ punastatparāyaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

वृद्धावस्थाको प्राप्त करता है । इसके बाद यह पुनः मृत्युको प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार यह जीव इस संसारचक्रमें घटीयन्त्रके समान घूमता रहता है।

English

Salvation or identity (with the Supreme Soul) can¬ not be secured through riches, affluence or greatness or by a series of religious rites* The root cause for the same is the worship of Hari.

अध्याय 229

श्लोक 7

जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तेषु योगस्थस्य च योगिनः ।या काचिन्मनसो वृत्तिः सा भवत्यच्युताश्रयात्

jāgratsvapnasuṣupteṣu yogasthasya ca yoginaḥ / yā kācinmanaso vṛttiḥ sā bhavatyacyutāśrayāt

हिन्दी अर्थ

जीव नरकभोग करनेके पश्चात् पापयोनिमें जन्म लेता है। पतितसे प्रतिग्रह स्वीकार करनेके कारण विद्वान् भी अधोयोनिमें जन्म ग्रहण करता है। याचक नरकभोग करनेके बाद कृमियोनिको प्राप्त होता है। गुरुकी पत्नी अथवा गुरुके धनकी मनसे भी कामना करनेवाला व्यक्ति कुत्ता होता है। मित्रका अपमान करनेवाला गधेकी योनिमें जन्म लेता है । माता-पिताको कष्ट पहुँचानेवाले प्राणीको

English

Salvation or identity (with the Supreme Soul) can¬ not be secured through riches, affluence or greatness or by a series of religious rites* The root cause for the same is the worship of Hari.

अध्याय 229

श्लोक 8

उत्तिष्ठन्निपतन्विष्णुं प्रलपन्विविशंस्तथा ।भुञ्जञ्जाग्रच्च गोविन्दं माधवं यश्च संस्मरेत्

uttiṣṭhannipatanviṣṇuṃ pralapanviviśaṃstathā / bhuñjañjāgracca govindaṃ mādhavaṃ yaśca saṃsmaret

हिन्दी अर्थ

कछुएको योनिमें जाना पड़ता है। जो मनुष्य अपने स्वामीका विश्वसनीय बन कर उसको छलकर जीवनयापन करता है; वह मृत्युके बाद व्यामोहमें फँसे हुए वानरकी योनिमें जाता है।

English

Salvation or identity (with the Supreme Soul) can¬ not be secured through riches, affluence or greatness or by a series of religious rites* The root cause for the same is the worship of Hari.

अध्याय 229

श्लोक 9

स्वेस्वे कर्मण्यभिरतः कुर्याच्चित्तं जनार्दने ।एषा शास्त्रानुसारोक्तिः किमन्यैर्बहुभाषितैः

svesve karmaṇyabhirataḥ kuryāccittaṃ janārdane / eṣā śāstrānusāroktiḥ kimanyairbahubhāṣitaiḥ

हिन्दी अर्थ

धरोहररूपमें अपने पास रखे हुए पराये धनका अपहरण करनेवाला व्यक्ति नरकगामी होता है। नरकसे निकलनेके पश्चात् वह कृमियोनिमें जन्म लेता है । नरकसे मुक्त होनेपर उस ईर्ष्यालु मनुष्यको राक्षसयोनिमें जाना पड़ता है। जो मनुष्य विश्वासघाती

English

Salvation or identity (with the Supreme Soul) can¬ not be secured through riches, affluence or greatness or by a series of religious rites* The root cause for the same is the worship of Hari.

अध्याय 229

श्लोक 10

ध्यानमेव परो धर्मो ध्यानमेव परं तपः ।ध्यानमेव परं शौचं तस्माद्ध्यानपरो भवेत्

dhyānameva paro dharmo dhyānameva paraṃ tapaḥ / dhyānameva paraṃ śaucaṃ tasmāddhyānaparo bhavet

हिन्दी अर्थ

अंकुरसे अंगुली, नेत्र, नाक, मुख और कान आदि होता है, वह मत्स्ययोनिमें उत्पन्न होता है। यव अङ्ग-उपाङ्ग पैदा होते हैं। उसके बाद उस विकसित और धान्यादि अनाजोंकी चोरी करनेवाले व्यक्ति अंकुरमें उत्पादक-शक्तिका सञ्चार होने लगता है । मरनेके पश्चात् चूहेकी योनिमें जन्म लेते हैं। जिससे हाथ-पैरकी अंगुलियोंमें नख आदि निकल दूसरेकी स्त्रीका अपहरण करनेवाला मनुष्य खूँखार

English

Salvation or identity (with the Supreme Soul) can¬ not be secured through riches, affluence or greatness or by a series of religious rites* The root cause for the same is the worship of Hari.

अध्याय 229

श्लोक 11

नास्ति विष्णोः परं ध्थेयं तपो नानशनात्परम् ।तस्मात्प्रधानमत्रोक्तं वासुदेवस्य चिन्तनम्

nāsti viṣṇoḥ paraṃ dhtheyaṃ tapo nānaśanātparam / tasmātpradhānamatroktaṃ vāsudevasya cintanam

हिन्दी अर्थ

आते हैं। शरीरमें त्वचा और रोम तथा बाल भेड्यिकी योनिमें जाता है। जो मनुष्य अपने भाईकी स्त्रीक साथ सहवास करता है, वह जन्म लेना पड़ता है। कपाससे बने वस्त्रोंकी चोरी कोकिलयोनिमें जन्म लेता है। गुरु आदिकी स्त्रियोंके करनेपर क्रौञ्च पक्षी, अग्निकी चोरी करनेपर बगुला, साथ सहवास करनेपर मनुष्य सूअर-योनिको अंगराग आदि रंजकद्रव्य (शरीर-संस्कारकद्रव्य) प्राप्त होता है। और शाक-पातकी चोरी करनेपर मनुष्य मयूर होता

