Chandogya Upanishad
44
अध्याय 44 / 154

Adhyāya 44

प्रपाठक खण्ड 44

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 44

श्लोक 3.7.1

॥ अथ यद्द्वितीयममृतं तद्रुद्रा उपजीवन्तीन्द्रेण मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति

|| atha yaddvitīyamamṛtaṃ tadrudrā upajīvantīndreṇa mukhena na vai devā aśnanti na pibantyetadevāmṛtaṃ dṛṣṭvā tṛpyanti

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मणः समस्तस्य महिमा विभूति- धश्च ब्रह्मणो विकारः पादो गाय- दविकाररक्षणाद्वायत्याख्याद्वाचा- स्थित है-रेसः इसका तापं है।।६॥ भूताकाश, देहाकाशच जर हृदगराक्ञाशाकरा अभेद यद्धे तदूब्रह्मतीद्‌' वाव तद्योऽयं बहिर्धा पुरुषा- वाव स योऽयमन्त॒ पुरुष आकाशो यो वे सोऽन्तः पुरुष आकाशः ॥ ॥ अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय आकाशस्तदेततपू्णमप्रवति पूर्णामप्रवतिनोऽधरियं

English

On the second of these nectars the Rudras live, with Indra at their head. True, the Devas do not eat or drink, but they enjoy by seeing the nectar.

अध्याय 44

श्लोक 3.7.2

त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति

ta etadeva rūpamabhisaṃviśantyetasmādrūpādudyanti

हिन्दी अर्थ

ओ भी वह त्रिपाद्‌ अमृतरूप बह्म है वह यही है, जो कि यह पुरुषसे बाहर आकारा है; ओर जो भी यह पुरुषसे बाहर आकाश है। वह यही है जो कि यह पुरुषके भीतर आकाश है; तथा जो भी न क्श्चन कामं कामयते न सथदुःखनदृत्तिरूपमाकाशं सुषु- वह निश्चय यही डहैबो किय अर्थात्‌ क्षरीरके भीतर आकाश है । जो भो वह पुरुषके भीत

English

They enter into that white colour, and they rise from that colour.

अध्याय 44

श्लोक 3.7.3

स य एतदेवममृतं वेद रुद्राणामेवैको भूत्वेन्द्रेणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति

sa ya etadevamamṛtaṃ veda rudrāṇāmevaiko bhūtvendreṇaiva mukhenaitadevāmṛtaṃ dṛṣṭvā tṛpyati sa etadeva rūpamabhisaṃviśatyetasmādrūpādudeti

हिन्दी अर्थ

यह हृदयके भीतर अर्थात्‌ हृदय" पण्ठरीकमे भाकाक्ञ है । एक होनेपर भी आका्टका तीन गुणविशि् ब्रहमको जानता है क । होनेवारी श्री-विभूति इस इष्ट गोण

English

He who thus knows this nectar, becomes one of the Rudras, with Indra at their head, he sees the nectar and rejoices. And he, having entered that colour, rises again from that colour.

अध्याय 44

श्लोक 3.7.4

स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता द्विस्तावद्दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता रुद्राणामेव तावदाधिपत्यँस्वाराज्यं पर्येता

sa yāvadādityaḥ purastādudetā paścādastametā dvistāvaddakṣiṇata udetottarato'stametā rudrāṇāmeva tāvadādhipatyam̐svārājyaṃ paryetā

हिन्दी अर्थ

उस इस प्रसिद्ध दयके पाँच देवघुषि है । इसका नो पून॑दिशा- वर्ती सुषि (छिदि) है वह प्राण है; वह चश्च है, वह भादि है, वही यह तेज भोर घन्नाय दहै--इस परार उपासना करे । जो इव तस्य ह वा इत्यादिना इस (त्य ह वा, इत्यादि खण्ड- द्वारा गायत्रीसंज्ञक ब्रह्मी उपासनाके गायत्र्याख्यस्य ब्रह्मण उपास- घङ्गरूपसे द्वारपारादि गुणक हृदयानतर्म॑त दक्षिणसुिभूत व्यानकी उपासना

English

So long as the sun rises in the east and sets in the west, twice as long does it rise in the south and set in the north; and so long does he follow the sovereign supremacy of the Rudras. Next: III, 8 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।