Agni Purana
213
अध्याय 213 / 381

Adhyaya 213

10 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ10 श्लोक

अध्याय 213

श्लोक 1

पृथ्वीदानानि अग्निर् उवाच पृथ्वीदानं प्रवक्ष्यामि पृथिवी त्रिविधा मता ।शतकोटिर्योजनानां सप्तद्वीपा ससागरा

pṛthvīdānāni agnir uvāca pṛthvīdānaṃ pravakṣyāmi pṛthivī trividhā matā / śatakoṭiryojanānāṃ saptadvīpā sasāgarā

हिन्दी अर्थ

है, उसे “चन्द्रग्रहण' कहते हैं। वही जब देहसे ऊपरतक बढ़ जाता है, तब उसे 'सूर्यग्रहण' मानते हैं साधक अपने उदरमें जितनी वायु भरी जा सके, भर ले। यह देहको पूर्ण करनेवाला, “पूरक' प्राणायाम है। श्वास निकलनेके सभौ द्वारोंको रोककर, श्वासोच्छ्ठासको क्रियासे शून्य

English

If the Sun passes (from one sign to the other) in the karanas (divisions of a day) bdlava kaulava and taitila, then the

अध्याय 213

श्लोक 2

जम्बुद्वीपावधिः सा च उत्तमा मेदिनीरिता ।उत्तमां पञ्चभिर्भारैः काञ्चनैश् च प्रकल्पयेत्

jambudvīpāvadhiḥ sā ca uttamā medinīritā / uttamāṃ pañcabhirbhāraiḥ kāñcanaiś ca prakalpayet

हिन्दी अर्थ

हो परिपूर्ण कुम्भकी भाँति स्थित हो जाय-इसे 'कुम्भक' प्राणायाम कहा जाता है। तदनन्तर

English

People would suffer from poverty and harassment by

अध्याय 213

श्लोक 3

तदर्धान्तरजं कूर्मं तथा पद्मं समादिशेत् ।उत्तमा कथिता पृथ्वी द्व्यंशेनैव तु मध्यमा

tadardhāntarajaṃ kūrmaṃ tathā padmaṃ samādiśet / uttamā kathitā pṛthvī dvyaṃśenaiva tu madhyamā

हिन्दी अर्थ

वायुको निकाले। इस प्रकार उच्छ्ठासयोगसे युक्त हो वायुका ऊपरकी ओर विरेचन (निःसारण) करे (यह 'रेचक' प्राणायाम है) । यह श्वासोच्छासकी क्रियाद्वारा अपने शरीरमें विराजमान शिवस्वरूप ब्रह्मका ही ('सोऽहं' ' हंसः 'के रूपमे) उच्चारण होता है, अतः तत्त्ववेत्ताओंके मतमें वही जप' कहा गया है। इस प्रकार एक तत्त्ववेत्ता योगीन्द्र श्वास-प्रश्चासद्वारा दिन-रातमें इक्कीस हजार छः

English

If the Sun makes a transit in lying position in catu- pada, visti or vdnijya {karanas or divisions of the day), it would cause famine or war between sovereigns or quarrel among hus¬ bands and wives.

अध्याय 213

श्लोक 4

कन्यसा च त्रिभागेन(१) त्रिहान्या कूर्मपङ्कजे ।पलानान्तु सहस्रेण कल्पयेत् कल्पपादपं

kanyasā ca tribhāgena(1) trihānyā kūrmapaṅkaje / palānāntu sahasreṇa kalpayet kalpapādapaṃ

हिन्दी अर्थ

सौकी संख्यामें मन्त्र-जप करता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरसे सम्बन्ध रखनेवाली ' अजपा' नामक गायत्री है। जो इस अजपाका जप करता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। चन्द्रमा, अग्नि तथा

English

The lowest by a third part, in a tortoise-lotus; with a thousand palas one should make a wish-tree:

अध्याय 213

श्लोक 5

मूलदण्डं सपत्रञ्च फलपुष्पसमन्वितं ।१ स्वल्पा सा तु त्रिभागेनेति ङ॥ , ट॥ च :प् २७६ पञ्चस्कन्धन्तु सङ्कल्प्य पञ्चानान्दापयेत् सुधीः

mūladaṇḍaṃ sapatrañca phalapuṣpasamanvitaṃ / 1 svalpā sā tu tribhāgeneti ṅa.. , ṭa.. ca :p 276 pañcaskandhantu saṅkalpya pañcānāndāpayet sudhīḥ

हिन्दी अर्थ

सूर्यसे युक्त मूलाधार-निवासिनी आद्या कुण्डलिनी- शक्ति हृदयप्रदेशमें अंकुरके आकारमें स्थित है। सात्त्विक पुरुषोंमें उत्तम वह योगी सृष्टिक्रमका अवलम्बन करके सृष्टिन्यास करे तथा ब्रह्मरन्ध्रवर्ती शिवसे कुण्डलिनीके मुखभागमें झरते हुए अमृतका चिन्तन करे। शिवके दो रूप हैं-सकल और निष्कल। सगुण साकार देहमें विराजित शिवको 'सकल' जानना चाहिए और जो देहसे रहित हैं,

English

with root and trunk and leaves, with fruits and flowers; having conceived five trunks, the wise one should have it given in five parts.