English

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अध्याय 229

श्लोक 12

यद्दुर्लभं परं प्राप्यं मनसो यन्न गोचरम् ।तदप्यप्रार्थितं ध्यातो ददाति मधुसूदनः

yaddurlabhaṃ paraṃ prāpyaṃ manaso yanna gocaram / tadapyaprārthitaṃ dhyāto dadāti madhusūdanaḥ

हिन्दी अर्थ

यज्ञ, दान तथा विवाह आदिमें विघ्न डालनेवाले है । लाल रंगकी वस्तुकी चोरी करनेसे मनुष्य जीवक मनुष्यको कृमियोनि प्राप्त होती है। देवता, पितर (पक्षिविशेष), अच्छी गन्धवाली वस्तुओंकी चोरी और ब्राह्मणोंको बिना भोजन आदि दिये जो करनेसे छुछुन्दर तथा खरगोशकी चोरी करनेसे वह मनुष्य अन्न ग्रहण कर लेता है, वह नरकको जाता खरगोशयोनिको प्राप्त होता है। कलाकी चोरी

English

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अध्याय 229

श्लोक 13

प्रमादात्कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत् ।स्मरणादेव तद्विष्णोः संपूर्णं स्यादिति श्रुतिः

pramādātkurvatāṃ karma pracyavetādhvareṣu yat / smaraṇādeva tadviṣṇoḥ saṃpūrṇaṃ syāditi śrutiḥ

हिन्दी अर्थ

है। वहाँसे मुक्त होकर वह पापी काकयोनिको करनेपर मनुष्य नपुंसक, लकड़ीकी चोरी करनेपर प्राप्त करता है। बड़े भाईका अपमान करनेसे घास-फूसमें रहनेवाला कीट, फूलकी चोरी करनेपर मनुष्यको क्रौञ्च (पक्षिविशेष)-योनिकी प्राप्ति होती दरिद्र तथा यावक (जौका सत्तू, धान, लाख है। यदि शूद्र ब्राह्मण-स्त्रीक साथ रमण करता है आदि) चुरानेपर पंगु होता है। तो वह कृमियोनिमें जन्म लेता है। उस ब्राह्मणीसे शाक-पातकी चोरी करनेपर हारीत और जलकी यदि वह संतानोत्पत्ति करता है तो वह लकड़ीमें चोरी करनेपर चातक पक्षी होता है। जो मनुष्य लगनेवाले घुन नामक कृमिकी योनिको प्राप्त होता किसीके घरका अपहरण करता है, वह मृत्युके है। कृतघ्न व्यक्ति कृमि, कीट, पतङ्ग तथा बिच्छूकी पश्चात् महाभयानक रौरव आदि नरकलोकोंमें

English

Salvation or identity (with the Supreme Soul) can¬ not be secured through riches, affluence or greatness or by a series of religious rites* The root cause for the same is the worship of Hari.

अध्याय 229

श्लोक 14

ध्यानेन सदृशो नास्ति शोधनं पापकर्मणाम् ।आगामिदेहहेतूनां दाहको योगपावकः

dhyānena sadṛśo nāsti śodhanaṃ pāpakarmaṇām / āgāmidehahetūnāṃ dāhako yogapāvakaḥ

हिन्दी अर्थ

योनियोंमें भ्रमण करता है। जो मनुष्य शस्त्रहीन जाकर कष्ट भोगता है। तृण, गुल्म, लता, वल्लरी पुरुषको मारता है, वह दूसरे जन्ममें गधा होता है। और वृक्षोंकी छाल चुरानेवाला व्यक्ति वृक्ष- स्त्री और बच्चेका वध करनेवालेको कृमियोनि योनिको प्राप्त होता है। यही स्थिति गौ, सुवर्ण प्राप्त होती है। भोजनकी चोरी करनेवाला मक्खीकी आदिकी चोरी करनेवाले मनुष्योंकी भी है।

English

Salvation or identity (with the Supreme Soul) can¬ not be secured through riches, affluence or greatness or by a series of religious rites* The root cause for the same is the worship of Hari.

अध्याय 229

श्लोक 15

विनिष्पन्नसमाधिस्तु मुक्तिमत्रैव जन्मनि ।प्राप्नोति योगी योगाग्निदग्धकर्मा च यो ऽचिरात्

viniṣpannasamādhistu muktimatraiva janmani / prāpnoti yogī yogāgnidagdhakarmā ca yo 'cirāt

हिन्दी अर्थ

योनिमें जाता है । अन्नकी चोरी करनेवाला निल्लीकी विद्याकी चोरी करनेवाला मनुष्य विभिन्न प्रकारके योनि तथा तिलकी चोरी करनेवाला चूहेकी योनिमें नरकलोकोंका भोग करनेके पश्चात् गुँगेकी योनिमें जन्म लेता है। घीकी चोरी करनेवाला मनुष्य जन्म लेता है। समिधारहित अग्निमे आहुति देनेवाला नेवला और मद्गुर (मत्स्यविशेष)-के मांसकी मन्दाग्नि-रोगसे ग्रस्त होता है। चोरी करनेवाला काकयोनिमें जाता है। मधुकी दूसरेकी निन्दा करना, कृतघ्नता, दूसरेकी मर्यादाको चोरी करनेपर मनुष्य दंशकयोनि तथा अपूप नष्ट करना, निष्ठुरता, अत्यन्त घृणित व्यवहारमें (पुआ)-की चोरी करनेपर चींटीकी योनिमें जन्म अभिरुचि, परस्त्रीक साथ सहवास करना, पराये लेता है। जलका अपहरण करनेपर पापी व्यक्ति धनका अपहरण करना, अपवित्र रहना, देवोंकी

English

Salvation or identity (with the Supreme Soul) can¬ not be secured through riches, affluence or greatness or by a series of religious rites* The root cause for the same is the worship of Hari.

