Chandogya Upanishad
55
अध्याय 55 / 154

Adhyāya 55

प्रपाठक खण्ड 55

6 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ6 श्लोक

अध्याय 55

श्लोक 3.18.1

॥ मनो ब्रह्मेत्युपासीतेत्यध्यात्ममथाधिदैवतमाकाशो ब्रह्मेत्युभयमादिष्टं भवत्यध्यात्मं चाधिदैवतं च

|| mano brahmetyupāsītetyadhyātmamathādhidaivatamākāśo brahmetyubhayamādiṣṭaṃ bhavatyadhyātmaṃ cādhidaivataṃ ca

हिन्दी अर्थ

इस प्रर जाननेवाखा उपाक दश्च देवताओंसे तादास्य प्राप्त कर्‌ दश्च संख्याके कारण विराटहूपसे सत्यकामक्रा वह्मचर्य-पालन ओर वनम जाकर गो चराना सवं वागाब्गन्यादि चाना- अन्न र अन्नादङ्पसे भरी प्रकार स्तुत हुए वागादि बैर

English

Let a man meditate on mind as Brahman (n.), this is said with reference to the body. Let a man meditate on the ether as Brahman (n.), this is said with reference to the Devas. Thus both the meditation which has reference to the body, and the meditation which has reference to the Devas, has been taught.

अध्याय 55

श्लोक 3.18.2

तदेतच्चतुष्पाद्ब्रह्म वाक्पादः प्राणः पादश्चक्षुः पादः श्रोत्रं पाद इत्यध्यात्ममथाधिदैवतमग्निः पादो वायुः पादा अदित्यः पादो दिशः पाद इत्युभयमेवादिष्टं भवत्यध्यात्मं चैवाधिदैवतं च

tadetaccatuṣpādbrahma vākpādaḥ prāṇaḥ pādaścakṣuḥ pādaḥ śrotraṃ pāda ityadhyātmamathādhidaivatamagniḥ pādo vāyuḥ pādā adityaḥ pādo diśaḥ pāda ityubhayamevādiṣṭaṃ bhavatyadhyātmaṃ caivādhidaivataṃ ca

हिन्दी अर्थ

जबालके पुत्र सलकामने अपनी माता जबाला सम्बोधित रके निवेदन श्रिया पूज्ये मँ ब्रह्मचयंपू्वक गुरुर्मे निवास करना सत्यकामो ह नामतः, हशब्द हः शब्द इतिहासका। योतक तद्या; जबालाया अपत्यं है । वालके पुत्रने, जो नामसे क। आमन्तित-सम्बोधित कर उसने उससे कहा--े तात । त॒ जिस गोतरवाला है उसे में नही जानती । पहके भँ पतिके धर आये हुए बहुत-से अतिथिर्योकी सेवा-टहलं करनेवाली परिचारिकः थी । परिचयं संरन होनेसे गोत्र आदिकी ओर

English

That Brahman (mind) has four feet (quarters). Speech is one foot, breath is one foot, the eye is one foot, the car is one foot-so much with reference to the body. Then with reference to the gods, Agni (fire) is one foot, Vâyu (air) is one foot, Âditya (sun) is one foot, the quarters are one foot. Thus both the worship which has reference to the body, and the worship which has reference to the Devas, has been taught.

अध्याय 55

श्लोक 3.18.3

वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः सोऽग्निना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद

vāgeva brahmaṇaścaturthaḥ pādaḥ so'gninā jyotiṣā bhāti ca tapati ca bhāti ca tapati ca kīrtyā yaśasā brahmavarcasena ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

जबाला सा हैनं पुत्र॒वाच-- उस ड अपने उस पुत्रस - कहा-हे तात निस गोत्रवाखा नाहमेतत्तव गोत्रं बेद, है तात है इतेरे गोच नही नानत / स ह हारिदुमतं गौतममेत्योवाच ब्रह्मचर्य भगवति

English

Speech is indeed the fourth foot of Brahman. That foot shines with Agni (fire) as its light, and warms. He who knows this, shines and warms through his celebrity, fame, and glory of countenance.

