Agni Purana
331
अध्याय 331 / 381

Adhyaya 332

6 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ6 श्लोक

अध्याय 331

श्लोक 1

अर्धसमनिरूपणम् अग्निर् उवाच उपचित्रकं ससमनामथभोजभगामथ(१) ।द्रूतमध्या ततभगागथोननजयाः स्मृताः

ardhasamanirūpaṇam agnir uvāca upacitrakaṃ sasamanāmathabhojabhagāmatha(1) / drūtamadhyā tatabhagāgathonanajayāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

शृङ्गाराद्धि भवेद्धास्यो रौद्राच्च करुणो रस: । वीराच्चैवाद्भुतोत्पत्ति्बी भत्साच्च भयानकः ॥ (नाट्यशास्त्र ६। ३९) ३. भरतमुनिने नाट्यशास्त्रमें यह प्रश्न उठाया है कि ' किं रसेभ्यो भावानामभिनिर्वृत्तिरुताहो भावेभ्यो रसानाम्।' (क्या रसोंसे भावोंको अभिव्यक्ति होती है अथवा भावोंसे रसोंकी।) इसके उत्तरमें वे कहते हैं कि ' भावोंसे ही रसोंकी अभिव्यक्ति देखी जाती है, रसोंसे भावोंकी नहीं।' रसके उद्धावक होनेके कारण ही वे भाव' कहे जाते हैं । यह उत्तर ही अग्निपुराणकी उक्तियोंमें मुखरित हुआ है । “न भावहीनोऽस्ति रसो न भावो रसवर्जितः ।'--यह उक्ति भी नाट्यशास्त्रकी कारिकाका ही अंश है। (देखिये ६। ३६) ।

English

See 14.1.

अध्याय 331

श्लोक 2

वेगवती ससमगा भभभगोगथो स्मृता ।१ ससमनागथतोभयागथ इति ख॥ :प् १९१ रुद्रविस्तारस्तोसभगासमजागोगथा स्मृता

vegavatī sasamagā bhabhabhagogatho smṛtā / 1 sasamanāgathatobhayāgatha iti kha.. :p 191 rudravistārastosabhagāsamajāgogathā smṛtā

हिन्दी अर्थ

'रति' आदि आठ स्थायी भाव होते हैं तथा 'स्तम्भ' आदि आठ सात्त्विक भाव माने जाते हैं। सुखके मनोऽनुकूल अनुभव (आनन्दको मनोरम अनुभूति) -को 'रति' कहा जाता है। हर्ष आदिके

English

RV.Kh. 5.87.10d.

अध्याय 331

श्लोक 3

रजसागोगथोद्रोणौगोगौ वै केतुमत्यपि ।आख्यानिकी ततजगागथोततजगागथ

rajasāgogathodroṇaugogau vai ketumatyapi / ākhyānikī tatajagāgathotatajagāgatha

हिन्दी अर्थ

द्वारा चित्तके विकासको 'हास' कहा जाता है। अभीष्ट वस्तुके नाश आदिसे उत्पन्न मनकी विकलताको 'शोक' कहते हैं। अपने प्रतिकूल आचरण करनेवालेपर कठोरताके उदयको 'क्रोध' कहते हैं। पुरुषार्थके अनुकूल मनोभावका नाम “उत्साह' है ॥ १३--१५॥

English

RV.Kh. 5.87.10d.

अध्याय 331

श्लोक 4

विपरीताख्यानिकी त्तौ जयागातौ जगोगथ ।सौमलौ गथलभभावौ भवेद्धरिणवल्लभा

viparītākhyānikī ttau jayāgātau jagogatha / saumalau gathalabhabhāvau bhaveddhariṇavallabhā

हिन्दी अर्थ

चित्र आदिके दर्शनसे जनित मानसिक विकलताको ' भय' कहते हैं। दुर्भाग्यवाही पदार्थोकी निन्दा 'जुगुप्सा' कहलाती है। किसी वस्तुके दर्शनसे चित्तका अतिशय आश्चर्यसे पूरित हो जाना

English

RV.Kh. 5.87.10d.

अध्याय 331

श्लोक 5

लौवनौगाथनजजा यः स्यादपराक्रमं ।पुष्पिता ननवयानजजावोगथो रजौ

lauvanaugāthanajajā yaḥ syādaparākramaṃ / puṣpitā nanavayānajajāvogatho rajau

हिन्दी अर्थ

“विस्मय' कहलाता है। “स्तम्भ! आदि आठ सात्त्विक भाव हैं, जो रजोगुण और तमोगुणसे परे हैं। भय या रागादि उपाधियोंसे चेष्टाका अवरोध हो जाना 'स्तम्भ' कहलाता है। श्रम एवं राग आदिसे युक्त अन्तःकरणके क्षोभसे शरीरमें उत्पन्न जलको 'स्वेद? कहते हैं। हर्षादिसे शरीरका उच्छ्वसित होना और उसमें रोंगटे खड़े हो जाना 'रोमाञ्च' कहा गया है। हर्ष आदि तथा भय

English

RV.Kh. 5.87.10d.

अध्याय 331

श्लोक 6

वीजथो जवजवागो मूले पनमती शिखा ।अष्टाविंशतिनागाभा त्रिंशन्नागन्ततो युजि ।खञ्जा तद्विपरीता स्यात् समवृत्तं प्रदर्श्यते

vījatho javajavāgo mūle panamatī śikhā / aṣṭāviṃśatināgābhā triṃśannāgantato yuji / khañjā tadviparītā syāt samavṛttaṃ pradarśyate

हिन्दी अर्थ

आदिके कारण वाणीका स्पष्ट उच्चारण न होना (गद्गद हो जाना) 'स्वरभेद' कहा गया है। चित्तके क्षोभसे उत्पन्न कम्पनको “वेपथु' कहा गया है। विषाद आदिसे शरीरको कान्तिका

English

RV.Kh. 5.87.10d.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।