अध्याय 229

श्लोक 16

यथाग्निरुद्यतशिखः कक्षं दहति वानिलः ।तथा चित्तस्थिते विष्णौ योगिना सर्वकिल्बिषम्

yathāgnirudyataśikhaḥ kakṣaṃ dahati vānilaḥ / tathā cittasthite viṣṇau yoginā sarvakilbiṣam

हिन्दी अर्थ

काकयोनिमैं उत्पन्न होता है। लकड़ीकी चोरी निन्दा तथा मर्यादाके बन्धनको तोड़कर अशिष्ट करनेपर मनुष्य हारीत (हारिल नामक पक्षी) व्यवहार करना, कृपणता करना तथा मनुष्योंका अथवा कबूतरकी योनिमें जन्म लेता है । जो प्राणी हनन करना--नरकभोग करके जन्म लिये हुए मनुष्योंके स्वर्ण-पात्रकी चोरी करता है, उसको कृमियोनिमें ये लक्षण हैं--ऐसा सभीको जान लेना चाहिए।

English

Salvation or identity (with the Supreme Soul) can¬ not be secured through riches, affluence or greatness or by a series of religious rites* The root cause for the same is the worship of Hari.

अध्याय 229

श्लोक 17

यथाग्नियोगात्कनकममलं संप्रजायते ।संप्लुष्टो वासुदेवेन मनुष्याणां सदा मलः

yathāgniyogātkanakamamalaṃ saṃprajāyate / saṃpluṣṭo vāsudevena manuṣyāṇāṃ sadā malaḥ

हिन्दी अर्थ

दंशक--वनमक्षिका (बड़े मच्छर) । काण्ड अष्टाङ्गयोग एवं एकाक्षर ब्रह्मका स्वरूप तथा प्रणवजपका माहात्म्य ४१३

English

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अध्याय 229

श्लोक 18

गङ्गास्नानसहस्रेषु पुष्करस्नानकोटिषु ।यत्पापं निलययाति स्मृते नश्यति तद्धरौ

gaṅgāsnānasahasreṣu puṣkarasnānakoṭiṣu / yatpāpaṃ nilayayāti smṛte naśyati taddharau

हिन्दी अर्थ

प्राणियोंके प्रति दया, सद्भावपूर्ण वार्तालाप, प्राणियोके साथ मैत्रीभाव-ये स्वर्गसे आये हुए परलोकके लिये सात्त्विक अनुष्ठान, सत्कार्योका मनुष्योंके लक्षण हैं। जो मनुष्य योगशस्त्रद्वारा निष्पादन, सत्यधर्मका पालन, दूसरेका हितचिन्तन, बताये यम, नियमादिक अष्टाङ्गयोगके साधनसे मुक्तिकी साधना, वेदोंमें प्रामाण्यबुद्धि, गुरु, देवर्षि सद्-ज्ञानको प्राप्त करता है, वह आत्यन्तिक फल

English

Salvation or identity (with the Supreme Soul) can¬ not be secured through riches, affluence or greatness or by a series of religious rites* The root cause for the same is the worship of Hari.

अध्याय 229

श्लोक 19

प्राणायामसहस्नैस्तु यत्पापं नश्यति ध्रुवम् ।क्षणमात्रेण तत्पापं हरेर्ध्यानात्प्रणश्यति

prāṇāyāmasahasnaistu yatpāpaṃ naśyati dhruvam / kṣaṇamātreṇa tatpāpaṃ harerdhyānātpraṇaśyati

हिन्दी अर्थ

और सिद्धर्षियोंकी सेवा, साधुजनोंद्वारा बताये गये अर्थात् मोक्षका अधिकारी बन जाता है। नियमोंका पालन, सत्क्रियाओंका अनुष्ठान तथा (अध्याय २२५) अष्टाङ्गयोग एवं एकाक्षर ब्रह्मका स्वरूप तथा प्रणवजपका

English

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अध्याय 229

श्लोक 20

कलिप्रभावाद्दुष्टोक्तिः पाषण्डानां तथोक्तयः ।न क्रामेन्मानसं तस्य यस्य चेतसि केशवः

kaliprabhāvādduṣṭoktiḥ pāṣaṇḍānāṃ tathoktayaḥ / na krāmenmānasaṃ tasya yasya cetasi keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

सूतजीने कहा- है द्विजश्रेष्ठ! अब मैं समस्त न तो 'तुम' रहते हो और न 'मैं' ही रहता हूँ, न अङ्गोंसहित महायोगका वर्णन करूँगा । यह महायोग शब्दादि तन्मात्राएँ रहती हैं और न अन्तःकरण ही मनुष्योंको भोग और मोक्ष प्रदान करनेका श्रेष्ठतम रहता है। है राजेन्द्र! हम दोनोंके बीच कौन-सा साधन है। भक्तिपूर्वक इस महायोगकी विधिका तत्त्व प्रधान है? वास्तवमें हम दोनों निःसार हैं।

English

Salvation or identity (with the Supreme Soul) can¬ not be secured through riches, affluence or greatness or by a series of religious rites* The root cause for the same is the worship of Hari.

