Agni Purana
280
अध्याय 280 / 381

Adhyaya 281

13 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ13 श्लोक

अध्याय 280

श्लोक 1

वृक्षायुर्वेदः धन्वन्तरिर् उवाच वृक्षायुर्वेदमाख्यास्ये प्लक्षश्चोत्तरतः शुभः ।प्राग्वटो याम्यतस्त्वाम्र आप्ये ऽश्वत्थः कर्मेण तु

vṛkṣāyurvedaḥ dhanvantarir uvāca vṛkṣāyurvedamākhyāsye plakṣaścottarataḥ śubhaḥ / prāgvaṭo yāmyatastvāmra āpye 'śvatthaḥ karmeṇa tu

हिन्दी अर्थ

महासेन-ये सोलह 'स्वर-मूर्तिदेवता' हैं। क्रोधीश, चण्डीश, पञ्चान्तक, शिवोत्तम, एकरुद्र, कूर्म,

English

Oil should be given on Saturday. One who makes a gift of food with cow's milk in the (month of) Aioina (October- November), (would also get rid of the diseases). One who bathes the liAga (representative symbol of Lord Siva) with ghee and milk would become free from diseases.

अध्याय 280

श्लोक 2

दक्षिणां दिशमुत्पन्नाः समीपे कण्टकद्रुमाः ।उद्यानं गृहवासे(१) स्यात् तिलान् वाप्यथ पुष्पितान्

dakṣiṇāṃ diśamutpannāḥ samīpe kaṇṭakadrumāḥ / udyānaṃ gṛhavāse(1) syāt tilān vāpyatha puṣpitān

हिन्दी अर्थ

दारुक, अर्द्धनारीश्वर, उमाकान्त, आषाढी, दण्डी द्विरण्ड, महाकाल, कपाली, भुजङ्गेश, पिनाको,

English

One should offer unto fire durvS (grass) dipped in the three sweet things (sugar, honey and clarified butter) with ( the recitation of) thegtyatri {mantra). One should bathe and make the offering in thatasterism in which one got the disease.

अध्याय 280

श्लोक 3

गृह्णीयाद्रोपयेद्वृक्षान् द्विजञ्चन्द्रं प्रपूज्य च ।ध्रुवाणि पञ्च वायव्यं हस्तं प्राजेशवैष्णवं

gṛhṇīyādropayedvṛkṣān dvijañcandraṃ prapūjya ca / dhruvāṇi pañca vāyavyaṃ hastaṃ prājeśavaiṣṇavaṃ

हिन्दी अर्थ

तथा संवर्तक -ये 'व्यञ्जन-मूर्तिदेवता' माने गये हैं

English

A hymn to (Lord) VUtu would remove the diseases that

अध्याय 280

श्लोक 4

नक्षत्राणि तथा मूलं शस्यन्ते द्रुमरोपणे ।प्रवेशयेन्नदीवाहान् पुष्करिण्यान्तु(२) कारयेत्

nakṣatrāṇi tathā mūlaṃ śasyante drumaropaṇe / praveśayennadīvāhān puṣkariṇyāntu(2) kārayet

हिन्दी अर्थ

उपर्युक्त श्रीकण्ठ आदि रुद्रोंका उनको शक्तियोंसहित क्रमशः न्यास करे । ( श्रीविद्यार्णव- तन्त्रमें इनकी शक्तियोंके नाम इस प्रकार दिये गये हैं-पूर्णादरी, विरजा, शाल्मली, लोलाक्षी, वर्तुलाक्षी, कुण्डोदरी, ऊर्ध्वकेशी, विकृतमुखी, ज्वालामुखी, उल्कामुखी, श्रामुखी तथा विद्यामुखी—ये रुद्रोंकी 'स्वर-शक्तियाँ' हैं। महाकाली, महासरस्वती, सर्वसिद्धि, गौरी, त्रैलोक्यविद्या, मन्त्रशक्ति,

English

The fourth, ninth and fourteenth days of a lunar fcfftnight.

अध्याय 280

श्लोक 5

१ गृहवामे इति ञ॥ २ पुष्करिण्यान्त्विति पाठो न सम्यक् प्रतिभाति :प् ४२ हस्ता मघा तथा मैत्रमाद्यं पुष्यं सवासवं ।जलाशयसमारम्भे वारुणञ्चोत्तरात्रयम्

1 gṛhavāme iti ña.. 2 puṣkariṇyāntviti pāṭho na samyak pratibhāti :p 42 hastā maghā tathā maitramādyaṃ puṣyaṃ savāsavaṃ / jalāśayasamārambhe vāruṇañcottarātrayam

हिन्दी अर्थ

खेचरी, मञ्जरी, रूपिणी, वीरिणी, काकोदरी, पूतना भद्रकाली, योगिनी, शङ्किनी, गर्जिनी, कालरात्रि, कूर्दिनी, कपर्दिनी, वञ्रिका, जया,

English

Those that arc pungent, bitter and astringent produce wind and destroy phlegm. Similarly those that are pungent, sour and saline are known to increase bile.

