Agni Purana
261
अध्याय 261 / 381

Adhyaya 262

33 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ33 श्लोक

अध्याय 261

श्लोक 1

उत्पातशान्तिः पुष्कर उवाच श्रीसूक्तं प्रतिवेदञ्च ज्ञेयं लक्ष्मीविवर्धनं ।हिरण्यवर्णा हरिणीमृचः पञ्चदश श्रियः

utpātaśāntiḥ puṣkara uvāca śrīsūktaṃ prativedañca jñeyaṃ lakṣmīvivardhanaṃ / hiraṇyavarṇā hariṇīmṛcaḥ pañcadaśa śriyaḥ

हिन्दी अर्थ

अथर्ववेदमें सुमन्तु, जाजलि, श्लोकायनि, शौनक, पिप्पलाद और मुञ्जकेश आदि शाखाप्रवर्तक ऋषि हैं। इसमें सोलह हजार मन्त्र और सौ उपनिषद् हैं। व्यासरूपमें अवतीर्ण होकर भगवान् श्रीविष्णुने ही वेदोंकी शाखाओंका विभाग आदि किया है। वेदोंके शाखाभेद आदि इतिहास और पुराण सब विष्णुस्वरूप हैं । भगवान् व्याससे लोमहर्षण सूतने पुराण आदिका उपदेश पाकर उनका प्रवचन किया।

English

I have described the use of ( the hymns of) Tajur (oeda). I shall (now) describe the use of (the hymns of) Sdma {veda). One will get all the pleasures by repeating the oaifioi hymns.

अध्याय 261

श्लोक 2

रथेष्वक्षेषु वाजेति चतस्रो यजुषि श्रियः ।स्रावन्तीयं तथा साम श्रीसूक्तं सामवेदके

ratheṣvakṣeṣu vājeti catasro yajuṣi śriyaḥ / srāvantīyaṃ tathā sāma śrīsūktaṃ sāmavedake

हिन्दी अर्थ

उनके सुमति, आग्निवर्चा, मित्रयु, शिंशपायन, कृतव्रत और सावर्णि-ये छः शिष्य हुए। शिंशपायन आदिने पुराणोंकी संहिताका निर्माण किया। भगवान् श्रीहरि ही 'ब्राह्म' आदि अठारह पुराणों एवं

English

Tait. Sam. 2.3.14.3a.

अध्याय 261

श्लोक 3

श्रियं धातर्मयि धेहि प्राक्तमाथर्वणे तथा ।श्रीसूक्तं यो जपेद्भक्त्या हुत्वा श्रीस्तस्य वै भवेत्

śriyaṃ dhātarmayi dhehi prāktamātharvaṇe tathā / śrīsūktaṃ yo japedbhaktyā hutvā śrīstasya vai bhavet

हिन्दी अर्थ

अष्टादश विद्याओंके रूपमें स्थित हैं। वे सप्रपञ्च- निष्प्रपञ्च तथा मूर्त-अमूर्त स्वरूप धारण करनेवाले विद्यारूपी श्रीविष्णु ' आग्नेय महापुराण 'में स्थित हैं। उनको जानकर उनकी अर्चना एवं स्तुति करके मानव भोग और मोक्ष-दोनोंको प्राप्त कर लेता है। भगवान् विष्णु विजयशील, प्रभावसम्पन्न तथा अग्नि-सूर्य आदिके रूपमें स्थित

English

Tait. Sam. 5.6.1.1a.

अध्याय 261

श्लोक 4

पद्मानि चाथ विल्वानि हुत्वाज्यं वा तिलान् श्रियः ।एकन्तु पौरुषं सूक्तं प्रतिवेदन्तु सर्वदं

padmāni cātha vilvāni hutvājyaṃ vā tilān śriyaḥ / ekantu pauruṣaṃ sūktaṃ prativedantu sarvadaṃ

हिन्दी अर्थ

हैं। वे भगवान् विष्णु ही अग्निरूपसे देवता आदिके मुख हैं। वे ही सबकी परमगति हैं। वे वेदों तथा पुराणोंमें “यज्ञमूर्ति'के नामसे गाये जाते हैं। यह ' अग्निपुराण’ श्रीविष्णुका ही विराट्रूप है। इस

English

RV. 10.9.4a.