अध्याय 229

श्लोक 21

सा तिथिस्तदहोरात्रं स योगः स च चन्द्रमाः ।लग्नं तदेव विख्यातं यत्र संस्मर्यते हरिः

sā tithistadahorātraṃ sa yogaḥ sa ca candramāḥ / lagnaṃ tadeva vikhyātaṃ yatra saṃsmaryate hariḥ

हिन्दी अर्थ

पाठ करनेमात्रसे मनुष्यके सभी पापोंका विनाश हो है राजन्! जीव और आत्मामें ऐक्य होनेपर भी जाता है, इसे अब आप सुनें। पृथक्-भावका बोध होता है। यह पृथकू-भावका महामति भगवान् दत्तात्रेयने राजा अलर्कसे बोध ज्ञान (स्वरूपज्ञान)-के तिरोधानसे होता है। कहा था कि है राजन्! ममता ही दुःखका मूल है यद्यपि ज्ञानका तिरोधान योगी (ब्रह्माभिन्न जीव)- और ममताका परित्याग ही दुःखसे निवृत्तिका में नहीं होना चाहिए, पर भेदबुद्धि एवं भेदबुद्धिमूलक उपाय है। अहंकार अज्ञानरूपी महातरुका अंकुर समस्त प्रपञ्च सबके अनुभवमें आ रहा है; अतः

English

Salvation or identity (with the Supreme Soul) can¬ not be secured through riches, affluence or greatness or by a series of religious rites* The root cause for the same is the worship of Hari.

अध्याय 229

श्लोक 22

सा हानिस्तन्महच्छिद्रं सा चार्थजडमूकता ।चन्मुहूर्तं क्षणो वापि वासुदेवो न चिन्त्यते

sā hānistanmahacchidraṃ sā cārthajaḍamūkatā / canmuhūrtaṃ kṣaṇo vāpi vāsudevo na cintyate

हिन्दी अर्थ

है। ममता उसका तना है। घर और क्षेत्र आदि इसकी उपपत्तिके लिये यह मानना पड़ता है कि उसकी शाखाएँ हैं। पत्नी उसका पल्लव है तथा ज्ञानका तिरोधान अनादिकालसे चला आ रहा है। धन-धान्य महान् पत्र हैं और पाप ही उसका यह ज्ञानका तिरोधान अज्ञानमूलक है। इसीलिये अत्यन्त दुर्गम मूल है। इस प्रकार पापमूलक अज्ञानको ज्ञाननाशकी दशा कहा जाता है। यह

English

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अध्याय 229

श्लोक 23

कलौ कृत युगं तस्य कलिस्तस्य कृते युगे ।हृदि नो यस्य गोविन्दो यस्य चेतसि नाच्युतः

kalau kṛta yugaṃ tasya kalistasya kṛte yuge / hṛdi no yasya govindo yasya cetasi nācyutaḥ

हिन्दी अर्थ

आपातरमणीय सुख-शान्तिके लिये यह आज्ञानरूपी ज्ञाननाशकी दशा ज्ञाने वियोगकी दशा है और महातरु पैदा हुआ है । जो लोग ज्ञानरूपी कुल्हाड़ीसे यह ज्ञानका वियोग ही जीवात्मा एवं आत्मा अज्ञानरूप महावृक्षको काट गिराते हैं, वे ही (ब्रह्म)-का पृथकू-भाव है तथा इस पृथक्- परमब्रह्ममें लीन हो जाते हैं । तदनन्तर ब्रह्मरसको भावके ज्ञानका नाश जीव एवं आत्मा (ब्रह्म)-के प्राप्तकर उसका भलीभाँति निष्कण्टक पान करके ऐक्यज्ञानसे ही होता है। यह ऐक्यज्ञान (ऐक्यका प्राज्ञ पुरुष नित्य-सुख एवं परम शान्तिको प्राप्त प्रत्यक्षात्मक अनुभव) ही मुक्ति है। अनैक्यका करते हैं। अनुभव तो प्राकृतगुणों (मायिक विस्तार)-के

English

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अध्याय 229

श्लोक 24

यस्याग्रतस्तथा पृष्ठे गच्छतस्तिष्ठतो ऽपि वा ।गोविन्दे नियतं चेतः कृतकृत्यः सदैव सः

yasyāgratastathā pṛṣṭhe gacchatastiṣṭhato 'pi vā / govinde niyataṃ cetaḥ kṛtakṛtyaḥ sadaiva saḥ

हिन्दी अर्थ

समस्त दृश्य-प्रपञ्च एवं इन्द्रियाँ भी उसी कारण होता है। (परब्रह्म) -में लीन हो जाती हैं। है राजन्! वहाँपर प्राणीका जिसमें निवास होता है, वह घर है।

English

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अध्याय 229

श्लोक 25

वासुदेवे मनो यस्य जपहोमार्चनादिषु ।तस्यान्तरायो मैत्रेय वेवेन्द्रत्वादिकं फलम्

vāsudeve mano yasya japahomārcanādiṣu / tasyāntarāyo maitreya vevendratvādikaṃ phalam

हिन्दी अर्थ

जिसके द्वारा उसके जीवनकी रक्षा होती है, वह भोज्य पदार्थ है। जो मुक्तिका हेतु है, वह ज्ञान है और जो बन्धनका हेतु है, वह अज्ञान है। है राजन्! प्राणियोंके पुण्य और पापका विनाश उसके द्वारा किये जानेवाले (सुख-दु:खात्मक) भोगोंसे होता है और अवश्यकरणीय जो कर्तव्य हैं, उनको न करनेसे पुण्यका क्षय हो जाता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और

English

Salvation or identity (with the Supreme Soul) can¬ not be secured through riches, affluence or greatness or by a series of religious rites* The root cause for the same is the worship of Hari.

