Agni Purana
178
अध्याय 178 / 381

Adhyaya 178

29 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ29 श्लोक

अध्याय 178

श्लोक 1

तृतीयाव्रतानि अग्निर् उवाच तृतीयाव्रतान्याख्यास्ये भुक्तिमुक्तिप्रदानि ते ।ललितायां तृतीयायां मूलगौरीव्रतं शृणु

tṛtīyāvratāni agnir uvāca tṛtīyāvratānyākhyāsye bhuktimuktipradāni te / lalitāyāṃ tṛtīyāyāṃ mūlagaurīvrataṃ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

चाण्डालका जल पीकर छः दिन उपवास रखे तथा चाण्डालोंके कूएँ अथवा पात्रका पानी पीकर 'सांतपन-ब्रत' करे। अन्त्यजका जल पीकर द्विज तीन रात उपवास रखकर पञ्चगव्यका

English

I shall describe the vows (to be practised) on the third lunar day which would confer enjoyment and emancipa¬ tion. Listen to me. (I shall describe) the mulagaurivrata for the (goddess) Lalita (a form of consort of Siva) (to be done) on the third lunar day.

अध्याय 178

श्लोक 2

तृतीयायां चैत्रशुक्ले ऊढा गौरी हरेण हि ।तिलस्नातो ऽर्चयेच्छम्भुं गौर्या हैमफलादिभिः

tṛtīyāyāṃ caitraśukle ūḍhā gaurī hareṇa hi / tilasnāto 'rcayecchambhuṃ gauryā haimaphalādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

पान करे। नवीन जल या जलके साथ मत्स्य, पञ्चगव्यका आचमन करनेसे शुद्धि होती है। शवयुक्त कूपका जल पीनेपर मनुष्य 'त्रिरात्रब्रत' करनेसे शुद्ध होता है। चाण्डालका अन्न खाकर ' चान्द्रायणत्रत' करे। आपत्कालमें शूद्रके घर

English

On the third of the bright half of Chaitra Gauri was married to Hara; having bathed with sesame one should worship Shambhu with Gauri with golden fruits and the like.

अध्याय 178

श्लोक 3

नमो ऽस्तु पाटलायैव पादौ देव्याः शिवस्य च ।शिवायेति च सङ्कीर्त्य जयायै गुल्फयोर्यजेत्

namo 'stu pāṭalāyaiva pādau devyāḥ śivasya ca / śivāyeti ca saṅkīrtya jayāyai gulphayoryajet

हिन्दी अर्थ

भोजन करनेपर पश्चात्तापसे शुद्धि हो जाती है। शूद्रके पात्रमें भोजन करनेवाला ब्राह्मण उपवास करके पञ्चगव्य पीनेसे शुद्ध होता है। कन्दुपक्क (भूजा), स्रेहपक्क (घी-तैलमें पके पदार्थ), घी-

English

"Homage to Patala" — one should worship the feet of the Goddess and of Shiva; having chanted "to Shiva," one should worship the ankles with "to Jaya."

अध्याय 178

श्लोक 4

त्रिपुरघ्नाय रुद्राय भान्यै जङ्घयोर्द्वयओः ।शिवं रुद्रायेश्वराय(१) विजयायैव जानुनी

tripuraghnāya rudrāya bhānyai jaṅghayordvayaoḥ / śivaṃ rudrāyeśvarāya(1) vijayāyaiva jānunī

हिन्दी अर्थ

वस्तुएँ शूद्रके घरसे ली जानेपर भी निन्दित नहीं हैं । बिना स्नान किये भोजन करनेवाला एक दिन उपवास रखकर दिनभर जप करनेसे पवित्र होता है। मूत्र-त्याग करके अशौचावस्थामें भोजन करनेपर 'त्रिरात्रत्रतसे' शुद्धि होती है। केश एवं कोटसे युक्त, जान-बूझकर पैरसे छुआ हुआ, भ्रूणघातीका देखा हुआ, रजस्वला स्त्रीका छुआ हुआ, कौए आदि पक्षियोंका जूठा किया हुआ,