अध्याय 261

श्लोक 5

सूक्तेन द्दद्यान्निष्पापो ह्य् एकैकया(१) जलाञ्जलिं ।स्नात एकैकया पुष्पं विष्णोर्दत्वाघहा भवेत्

sūktena ddadyānniṣpāpo hy ekaikayā(1) jalāñjaliṃ / snāta ekaikayā puṣpaṃ viṣṇordatvāghahā bhavet

हिन्दी अर्थ

अग्नि-आग्नेय पुराणके निर्माता और श्रोता श्रीजनार्दन ही हैं। इसलिये यह महापुराण सर्ववेदमय, सर्वविद्यामय तथा सर्वज्ञानमय है। यह उत्तम एवं पवित्र पुराण पठन और श्रवण करनेवाले मनुष्योंके लिये सर्वात्मा श्रीहरिस्वरूप है। यह ' आग्नेय- महापुराण' विद्यार्थियोंके लिये विद्याप्रद, अर्थार्थियोंके

English

Cf. TA. 1.11.7c.

अध्याय 261

श्लोक 6

स्नात एकैकया दत्वा फलं स्यात् सर्वकामभाक् ।महापापोपपान्तो भवेज्जप्त्वा तु पौरुषं

snāta ekaikayā datvā phalaṃ syāt sarvakāmabhāk / mahāpāpopapānto bhavejjaptvā tu pauruṣaṃ

हिन्दी अर्थ

राज्यार्थियोंके लिये राज्यदाता, धर्मार्थियोंके लिये धर्मदाता, स्वर्गार्थियोंके लिये स्वर्गप्रद और पत्रार्थियोंके लिये पुत्रदायक है। गोधन चाहनेवालेको गोधन और ग्रामाभिलाषियोंको ग्राम देनेवाला है।

English

RV. 6.28.5a.

अध्याय 261

श्लोक 7

कृच्छ्रैर् विशुद्धो जप्त्वा च हुत्वा स्नात्वाथ सर्वभाक् ।अष्टादशभ्यः शान्तिभ्यस्तिस्रो ऽन्याः शान्तयो वराः

kṛcchrair viśuddho japtvā ca hutvā snātvātha sarvabhāk / aṣṭādaśabhyaḥ śāntibhyastisro 'nyāḥ śāntayo varāḥ

हिन्दी अर्थ

यह कामार्थी मनुष्योंको काम, सम्पूर्ण सौभाग्य, गुण तथा कीर्ति प्रदान करनेवाला है । विजयाभिलाषी पुरुषोंको विजय देता है, सब कुछ चाहनेवालोंको सब कुछ देता है, मोक्षकामियोंको मोक्ष देता है और पापियोंके पापोंका नाश कर देता है

English

Gould not be traced.

अध्याय 261

श्लोक 8

अमृता चाभयवा सौम्या सर्वोत्पातविमर्दनाः ।अमृता सर्वदवत्या अभया ब्रह्मदैवता

amṛtā cābhayavā saumyā sarvotpātavimardanāḥ / amṛtā sarvadavatyā abhayā brahmadaivatā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणे 'वेदोकी शाखा आदिका वर्णन” नामक दो सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

MS. 4.13.7a: 208.10.