अध्याय 229

श्लोक 26

असंत्यज्य च गार्हस्थयं स तप्त्वा च महत्तपः ।छिनत्ति पौरुषीं मायां केशवार्पितमानसः

asaṃtyajya ca gārhasthayaṃ sa taptvā ca mahattapaḥ / chinatti pauruṣīṃ māyāṃ keśavārpitamānasaḥ

हिन्दी अर्थ

अपरिग्रह-ये पाँच यम हैं। शौच दो प्रकारका बताया गया है-बाह्यशौच और अन्त: शौच । संतोष, तपस्या, शान्ति, नारायणका पूजन और इन्द्रियदमन-- ये योगके साधन हैं। आसनोंके पद्म आदि भेद हैं।

English

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अध्याय 229

श्लोक 27

क्षमां कुर्वन्ति क्रुद्धेषु दयां मूर्खेषु मानवाः ।मुदञ्च धर्मशीलेषु गोविन्दे हृदयस्थिते

kṣamāṃ kurvanti kruddheṣu dayāṃ mūrkheṣu mānavāḥ / mudañca dharmaśīleṣu govinde hṛdayasthite

हिन्दी अर्थ

शरीरके अन्तर्गत प्रवाहित होनेवाली वायुपर विजय प्राप्त करना ' प्राणायाम ' है । प्रत्येक प्राणायाम पूरक, कुम्भक और रेचकके भेदसे तीन प्रकारका होता है। यही तीन प्राणायाम जब दस मात्राओंका होता है तो इसे लघु प्राणायाम तथा इससे दुगुनी मात्राका मध्यम प्राणायाम और तीन गुनी मात्राओंका उत्तम प्राणायाम कहा गया है। जिस प्राणायाममें योगिजन जप और ध्यानसे युक्त होते हैं, उसे

English

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अध्याय 229

श्लोक 28

ध्यायेन्नारायणं देवं स्नानदानादिकर्मसु ।प्रायश्चितेतेषु सर्वेषु दुष्कृतेषु विशेषतः

dhyāyennārāyaṇaṃ devaṃ snānadānādikarmasu / prāyaściteteṣu sarveṣu duṣkṛteṣu viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

“सगर्भ प्राणायाम और उसके अतिरिक्त प्राणायाम (अर्थात् जप तथा ध्यानसे रहित होनेपर) ' अगर्भ' नामक प्राणायाम कहलाता है। प्रथम प्राणायामसे योगी स्वप्नपर जय प्राप्त करता है, द्वितीय प्राणायामसे

English

Salvation or identity (with the Supreme Soul) can¬ not be secured through riches, affluence or greatness or by a series of religious rites* The root cause for the same is the worship of Hari.

अध्याय 229

श्लोक 29

लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराभवः ।येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः

lābhasteṣāṃ jayasteṣāṃ kutasteṣāṃ parābhavaḥ / yeṣāmindīvaraśyāmo hṛdayastho janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

योगी कम्पपर और तृतीय प्राणायामसे विपाकपर जय प्राप्त करता है। इस प्रकार इन तीनों दोषोंको योगी प्राणायामसे जीत लेता है। योगीको आसन लगाकर “प्रणव” में चित्त एकाग्र करके ध्यान और जप करना चाहिए। इस स्थितिमें वह अपनी दोनों एड़ियोंसे लिंग और अण्डकोशोंको दबाकर एकाग्र मनसे स्थित रहे। जो योगमार्गसे भलीभाँति परिचित है, उसे अपनी

English

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अध्याय 229

श्लोक 30

कीटपक्षिगणानाञ्च हरौ संन्यस्तचेतसाम् ।ऊर्ध्वा ह्येव गतिश्चास्ति किं पुनर्ज्ञानिनां नृणाम्

kīṭapakṣigaṇānāñca harau saṃnyastacetasām / ūrdhvā hyeva gatiścāsti kiṃ punarjñānināṃ nṛṇām

हिन्दी अर्थ

रजोवृत्तिसे तमोवृत्तिको तथा सत्त्ववृत्तिसे रजोवृत्तिको निरुद्ध करके निश्छल-भावसे प्रणवका जप करते हुए ध्यान करना चाहिए। इन्द्रियों, प्राण और मन आदिको उनके विषयोंसे निगृहीत करना चाहिए।

English

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अध्याय 229

श्लोक 31

वासुदेवतरुच्छाया नातिशीतातितापदा ।नरकद्वारशमनी सा किमर्थं न सेव्यते

vāsudevatarucchāyā nātiśītātitāpadā / narakadvāraśamanī sā kimarthaṃ na sevyate

हिन्दी अर्थ

इस तरह एक साथ ही प्रत्याहार (विषयोंसे इन्द्रियोंको हटाकर अन्तर्मुख करना)-का उपक्रम है, उसे योगमें ' धारणा' के नामसे स्वीकार किया जाता है। योगके तत्त्वको जाननेवाले योगिजन ऐसी धारणाकी दो आवृत्तिको ही योग कहते हैं। योगियोंको पहली धारणा नाड़ीमें, दूसरी हृदयमें,

English

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अध्याय 229

श्लोक 32

न च दुर्वाससः शापो राज्यञ्चापि शचीपतेः ।हन्तुं समर्थं हि सखे हृत्कृते मधुसूदने

na ca durvāsasaḥ śāpo rājyañcāpi śacīpateḥ / hantuṃ samarthaṃ hi sakhe hṛtkṛte madhusūdane

हिन्दी अर्थ

तीसरी वक्षःस्थलमें, चौथी उदरमें, पाँचवीं कण्ठमें, छठी मुखमें, सातवीं नासाग्रपर, आठवीं नेत्रमें, नवीं दोनों भौंहोंके मध्य और दसवीं मूर्धास्थानमें होती है। इस प्रकार योगमें इस धारणाको दस