English

"To Rudra, destroyer of Tripura, and Bhani" — the two shanks; "Shiva, to Rudra, to Ishvara, to Vijaya" — the knees;

अध्याय 178

श्लोक 5

ईशायेति कटिं देव्याः(२) शङ्करायेति शङ्करम् ।१ शिवं रुद्राय विश्वायेति ख॥ , छ॥ च ।शिवं भद्रायेश्वरायेति ज॥ , झ॥ , ञ॥ , ट॥ च २ ईशाय कट्यां देव्याश् च इति ङ॥ ।ईशायेति तातो देव्या इति घ॥ :प् २०२ कुक्षिद्वयञ्च कोटव्यै शूलिनम् शूलपाणये

īśāyeti kaṭiṃ devyāḥ(2) śaṅkarāyeti śaṅkaram / 1 śivaṃ rudrāya viśvāyeti kha.. , cha.. ca / śivaṃ bhadrāyeśvarāyeti ja.. , jha.. , ña.. , ṭa.. ca 2 īśāya kaṭyāṃ devyāś ca iti ṅa.. / īśāyeti tāto devyā iti gha.. :p 202 kukṣidvayañca koṭavyai śūlinam śūlapāṇaye

हिन्दी अर्थ

कुत्तेका स्पर्श किया हुआ अथवा गौका सूँघा हुआ अन्न खाकर तीन दिन उपवास करे। वीर्य, मल या मूत्रका भक्षण करनेपर 'प्राजापत्य-ब्रत' करे। नवश्राद्धमें “चान्द्रायण', मासिक श्राद्धमें

English

"To Isha" — the hip of the Goddess; "to Shankara" — Shankara; the two sides "to Kotavi," the trident-bearer "to Shulapani";

अध्याय 178

श्लोक 6

मङ्गलायै नमस्तुभ्यमुदरञ्चाभिपूजयेत् ।सर्वात्मने नमो रुद्रमैशान्यै च कुचद्वयं

maṅgalāyai namastubhyamudarañcābhipūjayet / sarvātmane namo rudramaiśānyai ca kucadvayaṃ

हिन्दी अर्थ

“पराकव्रत', त्रिपाक्षिक श्राद्धमें 'अतिकृच्छ ', षाणूमासिक श्राद्धमें “प्राजापत्य' और वार्षिक श्राद्धमे "एकपाद प्राजापत्य-व्रत' करे। पहले वार्षिक श्राद्धमें एक दिनका उपवास करे। निषिद्ध वस्तुका भक्षण करनेपर उपवास करके प्रायश्चित्त करे। भूतृण (छत्राक), लहसुन और

English

"Homage to Mangala" — one should worship the belly; "homage to the Self of all" — Rudra; "to Ishani" — the two breasts;

अध्याय 178

श्लोक 7

शिवं देवात्मने तद्वत् ह्रादिन्यै(१) कण्ठमर्चयेत् ।महादेवाय च शिवमनन्तायै करद्वयं

śivaṃ devātmane tadvat hrādinyai(1) kaṇṭhamarcayet / mahādevāya ca śivamanantāyai karadvayaṃ

हिन्दी अर्थ

प्राजापत्य' करे। अभोज्यान्न, शूद्रका अन्न, स्त्री एवं शूद्रका उच्छिष्ट या अभक्ष्य मांसका भक्षण करके सात दिन केवल दूध पीकर रहे। जो ब्रह्मचारी, संन्यासी अथवा व्रतस्थ द्विज मधु,

English

Shiva "to the Self of gods," likewise "to Hladini" — one should worship the throat; "to Mahadeva" Shiva; "to Ananta" the two hands;

अध्याय 178

श्लोक 8

त्रिलोचनायेति हरं बाहुं कालानलप्रिये(२) ।सौभाग्यायै महेशाय भूषणानि प्रपूजयेत्

trilocanāyeti haraṃ bāhuṃ kālānalapriye(2) / saubhāgyāyai maheśāya bhūṣaṇāni prapūjayet

