अध्याय 131
श्लोक 7.18.1
॥ यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्वैव विजानाति मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति मतिं भगवो विजिज्ञास इति
|| yadā vai manute'tha vijānāti nāmatvā vijānāti matvaiva vijānāti matistveva vijijñāsitavyeti matiṃ bhagavo vijijñāsa iti
हिन्दी अर्थ
कस्मास्पुनःकचिन्न प्रतिष्ठितः १ तो फिर दसा कयो कहा जाता है वह कहीं प्रतिष्ठित नहीं है £ इव्युच्यते--यस्मात्-- सो वतरते ठै; क्योंकि-- वही नीचे है, वही उपर है, वही पीठे है, वही आगे है, वही दायी मोर है, वही बायी ओर है ओर वदी यह सव है । अव उम अहकारादेश किया जाता हैम दी नीचे भेदी उप नेही स॒ एव भूमाधस्तान्न ठद्- वोह बड मूमा हौ नीचे है व्िरक्ेणा्यदियते यस्मि ऽवसे मिनन भोर नोर यी इ प भोपरिादितयादि नहीं है जिक्षपर वह प्रतिष्ठित दो।
English
'When one perceives, then one understands. One who does not perceive, does not understand. Only he who perceives, understands. This perception, however, we must desire to understand.' 'Sir, I desire to understand it.'