English

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अध्याय 229

श्लोक 33

वदतस्तिष्ठतो ऽन्यद्वा स्वेच्छया कर्म कुर्वतः ।नापयाति यदा चिन्ता सिद्धां मन्येत धारणाम्

vadatastiṣṭhato 'nyadvā svecchayā karma kurvataḥ / nāpayāti yadā cintā siddhāṃ manyeta dhāraṇām

हिन्दी अर्थ

प्रकारका माना गया है। इन दसों धारणाओंमें सफलता प्राप्त करके योगी अक्षररूपता (ब्रह्मत्व)- को प्राप्त कर लेता है। जिस प्रकार अग्निमें छोड़ी गयी अग्नि एकाकार हो जाती है, उसी प्रकार परमात्माके ध्यानमें लगायी गयी आत्मा तदाकार हो जाती है। ऐसी स्थितिमें योगीको ब्रह्मस्वरूप महापुण्यदायक ' ॐ'

English

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अध्याय 229

श्लोक 34

ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्तो नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः ।केयूरवान्मकरकुण्डलवान्किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः

dhyeyaḥ sadā savitṛmaṇḍalamadhyavarto nārāyaṇaḥ sarasijāsanasanniviṣṭaḥ / keyūravānmakarakuṇḍalavānkirīṭī hārī hiraṇmayavapurdhṛtaśaṅkhacakraḥ

हिन्दी अर्थ

इस महामन्त्रका जप करना चाहिए। इस प्रणव- महामन्त्रमें ' अकार, उकार और मकार '--ये तीन अक्षर हैं। इन तीन अक्षरोंके अतिरिक्त इस महामन्तरमें सत्त्व, रजस् तथा तमस्--इन तीन मात्राओंका योग

English

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अध्याय 229

श्लोक 35

न हि ध्यानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।श्वपचान्नानि भुञ्जानो पापी नैवात्र लिप्यते

na hi dhyānena sadṛśaṃ pavitramiha vidyate / śvapacānnāni bhuñjāno pāpī naivātra lipyate

हिन्दी अर्थ

भी है जो क्रमशः सात्त्विक तथा राजसिक और तामसिक मनोवृत्तिका परिचायक है। ३कारमें जो चतुर्थ आद्य अर्धमात्रा स्थित है, वह निर्गुण है तथा केवल योगियोंद्वारा ही जानने योग्य है । गान्धारस्वर (ग)-के आश्रित रहनेवाली इस अर्धमात्राको गान्धारी

English

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अध्याय 229

श्लोक 36

सदा चित्तं समासक्तं जन्तोर्विषयगोचरे ।यदि नारायणे ऽप्येवं को न मुच्येत बन्धनात्

sadā cittaṃ samāsaktaṃ jantorviṣayagocare / yadi nārāyaṇe 'pyevaṃ ko na mucyeta bandhanāt

हिन्दी अर्थ

नामसे जानना चाहिए। यह अक्षर परम ब्रह्म ३कारके नामसे योगमार्गमें स्वीकृत है । अतः इस महामन्त्रका जप और ध्यान करते हुए अपनी मुक्तिके लिये इस प्रकार अपनेमें ब्रह्मभावनाका

English

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अध्याय 229

श्लोक 37

सूत उवाच ।विष्णुभक्तिर्यस्य चित्ते कं वा जीवो नमेत्सदा ।स तारयति चात्मानं तदैव दुरितार्णवात्

sūta uvāca / viṣṇubhaktiryasya citte kaṃ vā jīvo nametsadā / sa tārayati cātmānaṃ tadaiva duritārṇavāt

हिन्दी अर्थ

निश्चय करना चाहिए “मैं स्थूलदेहसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ । मैं जरा-मरणसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं इस पृथ्वीके सभी मलोंसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। में वायु और आकाशसे रहित ज्योतिर्मय

English

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अध्याय 229

श्लोक 38

तञ्ज्ञानं यत्र गोविन्दः सा कथा यत्र काशवः ।तत्कर्म यत्तदर्थाय किमन्यैर्बहुभाषितैः

tañjñānaṃ yatra govindaḥ sā kathā yatra kāśavaḥ / tatkarma yattadarthāya kimanyairbahubhāṣitaiḥ

हिन्दी अर्थ

परमन्रह्म हूँ । मैं सूक्ष्मदेहसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ । मैं समस्त स्थान या अस्थानसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ । मैं गन्धतन्मात्रासे रहित ज्योतिर्मय

English

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अध्याय 229

श्लोक 39

सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्तदर्पितम् ।तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ

sā jihvā yā hariṃ stauti taccittaṃ yattadarpitam / tāveva kevalau ślāghyau yau tatpūjākarau karau

हिन्दी अर्थ

इन्द्रियसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं जिह्वा तथा घ्राणेन्द्रियसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ । मैं प्राण तथा अपान वायुसे रहित ज्योतिर्मय परमनब्रह्म हूँ। मैं व्यान और उदान वायुसे रहित ज्योतिर्मय परमन्रह्म हूँ। मैं आज्ञानसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण और अहंकारसे रहित तुरीयावस्थामें विद्यमान परमपदस्वरूप, ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं नित्य-शुद्ध-बुद्ध, मुक्त, आनन्दमय,

English

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अध्याय 229

श्लोक 40

प्रणाममीशस्य शिरः फलं विदुस्तदर्चनं पाणिफलं दिवौकसः ।मनः फलं तद्गुणकर्मचिन्तनं वचस्तु गोविन्दगुणस्तुतिः फलम्

praṇāmamīśasya śiraḥ phalaṃ vidustadarcanaṃ pāṇiphalaṃ divaukasaḥ / manaḥ phalaṃ tadguṇakarmacintanaṃ vacastu govindaguṇastutiḥ phalam