हिन्दी अर्थ

मांस या जननाशौच एवं मरणाशौचका अन्न भोजन कर लेता है, वह 'प्राजापत्य-कृच्छु' करे अन्यायपूर्वक दूसरेका धन हड़प लेनेको “चोरी' कहते हैं। सुवर्णकी चोरी करनेवाला राजाके द्वारा मूसलसे मारे जानेपर शुद्ध होता है। सुवर्णको चोरी करनेवाला, सुरापान करनेवाला,

English

"to the three-eyed" — Hara; the arm "to the beloved of Kalanala"; "to Saubhagya, to Mahesha" one should worship the ornaments;

अध्याय 178

श्लोक 9

अशोकमधुवासिन्यै ईश्वरायेति चौष्ठकौ ।चतुर्मुखप्रिया चास्यं हराय स्थाणवे नमः

aśokamadhuvāsinyai īśvarāyeti cauṣṭhakau / caturmukhapriyā cāsyaṃ harāya sthāṇave namaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मघाती और गुरुपत्नीगामी बारह वर्षतक भूमिपर शयन और जटा धारण करे। वह एक समय केवल पत्ते और फल-मूलका भोजन करनेसे शुद्ध होता है। चोरी अथवा सुरापान करके एक

English

"to Ashoka-madhuvasini, to Ishvara" the two lips; the face "to Chaturmukhapriya, to Hara, homage to Sthanu";

अध्याय 178

श्लोक 10

नमो ऽर्धनारीशहरममिताङ्ग्यै च नासिकां ।नम उग्राय लोकेशं ललितेति पुनर्भ्रुवौ

namo 'rdhanārīśaharamamitāṅgyai ca nāsikāṃ / nama ugrāya lokeśaṃ laliteti punarbhruvau

हिन्दी अर्थ

वर्षतक 'प्राजापत्य-व्रत' करे। मणि, मोती, मूँगा, ताँबा, चाँदी, लोहा, काँसा और पत्थरकी चोरी करनेवाला बारह दिन चावलके कण खाकर रहे। तालाबका अपहरण करनेपर ' चान्द्रायण-ब्रत'से शुद्धि मानी गयी है। भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थ, सवारी, शय्या, आसन, पुष्प, मूल अथवा फलको चोरी करनेवाला पञ्चगव्य पीकर शुद्ध होता है।

English

"homage to Ardhanarisha-Hara, to Amitangi" the nose; "homage to Ugra, lord of the world," and again the brows "to Lalita";

अध्याय 178

श्लोक 11

सर्वाय पुरहन्तारं(३) वासन्त्यै चैव तालुकं(४) ।नमः श्रीकण्ठनाथायै शितिकण्ठाय केशकं

sarvāya purahantāraṃ(3) vāsantyai caiva tālukaṃ(4) / namaḥ śrīkaṇṭhanāthāyai śitikaṇṭhāya keśakaṃ

हिन्दी अर्थ

तृण, काष्ठ, वृक्ष, सूखा अन्न, गुड़, वस्त्र, चर्म या

English

"to Sarva, destroyer of the cities, to Vasanti" the palate; "homage to Shrikanthanatha, to Shitikantha" the hair;

अध्याय 178

श्लोक 12

भीमोग्राय सुपूपिण्यै शिरः सर्वात्मने नमः ।मल्लिकाशोककमलकुन्दन्तगरमालती(५)

bhīmogrāya supūpiṇyai śiraḥ sarvātmane namaḥ / mallikāśokakamalakundantagaramālatī(5)

हिन्दी अर्थ

माँ, बहन, गुरुपुत्री, गुरुपत्नी और अपनी पुत्रीसे समागम करनेवाला 'गुरुपत्नीगामी' माना गया है। गुरुपत्नीगमन करनेपर अपने पापकी घोषणा करके जलते हुए लोहेको शय्यापर तप्त-लौहमयी स्त्रीका आलिङ्गन करके प्राणत्याग करनेसे शुद्ध होता है। अथवा गुरुपत्नीगामी तीन मासतक “चान्द्रायण-व्रत' करे। पतित स्त्रियोंके लिये भी इसी प्रायश्चित्तका विधान करे। पुरुषको परस्त्रीगमन