अध्याय 261

श्लोक 9

सौम्या च सर्वदैवत्या एका स्यात्सर्वकामदा ।१ ह्य् एकैकश इति क॥ , घ॥ , छ॥ , ञ॥ च :प् ४६१ अभयाया मणिः कार्यो वरुणस्य भृगूत्तम

saumyā ca sarvadaivatyā ekā syātsarvakāmadā / 1 hy ekaikaśa iti ka.. , gha.. , cha.. , ña.. ca :p 461 abhayāyā maṇiḥ kāryo varuṇasya bhṛgūttama

हिन्दी अर्थ

विभिन्न पुराणोंके दान तथा महाभारत-श्रवणमें दान-पूजन आदिका माहात्म्य पुष्कर कहते हैँ- परशुराम! पूर्वकालमें उस 'ब्रह्मपुराण'को लिखकर ब्राह्मणको दान दे। लोकपितामह ब्रह्माने मरीचिके सम्मुख जिसका स्वर्गाभिलाघी वैशाखकी पूर्णिमाको जलधेनुके साथ वर्णन किया था, पचीस हजार श्लोकोंसे समन्वित 'ब्रह्मपुराण'का दान करे। 'पद्मपुराण'में जो

English

Tait. Sam. 1.3.6.2a. *

अध्याय 261

श्लोक 10

शतकाण्डो ऽमृतायाश् च सौम्यायाः शङ्कजो मणिः ।तद्दैवत्यास् तथा मन्त्राः सिद्धौ(१) स्यान्मणिबन्धनं

śatakāṇḍo 'mṛtāyāś ca saumyāyāḥ śaṅkajo maṇiḥ / taddaivatyās tathā mantrāḥ siddhau(1) syānmaṇibandhanaṃ

हिन्दी अर्थ

पद्मसंहिता ( भूमिखण्ड) है, उसमें बारह हजार श्लोक हैं। ज्येष्ठमासकी पूर्णिमाको गौके साथ इसका दान करना चाहिए। महर्षि पराशरने वाराह- कल्पके वृत्तान्तको अभिगत करके तेईस हजार

English

One pleases (Lord) laAkara (Siva) by repeatii the chdndasi (Sman) hymns well. One will get the grace by repeat¬ ing the skdndi and paitri hymns. '

अध्याय 261

श्लोक 11

दिव्यान्तरीक्षभौमादिसमुत्पातार्दना इमाः ।दिव्यान्तरीक्षभौमन्तु अद्भुतं त्रिविधं शृणु

divyāntarīkṣabhaumādisamutpātārdanā imāḥ / divyāntarīkṣabhaumantu adbhutaṃ trividhaṃ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

श्लोकोंका ' विष्णुपुराण' कहा है। इसे आषाढ़की पूर्णिमाको जलधेनुसहित प्रदान करे । इससे मनुष्य भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त होता है। चौदह हजार श्लोकोंवाला ' वायुपुराण' भगवान् शंकरको अत्यन्त प्रिय है। इसमें वायुदेवने श्वेतकल्पके प्रसङ्गसे धर्मका वर्णन किया है। इस पुराणको लिखकर श्रावणकी पूर्णिमाको गुड़धेनुके साथ ब्राह्मणको दान करे। गायत्री-मन्त्रका आश्रय लेकर

English

(The repetition of the hymn) yata indra bhay&mahe is capable of destroying the harmful effects (of incantations). One who has broken the vow of continence will be released (from the fault) by repeating ( the hymn) agnistigmena-.

अध्याय 261

श्लोक 12

ग्रहर्क्षवैकृतं दिव्यमान्तरीक्षन्निबोध मे ।उल्कापातश् च दिग्दाहः परिवेशस्तथैव च

graharkṣavaikṛtaṃ divyamāntarīkṣannibodha me / ulkāpātaś ca digdāhaḥ pariveśastathaiva ca

हिन्दी अर्थ

निर्मित हुए जिस पुराणमें भागवत-धर्मका विस्तृत वर्णन है, सारस्वतकल्पका प्रसङ्ग कहा गया है तथा जो वृत्रासुर-वधकी कथासे युक्त है--उस पुराणको ' भागवत' कहते हैं। इसमें अठारह हजार

English

(The repetition of the hymn) paritofarh ca ' is known to be capable of destroying all sins. One who has sold (a thing) that should not be sold, should repeat (the hymn) ghrtavati*.

