Agni Purana
139
अध्याय 139 / 381

Adhyaya 139

13 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ13 श्लोक

अध्याय 139

श्लोक 1

षष्टिसंवत्सराः ईश्वर उवाच षष्ट्यब्दानां प्रवक्ष्यामि शुभाशुभमतः शृणु ।प्रभवे यज्ञकर्माणि विभवे सुखिनो जनाः

ṣaṣṭisaṃvatsarāḥ īśvara uvāca ṣaṣṭyabdānāṃ pravakṣyāmi śubhāśubhamataḥ śṛṇu / prabhave yajñakarmāṇi vibhave sukhino janāḥ

हिन्दी अर्थ

(अब पञ्च स्वरोंकी उत्पत्ति कह रहे हैं) जिस तरह लकड़ीमें व्यापक अग्निको प्रतीति बिना जलाये नहीं होती है, उसी तरह शरीरमें विद्यमान शिव-शक्तिको प्रतीति ज्ञानके बिना नहीं होती है। महादेवी पार्वती! पहले ३कारस्वरसे विभूषित शक्तिको उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् बिन्दु 'एकार' रूपमें परिणत हुआ। पुनः ओंकारमें

English

Listen! I shall describe the names of sixty years and the good or bad results from them. Sacrificial rites (would be done) in Prabhava. The people would be comfortable in Vibhava.

अध्याय 139

श्लोक 2

शुक्ले च सर्वशस्यानि प्रमोदेन प्रमोदिताः ।प्रजापतौ प्रवृद्धिः स्यादङ्गिरा भोगवर्धनः

śukle ca sarvaśasyāni pramodena pramoditāḥ / prajāpatau pravṛddhiḥ syādaṅgirā bhogavardhanaḥ

हिन्दी अर्थ

शब्द पैदा हुआ, जिससे 'उकार' का उद्गम हुआ। यह 'उकार' हृदयमें शब्द करता हुआ विद्यमान रहता है। 'अर्धचन्द्र' से मोक्ष-मार्गको बतानेवाले 'इकार' का प्रादुर्भाव हुआ। तदनन्तर

English

All grains (grow well) in Sukla. (People) rejoice in Pramoda {Pramodat). There would be increase (of articles of Comforts) in Prajdpati (Prajotpatti). (The year) Ahgird (Ahgi- rasa) would increase comforts.

अध्याय 139

श्लोक 3

श्रीमुखे वर्धते लोको भावे भावः प्रवर्धते ।पूरणो पूरते शक्रो धाता सर्वौषधीकरः

śrīmukhe vardhate loko bhāve bhāvaḥ pravardhate / pūraṇo pūrate śakro dhātā sarvauṣadhīkaraḥ

हिन्दी अर्थ

भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला अव्यक्त ' अकार' उत्पन्न हुआ। वही 'अकार' सर्वशक्तिमान् एवं प्रवृत्ति तथा निवृत्तिका बोधक है॥ ७--१०॥ (अब शरीरमें पाँचों स्वरोंका स्थान कह रहे हैं ) “अ' स्वर शरीरमें प्राण अर्थात् श्वासरूपसे स्थिर होकर विद्यमान रहता है। इसीका नाम 'इडा' है। 'इकार' प्रतिष्ठा नामसे रहकर रसरूपमें

English

The people (population) increase in Srimukha. Thou¬ ghts flourish well in Bhdva (Bhava). (In the year) Yuva the life essence gets filled up. Dhdtd makes the herbs sprout well.

अध्याय 139

श्लोक 4

ईश्वरः क्षेम आरोग्यबहुधान्यसुभिक्षदः ।प्रमाथी मध्यवर्षस्तु विक्रमे शस्यसम्पदः

īśvaraḥ kṣema ārogyabahudhānyasubhikṣadaḥ / pramāthī madhyavarṣastu vikrame śasyasampadaḥ

हिन्दी अर्थ

तथा पालक-स्वरूपमें रहता है । इसे ही 'पिङ्गला' कहते हैं। 'ई' स्वरको “क्रूरा शक्ति' कहते हैं। “हर-बीज' (उकार) स्वर शरीरमें अग्निरूपसे रहता है। यही “समान-बोधिका विद्या’ है। इसे

English

livara (gives) welfare and health. Bahuddna gives pros¬ perity. In Pramdtkl (there would be) moderate rains. There would be plenty of grains in Vikrama.

