Agni Purana
271
अध्याय 271 / 381

Adhyaya 272

39 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ39 श्लोक

अध्याय 271

श्लोक 1

सूर्यवंशकीर्तनं अग्निर् उवाच सूर्यवंशं सोमवंशं रज्ञां वंशं वदमि ते ।हरेर्ब्रह्मा पद्मगो ऽभून्मरीचिर्ब्रह्मणः सुतः

sūryavaṃśakīrtanaṃ agnir uvāca sūryavaṃśaṃ somavaṃśaṃ rajñāṃ vaṃśaṃ vadami te / harerbrahmā padmago 'bhūnmarīcirbrahmaṇaḥ sutaḥ

हिन्दी अर्थ

वृक्ष मङ्गल माना गया है। घरके समीप दक्षिण दिशामें उत्पन्न हुए काँटेदार वृक्ष भी शुभ हैं। आवास-स्थानके आसपास उद्यानका निर्माण करे अथवा सब ओरका भाग पुष्पित तिलोंसे सुशोभित ब्राह्मण और चन्द्रमाका पूजन करके वृक्षोंका आरोपण करे। वृक्षारोपणके लिये तीनों उत्तय, स्वाती, हस्त, रोहिणी, श्रवण और मूल-- ये नक्षत्र अत्यन्त प्रशस्त हैं। उद्यानमें पुष्करिणी

English

The number of hymns of the (wrfa), Tajur (veda), SOma {veda) and Atharva {oeda) that yield all (the desires) and confer the four ends of the human life is one lakh.

अध्याय 271

श्लोक 2

मरीचेः कश्यपस्तस्माद्विवस्वांस्तस्य पत्न्यपि ।संज्ञा राज्ञी(१) प्रभा तिस्रो राज्ञी रैवतपुत्रिका

marīceḥ kaśyapastasmādvivasvāṃstasya patnyapi / saṃjñā rājñī(1) prabhā tisro rājñī raivataputrikā

हिन्दी अर्थ

(बावली)-का निर्माण करावे और उसमें नदीके प्रवाहका प्रवेश करावे। जलाशयारम्भके लिये

English

{The gveda) is divided into two branches, Sahkhyayana and Aivalayana. The br&kmans (of this Veda) (contain) two thousand one hundred and ten hymns.

अध्याय 271

श्लोक 3

रेवन्तं सुषुवे पुत्रं प्रभातञ्च प्रभा रवेः ।त्वाष्ट्री संज्ञा मनुं पुत्रं यमलौ यमुनां यमम्

revantaṃ suṣuve putraṃ prabhātañca prabhā raveḥ / tvāṣṭrī saṃjñā manuṃ putraṃ yamalau yamunāṃ yamam

हिन्दी अर्थ

नक्षत्र उपयुक्त हैं वरुण, विष्णु और इन्द्रका पूजन करके इस कर्मको आरम्भ करे। नीम, अशोक, पुन्नाग (नागकेसर), शिरीष, प्रियङ्ग, अशोक', कदली (केला), जम्बू (जामुन), वकुल (मौलसिरी)

English

The first (branch) of the Sdmaveda is known as Kauthuma and the second as Atharvanayanl. The songs of this Veda consist of dranyaka uktha and uha. The extent of the {Sdmaveda) is said to be a collection of nine thousand four hundred and twentyfive.

अध्याय 271

श्लोक 4

छाया संज्ञा च सावर्णिं मनुं वैवस्वतं सुतम् ।शनिञ्च तपतीं विष्टिं संज्ञायाञ्चाश्विनौ पुनः

chāyā saṃjñā ca sāvarṇiṃ manuṃ vaivasvataṃ sutam / śaniñca tapatīṃ viṣṭiṃ saṃjñāyāñcāśvinau punaḥ

हिन्दी अर्थ

और अनार वृक्षोंका आरोपण करके ग्रीष्म-ऋतुमें प्रातःकाल और सायंकाल, शीत-ऋतुमें दिनके समय एवं वर्षा-ऋतुमें रात्रिके समय भूमिके सूख जानेपर वृक्षोंको सींचे। वृक्षोंके मध्यमें बीस

English

The Brahma {purdna) and other Purds are eighteen. (They are known to be) learning relating to (Lord) Hari

अध्याय 271

श्लोक 5

मनोर्वैवस्वतस्यासन् पुत्रा वै न च तत्समाः ।इक्ष्वाकुश् चैव नाभागो धृष्टःशर्यातिरेव च

manorvaivasvatasyāsan putrā vai na ca tatsamāḥ / ikṣvākuś caiva nābhāgo dhṛṣṭaḥśaryātireva ca

हिन्दी अर्थ

हाथका अन्तर 'उत्तम', सोलह हाथका अन्तर “मध्यम” और बारह हाथका अन्तर 'अधम' कहा गया है। बारह हाथ अन्तरवाले वृक्षोंको स्थानान्तरित कर देना चाहिए। घने वृक्ष फलहीन होते हैं । पहले उन्हें काट-छाँटकर शुद्ध करे

English

One would get enjoyment and emancipation by wor¬ shipping and praising Him, who is immanent, transcendent and bears the gross and subtle forms.