अध्याय 261

श्लोक 13

गन्धर्वनगरञ्चैव वृष्टिश् च विकृता च या ।चरस्थिरभवं भूमौ भूकम्पमपि भूमिजं

gandharvanagarañcaiva vṛṣṭiś ca vikṛtā ca yā / carasthirabhavaṃ bhūmau bhūkampamapi bhūmijaṃ

हिन्दी अर्थ

श्लोक हैं। इसको सोनेके सिंहासनके साथ भाद्रपदकी पूर्णिमाको दान करे। जिसमें देवर्षि नारदने बृहत्कल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर धर्मोकी व्याख्या की है, वह 'नारदपुराण' है । उसमें पचीस हजार श्लोक हैं। आश्विनमासकी पूर्णिमाको धेनुसहित उसका दान करे। इससे आत्यन्तिक सिद्धि प्राप्त होती है। जिसमें पक्षियोंके द्वारा धर्माधर्मका विचार किया गया है, नौ हजार

English

Then it should be tied on the wrist of the child that is born, with (the repetition of the hymn) somarh rdjdnarh. This will make the child free from all diseases.

अध्याय 261

श्लोक 14

सप्ताहाभ्यनतरे वृष्टावद्भुतं भयकृद्भवेत् ।शान्तिं विना त्रिभिर्वषैर् अद्भुतं भयकृद्भवेत्

saptāhābhyanatare vṛṣṭāvadbhutaṃ bhayakṛdbhavet / śāntiṃ vinā tribhirvaṣair adbhutaṃ bhayakṛdbhavet

हिन्दी अर्थ

श्लोकोंवाले उस 'मार्कण्डेयपुराण'का कार्तिककी पूर्णिमाको दान करे। अग्रिदेवने वसिष्ठ मुनिको जिसका श्रवण कराया है, वह “अग्निपुराण' है। इस ग्रन्थको लिखकर मार्गशीर्षकी पूर्णिमा तिथिमें

English

One who repeats (the hymn) samamadhydyanti will not die of thirst. One will not get a disease by repeating (the hymn) toamimd ofodhib*.

अध्याय 261

श्लोक 15

देवतार्चाः(२) प्रनृत्यन्ति वेपन्ते प्रज्वलन्ति च ।आरठन्ति(३) च रोदन्ति प्रस्विद्यन्ते हसन्ति च

devatārcāḥ(2) pranṛtyanti vepante prajvalanti ca / āraṭhanti(3) ca rodanti prasvidyante hasanti ca

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणके हाथमें दे। इस पुराणका दान सब कुछ देनेवाला है। इसमें बारह हजार ही श्लोक हैं और यह पुराण सम्पूर्ण विद्याओंका बोध करानेवाला है। ' भविष्यपुराण' सूर्य-सम्भव है। इसमें सूर्यदेवकी महिमा बतायी गयी है। इसमें चौदह हजार श्लोक हैं। इसे भगवान् शंकरने मनुसे कहा है। गुड़ आदि वस्तुओंके साथ पौषकी पूर्णिमाको इसका दान करना चाहिए। सावर्ण्य-मनुने नारदसे

English

SV. 1.274a; 2.671a.

अध्याय 261

श्लोक 16

अर्चाविकारोपशमो ऽभ्यर्च्य हुत्वा प्रजापतेः ।अनग्निर्दीप्यते यत्र राष्ट्रे च भृशनिस्वनं

arcāvikāropaśamo 'bhyarcya hutvā prajāpateḥ / anagnirdīpyate yatra rāṣṭre ca bhṛśanisvanaṃ

हिन्दी अर्थ

'ब्रह्मवैवर्तपुराण' का वर्णन किया है। इसमें रथन्तर- कल्पका वृत्तान्त है और अठारह हजार श्लोक हैं। माघमासको पूर्णिमाको इसका दान करे। वराहके चरित्रसे युक्त जो 'वाराहपुराण' है, उसका भी

English

Tail. Sam. 4.6.1.5a; SV. 1.512a. Of. partto fifUatd SV. 1.512a.