English

"to Bhimograya, to Supupini" the head; "homage to the Self of all." Mallika, ashoka, lotus, kunda, tagara, malati,

अध्याय 178

श्लोक 13

कदम्बकरवीरञ्च(६) वाणमम्लानकुङ्कुमं ।सिन्धुवारञ्च मासेषु सर्वेषु क्रमशः स्मृतं

kadambakaravīrañca(6) vāṇamamlānakuṅkumaṃ / sindhuvārañca māseṣu sarveṣu kramaśaḥ smṛtaṃ

हिन्दी अर्थ

करनेपर जो प्रायश्चित्त बतलाया गया है, वही उनसे करावे। कुमारी कन्या, चाण्डाली, पुत्री और अपने सपिण्ड तथा पुत्रकी पत्नीमें वीर्यसेचन करनेवालेको प्राणत्याग कर देना चाहिए। द्विज एक रात

English

kadamba, oleander, vana, amlana, saffron, sinduvara — in all months in order are remembered.

अध्याय 178

श्लोक 14

उमामहेश्वरौ पूज्य सौभाग्याष्टकमग्रतः(७) ।१ शिवं वेदात्मने तद्वद्रूपिण्यै इति घ॥ , ज॥ , ञ॥ च २ हरञ्चान्तकालानलप्रिये इति ख॥ , घ॥ , ज॥ , ञ॥ च ३ पुरहर्तारमिति घ॥ ४ वासन्यै च तथालकमिति छ॥ , ट॥ च ५ मल्लिकाशोककमलच्छदं तगरमालती इति ख॥ , घ॥ , ज॥ च ६ कुन्दञ्च करवीरञ्चेति ख॥ , घ॥ , ज॥ च ७ मल्लिकाशोकेत्यादिः, सौभाग्याष्टकमग्रतः इत्य् अन्तः छ॥ पुस्तके नास्ति :प् २०३ स्थापयेद्(१) घृतनिष्पावकुसुम्भक्षीरजीवकं

umāmaheśvarau pūjya saubhāgyāṣṭakamagrataḥ(7) / 1 śivaṃ vedātmane tadvadrūpiṇyai iti gha.. , ja.. , ña.. ca 2 harañcāntakālānalapriye iti kha.. , gha.. , ja.. , ña.. ca 3 purahartāramiti gha.. 4 vāsanyai ca tathālakamiti cha.. , ṭa.. ca 5 mallikāśokakamalacchadaṃ tagaramālatī iti kha.. , gha.. , ja.. ca 6 kundañca karavīrañceti kha.. , gha.. , ja.. ca 7 mallikāśoketyādiḥ, saubhāgyāṣṭakamagrataḥ ity antaḥ cha.. pustake nāsti :p 203 sthāpayed(1) ghṛtaniṣpāvakusumbhakṣīrajīvakaṃ

हिन्दी अर्थ

शूद्राका सेवन करके जो पाप संचित करता है, वह तीन वर्षतक नित्य गायत्री-जप एवं भिक्षान्नका भोजन करनेसे नष्ट होता है। चाची, भाभी, बुआ, निक्षिप्ता (धरोहरके रूपमें रखी हुई), शरणागता, मामी, सगोत्रा बहिन, दूसरेको चाहनेवाली स्त्री, शिष्यपत्नी अथवा गुरुपत्नीसे गमन करके, ' चान्द्रायण-ब्रत' करे

English

Having worshipped Uma and Maheshvara, one should place before them the eight good-fortune items: ghee, nishpava, safflower, milk, jivaka,

अध्याय 178

श्लोक 15

तरुराजेक्षुलवणं(२) कुस्तुम्बुरुमथाष्टमं ।चैत्रे शृगोदकं प्राश्य देवदेव्यग्रतः स्वपेत्

tarurājekṣulavaṇaṃ(2) kustumburumathāṣṭamaṃ / caitre śṛgodakaṃ prāśya devadevyagrataḥ svapet

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें "अनेकविध प्रायश्चित्तोंका वर्णन” नामक एक सौ तिहततरवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

tree-king, sugarcane, salt, and kustumburu the eighth. In Chaitra having drunk water with horn, one should sleep before the God and Goddess.