अध्याय 271

श्लोक 6

नरिष्यन्तस् तथा प्रांशुर्नाभागादिष्टसत्तमाः ।करुषश् च पृषध्रश् च अयोध्यायां महाबलाः

nariṣyantas tathā prāṃśurnābhāgādiṣṭasattamāḥ / karuṣaś ca pṛṣadhraś ca ayodhyāyāṃ mahābalāḥ

हिन्दी अर्थ

जलसे उनको सींचे। वृक्षोंके फलोंका नाश

English

(That) all-pervasive, triumphant (lord) wishing for prosperity is of the forms of Fire, Sun etc. (Lord) Vi§5iu, that is the mouth of the gods in the form of the Fire (god), is the supreme state.

अध्याय 271

श्लोक 7

कन्येला च मनोरासीद्बुधात्तस्यां पुरूरवाः ।पुरूरवसमुच्पाद्य सेला सुद्युम्नताङ्गता

kanyelā ca manorāsīdbudhāttasyāṃ purūravāḥ / purūravasamucpādya selā sudyumnatāṅgatā

हिन्दी अर्थ

घृतसे मिश्रित शीतल जलके द्वारा यदि सेचन किया जाय तो वृक्षोंमें सदा फलों एवं पुष्पोंको वृद्धि होती है। भेड़ और बकरीकी विष्ठाका चूर्ण, जौका चूर्ण, तिल और जल इनको एकत्र करके सात दिनतक एक स्थानपर रखे। उसके बाद इससे सींचना सभी वृक्षोंके फल और पुष्पोंको बढ़ानेवाला है

English

Manu had a daughter Ila; from Budha on her, Pururavas; having begotten Pururavas, Ila (Sela) attained the state of Sudyumna.

अध्याय 271

श्लोक 8

१ अत्र छायेतिपाठो युक्तः :प् ८ सुद्युम्नादुत्कलगयौ विनताश्वस्त्रयो नृपाः ।उत्कलस्योत्कलं राष्ट्रं विनताश्वस्य पश्चिमा

1 atra chāyetipāṭho yuktaḥ :p 8 sudyumnādutkalagayau vinatāśvastrayo nṛpāḥ / utkalasyotkalaṃ rāṣṭraṃ vinatāśvasya paścimā

हिन्दी अर्थ

मछलीके जल (जिसमें मछली रहती हों)-से सींचनेपर वृक्षोंकी वृद्धि होती है। विडंगचावलके साथ यह जल वृक्षोंका दोहद (अभिलषित- पदार्थ) है। इसका सेचन साधारणतया सभी

English

From Sudyumna came Utkala, Gaya and Vinatashva — three kings. Utkala's kingdom is Utkala; Vinatashva's the western

अध्याय 271

श्लोक 9

दिक् सर्वा राजवर्यस्य गयस्य तु गयापुरी ।वशिष्ठवाक्यात् सुद्युम्नः प्रतिष्ठानमवाप ह

dik sarvā rājavaryasya gayasya tu gayāpurī / vaśiṣṭhavākyāt sudyumnaḥ pratiṣṭhānamavāpa ha

हिन्दी अर्थ

वृक्ष-रोगोंका विनाश करनेवाला है इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'वृक्षायुर्वेदका वर्णन” नामक दो सौ बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

direction, all; Gaya's, of the best of kings, is Gayapuri. By Vasishtha's word Sudyumna obtained Pratishthana;

अध्याय 271

श्लोक 10

तत् पुरूरवसे प्रादात्सुद्युम्नो राज्यमाप्य तु ।नरिष्यतः शकाः पुत्रा नाभागस्य च वैष्णवः

tat purūravase prādātsudyumno rājyamāpya tu / nariṣyataḥ śakāḥ putrā nābhāgasya ca vaiṣṇavaḥ