अध्याय 280

श्लोक 6

संपूज्य वरुणं विष्णुं पर्जन्यं तत् समाचरेत् ।अरिष्टाशोकपुन्नागशिरीषाः सप्रियङ्गवः

saṃpūjya varuṇaṃ viṣṇuṃ parjanyaṃ tat samācaret / ariṣṭāśokapunnāgaśirīṣāḥ sapriyaṅgavaḥ

हिन्दी अर्थ

इनके न्यासकी विधि इस प्रकार है--' हसौं विरजायै नमः।' इत्यादि। इसी तरह अन्य स्वरशक्तियोंका न्यास करना चाहिए। व्यञ्जन- शक्तियोंके न्यासके लिये यही विधि है। यथा--'हसौं कं क्रोधीशाय महाकाल्यै नमः।

English

Those that are bitter, sweet and astringent destroy bile. This is not the effect of the taste but only of its chemical action.

अध्याय 280

श्लोक 7

अशोकः कदली जम्बुस् तथा वकुलदाडिमाः ।सायं प्रातस्तु घर्मर्तौ शीतकाले दिनान्तरे

aśokaḥ kadalī jambus tathā vakuladāḍimāḥ / sāyaṃ prātastu gharmartau śītakāle dināntare

हिन्दी अर्थ

इत्यादि। साधकको चाहिए कि उदयादि अङ्गोंका भी न्यास करे; क्योंकि सम्पूर्ण मन्त्र साङ्ग होनेपर ही सिद्धिदायक होते हैं। हल्लेखाको व्योम-बीजसे युक्त करके इन अङ्गोंका न्यास

English

O Susruta! Those that are stimulant and hot destroy phlegm and wind. Those that are cold destroy bile. They (the herbs) exert their influence according to their qualities.

अध्याय 280

श्लोक 8

वर्षारत्रौ भुवः शोषे सेक्तव्या रोपिता द्रुमाः ।उत्तमं विंशतिर्हस्ता मध्यमं षोडशान्तरम्

varṣāratrau bhuvaḥ śoṣe sektavyā ropitā drumāḥ / uttamaṃ viṃśatirhastā madhyamaṃ ṣoḍaśāntaram

हिन्दी अर्थ

करना चाहिए। हृदयादि अङ्ग मन्त्रोंको अन्तमें जोड़कर बोलना चाहिए। यथा-'हां हृदयाय तिलोंकी आहुति दे। लिपियोंकी अधिष्ठात्री नमः। हीं शिरसे स्वाहा। हूं शिखायै वषट्। देवी वागीश्वरी अपने चार हाथोंमें अक्षमाला, हें कवचाय हुम्। हों नेत्रत्रयाय वौषट्। कलश, पुस्तक और कमल धारण करती हैं। हरः अस्त्राय फट्।' यह 'षडङ्गन्यास' कहा कवित्व आदिकी शक्ति प्रदान करती हैं। इसलिये

English

The three (seasons) beginning with the rainy (are said to be) visargas. The three (seasons) beginning with winter and ending with summer (are) adana.

अध्याय 280

श्लोक 9

स्थानात् स्थानान्तरं कार्यं वृक्षाणां द्वादशावरं ।विफलाः स्युर्घना वृक्षाः शस्त्रेणादौ हि शोधनम्

sthānāt sthānāntaraṃ kāryaṃ vṛkṣāṇāṃ dvādaśāvaraṃ / viphalāḥ syurghanā vṛkṣāḥ śastreṇādau hi śodhanam

हिन्दी अर्थ

गया है। पञ्चाङ्गन्यासमें नेत्रको छोड़ दिया जाता जपकर्मके आदिमें सिद्धिके लिये उनका है। निरङ्ग-मन्त्रका उसके स्वरूपसे ही अङ्गन्यास न्यास करे। इससे अकवि भी निर्मल कवि करके क्रमशः वागीश्वरी देवी (हीं)-का होता है। मातृका-न्याससे सभी मन्त्र सिद्ध एक लाख जप करे तथा यथोक्त (दशांश) होते हैं

English

Winter, spring and summer.

अध्याय 280

श्लोक 10

विडङ्गघृतपङ्काक्तान् सेचयेच्छीतवारिणा ।फलनाशे कुलथैश् च मासैर् मुद्गैर् यवैस्तिलैः

viḍaṅgaghṛtapaṅkāktān secayecchītavāriṇā / phalanāśe kulathaiś ca māsair mudgair yavaistilaiḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्रेय महापृराणमें 'मन्त्र-परिभाषाका वर्णन” नामक दो सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ अग्निदेव कहते हैं-वसिष्ठ! अब मैं नागोंको विविध भेद, दंशके स्थान, मर्मस्थल, सूतक और उत्पत्ति, सर्पदंशमें अशुभ नक्षत्र आदि, सर्पदंशके सर्पदष्ट मनुष्यको चेष्टा-इन सात लक्षणोंको

English

The characteristics of the disease due to the (derang¬ ed) wind are — pain in the bones, bitter taste in the mouth, parched state of feeling in the mouth, yawning and bristling of the pair.