अध्याय 178

श्लोक 16

प्रातः स्नात्वा समभ्यर्च्य विप्रदाम्पत्यमर्चयेत्(३) ।तदष्टकं द्विजे दद्याल्ललिता प्रीयतां मम(४)

prātaḥ snātvā samabhyarcya vipradāmpatyamarcayet(3) / tadaṣṭakaṃ dvije dadyāllalitā prīyatāṃ mama(4)

हिन्दी अर्थ

प्रायश्चित्तोंका वर्णन अग्निदेव कहते हैं- देव-मन्दिरके पूजन आदिका लोप करनेपर प्रायश्चित्त करना चाहिए। पूजाका लोप करनेपर एक सौ आठ बार जप करे और दुगुनी पूजाको व्यवस्था करके

English

In the morning having bathed and worshipped one should worship a Brahmin couple. One should give those eight to a Brahmin: "May Lalita be pleased with me."

अध्याय 178

श्लोक 17

शृङ्गोदकं(५) गोमयं च मन्दारं बिल्वपत्रकं ।कुशोदकं दधि क्षीरं कार्त्तिके पृषदाज्यकम्

śṛṅgodakaṃ(5) gomayaṃ ca mandāraṃ bilvapatrakaṃ / kuśodakaṃ dadhi kṣīraṃ kārttike pṛṣadājyakam

हिन्दी अर्थ

पञ्चोपनिषद्-मन्त्रोंसे हवन कर ब्राह्मण-भोजन करावे। सूतिका स्त्री, अन्त्यज अथवा रजस्वलाके द्वारा देवमूर्तिका स्पर्श होनेपर सौ बार गायत्री- जप करे। दुगुना स्नान करके पञ्चोपनिषद्-

English

Horn water, cow-dung, mandara, bilva leaf, kusha water, curds, milk in Kartika, spotted ghee,

अध्याय 178

श्लोक 18

गोमूत्राज्यं कृष्णतिलं पञ्चगव्यं क्रमाशनं ।ललिता विजया भद्रा भवानी कुमुदा शिवा

gomūtrājyaṃ kṛṣṇatilaṃ pañcagavyaṃ kramāśanaṃ / lalitā vijayā bhadrā bhavānī kumudā śivā

हिन्दी अर्थ

नियम भङ्ग होनेपर होम, स्नान और पूजन करे। होम-द्रव्यको चूहे आदि खा लें या वह कोटयुक्त हो जाय, तो उतना अंश छोड़कर तथा शेष द्रव्यका जलसे प्रोक्षण करके देवताओंका पूजन करे। भले ही अङ्कुरमात्र अर्पण करे, परंतु छिन्न-भिन्न द्रव्यका बहिष्कार कर दे। अस्पृश्य मनुष्योंका स्पर्श हो जानेपर पूजा-द्रव्यको दूसरे पात्रमें रख दे। पूजाके समय मन्त्र अथवा द्रव्यको

English

cow-urine and ghee, black sesame, the five cow-products — food in order. Lalita, Vijaya, Bhadra, Bhavani, Kumuda, Shiva,

अध्याय 178

श्लोक 19

वासुदेवी तथा गौरी मङ्गला कमला सती ।चैत्रादौ दानकाले च प्रीयतामिति वाचयेत्

vāsudevī tathā gaurī maṅgalā kamalā satī / caitrādau dānakāle ca prīyatāmiti vācayet

हिन्दी अर्थ

त्रुटि होनेपर हैव एवं मानुष विध्नोंका विनाश करनेवाले गणपतिके बीज-मन्त्रका जप करके पुनः पूजन करे। देव-मन्दिरका कलश नष्ट हो जानेपर सौ बार मन्त्र-जप करे। देवमूर्तिके हाथसे

English

Vasudevi and Gauri, Mangala, Kamala, Sati — at the time of gifts from Chaitra and so on one should say "May she be pleased."