हिन्दी अर्थ

नाना रोगनाशक ओषधियोंका वर्णन

English

Sudyumna, having obtained the kingdom, gave it to Pururavas. Narishyanta's sons were the Shakas; Nabhaga's was Vaishnava;

अध्याय 271

श्लोक 11

अम्बरीषः प्रजापालो धार्ष्टकं धृष्टतः कुलम् ।सुकल्पानर्तौ शर्यार्तेर्वैरोह्यानर्ततो नृपः

ambarīṣaḥ prajāpālo dhārṣṭakaṃ dhṛṣṭataḥ kulam / sukalpānartau śaryārtervairohyānartato nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान् धन्वन्तरि कहते हैं अडूसा, मुलहठी या कचूर', दोनों प्रकारकी हल्दी और इन्द्रयव इनका क्वाथ बालकोंके सभी प्रकारके अतिसारमें तथा स्तन्य (माताके दूधके) दोषोंमें प्रशस्त है। पीपल और अतीसके सहित काकड़ाशृंगीका अथवा केवल एक अतीसका चूर्ण करके बालकोंको मधुके साथ चटावे। इससे खाँसी, वमन और ज्वर

English

Ambarisha, protector of subjects; from Dhrishta the Dharshtaka lineage. Sukalpa and Anarta of Sharyati; from Anarta, Vairohya the king;

अध्याय 271

श्लोक 12

आनर्तविषयश्चासीत् पुरी चासीत् कुशस्थली ।रेवस्य रैवतः पुत्रः ककुद्मी नाम धार्मिकः

ānartaviṣayaścāsīt purī cāsīt kuśasthalī / revasya raivataḥ putraḥ kakudmī nāma dhārmikaḥ

हिन्दी अर्थ

नष्ट होता है। बालकोंको दुग्ध, घृत अथवा

English

the Anarta country and the city Kushasthali. Revata, son of Reva, named Kakudmi, righteous,

अध्याय 271

श्लोक 13

ज्येष्ठः पुत्रशतस्यासीद्राज्यं प्राप्य कुशस्थलीम् ।स कन्यासहितः श्रुत्वा गान्धर्वं ब्रह्मणो ऽन्तिके

jyeṣṭhaḥ putraśatasyāsīdrājyaṃ prāpya kuśasthalīm / sa kanyāsahitaḥ śrutvā gāndharvaṃ brahmaṇo 'ntike

हिन्दी अर्थ

तैलके साथ वचका सेवन करावे अथवा मुलहठी और शङ्खुपुष्पीको दूधके साथ बालक पिये। इससे बालकोंको वाक्शक्ति एवं रूपसम्पत्तिके साथ-साथ आयु, बुद्धि और कान्तिको भी वृद्धि होती है। वच, कलिहारी,

English

was eldest of a hundred sons; having obtained the kingdom at Kushasthali, with his daughter, having heard a Gandharva song near Brahma,

अध्याय 271

श्लोक 14

मुहूर्तभूतं देवस्य मर्त्ये बहुयुगं गतम् ।आजगाम जवेनाथ स्वां पुरीं यादवैर् वृताम्

muhūrtabhūtaṃ devasya martye bahuyugaṃ gatam / ājagāma javenātha svāṃ purīṃ yādavair vṛtām

हिन्दी अर्थ

और सैन्धव इनका चूर्ण बालकोंको प्रातःकाल पिलावे। इसका सेवन बुद्धिवरद्धक है। देवदारु, बड़ा सहजन, त्रिफला और नागरमोथा-इनका

English

a moment for the god had passed many ages in the mortal world. He then came quickly to his own city filled with Yadavas,

अध्याय 271

श्लोक 15

कृतां द्वारवतीं नाम बहुद्वारां मनोरमाम् ।भोजवृष्ण्यन्धकैर् गुप्तां(?) वासुदेवपुरोगमैः

kṛtāṃ dvāravatīṃ nāma bahudvārāṃ manoramām / bhojavṛṣṇyandhakair guptāṃ(?) vāsudevapurogamaiḥ

हिन्दी अर्थ

१. २८२ वें अध्यायमें ६-७ दोनों श्लोकोंमें अशोक वृक्षका नाम है, पुनरुक्ति-दोष नहीं है। कारण यह है कि अशोक 'श्वेत' तथा 'रक्त' दो प्रकारका होता है। दोनों भवनके पास प्रशस्त हैं।

English

made Dvaravati, of many gates, delightful, protected by Bhojas, Vrishnis and Andhakas, with Vasudeva at the front.