अध्याय 261

श्लोक 17

न दीप्यते चेन्धनवांस्तद्राष्ट्रं पाड्यते नृपैः ।अग्निवैकृत्यशमनमग्निमन्त्रैश् च भार्गव

na dīpyate cendhanavāṃstadrāṣṭraṃ pāḍyate nṛpaiḥ / agnivaikṛtyaśamanamagnimantraiś ca bhārgava

हिन्दी अर्थ

माघ मासको पूर्णिमाको दान करे। ऐसा करनेसे दाता ब्रह्मलोकका भागी होता है। जहाँ अग्निमय लिङ्गमें स्थित भगवान् महेश्वरने आग्नेयकल्पके वृत्तान्तोंसे युक्त धर्मोका विवेचन किया है, वह ग्यारह हजार शलोकोंवाला 'लिङ्गपुराण' है। फाल्गुनको पूर्णिमाको तिलधेनुके साथ उसका दान करके मनुष्य शिवलोकको प्राप्त होता है। “वाराहपुराण'में भगवान् श्रीविष्णुने भूदेवीके प्रति

English

SV. 1.378a.

अध्याय 261

श्लोक 18

अकाले फलिता वृक्षाः क्षीरं रक्तं स्रवन्ति च ।वृक्षोत्पातप्रशमनं शिवं पूज्य च कारयेत्

akāle phalitā vṛkṣāḥ kṣīraṃ raktaṃ sravanti ca / vṛkṣotpātapraśamanaṃ śivaṃ pūjya ca kārayet

हिन्दी अर्थ

मानव-जगतूको प्रवृत्तिसे लेकर वराह-चरित्र आदि उपाख्यानोंका वर्णन किया है। इसमें चौबीस हजार श्लोक हैं। चैत्रकी पूर्णिमाको 'गरुडपुराण'का सुवर्णके साथ दान करके मनुष्य विष्णुपदको प्राप्त होता

English

SV. 1.141a. SV. 1.73a; 2.1096a.

अध्याय 261

श्लोक 19

अतिवृष्टिरनावृष्टिर्दुर्भिक्षायोभयं मतं ।२ देवताश्चेति ख॥ , छ॥ च ३ आवटन्तीति ख॥ , घ॥ , छ॥ , ञ॥ च :प् ४६२ अनृतौ त्रिदिनारब्धवृष्टिर्ज्ञेया भयाय हि

ativṛṣṭiranāvṛṣṭirdurbhikṣāyobhayaṃ mataṃ / 2 devatāśceti kha.. , cha.. ca 3 āvaṭantīti kha.. , gha.. , cha.. , ña.. ca :p 462 anṛtau tridinārabdhavṛṣṭirjñeyā bhayāya hi

हिन्दी अर्थ

है। 'स्कन्दमहापुराण' चौरासी हजार श्लोकोंका है। कुमार स्कन्दने तत्पुरुष-कल्पकी कथा एवं शैवमतका आश्रय लेकर इस महापुराणका प्रवचन किया है। इसका भी चैत्रको पूर्णिमाको दान करना चाहिए। दस हजार श्लोकोंसे युक्त “वामनपुराण' धर्मार्थ आदि पुरुषार्थांका अवबोधक है। इसमें श्रीहरिको धौमकल्पसे सम्बन्धित कथाका वर्णन है। शरद् पूर्णिमामें विषुव-संक्रान्तके समय

English

Cr. Ve die Concordance b.

