Chandogya Upanishad
57
अध्याय 57 / 154

Adhyāya 57

प्रपाठक खण्ड 57

8 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ8 श्लोक

अध्याय 57

श्लोक 4.1.1

चतुर्थोऽध्यायः ॥ जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाक्य आस स ह सर्वत आवसथान्मापयांचक्रे सर्वत एव मेऽन्नमत्स्यन्तीति

caturtho'dhyāyaḥ || jānaśrutirha pautrāyaṇaḥ śraddhādeyo bahudāyī bahupākya āsa sa ha sarvata āvasathānmāpayāṃcakre sarvata eva me'nnamatsyantīti

हिन्दी अर्थ

मषभः । स सत्यकामो ह श्वोभूते गा अभि प्रस्थापयाञ्चकाराचाय- यत्र यसिमिन्काके देशेऽमि सायं वह सांड (अनि तुञ्चे दूसरा पाद बतखवेगा-एेसा कहकर मोन हो गया । दूसरे दिन सत्यकामने

English

There lived once upon a time Gânasruti Pautrâyana (the great-grandson of Ganasruta), who was a pious giver, bestowing much wealth upon the people, and always keeping open house. He built places of refuge everywhere, wishing that people should everywhere eat of his food.

अध्याय 57

श्लोक 4.1.2

अथ हँसा निशायामतिपेतुस्तद्धैवँ हँ सोहँ समभ्युवाद हो होऽयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षी स्तत्त्वा मा प्रधाक्षीरिति

atha ham̐sā niśāyāmatipetustaddhaivam̐ ham̐ soham̐ samabhyuvāda ho ho'yi bhallākṣa bhallākṣa jānaśruteḥ pautrāyaṇasya samaṃ divā jyotirātataṃ tanmā prasāṅkṣī stattvā mā pradhākṣīriti

हिन्दी अर्थ

तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति उससे अग्निने सत्यकाम पसा कंडा । तव उग्नने "मगवन्‌ ! तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम ३ उससे अग्निने सल्यकाम भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्रति- कदा । उसे सत्यकामने “भगवन्‌ ' ब्रह्मणः सोभ्य ते पादं वाणीति ब्रवीतु मे दयोः कछा समुद्रः केष वे सोम्य चतुष्कः पादो ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम

English

Once in the night some Hamsas (flamingoes) flew over his house, and one flamingo said to another: 'Hey, Bhallâksha, Bhallâksha (short-sighted friend). The light (glory) of Gânasruti Pautrâyana has spread like the sky. Do not go near, that it may not burn thee.'

अध्याय 57

श्लोक 4.1.3

तमु ह परः प्रत्युवाच कम्वर एनमेतत्सन्तँ सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथँ सयुग्वा रैक्व इति

tamu ha paraḥ pratyuvāca kamvara enametatsantam̐ sayugvānamiva raikvamāttheti yo nu katham̐ sayugvā raikva iti

हिन्दी अर्थ

हे सोम्य मं तुस ब्रह्मका एक पाद बतलाञॐ सव्यक्रामने कहा-- “भगवान्‌ मुञ्चे भवरय बतखयें ।' तब उसने उससे कहा-- “थिवी कसा है, अन्तरिक्ष कला है, यलोक कख है ओर समुद्र कला दे सोम्य मँ तुञचे ब्रह्मका एक पाद बतरऊं सत्यकामने कदा उससे कहा-“एथिवी कटा है,

English

The other answered him: 'How can you speak of him, being what he is (a râganya, noble), as if he were like Raikva with the car ?'

अध्याय 57

श्लोक 4.1.4

यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनँ सर्वं तदभिसमैति यत्किंच प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति

yathā kṛtāyavijitāyādhareyāḥ saṃyantyevamenam̐ sarvaṃ tadabhisamaiti yatkiṃca prajāḥ sādhu kurvanti yastadveda yatsa veda sa mayaitadukta iti

हिन्दी अर्थ

स य एतमेवं विद्राश्श्तुष्कटं पादं ब्रह्मणोऽ- नन्तवानित्यपास्तेऽनन्तवानस्मिंहछोके भवत्यनन्तवतो ह खोकाज्ञयति य॒ एतमेवं विद्ारश्वतुष्कलं पादं वहू, जो इसे इस प्रकार जानेवाला पुरुष नह्मके इस चतुप्कल पादको “भनन्तवान्‌" इख गुणसे युक्त उपासना करता है उह इम लोकम अनन्तवान्‌ होता है ओर अनन्तवान्‌ ोरकोको जीत छता है,जो कि सयः कृश्चियथोक्तं पादम- वह, जो कोर पुरुष उप्यक्त पाद्‌- नन्तवचवेन गुणेनोपास्ते स क़ अनन्तवत्त्व गुणसे युक्त मु कृता है वह इस ठेोकर्म उसी

English

The first replied: 'How is it with this Raikva with the car of whom thou speakest?' The other answered: 'As (in a game of dice) all the lower casts belong to him who has conquered with the Krita cast, so whatever good deeds other people perform, belong to that Raikva. He who knows what he knows, he is thus spoken of by me.'