अध्याय 271

श्लोक 16

रेवतीं बलदेवाय ददौ ज्ञात्वा ह्य् अनिन्दिताम् ।तपः सुमेरुशिखरे तप्त्वा विष्ण्वालयं गतः

revatīṃ baladevāya dadau jñātvā hy aninditām / tapaḥ sumeruśikhare taptvā viṣṇvālayaṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

२. प्रथम श्लोकमें “सिंही शटी' तथा “सिंही यष्टी ' दोनों पाठ हैं, जो युक्तियुक्त हैं। “शटी 'का अर्थ 'कचूर' है तथा “यष्टी 'का अर्थ

English

Knowing her blameless, he gave Revati to Baladeva. Having performed austerity on the peak of Sumeru, he went to Vishnu's abode.

अध्याय 271

श्लोक 17

नाभागस्य च पुत्रौ द्वौ वैश्यौ ब्राह्मणतां गतौ ।करूषस्य तु कारूषाः क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः

nābhāgasya ca putrau dvau vaiśyau brāhmaṇatāṃ gatau / karūṣasya tu kārūṣāḥ kṣatriyā yuddhadurmadāḥ

हिन्दी अर्थ

क्वाथ अथवा पीपल और मुनक्काका कल्क सभी प्रकारके कृमिरोगोंका नाशक है। शुद्ध राँगेको त्रिफला, भृङ्गराज तथा अदरखके रस या मधु-घृतमें अथवा भेड्के मूत्र या गोमूत्रमें अञ्जन करनेसे नेत्ररोगोंमें लाभ होता है। दूर्वासका नस्य नाकसे बहनेवाले रक्तरोग (नाशा)-को शान्त करनेमें उत्तम है

English

Two sons of Nabhaga, Vaishyas, became Brahmins; from Karusha the Karushas, Kshatriyas, mad in battle;

अध्याय 271

श्लोक 18

शूद्रत्वञ्च पृषध्रो ऽगाद्धिंसयित्वा गुरोश् च गाम् ।मनुपुत्रादथेक्षाकोर्विकुक्षिर्देवराडभूत्

śūdratvañca pṛṣadhro 'gāddhiṃsayitvā guroś ca gām / manuputrādathekṣākorvikukṣirdevarāḍabhūt

हिन्दी अर्थ

लहसुन, अदरख और सहजनके रससे कानको भर देनेपर अथवा अदरखके रस या तैलसे कानको भर देनेपर वह कर्णशूलका नाशक तथा ओष्ठ-रोगोंको दूर करनेवाला होता है। जायफल,

English

Prishadhra went to Shudrahood after killing his teacher's cow. From Manu's son Ikshvaku, Vikukshi became the king of gods (Shashada);

अध्याय 271

श्लोक 19

विकुक्षेस्तु ककुत्स्थो ऽभूत्तस्य पुत्रः सुयोधनः ।तस्य पुत्रः पृथुर् नाम विश्वगश्वः पृथोः सुतः

vikukṣestu kakutstho 'bhūttasya putraḥ suyodhanaḥ / tasya putraḥ pṛthur nāma viśvagaśvaḥ pṛthoḥ sutaḥ

हिन्दी अर्थ

हल्दी, गोदुग्ध तथा बड़ी हरैके कल्कसे सिद्ध किया हुआ तिलका तैल कवल (कुल्ला) करनेसे दन्तपीड़ाका नाशक है। काँजी, नारियलका जल, गोमूत्र, सुपारी तथा सोंठ-इनके क्वाथका कवल मुखमें रखनेसे जिह्वाके रोगका नाश होता है। कलिहारीके कल्क (पिसे हुए द्रव्य)-में निर्गुण्डीके रसके साथ सिद्ध किया हुआ तैलका नस्य लेने (नाकमें डालने)-से गण्डमाला और

English

of Vikukshi was Kakutstha; his son Suyodhana; his son named Prithu; Vishvagashva, son of Prithu;

अध्याय 271

श्लोक 20

आयुस्तस्य च पुत्रो ऽभूद्युवनाश्वस् तथा सुतः ।युवनाश्वाच्च श्रावन्तः पूर्वे श्रावन्तिका पुरी

āyustasya ca putro 'bhūdyuvanāśvas tathā sutaḥ / yuvanāśvācca śrāvantaḥ pūrve śrāvantikā purī

हिन्दी अर्थ

गलगण्डरोगका नाश होता है। सभी चर्मरोगोंको नष्ट करनेवाले आक, काटा, करञ्ज, थूहर, अमलतास और चमेलीके पत्तोंको गोमूत्रके साथ पीसकर उबटन लगाना चाहिए। वाकुचीको