अध्याय 261

श्लोक 20

वृष्टिवैकृत्यनाशः स्यात्पर्जण्येन्द्वर्कपूजनात् ।नगरादपसर्पन्ते समीपमुपयान्ति च

vṛṣṭivaikṛtyanāśaḥ syātparjaṇyendvarkapūjanāt / nagarādapasarpante samīpamupayānti ca

हिन्दी अर्थ

इसका दान करे। ' कूर्मपुराण'में आठ हजार श्लोक हैं। कूर्मावतार श्रीहरिने इन्द्रद्युम्नके प्रसड़से रसातलमें इसको कहा था। इसका सुवर्णमय कच्छपके साथ दान करना चाहिए। मत्स्यरूपी श्रीविष्णुने कल्पके

English

Could not be traced. Could not be traced.

अध्याय 261

श्लोक 21

नद्यो ह्रदप्रश्रवणा विरसाश् च भवन्ति च ।शलिलाशयवैकृत्ये जप्तव्यो वारुणो मनुः

nadyo hradapraśravaṇā virasāś ca bhavanti ca / śalilāśayavaikṛtye japtavyo vāruṇo manuḥ

हिन्दी अर्थ

आदिकालमें मनुको तेरह हजार श्लोकोंसे युक्त “मत्स्यपुराण'का श्रवण कराया था। इसे हेमनिर्मित मत्स्यके साथ प्रदान करे। आठ हजार श्लोकोंवाले “गरुडपुराण' का भगवान् श्रीविष्णुने ताक्ष्यकल्पमें प्रवचन किया था। इसमें विश्वाण्डसे गरुड़की उत्पत्तिकी कथा कही गयी है। इसका स्वर्णहंसके साथ दान करे। भगवान् ब्रह्माने ब्रह्माण्डके माहात्म्यका आश्रय लेकर जिसे कहा है, बारह

English

Gould not be traced.

अध्याय 261

श्लोक 22

अकालप्रसवा नार्यः कालतो वाप्रजास् तथा ।विकृतप्रसवाश् चैव युग्मप्रसवनादिकं

akālaprasavā nāryaḥ kālato vāprajās tathā / vikṛtaprasavāś caiva yugmaprasavanādikaṃ

हिन्दी अर्थ

हजार श्लोकोंवाले उस 'ब्रह्माण्डपुराण'को भी लिखकर ब्राह्मणके हाथमें दान करे॥ १-२२ ३॥

English

RV. 1.91.22a. O Rama! Collyrium applied to the eyes (with the hymn) bhago na citra* will increase fortune. There need be no doubt.

अध्याय 261

श्लोक 23

स्त्रीणां प्रसववैकृत्ये स्त्रीविप्रादिं प्रपूजयेत् ।वडवा हस्तिनी गौर्वा यदि युग्मं प्रसूयते

strīṇāṃ prasavavaikṛtye strīviprādiṃ prapūjayet / vaḍavā hastinī gaurvā yadi yugmaṃ prasūyate

हिन्दी अर्थ

महाभारत-श्रबणकालमें प्रत्येक पर्वको समाप्तिपर पहले कथावाचकका वस्त्र, गन्ध, माल्य आदिसे पूजन करे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको खीरका भोजन करावे। प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर गौ, भूमि, ग्राम तथा सुवर्ण आदिका दान करे।

English

A child should be fed with the powder of vacd soaked in ghee daily with the repetition of (the hymn) indramidgdlhino. It will give him good memory.

अध्याय 261

श्लोक 24

विजात्यं विकृतं वापि षड्भिर्मासैर् म्रियेत वै ।विकृतं वा प्रसूयन्ते परचक्रभयं भवेत्

vijātyaṃ vikṛtaṃ vāpi ṣaḍbhirmāsair mriyeta vai / vikṛtaṃ vā prasūyante paracakrabhayaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

महाभारतके पूर्ण होनेपर कथावाचक ब्राह्मण और महाभारत-संहिताकी पुस्तकका पूजन करे। ग्रन्थको पवित्र स्थानपर रेशमी वस्त्रसे आच्छादित करके पूजन करना चाहिए। फिर भगवान् नर-नारायणकी

English

The repetition of the eight vairUpya (hymns) daily confers fortune. One will get all the desires fulfilled by repeating the saptdffaka (hymns). One who worships cows daily morning and evening (with the repetition of the hymn) gavyofuijo unweariedly will always have cows in his house.