अध्याय 55

श्लोक 3.18.4

प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स वायुना ज्योतिषा भाति च तपति च् भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद

prāṇa eva brahmaṇaścaturthaḥ pādaḥ sa vāyunā jyotiṣā bhāti ca tapati c bhāti ca tapati ca kīrtyā yaśasā brahmavarcasena ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

उसने हारिदुमत गोतमके पस जाकर कहा- प्य श्रीमान्‌के यहां नहचर्पूरक वास कलगा; एसीसे मापकी स्निधिमे माया हः स॒ह सत्यकामो हार्दम उस सत्यकामने, जो गोत्रतः दरिदिमतोऽपस्यं हार्रिमतं गोतमं गौतम ये, छन ्ारिदुमत-हरिदुमानके गोत एय गत्वोवाच जह्ाचयं एके पास नाक नर इतयुक्तवन्तम्‌-- इस भकार कहनवारे-- कछण्ड 8 शाङ्करभाष्याथे ३८३ सत्वक्षामो नाम तमसीति सोऽह श्सत्यकामो जावा-

English

Breath is indeed the fourth foot of Brahman. That foot shines with Vâyu (air) as its light, and warms. He who knows this, shines and warms through his celebrity, fame, and glory of countenance.

अध्याय 55

श्लोक 3.18.5

चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स आदित्येन ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद

cakṣureva brahmaṇaścaturthaḥ pādaḥ sa ādityena jyotiṣā bhāti ca tapati ca bhāti ca tapati ca kīrtyā yaśasā brahmavarcasena ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

उससे गोतमने कहा-े सोम्य ! तु किस गोत्रवाख है 2 उसने कहा--“भगवन्‌ । मँ जिस गोत्रवाला ह उसे नी जानता । मेने मातासे पूया था । उसने सुञ्ञे यहं उत्त द्विया कि 'पहके मँ पतिके घर भये हुए तं होवाच गोतमः-- किंगोत्रो उसे गोतमने कहा- ह सोम्य तु किंस गोत्रवाला है ! नु सोम्यासि ! इति, विज्ञातङल- वर्योकि जिसके कुर ओर गोत्रका

English

The eye is indeed the fourth foot of Brahman. That foot shines with Âditya (sun) as its light, and warms. He who knows this, shines and warms through his celebrity, fame, and glory of countenance.

अध्याय 55

श्लोक 3.18.6

श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स दिग्भिर्ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद य एवं वेद

śrotrameva brahmaṇaścaturthaḥ pādaḥ sa digbhirjyotiṣā bhāti ca tapati ca bhāti ca tapati ca kīrtyā yaśasā brahmavarcasena ya evaṃ veda ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

उससे गोतमने कहा --्ेसा स्पष्ट भाषण छोई ब्राह्मणेतरः नहींक्‌ सकता । जतः है सोम्य ! तू समिधा ठे जा, भँ तेरा उपनयन कर दग, कङ तृते सलक व्याग नही किया तव॒उसतका उपनयन कर च॒, तं होवाच गोतमो नैतद्चो- उत गोतमने कहा- शसा सरलाथयुक्त वचन विरोषतः कोई ह अत्राह्मण नहीं बोर सकता, क्योंकि वृषभद्रारा सत्यकामकी बह्यके प्रथम पाद्का उपदेश तमेतं श्रद्रातपोभ्यां सिद्धं श्रद्वा जीर तपसे सिद्ध हए उष ति इस सत्यकामसे दिक्सम्बन्धिनी

English

The ear is indeed the fourth foot of Brahman. That foot shines with the quarters as its light, and warms. He who knows this, shines and warms through his celebrity, fame, and glory of countenance.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।