English

his son Ayu; then Yuvanashva a son; from Yuvanashva Shravanta, in the east the city Shravanti;

अध्याय 271

श्लोक 21

श्रावन्ताद् वृहदश्वो ऽभूत् कुबलाश्वस्ततो नृपः ।धुन्धुमारत्वमगमद्धुन्धोर् नाम्ना च वै पुरा

śrāvantād vṛhadaśvo 'bhūt kubalāśvastato nṛpaḥ / dhundhumāratvamagamaddhundhor nāmnā ca vai purā

हिन्दी अर्थ

तिलोंके साथ एक वर्षतक खाया जाय तो वह सालभरमें कुष्ठरोगका नाश कर देती है। हरै, औषध हैं। पाठा, चित्रक, हल्दी, त्रिफला और व्योष (सोंठ, मिर्च, पीपल)--इनका चूर्ण तक्रके साथ पीनेसे अथवा गुड़के साथ हरीतकी खानेसे अर्शरोगका नाश होता है। प्रमेह-रोगीको त्रिफला,

English

from Shravanta Brihadashva; then the king Kuvalashva, who of old attained the name Dhundhumara from Dhundhu.

अध्याय 271

श्लोक 22

धुन्धुमारास्त्रयो भूपा दृढाश्वो दण्ड एव च ।कपिलो ऽथ दृढाश्वात्तु हर्यश्वश् च प्रमोदकः

dhundhumārāstrayo bhūpā dṛḍhāśvo daṇḍa eva ca / kapilo 'tha dṛḍhāśvāttu haryaśvaś ca pramodakaḥ

हिन्दी अर्थ

इनका क्वाथ या आँवलेका रस हल्दी, कल्क और मधुके साथ पीना चाहिए। अडूसेको जड़

English

Three Dhundhumara kings: Dridhashva and Danda; Kapila; from Dridhashva Haryashva and Pramodaka;

अध्याय 271

श्लोक 23

हर्यश्वाच्च निकुम्भो ऽभूत् संहताश्वो निकुम्भतः ।अकृशाश्वो रणाश्वश् च संहताश्वसुतावुभौ

haryaśvācca nikumbho 'bhūt saṃhatāśvo nikumbhataḥ / akṛśāśvo raṇāśvaś ca saṃhatāśvasutāvubhau

हिन्दी अर्थ

गिलोय और अमलतासके क्काथमें शुद्ध एरण्डका तेल मिलाकर पीनेसे वातरक्तका नाश होता है और पिप्पली प्लीहारोगको नष्ट करती पेटके रोगीको थूहरके दूधमें अनेक बार भावना दी हुई पिप्पलीका सेवन करना चाहिए।

English

from Haryashva Nikumbha; Samhatashva from Nikumbha; Akrishashva and Ranashva, both sons of Samhatashva;

अध्याय 271

श्लोक 24

युवनाश्वो रणाश्वस्य मान्धाता युवनाश्वतः ।मान्धातुः पुरुकुत्सो ऽभून्मुचुकुन्दो द्वितीयकः

yuvanāśvo raṇāśvasya māndhātā yuvanāśvataḥ / māndhātuḥ purukutso 'bhūnmucukundo dvitīyakaḥ

हिन्दी अर्थ

पीपल)-के कल्कसे सिद्ध दूध अरुचिरोगका निवारण करता है। पीपलामूल, वच, हरै, पीपल और विङङ्गको घीमें मिलाकर रखे। (उसके सेवनसे) या केवल तक्रके एक मासतक सेवनसे

English

Yuvanashva of Ranashva; Mandhata from Yuvanashva; of Mandhata Purukutsa; Muchukunda the second;

अध्याय 271

श्लोक 25

पुरुकुत्सादसस्युश् च सम्भूतो नर्मदाभवः ।सम्भूतस्य सुधन्वाभूत्त्रिधन्वाथ सुधन्वनः

purukutsādasasyuś ca sambhūto narmadābhavaḥ / sambhūtasya sudhanvābhūttridhanvātha sudhanvanaḥ

हिन्दी अर्थ

ग्रहणी, अर्श, पाण्डु, गुल्म और कृमिरोगोंका नाश होता है। त्रिफला, गिलोय, अडूसा, कुटकी, चिरायता-इनका क्वाथ शहदके साथ पीनेसे कामलासहित पाण्डुरोगका नाश होता है। अडूसेके रसको मिश्री और शहद मिलाकर पीनेसे या शतावरी, दाख, खरेटी और सोंठ-इनसे सिद्ध किया हुआ दूध पीनेसे रक्त-पित्तरोगका नाश होता है। क्षयरोगके रोगीको शतावरी, विदारीकंद,