अध्याय 261

श्लोक 25

होमः प्रसूतिवैकृत्ये जपो विप्रादिपूजनं ।यानि यानान्ययुक्तानि युक्तानि न वहन्ति च

homaḥ prasūtivaikṛtye japo viprādipūjanaṃ / yāni yānānyayuktāni yuktāni na vahanti ca

हिन्दी अर्थ

पुष्प आदिसे पूजा करे। गौ, अन्न, भूमि, सुवर्णके दानपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराकर क्षमा-प्रार्थना करे। श्रोताको विविध रल्रॉंका महादान करना चाहिए। प्रत्येक मासमें कथावाचकको दो या तीन माशे सुवर्णका दान करे और अयनके प्रारम्भमें भी पहले उसके लिये सुवर्णके दानका विधान है। द्विजश्रेष्ठ! समस्त श्रोताओंको भी कथावाचकका पूजन करना चाहिए। जो मनुष्य इतिहास एवं

English

One who offers a droa (a measure) of barley soaked in

अध्याय 261

श्लोक 26

आकाशे तूर्यनादाश् च महद्भयमुपस्थितं ।प्रविशन्ति यदा ग्राममारण्या मृगपक्षिणः

ākāśe tūryanādāś ca mahadbhayamupasthitaṃ / praviśanti yadā grāmamāraṇyā mṛgapakṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

पुराणोंका पूजन करके दान करता है, वह आयु, आरोग्य, स्वर्ग और मोक्षको भी प्राप्त कर लेता है

English

Could not be traced. Could not be traced.

अध्याय 261

श्लोक 27

अरण्यं यान्ति वा ग्राम्याः जलं यान्ति स्थलोद्भवाः ।स्थलं वा जलजा यान्ति राजद्वारादिके शिवाः

araṇyaṃ yānti vā grāmyāḥ jalaṃ yānti sthalodbhavāḥ / sthalaṃ vā jalajā yānti rājadvārādike śivāḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें “पुराणदान आदिके माहात्म्यका कथन” नामक दो सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ सूर्यवंशका वर्णन

English

SV.1.449ab.

अध्याय 261

श्लोक 28

प्रदोषे कुक्कुटो वासे शिवा चार्कोदये भवेत् ।गृहङ्कपोतः प्रविशेत् क्रव्याहा मूर्ध्नि लीयते

pradoṣe kukkuṭo vāse śivā cārkodaye bhavet / gṛhaṅkapotaḥ praviśet kravyāhā mūrdhni līyate

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं-- वसिष्ठ! अब मैं तुमसे सूर्यवंश तथा राजाओंके वंशका वर्णन करता हूँ। भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजी प्रकट हुए हैं। ब्रह्माजीके पुत्रका नाम मरीचि है। मरीचिसे

English

Could not be traced. SV. 1.476a; 2.285a.

अध्याय 261

श्लोक 29

मधुरां मक्षिकां कुर्यात् काको मैथुनगो दृशि ।प्रासादतोरणोद्यानद्वारप्राकारवेश्मनां

madhurāṃ makṣikāṃ kuryāt kāko maithunago dṛśi / prāsādatoraṇodyānadvāraprākāraveśmanāṃ

हिन्दी अर्थ

कश्यप तथा कश्यपसे विवस्वान् (सूर्य )-का जन्म हुआ है। सूर्यकी तीन स्त्रियाँ हैं-संज्ञा, राज्ञी और प्रभा। इनमेंसे राज्ञी' रैवतकी पुत्री हैं। उन्होंने 'रेवन्त' नामवाले पुत्रको जन्म दिया है। सूर्यकी ' प्रभा' नामवाली पत्नीसे ' प्रभात' नामवाला पुत्र हुआ। “संज्ञा' विश्वकर्माकी पुत्री है। उनके

English

Tait. Sam. 1.8.13.1.