अध्याय 178

श्लोक 20

फलमेकं पवित्राज्यं(६) व्रतान्ते शयानं ददेत् ।उमामहेश्वरं हैमं वृषभञ्च गवा सह

phalamekaṃ pavitrājyaṃ(6) vratānte śayānaṃ dadet / umāmaheśvaraṃ haimaṃ vṛṣabhañca gavā saha

हिन्दी अर्थ

गिरने एवं नष्ट हो जानेपर उपवासपूर्वक अग्निमें सौ आहुतियाँ देनेसे शुभ होता है। जिस पुरुषके मनमें पाप करनेपर पश्चात्ताप होता है, उसके लिये श्रीहरिका स्मरण ही परम प्रायश्चित्त है। चान्द्रायण, पराक एवं प्राजापत्य-व्रत पापसमूहोंका विनाश करनेवाले हैं। सूर्य, शिव, शक्ति और विष्णुके मन्त्रका जप भी पापोंका प्रशमन करता है। गायत्री, प्रणव, पापप्रणाशनस्तोत्र एवं मन्त्रका

English

At the end of the vow one should give a fruit, a pure ghee, and a bed; a golden Uma-Maheshvara and a bull with a cow;

अध्याय 178

श्लोक 21

गुरुञ्च मिथुनान्यर्च्य(७) वस्त्राद्यैर् भुक्तिमुक्तिभाक्(८) ।सौभाग्यारोग्यरूपायुः सौभाग्यशयनव्रतान्

guruñca mithunānyarcya(7) vastrādyair bhuktimuktibhāk(8) / saubhāgyārogyarūpāyuḥ saubhāgyaśayanavratān

हिन्दी अर्थ

जप पापोंका अन्त करनेवाला है। सूर्य, शिव, शक्ति और विष्णुके 'क' से प्रारम्भ होनेवाले, 'रा' बीजसे संयुक्त, रादि आदि और रान्त मन्त्र करोड़गुना फल देनेवाले हैं। इनके सिवा ' ३

English

having worshipped the teacher and couples with garments and the rest, one shares enjoyment and liberation. Good fortune, health, beauty, life — the good-fortune-bed vows

अध्याय 178

श्लोक 22

नभस्ये वाथ वैशाखे कुर्यान्मार्गशिरस्यथ(९) ।१ अर्पयेदिति ख॥ , छ॥ च २ तृणराजेक्षुलवणमिति ख॥ , छ॥ , ट॥ च ३ द्विजदाम्पत्यमर्चयेदिति ख॥ , घ॥ , छ॥ , ट॥ च ४ ललिता प्रीयतामिति ट॥ ५ पृष्ठोदकमिति ञ॥ ।कूपोदकमिति ज॥ , झ॥ च ६ परित्याज्यमिति क॥ , ज॥ , ठ॥ च ।परित्यज्येति ख॥ , छ॥ च ।परिग्राह्यमिति ङ॥ ७ गुरुं मिथुनमभर्च्येति ङ॥ ८ वस्त्राद्यैः सर्वमाप्नुयादिति ख॥ , घ॥ , ङ॥ , छ॥ , झ॥ , ञ॥ , ट॥ च ९ कुर्याद्वा मार्गशीर्षके इति ङ॥ , ञ॥ च :प् २०४ शुक्लपक्षे तृतीयायाम् ललितायै नमो यजेत्