हिन्दी अर्थ

अद्वैत, ज्ञानस्वरूप, ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ।'

English

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अध्याय 229

श्लोक 41

मेरुमन्दरमात्रो ऽपि राशिः पापस्य कर्मणः ।केशवस्मरणादेव तस्य सर्वं विनश्यति

merumandaramātro 'pi rāśiḥ pāpasya karmaṇaḥ / keśavasmaraṇādeva tasya sarvaṃ vinaśyati

हिन्दी अर्थ

सूतजीने कहा--हे शौनक! इस प्रकार मैंने मुक्ति देनेवाले अष्टाङ्गयोगका वर्णन कर दिया है। भगवद्भक्तिनिरूपण तथा भक्तोंकी महिमा

English

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अध्याय 229

श्लोक 42

यत्किञ्चित्कुरुते कर्म पुरुषः साध्वसाधु वा ।सर्वं नारायणे न्यस्य कुर्वन्नपि न लिम्पति

yatkiñcitkurute karma puruṣaḥ sādhvasādhu vā / sarvaṃ nārāyaṇe nyasya kurvannapi na limpati

हिन्दी अर्थ

जो लोग मायापाशसे आबद्ध हैं, वे सभी नित्य- नैमित्तिक ही कार्य करते हैं और उसीमें अन्ततक लगे रहते हैं। इस कारण उन्हें परमात्माका ऐक्य प्राप्त नहीं होता, वे पुनः इस संसारमें जन्म लेते

English

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अध्याय 229

श्लोक 43

तृणादिचतुरास्यान्तं भूतग्रामं चतुर्विधम् ।चराचरं जगत्सर्वं प्रसुप्तं मायया तव

tṛṇādicaturāsyāntaṃ bhūtagrāmaṃ caturvidham / carācaraṃ jagatsarvaṃ prasuptaṃ māyayā tava

हिन्दी अर्थ

हैं। जो आज्ञानसे मोहित हैं, वे ज्ञानयोग प्राप्त करके आज्ञानसे मुक्त हो जाते हैं । उसके बाद वह जीवन्मुक्त योगी न कभी मरता है, न दुःखी होता है; न रोगी होता है और न संसारके किसी बन्धनसे आबद्ध होता है । न वह पापोंसे युक्त होता है, न तो उसे नरकयातनाका ही दुःख भोगना पड़ता है और न वह गर्भवासमें दु:खी ही होता है। वह स्वयं अव्यय नारायणस्वरूप हो जाता है।

English

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अध्याय 229

श्लोक 44

यस्मिन्न्यस्तमतिर्न याति नरकं स्वर्गो ऽपि यच्चिन्तने विघ्नो यत्र नवा विशेत्कथमपि ब्राह्मो ऽपिलोको ऽल्पकः ।मुक्तिञ्चेतसि संस्थितो जडधियां पुंसां ददात्यव्ययः किञ्चित्रं यदयं प्रयाति विलयं तत्राच्युते कीर्तिते

yasminnyastamatirna yāti narakaṃ svargo 'pi yaccintane vighno yatra navā viśetkathamapi brāhmo 'piloko 'lpakaḥ / muktiñcetasi saṃsthito jaḍadhiyāṃ puṃsāṃ dadātyavyayaḥ kiñcitraṃ yadayaṃ prayāti vilayaṃ tatrācyute kīrtite

हिन्दी अर्थ

इस प्रकारको अनन्य भक्तिसे वह योगी भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले भगवान् नारायणको प्राप्त

English

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अध्याय 229

श्लोक 45

अग्निकार्यं जपः स्नानं विष्णोर्ध्यानञ्च पूजनम् ।गन्तुं दुः खोदधेः कुर्युर्ये च तत्र नरन्ति ते

agnikāryaṃ japaḥ snānaṃ viṣṇordhyānañca pūjanam / gantuṃ duḥ khodadheḥ kuryurye ca tatra naranti te

हिन्दी अर्थ

ध्यान, पूजा, जप, स्तोत्र, व्रत, यज्ञ और दानके नियमोंका पालन करनेसे मनुष्यके चित्तकी शुद्धि होती है। चित्तशुद्धिसे ज्ञान प्राप्त होता है। प्रणवादि मन्त्रोंका जप करके द्विजोंने मुक्ति प्राप्त की है। इन्द्रने भी इन्द्रासन प्राप्त किया। श्रेष्ठ गन्धर्वो और अप्सराओंने उच्च पद प्राप्त किया। देवताओंने देवत्व और मुनियोंने मुनित्व प्राप्त किया। गन्धर्वोने गन्धर्वत्व तथा राजाओंने राजत्वको प्राप्त किया।

English

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अध्याय 229

श्लोक 46

राष्ट्रस्य शरणं राजा पितरो बालकस्य च ।धर्मश्च सर्वमर्त्यानां सर्वस्य शरणं हरिः

rāṣṭrasya śaraṇaṃ rājā pitaro bālakasya ca / dharmaśca sarvamartyānāṃ sarvasya śaraṇaṃ hariḥ

हिन्दी अर्थ

भगवद्भक्तिनिरूपण तथा भक्तोंकी महिमा सूतजीने कहा--अब मैं विष्णुभक्तिका वर्णन मधुर फल है--

English

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अध्याय 229

श्लोक 47

ये नमन्ति जगद्योनिं वासुदेवं सनातनम् ।न येभ्यो विद्यते तीर्थमधिकं मुनिसत्तम्

ye namanti jagadyoniṃ vāsudevaṃ sanātanam / na yebhyo vidyate tīrthamadhikaṃ munisattam