English

from Purukutsa Trasadasyu, born of Narmada; of Sambhuta Sudhanva; then Tridhanva from Sudhanva;

अध्याय 271

श्लोक 26

त्रिधन्वनस्तु तरुणस्तस्य सत्यव्रतः सुतः ।सत्यव्रतात्सत्यरथो हरिश् चन्द्रश् च तत्सुतः

tridhanvanastu taruṇastasya satyavrataḥ sutaḥ / satyavratātsatyaratho hariś candraś ca tatsutaḥ

हिन्दी अर्थ

गोखरूके चूर्णको शहद और घीके साथ चाटना चाहिए

English

of Tridhanva Taruna; his son Satyavrata; from Satyavrata Satyaratha, and Harishchandra his son;

अध्याय 271

श्लोक 27

हरिश् चन्द्राद्रोहिताश्वो रोहिताश्वाद्वृको ऽभवत् ।वृकाद्वाहुश् च वाहोश् च सगरस्तस्य च प्रिया

hariś candrādrohitāśvo rohitāśvādvṛko 'bhavat / vṛkādvāhuś ca vāhoś ca sagarastasya ca priyā

हिन्दी अर्थ

हरै, सहजन, करञ्ज आक, दालचीनी, पुनर्नवा, सोंठ और सैन्धव-इनका गोमूत्रके साथ योग करके लेप किया जाय तो यह विद्रधिकी गाँठको पकानेके लिये उत्तम उपाय है। निशोथ, जीवन्ती, दन्तीमूल, मञ्जिष्ठा, दोनों हल्दी, रसाञ्जन और नीमके पत्तेका लेप भगन्दरमें श्रेष्ठ है । अमलतास, हरिद्रा, लाक्षा और अडूसा- इनके चूर्णको गोघृत और शहदके साथ बत्ती

English

from Harishchandra Rohitashva; from Rohitashva Vrika; from Vrika Bahu; and of Bahu Sagara, with his beloved,

अध्याय 271

श्लोक 28

प्रभा षष्टिसहस्राणां सुतानां जननी ह्य् अभूत् ।तुष्टादौर्वान्नृपादेकं भानुमत्यसमञ्जसम्

prabhā ṣaṣṭisahasrāṇāṃ sutānāṃ jananī hy abhūt / tuṣṭādaurvānnṛpādekaṃ bhānumatyasamañjasam

हिन्दी अर्थ

बनाकर नासूरमें देवे। इससे नासूरका शोधन होकर घाव भर जाता है। पिप्पली, मुलहठी, हल्दी, लोध, पद्मकाष्ठ, कमल, लालचन्दन एवं मिर्च-इनके साथ गोदुग्धमें सिद्ध किया हुआ

English

Prabha, who became the mother of sixty thousand sons. By the pleased sage Aurva one son Asamanjasa of Bhanumati;

अध्याय 271

श्लोक 29

खनन्तः पृथिवीं दग्धा विष्णुना(१) बहुसागराः ।असमञ्जसो ऽंश्रुमांश् च दिलीपो ऽंशुमतो ऽभवत्

khanantaḥ pṛthivīṃ dagdhā viṣṇunā(1) bahusāgarāḥ / asamañjaso 'ṃśrumāṃś ca dilīpo 'ṃśumato 'bhavat

हिन्दी अर्थ

तैल घावको भरता है। श्रीताड़, कपासकी पत्तियाँकी भस्म, त्रिफला, गोलमिर्च, खरेटी और हल्दी--इनका गोला बनाकर घावका स्वेदन करे और इन ओषधियोंके तेलको घावपर लगाये। दूधके साथ कुम्भीसार (गुग्गुलसार)-को आगपर जलाकर व्रणपर लेप करे। (अथवा गुग्गुलसारको दूधमें मिलाकर आगसे जले हुए व्रणपर लेप करे।) अथवा जलकुम्भीको जलाकर दूधमें

English

the diggers of the earth were burned by Vishnu, with many oceans. Asamanjasa, Amshuman, and Dilipa of Amshuman;

अध्याय 271

श्लोक 30

भगीरथो दिलीपात्तु येन गङ्गावतारिता ।१ मुनिनेति ज॥ :प् १० भगीरथात्तु नाभागो नाभागादम्बरीषकः

bhagīratho dilīpāttu yena gaṅgāvatāritā / 1 munineti ja.. :p 10 bhagīrathāttu nābhāgo nābhāgādambarīṣakaḥ