nabhasye vātha vaiśākhe kuryānmārgaśirasyatha(9) / 1 arpayediti kha.. , cha.. ca 2 tṛṇarājekṣulavaṇamiti kha.. , cha.. , ṭa.. ca 3 dvijadāmpatyamarcayediti kha.. , gha.. , cha.. , ṭa.. ca 4 lalitā prīyatāmiti ṭa.. 5 pṛṣṭhodakamiti ña.. / kūpodakamiti ja.. , jha.. ca 6 parityājyamiti ka.. , ja.. , ṭha.. ca / parityajyeti kha.. , cha.. ca / parigrāhyamiti ṅa.. 7 guruṃ mithunamabharcyeti ṅa.. 8 vastrādyaiḥ sarvamāpnuyāditi kha.. , gha.. , ṅa.. , cha.. , jha.. , ña.. , ṭa.. ca 9 kuryādvā mārgaśīrṣake iti ṅa.. , ña.. ca :p 204 śuklapakṣe tṛtīyāyām lalitāyai namo yajet

हिन्दी अर्थ

क्लीं ' से प्रारम्भ होनेवाले चतुर्थ्यन्त एवं अन्तमें “नमः संयुक्त मन्त्र सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्ध करनेवाले हैं। नूसिंह भगवानके द्वादशाक्षर एवं अष्टाक्षर मन्त्रका जप पापसमूहोंका विनाश करता है। अग्निपुराणका पठन एवं श्रवण करनेसे भी मनुष्य समस्त पापसमूहोंसे छूट जाता है। इस पुराणमें अग्निदेवका माहात्म्य भी वर्णित है। परमात्मा श्रीविष्णु ही मुखस्वरूप अग्निदेव

English

one should perform in Bhadrapada or Vaishakha or Margashirsha. On the third of the bright half one should worship "homage to Lalita";

अध्याय 178

श्लोक 23

प्रतिपक्षं ततः प्रार्च्य व्रतान्ते(१) मित्युनानि च ।चतुर्विंशतिमभ्यर्च्य वस्त्राद्यैर् भुक्तिमुक्तिभाक्

pratipakṣaṃ tataḥ prārcya vratānte(1) mityunāni ca / caturviṃśatimabhyarcya vastrādyair bhuktimuktibhāk

हिन्दी अर्थ

हैं, जिनका सम्पूर्ण वेदोंमें गान किया गया है।

English

each fortnight then worshipping, at the end of the vow also couples; having worshipped twenty-four with garments and the rest one shares enjoyment and liberation.

अध्याय 178

श्लोक 24

उक्तो मार्गो द्वितीयो ऽयं सौभाग्यव्रतमावदे ।फाल्गुणादितृतीयायां लवणं यस्तु वर्जयेत्

ukto mārgo dvitīyo 'yaṃ saubhāgyavratamāvade / phālguṇāditṛtīyāyāṃ lavaṇaṃ yastu varjayet

हिन्दी अर्थ

भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले उन परमेश्वरका प्रवृत्ति और निवृत्ति-मार्गसे भी पूजन किया जाता है। अग्निरूपमें स्थित श्रीविष्णुके उद्देश्यसे हवन, जप, ध्यान, पूजन, स्तवन एवं नमस्कार शरीर- सम्बन्धी सभी पापोंका विध्वंस करनेवाला है। दस प्रकारके स्वर्णदान, बारह प्रकारके धान्यदान,

English

This is stated as the second way; I tell the Saubhagya vow: from the third of Phalguna he who avoids salt,

अध्याय 178

श्लोक 25

समाप्ते शयनन्दद्याद्गृहश्चोपस्करान्वितं ।सम्पूज्य विप्रमिथुनं भवानी प्रीयतामिति(२)

samāpte śayanandadyādgṛhaścopaskarānvitaṃ / sampūjya vipramithunaṃ bhavānī prīyatāmiti(2)

हिन्दी अर्थ

अन्नदान-ये सब महापापोंका अपहरण करनेवाले हैं। तिथि, वार, नक्षत्र, संक्रान्ति, योग, मन्वन्तरारम्भ आदिके समय सूर्य, शिव, शक्ति तथा विष्णुके उद्देश्यसे किये जानेवाले व्रत आदि पापोंका

English

at the end should give a bed with household articles; having worshipped a Brahmin couple: "May Bhavani be pleased."