अध्याय 57

श्लोक 4.1.5

तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायण उपशुश्राव स ह संजिहान एव क्षत्तारमुवाचाङ्गारे ह सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथँ सयुग्वा रैक्व इति

tadu ha jānaśrutiḥ pautrāyaṇa upaśuśrāva sa ha saṃjihāna eva kṣattāramuvācāṅgāre ha sayugvānamiva raikvamāttheti yo nu katham̐ sayugvā raikva iti

हिन्दी अर्थ

हंसद्वा्य बह्मके त्रतीय पादक उपदेश्च परस्थापयाचकार ता यत्राभि सायं वभूवुस्तत्रागनिसु- सत्यकाम ३ इति भगव इति ह ध्रतिशुश्राव

English

Gânasruti Pautrâyana overheard this conversation, and as soon as he had risen in the morning, he said to his. door-keeper (kshattri): 'Friend, dost thou speak of (me, as if I were) Raikva with the car?' He replied: 'How is it with this Raikva, with the car?'

अध्याय 57

श्लोक 4.1.6

यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनँ सर्वं तदभिसमैति यत्किंच प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति

yathā kṛtāyavijitāyādhareyāḥ saṃyantyevamenam̐ sarvaṃ tadabhisamaiti yatkiṃca prajāḥ sādhu kurvanti yastadveda yatsa veda sa mayaitadukta iti

हिन्दी अर्थ

दंस तुज्ञे तीसरा पाद वतरवेगा' एेसा कहकर अग्नि निवृत्त हो गया । दुसरे दिन उसने गोर्थको आचार्युलंक़ी जोर दोक दिया। वे सायङ्काल जहाँ एकत्रित ईं वह उसी जगह अग्नि प्रस्वरिति कर, तव हंसने उदके. समीप उतरकर कहा- सत्यकाम ॥ सोऽग्निहंसस्ते पादं वक्तेत्यु-) वह अग्नि (हं तज्ञ तीसरा 4द क्तवोपरराम । ईस आदित्यः, बतरवेगा' देसा कहकर उपरत दो स ह श्वोभूत इत्यादि समा- दोनेके कारण यँ आदिव्यको हंस

English

The king said: 'As (in a game of dice), all the lower casts belong to him who has conquered with the Krita cast, so whatever good deeds other people perform, belong to that Raikva. He who knows what he knows, he is thus spoken of by me.'

अध्याय 57

श्लोक 4.1.7

स ह क्षत्तान्विष्य नाविदमिति प्रत्येयाय तँ होवाच यत्रारे ब्राह्मणस्यान्वेषणा तदेनमर्च्छेति

sa ha kṣattānviṣya nāvidamiti pratyeyāya tam̐ hovāca yatrāre brāhmaṇasyānveṣaṇā tadenamarccheti

हिन्दी अर्थ

हंसने कदहा-- है सोम्य मँ तचे ब्रह्मका पाद्‌ वतरा खत्यकाम बोख-- भगवान्‌ मुञ्े वतर ॥ तव वह उससे बोख-- “अभ्नि कठा है, सूयं कटा है, चन्द्रमा कला है ओर वियत्‌ कला है । स च पतमेवं विद्राश्चतुष्कटं पादं ब्रह्मणो स्योतिष्मानित्युपास्ते उ्योतिष्मानस्भिखोके भवति उ्योतिऽमतो ह खोकाज्ञयति य एतमेवं विद्रार्तु-

English

The door-keeper went to look for Raikva, but returned saying, 'I found him not.' Then the king said: 'Alas! where a Brâhmana should be searched for (in the solitude of the forest), there go for him.'

अध्याय 57

श्लोक 4.1.8

सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कषमाणमुपोपविवेश तँ हाभ्युवाद त्वं नु भगवः सयुग्वा रैक्व इत्यहँ ह्यरा३ इति ह प्रतिजज्ञे स ह क्षत्ताविदमिति प्रत्येयाय

so'dhastācchakaṭasya pāmānaṃ kaṣamāṇamupopaviveśa tam̐ hābhyuvāda tvaṃ nu bhagavaḥ sayugvā raikva ityaham̐ hyarā3 iti ha pratijajñe sa ha kṣattāvidamiti pratyeyāya

हिन्दी अर्थ

जो कोई इसे इस प्रकार जानेवाला पुरम ॒तब्रह्मके इस चतुष्कलं पादक “योतिष्मान्‌' पसे गुणसे युक्त उपासना करता ह वह इस शोकम ज्योतिष्मान्‌ होता है तथा ज्योतिष्मान्‌ लोकोको जीत ठता है, जो कोड अभिः कला खयः कला चन्द्रः “जमन कला है, स्यं कला है, र सोम्य यह” इत्यादि वाक्यसे उसने ज्योति्विंषयमेव च देनं प्रोवा- ज्योतिरविपयक दरश॑नका ही निरूपण मद्गुद्रारा वह्मके चतुथं पाद्का उपदेश पयाधकार ता यत्राभि सायं बभूुस्तज्ाग्निसुपसमाधाय

English

The door-keeper came to a man who was lying beneath a car and scratching his sores . He addressed him, and said: 'Sir, are you Raikva with the car? ' He answered: 'Here I am.' Then the door-keeper returned, and said: 'I have found him.'

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।