Chandogya Upanishad
153
अध्याय 153 / 154

Adhyāya 153

प्रपाठक खण्ड 153

1 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ1 श्लोक

अध्याय 153

श्लोक 8.14.1

॥ आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतँ स आत्मा प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानां यशो राज्ञां यशोविशां यशोऽहमनुप्रापत्सि स हाहं यशसां यशः श्येतमदत्कमदत्कँ श्येतं लिन्दु माभिगां लिन्दु माभिगाम्

|| ākāśo vai nāma nāmarūpayornirvahitā te yadantarā tadbrahma tadamṛtam̐ sa ātmā prajāpateḥ sabhāṃ veśma prapadye yaśo'haṃ bhavāmi brāhmaṇānāṃ yaśo rājñāṃ yaśoviśāṃ yaśo'hamanuprāpatsi sa hāhaṃ yaśasāṃ yaśaḥ śyetamadatkamadatkam̐ śyetaṃ lindu mābhigāṃ lindu mābhigām

हिन्दी अर्थ

उप्त इस आन्मज्ञानका दरहषाने भरजापतिके प्रति वर्णन किय, प्रनापतिने मनुसे कहा, मनुने 9जावग॑को सुनाया । नियमानुसार गुरुके कर्तन्यकरमोक्रो समाप्त करता हुआ वेदकरा अध्ययन कर आचार्यकुले तद्धेतदात्मन्ञानं सोपकरणम्‌ शमादि उपकरणोके सहित उष इस आतमज्ञानका “ओमिव्येतदक्षरम्‌? “जोमित्येतदक्षरम्‌” इत्याद्यः सहो- इ्यादि उपासनाके सहित उसका दतिच्छान्दोम्योपनिषहैष्टमाभ्याये पन्चद्श-

English

He who is called ether (âkâsa) is the revealer of all forms and names. That within which these forms and names are contained is the Brahman, the Immortal, the Self. I come to the hall of Pragâpati, to the house; I am the glorious among Brahmans, glorious among princes, glorious among men . I obtained that glory, I am glorious among the glorious. May I never go to the white, toothless, yet devouring, white abode ; may I never go to it.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।