अध्याय 139

श्लोक 5

वृषो वृष्यति सर्वांश् च चित्रभानुश् च चित्रतां ।स्वर्भानुः क्षेममारोग्यं तारणे जलदाः शुभाः

vṛṣo vṛṣyati sarvāṃś ca citrabhānuś ca citratāṃ / svarbhānuḥ kṣemamārogyaṃ tāraṇe jaladāḥ śubhāḥ

हिन्दी अर्थ

'गान्धारी' कहते हैं। इसमें “दहनात्मिका' शक्ति है। 'एकार' स्वर शरीरमें जलरूपसे रहता है। इसमें शान्ति-क्रिया है तथा 'ओकार' स्वर शरीरमें वायुरूपसे रहता है। यह अपान, व्यान, उदान आदि पाँच स्वरूपोंमें होकर स्पर्श करता हुआ गतिशील रहता है । पाँचों स्वरोंका सम्मिलित सूक्ष्म रूप जो 'ओंकार' है, वह “शान्त्यतीत' नामसे बोधित होकर शब्द-गुणवाले आकाश-

English

Vrfa {Vifu) makes all things thrive. CitrabhSnu sees many

अध्याय 139

श्लोक 6

पार्थिवे शस्यसम्पत्तिरतिवृष्टिस् तथा जयः ।सर्वजित्युत्तमा वृष्टिः सर्वधारी सुभिक्षदः

pārthive śasyasampattirativṛṣṭis tathā jayaḥ / sarvajityuttamā vṛṣṭiḥ sarvadhārī subhikṣadaḥ

हिन्दी अर्थ

रूपमें रहता है। इस तरह पाँचों स्वर (आ, इ, उ, ए, ओ) हुए, जिनके स्वामी क्रमसे मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र तथा शनि ग्रह हुए। ककारादि वर्ण इन स्वरोंके नीचे होते हैं। ये ही संसारके मूल कारण

English

(There would be) abundance of rains in Pdrthiva. Jaya (Vtjaya) (indicates) excessive rains. Sarvajit (indicates) good showers. Sarvadhatrl gives prosperity.

अध्याय 139

श्लोक 7

विरोधी जलदान् हन्ति विकृतश् च भयङ्करः ।खरे भवेत् पुमान् वीरो नन्दने नन्दते प्रजा

virodhī jaladān hanti vikṛtaś ca bhayaṅkaraḥ / khare bhavet pumān vīro nandane nandate prajā

हिन्दी अर्थ

हैं। इन्हींसे चराचर सब पदार्थोंका ज्ञान होता है अब मैं विद्यापीठका स्वरूप बतलाता हूँ, जिसमें 'ओंकार' शिवरूपसे कहा गया है और 'उमा' स्वयं सोम अर्थात् अमृतरूपसे है।

English

Virodhi destroys clouds. ( Vikrti) causes panic. Men become chivalrous in Khara. The people rejoice in Nandana.

अध्याय 139

श्लोक 8

विषयः शत्रुहन्ता च शत्रुरोगादि मर्दयेत् ।ज्वरार्तो मन्मथे लोको दुष्करे दुष्करा प्रजाः

viṣayaḥ śatruhantā ca śatrurogādi mardayet / jvarārto manmathe loko duṣkare duṣkarā prajāḥ

हिन्दी अर्थ

न छ ती र SSS NNN NNN Ih व वा वी वा वी की दी वी की वी डी आी

English

Vikdri causes the wrath of enemies. O Victorious one! (The year) Sarvadd {Sdrvarl) gives comforts to all. Water inundates (the earth) in Plava. O Good-natured one! The people do auspicious things in iSubhakft.

अध्याय 139

श्लोक 9

दुर्मुखे दुर्मुखो लोको(१) हेमलम्बे न सम्पदः ।संवत्सरो महादेवि विलम्बस्तु सुभिक्षदः

durmukhe durmukho loko(1) hemalambe na sampadaḥ / saṃvatsaro mahādevi vilambastu subhikṣadaḥ