हिन्दी अर्थ

मिलाकर लगानेसे सभी प्रकारके व्रण ठीक होते हैं। इसी प्रकार नारियलके जड़को मिट्टीमें घृत मिलाकर सेक करनेसे व्रणका नाश होता है॥ २२--२७॥

English

Bhagiratha from Dilipa, by whom the Ganga was brought down; from Bhagiratha Nabhaga; from Nabhaga Ambarisha;

अध्याय 271

श्लोक 31

सिन्धुद्वीपो ऽम्बरीषात्तु श्रुतायुस्तत्सुतः स्मृतः ।श्रुतायोरृतपर्णो ऽभूत्तस्य कल्माषपादकः

sindhudvīpo 'mbarīṣāttu śrutāyustatsutaḥ smṛtaḥ / śrutāyorṛtaparṇo 'bhūttasya kalmāṣapādakaḥ

हिन्दी अर्थ

सोंठ, अजमोद, सेंधानमक, इमलीको छाल -- इन सबके समान भाग हरैंको तक्र या गरम जलके साथ पीनेसे अतिसारका नाश होता है। इन्द्रयव, अतीस, सोंठ, बेलगिरि और नागरमोथाका क्वाथ आमसहित जीर्ण अतिसारमें और शूलसहित रक्तातिसारमें भी पिलाना चाहिए। ठंडे थूहरमें सेंधानमक भरकर आगमें जला ले। फिर यथोचित मात्रामें उदरशूलवालेको गरम जलके साथ दे।

English

Sindhudvipa from Ambarisha; his son is remembered Shrutayu; from Shrutayu Ritaparna; his Kalmashapada;

अध्याय 271

श्लोक 32

कल्माषाङ्घ्रेः सर्वकर्मा(१) ह्य् अनरण्यस्ततो ऽभवत् ।अनरण्यात्तु निघ्नो ऽथ अनमित्रस्ततो रघुः

kalmāṣāṅghreḥ sarvakarmā(1) hy anaraṇyastato 'bhavat / anaraṇyāttu nighno 'tha anamitrastato raghuḥ

हिन्दी अर्थ

अथवा सेंधानमक, हींग, पीपल, हरैं-इनका गरम जलके साथ सेवन करावे

English

from Kalmashapada Sarvakarma; then Anaranya; from Anaranya Nighna, then Anamitra, then Raghu;

अध्याय 271

श्लोक 33

रघोरभुद्दिलीपस्तु दिलीपाच्चाप्यजो नृपः ।दीर्घवाहुरजात् कालस्त्वजापालस्ततो ऽभवत्

raghorabhuddilīpastu dilīpāccāpyajo nṛpaḥ / dīrghavāhurajāt kālastvajāpālastato 'bhavat

हिन्दी अर्थ

वरकी वरोह, कमल और धानकी खीलका चूर्ण-इनको शहदमें भिगोकर, कपड़ेमें पोटली बनाकर, मुखमें रखकर उसे चूसे तो इससे प्यास दूर होती है। अथवा कुटको, पीपल, मीठा कूट एवं धानका लावा मधुके साथ मिलाकर, पोटलीमें रखकर मुँहमें रखे और चूसे तो प्यास दूर हो जाती है। पाठा, दारुहल्दी,

English

of Raghu Dilipa, and from Dilipa king Aja; Dirghabahu from Aja; Kala; then Ajapala;

अध्याय 271

श्लोक 34

तथ दशरथो जातस्तस्य पुत्रचतुष्टयम् ।नारायणात्मकाः सर्वे रामस्तस्याग्रजो ऽभवत्

tatha daśaratho jātastasya putracatuṣṭayam / nārāyaṇātmakāḥ sarve rāmastasyāgrajo 'bhavat

हिन्दी अर्थ

चमेलीके पत्र, मुनक्काकी जड़ और त्रिफला इनका क्वाथ बनाकर उसमें शहद मिला दे। इसको मुखमें धारण करनेसे मुखपाक-रोग नष्ट होता है। पीपल, अतीस, कुटकी, इन्द्रयव,

English

then Dasharatha was born, with four sons, all of Narayana's nature; Rama was his eldest.