अध्याय 178

श्लोक 26

सौभाग्यार्थं तृतीयोक्ता गौरीलोकादिदायिनी ।माघे भाद्रे च वैशाखे तृतीयाव्रतकृत्तथा

saubhāgyārthaṃ tṛtīyoktā gaurīlokādidāyinī / māghe bhādre ca vaiśākhe tṛtīyāvratakṛttathā

हिन्दी अर्थ

प्रशमन करते हैं। गङ्गा, गया, प्रयाग, अयोध्या, उज्जैन, कुरुक्षेत्र, पुष्कर, नैमिषारण्य, पुरुषोत्तमक्षेत्र, शालग्राम, प्रभासक्षेत्र आदि तीर्थ पापसमूहोंको विनष्ट करते हैं। “मैं परम प्रकाशस्वरूप बल हूँ।'--इस प्रकारकी धारणा भी पापोंका विनाश करनेवाली है । ब्रह्मपुराण, अग्निपुराण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, भगवान्के अवतार, समस्त देवताओंकी प्रतिमा-प्रतिष्ठा एवं पूजन, ज्यौतिष, पुराण, स्मृतियाँ,

English

For good fortune the third is told, giving Gauri's world and the rest; one who keeps the third-vow in Magha, Bhadra and Vaishakha;

अध्याय 178

श्लोक 27

दमनकतृतीयाकृत् चैत्रे दमनकैर् यजेत् ।आत्मतृतीया मार्गस्य प्रार्च्येच्छाभोजनादिना

damanakatṛtīyākṛt caitre damanakair yajet / ātmatṛtīyā mārgasya prārcyecchābhojanādinā

हिन्दी अर्थ

तप, व्रत, अर्थशास्त्र, सृष्टिके आदितत्त्, आयुर्वेद, धनुर्वेद, शिक्षा, छन्दः-शास्त्र, व्याकरण, निरुक्त, कोष, कल्प, न्याय, मीमांसा-शास्त्र एवं अन्य सब कुछ भी भगवान् श्रीविष्णुकी विभूतियाँ हैं ।

English

the Damanaka-third doer in Chaitra should worship with damanaka; the Atma-third of Margashirsha one should worship by eating as desired and so on.

अध्याय 178

श्लोक 28

गौरी काली उमा भद्रा दुर्गा कान्तिः सरस्वती ।वैष्णवी लक्ष्मीः प्रकृतिः शिवा नारायणी क्रमात्(३)

gaurī kālī umā bhadrā durgā kāntiḥ sarasvatī / vaiṣṇavī lakṣmīḥ prakṛtiḥ śivā nārāyaṇī kramāt(3)

हिन्दी अर्थ

वे श्रीहरि एक होते हुए भी सगुण-निर्गुण दो रूपोंमें विभक्त एवं सम्पूर्ण संसारमें संनिहित हैं। जो ऐसा जानता है, श्रीहरि-स्वरूप उन महापुरुषका दर्शन करनेसे दूसरोंके पाप विनष्ट हो जाते हैं। भगवान् श्रीहरि ही अष्टादश विद्यारूप, सूक्ष्म, स्थूल, सच्चित्-स्वरूप, अविनाशी परब्रह्म एवं निष्पाप विष्णु हैं

English

Gauri, Kali, Uma, Bhadra, Durga, Kanti, Sarasvati, Vaishnavi, Lakshmi, Prakriti, Shiva, Narayani in order;

अध्याय 178

श्लोक 29

मार्गतृतीयामारभ्य सौभाग्यं स्वर्गमाप्नुयात्

mārgatṛtīyāmārabhya saubhāgyaṃ svargamāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें प्रायश्चित्त-वर्णन नामक एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

beginning from the Margashirsha third, one obtains good fortune and heaven.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।