अध्याय 261

श्लोक 30

अनिमित्तन्तु पतनं दृढानां राजमृत्यवे ।रजसा वाथ धूमेन दिशो यत्र समाकुलाः

animittantu patanaṃ dṛḍhānāṃ rājamṛtyave / rajasā vātha dhūmena diśo yatra samākulāḥ

हिन्दी अर्थ

गर्भसे वैवस्वत मनु तथा जुड़वीं संतान यम और यमुनाकी उत्पत्ति हुई है। (संज्ञाको छायाको भी,

English

MS. 4.9.11:132.10. SV. 1.198a.

अध्याय 261

श्लोक 31

केतूदयोपरागौ च छिद्रता शशिसूर्ययोः ।ग्रहर्क्षविकृतिर्यत्र तत्रापि भयमादिशेत्

ketūdayoparāgau ca chidratā śaśisūryayoḥ / graharkṣavikṛtiryatra tatrāpi bhayamādiśet

हिन्दी अर्थ

इस अध्यायमें विभिन्न पुराणोंकी जो श्लोक-संख्याएँ दी गयी हैं, वे अन्य पुराणोंके वर्णनोंसे बहुत अंशमें मेल नहीं खाती हैं तथा उपलब्ध पुराणोंको देखनेसे भी इन वर्णनोंकी प्राय: संगति नहीं बैठती है। पद्मपुराणमें जहाँ छप्पन हजार श्लोक हैं, वहाँ इसमें बारह हजार ही श्लोक बताये गये हैं । सम्भव है, केवल पद्मसंहिता (भूमिखण्ड)-के ही इतने श्लोक कहे गये हों। विष्णुपुराणमें पाँच हजार श्लोक उपलब्ध होते हैं, किंतु इसमें तेईस हजार श्लोक कहे गये हैं। यदि विष्णुधर्मोत्तरपुराणके भी श्लोक इसके साथ सम्मिलित कर लिये जायँ तो उक्त संख्या संगत हो सकती है। वाराहपुराणके चौबीस हजार श्लोक बताये गये हैं, किंतु

English

See 14.1.

अध्याय 261

श्लोक 32

अग्निर्यत्र म दीप्येत स्रवन्ते चोदकम्भकाः ।मृतिर्भयं शून्यतादिरुत्पातानां फलम्भवेत्

agniryatra ma dīpyeta sravante codakambhakāḥ / mṛtirbhayaṃ śūnyatādirutpātānāṃ phalambhavet

हिन्दी अर्थ

वर्तमान पुस्तकोंमें उतने श्लोक नहीं मिलते। गरुडपुराणमें आठ हजार श्लोक बताये गये हैं, परंतु उपलब्ध गरुडपुराणमें इससे दूनेसे भी अधिक श्लोक मिलते हैं । यह भी सम्भव है कि भूलसे गरुडपुराणकी जगह वाराहपुराण और वाराहपुराणके स्थानमें गरुडपुराण लिख गया हो।

English

RV.Kh. 5.87.10d. Cf. Tait. Sam. 4.4.2.2.

अध्याय 261

श्लोक 33

द्विजदेवादिपूजाभ्यः शान्तिर्जप्यैस्तु होमतः

dvijadevādipūjābhyaḥ śāntirjapyaistu homataḥ //

हिन्दी अर्थ

जो स्त्रीरूपमें प्रतिष्ठित थी, 'छाया-संज्ञा' कहते हैं।) छाया-संज्ञाने सूर्यके अंशसे सावर्णि मनु तथा शनैश्वर नामक पुत्रको और तपती एवं विष्टि नामवाली कन्याओंको जन्म दिया। तदनन्तर (अश्वारूपधारिंणी) संज्ञासे दोनों अश्विनीकुमारोंको

English

SV. 1.186a.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।