अध्याय 271

श्लोक 35

रावणान्तकरो राजा ह्य् अयोध्यायां रघूत्तमः ।वाल्मीकिर्यस्य चरितं चक्रे तन्नारदश्रवात्

rāvaṇāntakaro rājā hy ayodhyāyāṃ raghūttamaḥ / vālmīkiryasya caritaṃ cakre tannāradaśravāt

हिन्दी अर्थ

देवदारु, पाठा और नागरमोथा-इनका गोमूत्रमें बना क्काथ मधुके साथ लेनेपर सब प्रकारके कण्ठरोगोंका नाश होता है। हरै, गोखरू, जवासा, अमलतास एवं पाषाण-भेद-इनके क्काथमें शहद मिलाकर पीनेसे मूत्रकृच्छ्का कष्ट दूर होता है। बाँसका छिलका और वरुणकी छालका क्वाथ शर्करा और अश्मरी-रोगका विनाश करता है। श्लीपद-रोगसे युक्त मनुष्य शाखोटक

English

The king, best of Raghus, killer of Ravana in Ayodhya, whose deeds Valmiki composed having heard from Narada.

अध्याय 271

श्लोक 36

रामपुत्रौ कुशलवौ सीतायां कुलवर्धनौ ।अतिथिश् च कुशाज्जज्ञे निषधस्तस्य चात्मजः

rāmaputrau kuśalavau sītāyāṃ kulavardhanau / atithiś ca kuśājjajñe niṣadhastasya cātmajaḥ

हिन्दी अर्थ

(सिंहोर)-की छालका क्वाथ मधु और दुग्धके साथ पान करे। उड़द, मदारको पत्ती तथा दूध, तैल, मोम एवं सैंधव लवण--इनका योग पादरोगनाशक है। सोंठ, काला नमक

English

Rama's sons, Kusha and Lava, born of Sita, increasers of the line; Atithi was born of Kusha; Nishadha his son.

अध्याय 271

श्लोक 37

निषधात्तु नलो जज्ञे नभो ऽजायत वै नलात् ।नभसः पुण्डरीको ऽभूत् सुधन्वा च ततो ऽभवत्

niṣadhāttu nalo jajñe nabho 'jāyata vai nalāt / nabhasaḥ puṇḍarīko 'bhūt sudhanvā ca tato 'bhavat

हिन्दी अर्थ

और हींग-इनका चूर्ण या सोंठके रसके साथ सिद्ध किया घी अथवा इनका क्राथ पीनेसे मलबन्ध-दोष और तत्सम्बन्धी रोग नष्ट होते हैं। गुल्मरोगी सर्जक्षार, चित्रक, हींग और अजमोद-इनके रसके साथ या विडंग एवं चित्रकके साथ तक्रपान करे। आँवला, परवल और मूँग-इनके क्काथका घृतके साथ सेवन विसर्परोगका अपहरण करनेवाला है। अथवा

English

From Nishadha Nala was born; from Nala Nabha was born; from Nabha Pundarika; then Sudhanva;

अध्याय 271

श्लोक 38

सुधन्वनो देवानीको ह्य् अहीनाश्वश् च तत्सुतः ।अहीनाश्वात् सहस्राश्वश् चन्द्रालोकस्ततो ऽभवत्

sudhanvano devānīko hy ahīnāśvaś ca tatsutaḥ / ahīnāśvāt sahasrāśvaś candrālokastato 'bhavat

हिन्दी अर्थ

सोंठ, देवदारु और पुनर्नवा या बंशलोचन- इनका दुग्धयुक्त क्राथ उपकारक है। गोमूत्रके

English

from Sudhanva Devanika, and Ahinashva his son; from Ahinashva Sahasrashva; then Chandraloka;

अध्याय 271

श्लोक 39

चन्द्रावलोकतस्तारापीडो ऽस्माच्चन्द्रपर्वतः ।चन्द्रगिरेर्भानुरथः श्रुतायुस्तस्य चात्मजः ।इक्ष्वाकुवंशप्रभवाः सूर्यवंशधराः स्मृताः

candrāvalokatastārāpīḍo 'smāccandraparvataḥ / candragirerbhānurathaḥ śrutāyustasya cātmajaḥ / ikṣvākuvaṃśaprabhavāḥ sūryavaṃśadharāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

तथा त्रिफलाका क्वाथ शोथ (सूजन)-को शान्त करता है। गुड़, सहिजन एवं निशोथ, सैंधव दो सौ तिरासीवें अध्यायके २७ वें श्लोकमें दो प्रकारके पाठ सम्भव तथा युक्तियुक्त हैं -(१) कुम्भीसारं पयोयुक्तं वहिदग्धत्रणे

English

from Chandravaloka Tarapida; from him Chandraparvata; from Chandragiri Bhanuratha; Shrutayu his son. Those born of the Ikshvaku line are remembered as bearers of the Solar dynasty.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।