Chandogya Upanishad
30
अध्याय 30 / 154

Adhyāya 30

प्रपाठक खण्ड 30

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 30

श्लोक 2.17.1

॥ पृथिवी हिंकारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोताः

|| pṛthivī hiṃkāro'ntarikṣaṃ prastāvo dyaurudgītho diśaḥ pratihāraḥ samudro nidhanametāḥ śakvaryo lokeṣu protāḥ

हिन्दी अर्थ

त्रयीविद्या हकार है । ये तीन लोक प्रस्ताव है । अग्नि, वायु र आदिय ये उद्गीथ है । नक्र, पक्षी जोर किरणे ये प्रतिहार है । सप, गन्धव नौर पितृगण-ये निधन है । य सामोपासना स्म तरयी विद्या हिंकारः । अगन्या- त्रयीविद्या हिका है । त्रयीविद्या अगि आदिकरा का्य॑है--रेसी श्रुति होनेके कारण जयीविद्या अमि जीर धकारमे समामता होनेके । कारण सर्पादिका निघनत्व बतलाया यह साम--किसी नामविरोषः

English

The hiṅkâra is the earth, the prastâva the sky, the udgîtha heaven, the pratihâra the regions, the nidhana the sea. These are the Sakvarî Sâmans, as interwoven in the worlds .

अध्याय 30

श्लोक 2.17.2

स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोता वेद लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या लोकान्न निन्देत्तद्व्रतम्

sa ya evametāḥ śakvaryo lokeṣu protā veda lokī bhavati sarvamāyureti jyogjīvati mahānprajayā paśubhirbhavati mahānkīrtyā lokānna nindettadvratam

हिन्दी अर्थ

सरवविषयक सामक विदवानूको ॐ यहाँ “सपं, शब्दका पयाय “विषधर, “फणधर' आदिः कोई धकारनिशिष्ट शब्द्‌ ठेना चाहिये; जैसा कि २।२।१ के माष्थमे भाष्यकारने अन्तरि्चको उद्गीय सवं हो जाता है अर्थात्‌ सर्वर तीत्यथः। निरूपचसितिसर्वभावे दो जाता है; क्योंकि सर्वभावकषा म स्थित पुरषोसे बक प्राप्त होना

English

He who thus knows the Sakvarîs, as interwoven in the worlds, becomes possessed of the worlds, he reaches the full life, he lives long, becomes great with children and cattle, great by fame. His rule is, 'Never complain of the worlds.'

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।