Chandogya Upanishad
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अध्याय 70 / 154

Adhyāya 70

प्रपाठक खण्ड 70

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 70

श्लोक 4.14.1

॥ ते होचुरुपकोसलैषा सोम्य तेऽस्मद्विद्यात्मविद्या चाचार्यस्तु ते गतिं वक्तेत्याजगाम हास्याचार्यस्तमाचार्योऽभ्युवादोपकोसल३ इति

|| te hocurupakosalaiṣā somya te'smadvidyātmavidyā cācāryastu te gatiṃ vaktetyājagāma hāsyācāryastamācāryo'bhyuvādopakosala3 iti

हिन्दी अर्थ

सतौ धनः पत्यतरन््ाणाल- रहकर फिर लौटकर अन्य परणेपि वाच कथं केन प्रकारेणाशकत कला मूका यथा लोकेण्वदन्तो ध्यायन्तो मनसेवमिति प्रविवेश ह चक्षुः फिर चुने उक्तमण किया । उसने एक वषं प्रवा करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूष्ा-भिरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ¢ उन्होने कडा- “निष प्रकार अन्धे रोग बिना देखे प्राणसे प्राणन

English

Then they all said: 'Upakosala, this is our knowledge, our friend, and the knowledge of the Self, but the teacher will tell you the way (to another life).'

अध्याय 70

श्लोक 4.14.2

भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद इव सोम्य ते मुखं भाति को नु त्वानुशशासेति को नु मानुशिष्याद्भो इतीहापेव निह्नुत इमे नूनमीदृशा अन्यादृशा इतीहाग्नीनभ्यूदे किं नु सोम्य किल तेऽवोचन्निति

bhagava iti ha pratiśuśrāva brahmavida iva somya te mukhaṃ bhāti ko nu tvānuśaśāseti ko nu mānuśiṣyādbho itīhāpeva nihnuta ime nūnamīdṛśā anyādṛśā itīhāgnīnabhyūde kiṃ nu somya kila te'vocanniti

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर श्रोत्रे उक्तमण करिया उसने एक वै प्रवास करनेके अनन्तर फिर रट पृष्ा--भेरे बिना तुम कैसे जीवित एह सके 2 उर्दोने कदा-- निस प्रकार बहरे सनुष्य बिना सुने प्राणसे फिर रोरकर फहा- भेर बिना तुम कसे जीवित रह सके उन्दनि कहा-- “जिस प्रकार वच्चे, जिनका कि मन ॒विकषितं नहीं होत पराणसे प्राणनक्रिया करते, वाणीसे बोरे नेत्रसे देखते जौर कानसे घनत ।

English

In time his teacher came back, and said to him: 'Upakosala.' He answered: 'Sir.' The teacher said: 'Friend, your face shines like that of one who knows Brahman. Who has taught you?' 'Who should teach me, Sir?' he said. He denies, as it were. And he said (pointing) to the fires: 'Are these fires other than fires?' The teacher said: 'What, my friend, have these fires told you?'

अध्याय 70

श्लोक 4.14.3

इदमिति ह प्रतिजज्ञे लोकान्वाव किल सोम्य तेऽवोचन्नहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच

idamiti ha pratijajñe lokānvāva kila somya te'vocannahaṃ tu te tadvakṣyāmi yathā puṣkarapalāśa āpo na śliṣyanta evamevaṃvidi pāpaṃ karma na śliṣyata iti bravītu me bhagavāniti tasmai hovāca

हिन्दी अर्थ

कराम श्रोत्रं होच्चक्राम यनो किया इत्यादि शोष समस्त श्रुतियो- का तासं समान है । निस प्रकार । होच्चकरामेत्यादि । यथा वारक फिर प्राणने उक्तमण कानेकी इच्छा की । उसने, 'जिस प्रकार अच्छा घोड़ा अपने पैर बोधनेकी कौरोक्रो उखाड़ क्ता है उसी भकार अन्य प्राणोको भी उखा दिया । तब उन सवने उसके सामने जाकर मिच्छन्कि- भाणने उक्तमण करनेकी इच्छा उच्क्रमिषमुतकरमित्‌ करते हुए क्या फिया ? सो बत्रलाया भकरोत्‌ १ इत्युच्यते--यथा नाता --रोकमे निल प्रकार

English

He answered: 'This' (repeating some of what they had told him). The teacher said: 'My friend, they have taught you about the worlds, but I shall tell you this; and as water does not cling to a lotus leaf, so no evil deed clings to one who knows it.' He said: 'Sir, tell it me.' Next: IV, 15 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।