Brahmanda Purana
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अध्याय 1 / 156

Book 1 - Adhyaya 1

ब्रह्माण्ड उत्पत्ति

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 1

श्लोक 1

ब्रह्माण्डमण्डलाकारं वह्नेरण्डमिव स्थितम् ।जलेनावृतमित्याहुस्तोयेनाम्बु च मण्डलम्

brahmāṇḍamaṇḍalākāraṃ vahneraṇḍamiva sthitam | jalenāvṛtamityāhustoyenāmbu ca maṇḍalam

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माण्ड गोलाकार (अण्डाकार) है, अग्नि के अण्ड की भाँति स्थित है। उसे जल से आवृत कहते हैं और जल-मण्डल को दूसरे तत्त्व से।

English

The Brahmanda (cosmic egg) is sphere-shaped, like a fire-egg, resting thus. It is said to be surrounded by water, and the water-region by another element.

अध्याय 1

श्लोक 2

लक्ष्मीनारायणो यत्र यत्र गौरीशङ्करौ ।यत्र साहित्यविद्या च तत्र भूरि सुखं नृणाम्

lakṣmīnārāyaṇo yatra yatra gaurīśaṅkarau | yatra sāhityavidyā ca tatra bhūri sukhaṃ nṛṇām

हिन्दी अर्थ

जहाँ लक्ष्मी-नारायण हैं (समृद्धि और सत्त्व), जहाँ गौरी-शंकर हैं (प्रेम और चेतना), और जहाँ साहित्य-विद्या है — वहाँ मनुष्यों को प्रचुर सुख मिलता है।

English

Where Lakshmi-Narayana are (prosperity with virtue), where Gauri-Shankara are (love with consciousness), and where literature and learning are — there is abundant happiness for human beings.

अध्याय 1

श्लोक 4

देवी देवानां देवता देवीनां देवतानाम् ।सर्वभूतानां च शक्तिः सर्वभूतानां च धारिणी

devī devānāṃ devatā devīnāṃ devatānām | sarvabhūtānāṃ ca śaktiḥ sarvabhūtānāṃ ca dhāriṇī

हिन्दी अर्थ

देवी देवताओं की देवता है, देवियों की देवी है। वह सभी प्राणियों की शक्ति है, और सभी प्राणियों की धारिणी है।

English

The Goddess is the deity of the gods, the goddess of goddesses. She is the power of all beings, and the sustainer of all beings.

अध्याय 1

श्लोक 8

यां विन्दते सा वै शक्तिर्या वा विद्यात्मिका परा ।या च कर्मात्मिका प्रोक्ता त्रिधा शक्तिः प्रतिष्ठिता

yāṃ vindate sā vai śaktiryā vā vidyātmikā parā | yā ca karmātmikā proktā tridhā śaktiḥ pratiṣṭhitā

हिन्दी अर्थ

जो प्राप्त होती है वह शक्ति है, जो परम विद्या है, और जो कर्म-स्वरूपा कही जाती है — शक्ति इन तीन रूपों में प्रतिष्ठित है।

English

That which is found is Shakti; that which is supreme knowledge; and that which is declared as action — Shakti is established in these three forms.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_brahmANDapurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।