अध्याय 280

श्लोक 11

घृतशीतपयःसेकः फलपुष्पाय सर्वदा ।आविकाजशकृच्चूर्णम् यवचूर्णं तिलानि च

ghṛtaśītapayaḥsekaḥ phalapuṣpāya sarvadā / āvikājaśakṛccūrṇam yavacūrṇaṃ tilāni ca

हिन्दी अर्थ

है। सर्पोके सम्बन्धमें 'सुश्रुत' ग्रन्थमें (पू० तन्त्र, कल्पस्थान, अध्याय ४ में) जो कुछ कहा गया है, उसका सारांश इस प्रकार है-सर्प दो प्रकारके होते हैं-'दिव्य' और ' भौम'। दिव्य सर्प वासुकि और तक्षक आदि हैं। वे इस पृथ्वीका बोझ उठानेवाले हैं; प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी होते हैं । वे कुपित हो जायँ तो फुफकार और दृष्टिमात्रे सम्पूर्ण जगत्को दग्ध कर सकते हैं। वे सदा नमस्कारके ही योग्य हैं। उनके डसनेकी कोई दवा नहीं है। चिकित्सासे उनका कोई प्रयोजन नहीं है।

English

Tlie characteristics of disease due to phlegm are languor, flow of water (from the mouth), heaviness (of the body), sweet taste in the mouth and longing for heat.

अध्याय 280

श्लोक 12

गोमांसमुदकञ्चैव सप्तरात्रं निधापयेत् ।उत्सेकः सर्ववृक्षाणां फलपुष्पादिवृद्धिदः

gomāṃsamudakañcaiva saptarātraṃ nidhāpayet / utsekaḥ sarvavṛkṣāṇāṃ phalapuṣpādivṛddhidaḥ

हिन्दी अर्थ

परंतु जो भूमिपर उत्पन्न होनेवाले सर्प हैं, जिनकी दाढोंमें विष होता है तथा जो मनुष्योंको काटते हैं, उनकी संख्या अस्सी है । उन सबके पाँच भेद हैं-दर्वीकर, मण्डली, राजिमान्, निर्विष और वैकरञ्ञ। राजिमानूको ही अग्निपुराणमें 'राजिल' कहा गया है। इनमें “दर्वीकर' छब्बीस, ' मण्डली ' बाईस, ' राजिमान्' (या राजिल) दस, 'निर्विष' बारह तथा ' वैकरञ्ज' तीन प्रकारके होते हैं । बैकरज्जोंद्वारा मण्डली तथा राजिलके संयोगसे उत्पन्न चित्रित सर्प सात प्रकारके माने गये हैं। मण्डलीके संयोगसे उत्पन्न चार और राजिलके संयोगसे उत्पन्न तीन। इस तरह इनके अस्सी प्रकार हुए।

English

(Eating of) oil and hot food, anointing the body with oil and bathing and drinking of oil and the like would appease (deranged) wind. Clarified butter, milk, sugar and the rays of the moon and the like would counter (deranged) bile.

अध्याय 280

श्लोक 13

मत्स्याम्भसा तु सेकेन वृद्धिर्भवति शाखिनः ।विडङ्गतण्डुलोपेतं मत्स्यं मांसं हि दोहदं ।सर्वेषामविशेषेण वृक्षाणां रोगमर्दनम्

matsyāmbhasā tu sekena vṛddhirbhavati śākhinaḥ / viḍaṅgataṇḍulopetaṃ matsyaṃ māṃsaṃ hi dohadaṃ / sarveṣāmaviśeṣeṇa vṛkṣāṇāṃ rogamardanam

हिन्दी अर्थ

दर्वीकर सर्प चक्र, हल, छत्र, स्वस्तिक और अङ्कुशका चिह्न धारण करनेवाले, फणयुक्त तथा शीघ्रगामी होते हैं। मण्डली सर्प विविध मण्डलोंसे चित्रित, मोटे तथा मन्दगामी हुआ करते हैं। वे अग्नि तथा सूर्यके तुल्य तेजस्वी जान पड़ते हैं । राजिमान् अथवा राजिल सर्प चिकने होते हैं। वे तिरछी, ऊर्ध्वगामिनी एवं बहुरंगी रेखाओंद्वारा चित्रित-से जान पड़ते हैं । चरकने भी इन सर्पोके विषयमें ऐसा ही, किंतु संक्षिप्त विवरण दिया है--

English

The oil of the three myrobalans together with honey and doing exercises etc. would remove (deranged) phlegm. Contemplation on (Lord) Visnu and His worship would appease all the diseases.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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