हिन्दी अर्थ

करूँगा, जिससे सब कुछ प्राप्त हो जाता है। भगवान् विष्णु भक्तिसे जितना संतुष्ट होते हैं, उतना अन्य किसी साधनसे नहीं । भगवान् हरिका निरन्तर स्मरण करना मनुष्योंके लिये महान् श्रेयका मूल है। यह पुण्योंकी उत्पत्तिका साधन है और जीवनका

English

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अध्याय 229

श्लोक 48

अनर्घरत्नपूजाञ्च कुर्यात्स्वाध्यायमेव च ।तमेवोद्दिश्य गोविन्दं ध्यायन्नित्यमतन्द्रितः

anargharatnapūjāñca kuryātsvādhyāyameva ca / tamevoddiśya govindaṃ dhyāyannityamatandritaḥ

हिन्दी अर्थ

यथा भक्त्या हरिस्तुष्येत् तथा नान्येन केनचित्॥

English

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अध्याय 229

श्लोक 49

शूद्रं वा भगवद्भक्तं निषादं श्वपचं तथा ।द्विजजाति समंमन्यो न याति नरकं नरः

śūdraṃ vā bhagavadbhaktaṃ niṣādaṃ śvapacaṃ tathā / dvijajāti samaṃmanyo na yāti narakaṃ naraḥ

हिन्दी अर्थ

इसलिये विद्वानोंने विष्णुकी सेवाको भक्तिका १-परम व्यापक ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है, उसका कोई आश्रय नहीं है। इसलिये उसके स्थान या स्थानाभावकी कल्पना सर्वथा

English

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अध्याय 229

श्लोक 50

आदरेण सदा स्तौति धनवन्तं धनेच्छया ।तथा विश्वस्य कर्तारं को न मुच्येत बन्धनात्

ādareṇa sadā stauti dhanavantaṃ dhanecchayā / tathā viśvasya kartāraṃ ko na mucyeta bandhanāt

हिन्दी अर्थ

बहुत बड़ा साधन कहा है। भगवान् त्रिलोकीनाथ विष्णुके नाम तथा कर्मादिके कीर्तनमें तन्मय होकर जो लोग प्रसन्नताके आँसू बहाते हैं और रोमाञ्चित होकर गद्गद हो उठते हैं, वे ही उनके भक्त हैं--

English

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अध्याय 229

श्लोक 51

यथा प्राप्तवनो वह्निर्दहत्यार्द्रमपीन्धनम् ।तथाविधः स्थितो विष्णुर्योगिनां सर्वकिल्विषम्

yathā prāptavano vahnirdahatyārdramapīndhanam / tathāvidhaḥ sthito viṣṇuryogināṃ sarvakilviṣam

हिन्दी अर्थ

ते भक्ता लोकनाथस्य नामकर्मादिकीर्तने ॥ अतः हम सभीको जगत्स्रष्टा देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुके दिव्य उपदेशोंका अनुसरण करना चाहिए। वे ही वैष्णव हैं, जो वेद-शास्त्रोंके अनुसार अवश्यकरणीय नित्य-कर्मोंका पालन करते हुए

English

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अध्याय 229

श्लोक 52

आदीप्तं पर्वतं यद्वन्नाश्रयन्ति मृगादयः ।तद्वत्पापनि सर्वाणि योगाभ्यासरतं नरम्

ādīptaṃ parvataṃ yadvannāśrayanti mṛgādayaḥ / tadvatpāpani sarvāṇi yogābhyāsarataṃ naram

हिन्दी अर्थ

श्रीविष्णुके प्रति अति स्निग्ध रहते हैं तथा भक्तिप्रवणताके कारण अद्वैतभावसे स्वयंको पृथकूकर जिन नामोंका स्मरण स्वयं भगवान् भी करते हैं उन मङ्गलमय नामोंका श्रवण-कीर्तन करनेके

English

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अध्याय 229

श्लोक 53

यस्य यावांश्च विश्वासस्तस्य सिद्धिस्तु तावती ।एतवानेव कृष्णस्य प्रभावः परिमीयते

yasya yāvāṃśca viśvāsastasya siddhistu tāvatī / etavāneva kṛṣṇasya prabhāvaḥ parimīyate

हिन्दी अर्थ

साथ स्वामि-सेवकभावसे सदा भगवान् श्रीविष्णुको प्रणाम किया करते हैं। वे ही महाभागवत हैं, जो श्रीविष्णुके भक्तजनोंके प्रति वात्सल्यभाव रखते हैं तथा श्रीविष्णुके पूजन एवं उनकी आज्ञाका अनुसरण करते हैं। भगवान् श्रीविष्णुकी मङ्गलमयी कथाओंके श्रवणमें ही अतिशय प्रीतिपूर्वक सदा लीन रहते हैं तथा अपने नेत्र आदि समस्त अङ्गोंकी समस्त चेष्टाएँ भगवान्की सेवाके लिये ही समर्पित किये रहते हैं।

English

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अध्याय 229

श्लोक 54

विद्वेषादपि गोविन्दं दमघोषात्मजः स्मरन् ।शिशुपालो गतस्तत्त्वं किं पुनस्तत्परायणः

vidveṣādapi govindaṃ damaghoṣātmajaḥ smaran / śiśupālo gatastattvaṃ kiṃ punastatparāyaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

संक्षेपमें यह समझना चाहिए कि जो लोग पूर्ण समर्पणभावसे श्रीविष्णुकी भक्तिमें ही अपने मनको निरन्तर एकाग्र रखते हैं, वे ही परम भागवत हैं। इन परम महाभागवत लोगोंका मुख्य लक्षण यह है कि

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_garuDapurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

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शोध टिप्पणीResearch note

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