Chandogya Upanishad
85
अध्याय 85 / 154

Adhyāya 85

प्रपाठक खण्ड 85

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 85

श्लोक 5.12.1

॥ औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते

|| aupamanyava kaṃ tvamātmānamupāssa iti divameva bhagavo rājanniti hovācaiṣa vai sutejā ātmā vaiśvānaro yaṃ tvamātmānamupāsse tasmāttava sutaṃ prasutamāsutaṃ kule dṛśyate

हिन्दी अर्थ

तथथेषीकातूरमम्नो भतं भटूयेतेवहास्य सवे इस विषयमे यह दृष्टान्त भी है--निख प्रकार सीकका अपरमाग अग्निम घुषा देनेसे त्कार जल जाता है उसी प्रकार जो इस प्रकार तथयषीकायास्तलमगरमगनौ इस विषयमे -यह द्टान्त है-नि प्रोतं भकष परद्येत रद्य भकार पीक तूङ-अपरभाग भनि" । खाब्ड २४ शाङ्करष्याथे ५७१ तस्मादु हैवंविद्यद्यपि है उसो प्रकार सबके अन्तरात्मभूत ओर समस्त अरन्नोके भोक्ता इस

English

'Aupamanyava, whom do you meditate on as the Self?' He replied: 'Heaven only, venerable king.' He said: 'The Self which you meditate on is the Vaisvânara Self, called Sutegas (having good light). Therefore every kind of Soma libation is seen in your house .

अध्याय 85

श्लोक 5.12.2

अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूधा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति

atsyannaṃ paśyasi priyamattyannaṃ paśyati priyaṃ bhavatyasya brahmavarcasaṃ kule ya etamevamātmānaṃ vaiśvānaramupāste mūdhā tveṣa ātmana iti hovāca mūrdhā te vyapatiṣyadyanmāṃ nāgamiṣya iti

हिन्दी अर्थ

दातमनि हैवास्य तदवश्वानरे हृतस्यादिति तदेष अतः वह इस प्रकार जाननेवास यदि चाण्डाल्को उच्छिष्ट भी दे तो मी उसका वह भन्न वैधानर आत्मामं ही हुत होगा । इस विषये

English

'You eat food, and see your desire (a son, &c.), and whoever thus meditates on that Vaisvânara Self, eats food, sees his desire, and has Vedic glory (arising from study and sacrifice) in his house. That, however, is but the head of the Self, and thus your head would have fallen (in a discussion), if you had not come to me.'

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।