अध्याय 213

श्लोक 6

एतद्दाता ब्रह्मलोके पितृभिर्मोदते चिरं ।विष्ण्वग्रे कामधेनुन्तु पलानां पञ्चभिः शतैः

etaddātā brahmaloke pitṛbhirmodate ciraṃ / viṣṇvagre kāmadhenuntu palānāṃ pañcabhiḥ śataiḥ

हिन्दी अर्थ

वे 'निष्कल' कहे गये हैं। वे ' हंस-हंस'का जप करते हैं। 'हंस' नाम है-'सदाशिव'का। जैसे तिलोंमें तेल और पुष्पोंमें गन्धकी स्थिति है, उसी प्रकार अन्तर्यामी पुरुष (जीवात्मा)-में

English

The giver of this long rejoices in Brahma's world with the ancestors. Before Vishnu a wish-cow of five hundred palas;

अध्याय 213

श्लोक 7

ब्रह्मविष्णुमहेशाद्या देवा धेनौ व्यवस्थिताः ।धेनुदानं सर्वदानं सर्वद ब्रह्मलोकदं

brahmaviṣṇumaheśādyā devā dhenau vyavasthitāḥ / dhenudānaṃ sarvadānaṃ sarvada brahmalokadaṃ

हिन्दी अर्थ

बाहर और भीतर भी सदाशिवका निवास है। ब्रह्माका स्थान हृदयमें है, भगवान् विष्णु कण्ठमें अधिष्ठित हैं, तालुके मध्यभागमें रुद्र, ललाटमें महेश्वर और प्राणोंके अग्रभागमें सदाशिवका स्थान है। उनके अन्तमें परात्पर ब्रह्म विराजमान हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, महेश्वर और सदाशिव -इन पाँच रूपोंमें 'सकल' (साकार या सगुण) परमात्माका वर्णन किया गया है। इसके विपरीत परमात्मा,

English

Brahma, Vishnu, Maheshvara and other gods are established in the cow. The gift of a cow is all gifts, giver of all, giver of Brahma's world;

अध्याय 213

श्लोक 8

विष्ण्वग्रे कपिलां दत्त्वा तारयेत् सकलं कुलं ।अलङ्कृत्य स्त्रियं दद्यादश्वमेधफलं लभेत्(१)

viṣṇvagre kapilāṃ dattvā tārayet sakalaṃ kulaṃ / alaṅkṛtya striyaṃ dadyādaśvamedhaphalaṃ labhet(1)

हिन्दी अर्थ

जो निर्गुण निराकाररूप है, उसे 'निष्कल' कहा गया है

English

having given a tawny cow before Vishnu one saves the whole family; having adorned a woman, one should give: one obtains the fruit of the Ashvamedha;

अध्याय 213

श्लोक 9

भूमिं दत्त्वा सर्वभाक् स्यात् सर्वशस्यप्ररोहिणीम् ।ग्रामं वाथ पुरं वापि(२) खेटकञ्च दद्त् सुखी

bhūmiṃ dattvā sarvabhāk syāt sarvaśasyaprarohiṇīm / grāmaṃ vātha puraṃ vāpi(2) kheṭakañca dadt sukhī

हिन्दी अर्थ

जो योगी अनाहत नादको प्रासादतक उठाकर अनवरत जप करता है, वह छः महीनोंमें ही सिद्धि प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। गमनागमनके ज्ञानसे समस्त पापोंका क्षय होता है ऐश्वर्यको छः महीनोंमें ही प्राप्त कर लेता है। मैंने स्थूल, सूक्ष्म और परके भेदसे तीन प्रकारके प्रसादका वर्णन किया है । प्रसादको हृस्व, दीर्घ और प्लुत-इन तीन रूपोंमें लक्षित करे। हस्व'

English

having given land one shares in all — land producing all crops; giving a village, town or market-town one is happy;

अध्याय 213

श्लोक 10

कार्त्तिक्यादौ(३) वृषोत्सर्गं कुर्वंस्तारयते कुलं(४)

kārttikyādau(3) vṛṣotsargaṃ kurvaṃstārayate kulaṃ(4)

हिन्दी अर्थ

पापोंको दग्ध कर देता है, 'दीर्घ' मोक्षप्रद होता है और 'प्लुत' आप्यायन (तृप्तिप्रदान) करनेमें समर्थ है। यह मस्तकपर बिन्दु (अनुस्वार)-से विभूषित होता है। हस्व-प्रासाद-मन्त्रके आदि

English

performing the bull-release at Kartika and the like one saves the family.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

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6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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