Chandogya Upanishad
65
अध्याय 65 / 154

Adhyāya 65

प्रपाठक खण्ड 65

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 65

श्लोक 4.9.1

॥ प्राप हाचर्यकुलं तमाचर्योऽभ्युवाद सत्यकाम३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव

|| prāpa hācaryakulaṃ tamācaryo'bhyuvāda satyakāma3 iti bhagava iti ha pratiśuśrāva

हिन्दी अर्थ

प्रनापतिर्छोकानभ्यतपन्लोका- पजापतिने शोकोको अर्थ्‌ तद्रेषे ब्रह्मत्वक्म॑णि चाथान्य- ग्रहण करने की इच्छसे ध्यान फिर उसने इन तीन देवताओंको रक्ष्य करके तप क्रिया । उन तप क्रिये नाते हुए देवता्भसि उसने रस निकाठे । अग्निस ऋक्, वायुसे थजुः ओर भादिव्यसे साम ग्रहण क्यि पुनरप्येवमेवारन्याद्याः स किरि भी उसी प्रकार उसने एतास्तिस्रो देवता उदिश्याम्य- अग्नि जादि तीन देवताओंको रक्षय तपत्‌ । ततोऽपि सारं रसं त्रयी- बनाकर तप क्रिया । उनसे भी त्रयी-

English

Thus he reached the house of his teacher. The teacher said to him: 'Satyakâma.' He replied: 'Sir.'

अध्याय 65

श्लोक 4.9.2

ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वानुशशासेत्यन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे भगवाँस्त्वेव मे कामे ब्रूयात्

brahmavidiva vai somya bhāsi ko nu tvānuśaśāsetyanye manuṣyebhya iti ha pratijajñe bhagavām̐stveva me kāme brūyāt

हिन्दी अर्थ

गाहषत्ये जुदुयाटचामेव तद्रसेनर्चां वीर्येणर्चां यज्ञस्य तदनन्तर उसने इस त्रयीविदयाको रक्षय करके तप क्रा । उस तप की जाती हुई विद्यसे उसने रस निकाले । क्‌ श्रुति्येसि भूः, यजुःश्रति्योसि युवः तथा सामश्रतिर्योसे स्वः इन रसोको रहण किया ।

English

The teacher said: 'Friend, you shine like one who knows Brahman. Who then has taught you ?' He replied: 'Not men. But you only, Sir, I wish, should teach me ;

अध्याय 65

श्लोक 4.9.3

श्रुतँह्येव मे भगवद्दृशेभ्य आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापतीति तस्मै हैतदेवोवाचात्र ह न किंचन वीयायेति वीयायेति

śrutam̐hyeva me bhagavaddṛśebhya ācāryāddhaiva vidyā viditā sādhiṣṭhaṃ prāpatīti tasmai haitadevovācātra ha na kiṃcana vīyāyeti vīyāyeti

हिन्दी अर्थ

जोर यदि यजुःश्रुतियोकि कारण क्षत हो तो सुवः स्वाहा! पे कहकर दक्षिणाग्निमे हवन करे । ईस प्रकार वह यजुओंके रससे यजुभोके वीर््रारा यज्ञके यजुःसम्बन्धी क्षतकौ पूतं करता है जुहुयात्सास्नामेव तद्रसेन साम्नां वीर्येण साम्नां यज्ञस्य जौर यदि सामश्रति्योकि कारण क्षत हो तो स्वः स्वाहा' पषा कृकर आहवनीयाग्नम हवन करे । इस प्रकार वह सामके रससे सामके वीयं द्वारा यक्ञके सामस्बन्धी क्षतकी पूर्तिं करता है

English

'For I have heard from men like you, Sir, that only knowledge which is learnt from a teacher (Âkârya), leads to real good.' Then he taught him the same knowledge. Nothing was left out, Yea, nothing was left out.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।