हिन्दी अर्थ

इन्हींको वामा, ज्येष्ठा तथा रौद्री शक्ति भी कहते हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र-क्रमशः ये ही तीनों गुण हैं एवं सृष्टिके उत्पादक, पालक तथा संहारक हैं। शरीरके अंदर तीन रत्न नाड़ियाँ हैं, जिनका नाम स्थूल, सूक्ष्म तथा पर है। इनका श्वेत वर्ण है। इनसे सहैव अमृत टपकता रहता है, जिससे आत्मा सहैव आप्लावित रहता है। इस प्रकार उसका दिन-रात ध्यान करते

English

The people (become) cruel in In Anala {Nala)

अध्याय 139

श्लोक 10

विकारी शत्रुकोपाय विजये सर्वदा क्वचित् ।प्लवे प्लवन्ति तोयानि शोभने शुभकृत्प्रजा

vikārī śatrukopāya vijaye sarvadā kvacit / plave plavanti toyāni śobhane śubhakṛtprajā

हिन्दी अर्थ

रहना चाहिए। देवि! ऐसे साधकका शरीर अजर हो जाता है तथा उसे शिव-सायुज्यकी प्राप्ति हो जाती है। प्रथमतः अङ्गुष्ठ आदिमें, नेत्रोंमें तथा देहमें भी अङ्गन्यास करे, तत्पश्चात् मृत्युंजयकी

English

All things are accomplished in Siddhdrtha {Siddhdrthi), Dreadful events take place in Raudr a (Raudri). (There would be) moderate rains in Durmati. Dundubhi causes welfare and (plenty of) grains.

अध्याय 139

श्लोक 11

राक्षसे निष्ठुरो लोको विविधन्धान्यमानने ।सुवृष्टिः पिङ्गले क्वापि काले ह्य् उक्तो धनक्षयः

rākṣase niṣṭhuro loko vividhandhānyamānane / suvṛṣṭiḥ piṅgale kvāpi kāle hy ukto dhanakṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

अर्चना करके यात्रा करनेवाला संग्राम आदिमें विजयी होता है। आकाश शून्य है, निराधार है तथा शब्द-गुणवाला है। वायुमें स्पर्श गुण है। वह तिरछा झुककर स्पर्श करता है। रूपको अर्थात् अग्निकी ऊर्ध्वगति बतलायी गयी है तथा जलकी अधोगति होती है। सब स्थानोंको छोड़कर गन्ध-गुणवाली पृथ्वी

English

It rains well in Rudhirodgdri. Raktdksa and Krodhana (give) victory. InKaya {Akfaya) people get reduced to poverty. These are the sixty years.

अध्याय 139

श्लोक 12

सिद्धार्थे सिद्ध्यते सर्वं रौद्रे रौद्रं प्रवर्तते ।दुर्मतौ मध्यमा वृष्टिर्दुन्दुभिः क्षेमधान्यकृत्

siddhārthe siddhyate sarvaṃ raudre raudraṃ pravartate / durmatau madhyamā vṛṣṭirdundubhiḥ kṣemadhānyakṛt

हिन्दी अर्थ

मध्यमें रहकर सबके आधार-रूपमें विद्यमान है॥ १५-२० ३ ॥

English

It rains well in Rudhirodgdri. Raktdksa and Krodhana (give) victory. InKaya {Akfaya) people get reduced to poverty. These are the sixty years.

अध्याय 139

श्लोक 13

स्रवन्ते रुधिरोद्गारी रक्ताक्षः क्रोधने जयः ।क्षये क्षीणधनो लोकः(२) षष्टिसंवत्सराणि तु

sravante rudhirodgārī raktākṣaḥ krodhane jayaḥ / kṣaye kṣīṇadhano lokaḥ(2) ṣaṣṭisaṃvatsarāṇi tu

हिन्दी अर्थ

नाभिके मूलमें अर्थात् मेरुदण्डकी जड़में कंदके स्वरूपमें श्रीशिवजी सुशोभित हैं। वहींपर शक्ति-समुदायके साथ सूर्य, चन्द्रमा तथा भगवान् विष्णु रहते हैं और पञ्चतन्मात्राओंके साथ दस प्रकारके प्राण भी रहते हैं। कालाग्निके समान देदीप्यमान वह शिवजीकी मूर्ति सहैव चमकती रहती है। वही चराचर जीवलोकका प्राण है। उस मन्त्रपीठके नष्ट होनेपर वायुस्वरूप जीवका

English

It rains well in Rudhirodgdri. Raktdksa and Krodhana (give) victory. InKaya {Akfaya) people get reduced to poverty. These are the sixty years.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।