Agni Purana
136
अध्याय 136 / 381

Adhyaya 136

6 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ6 श्लोक

अध्याय 136

श्लोक 1

नक्षत्रचक्रं ईश्वर उवाच अथ चक्रं प्रवक्ष्यामि यात्रादौ च फलप्रदम् ।अश्विन्यादौ लिखेच्चक्रं त्रिनाडीपरिभूषितं

nakṣatracakraṃ īśvara uvāca atha cakraṃ pravakṣyāmi yātrādau ca phalapradam / aśvinyādau likheccakraṃ trināḍīparibhūṣitaṃ

हिन्दी अर्थ

२. इस विषयपर भास्कराचार्य अपनी गणिताध्याय' नामक पुस्तकके 'कालमानाध्याय' में लिखते हैं- गुर्वक्षरैः खेन्दुमितैरणुस्तैः षङ्भिः पलं तैर्घटिका खषड्भिः । स्याद्वा घटीषष्टिरहः खरामैर्मासो दिनैस्तैिकुभिश्च वर्षम् “दस गुरु अक्षरोंके उच्चारणमें जितना समय लगता है, उसे एक अणु' कहते हैं और ६ अणुओंका एक 'पल' होता है । ६० पलका १ 'दण्ड', ६० दण्डका १ ' अहोरात्र ३० दिन-रातका एक 'मास' और १२ मासका एक 'वर्ष' होता है।''

English

The illumination (rite) should be done with the repe¬ tition of mantras of the tuft ending with (the syllable) phat. Oblation should be done with the mantras like Om, hrim, oblations to Siva.

अध्याय 136

श्लोक 2

अश्विन्यार्द्रादिभिः पूर्वा ततश्चोत्तरफल्गुनी ।हस्ता ज्येष्ठा तथा मूलं वारुणं चाप्यजैकपात्

aśvinyārdrādibhiḥ pūrvā tataścottaraphalgunī / hastā jyeṣṭhā tathā mūlaṃ vāruṇaṃ cāpyajaikapāt

हिन्दी अर्थ

उदयकाल एवं अस्तकालका मान अहोरात्रके होता है। अर्थात् ११००, १४३०००० ग्यारह अरब

English

Beginning with Tryambakarii yajamahe etc.

अध्याय 136

श्लोक 3

१ मुष्टिमुद्गरसंयुक्तौ इति ज॥ ।ऋष्टिमुद्गरयुक्तौ चेति ञ॥ २ अभयस्वस्तिकान्वितौ इति ख॥ , ग॥ , ङ॥ , छ॥ , झ॥ च ।अभयस्तम्भिकाश्वितौ इति ज॥ :प् ८१ नाडीयं प्रथमा चान्या याम्यं मृगशिरस् तथा ।पुष्यं भाग्यन्तथा चित्रा मैत्रञ्चाप्यं च वासवं

1 muṣṭimudgarasaṃyuktau iti ja.. / ṛṣṭimudgarayuktau ceti ña.. 2 abhayasvastikānvitau iti kha.. , ga.. , ṅa.. , cha.. , jha.. ca / abhayastambhikāśvitau iti ja.. :p 81 nāḍīyaṃ prathamā cānyā yāmyaṃ mṛgaśiras tathā / puṣyaṃ bhāgyantathā citrā maitrañcāpyaṃ ca vāsavaṃ

हिन्दी अर्थ

अर्थात् ६० दण्डके एकादशांशके समान होता है-जैसे ६० में ११ से भाग देनेपर ५ दण्ड २७ स्वरोंका उदयास्तमान होता है। किसी स्वरके उदयके बाद दूसरा स्वर ५ दण्ड २७ पलपर उदय होगा। इसी तरह पाँचोंका उदय तथा अस्तमान जानना चाहिए। इनमेंसे जब मृत्युस्वरका उदय

English

This is the first channel, and another: Yamya, Mrigashira, Pushya, Bhagya, Chitra, Maitra, Apya and Vasava;

अध्याय 136

श्लोक 4

अहिर्व्रध्रं तृतीयाथ कृत्तिका रोहिणी ह्य् अहिः ।चित्रा स्वाती विशाखा च श्रवणा रेवती च भं

ahirvradhraṃ tṛtīyātha kṛttikā rohiṇī hy ahiḥ / citrā svātī viśākhā ca śravaṇā revatī ca bhaṃ

हिन्दी अर्थ

हो, तब युद्ध करनेपर पराजयके साथ ही मृत्यु हो जाती है॥ ५--७॥

English

Ahirbudhnya the third; Krittika, Rohini, Ahi; Chitra, Svati, Vishakha, Shravana and Revati — the star.

अध्याय 136

श्लोक 5

नाडीत्रितयसंजुष्टग्रहाज् ज्ञेयं शुभाशुभं ।चक्रम्फणीश्वरन्तत्तु(१) त्रिनाडीपरिभूषितं

nāḍītritayasaṃjuṣṭagrahāj jñeyaṃ śubhāśubhaṃ / cakramphaṇīśvarantattu(1) trināḍīparibhūṣitaṃ

हिन्दी अर्थ

(अब शनिचक्रका वर्णन करते हैं) शनिचक्रमें १५ दिनोंपर क्रमशः ग्रहोंका उदय हुआ करता है। इस पञ्चदश विभागके अनुसार शनिका भाग युद्धमें मृत्युदायक होता है। (विशेष जब कि शनि एक राशिमें ढाई साल अर्थात् ३० मास रहता है, उसमें दिन-संख्या ९०० हुई। ९०० में १५ का भाग देनेसे लब्धि ६० होगी। ६० दिनका १ पञ्चदश विभाग हुआ। शनिके राशिमें प्रवेश

English

By the planets joined with the three channels one should know the auspicious and inauspicious. This wheel, Phanishvara, is adorned with three channels;

अध्याय 136

श्लोक 6

रविभौमार्कराहुस्थमशुभं स्याच्छुभं परं ।देशग्रामयुता भ्रातृभार्याद्या एकशः शुभाः

ravibhaumārkarāhusthamaśubhaṃ syācchubhaṃ paraṃ / deśagrāmayutā bhrātṛbhāryādyā ekaśaḥ śubhāḥ

हिन्दी अर्थ

करनेके बाद शनि आदि ग्रहोंका उदय ६० दिनका होगा; जिसमें उदयसंख्या ४ बार होगी। इस तरह जब शनिका भाग आये, उस समय युद्ध करना निषिद्ध है)

English

standing on Sun, Mars, Saturn and Rahu it is inauspicious; otherwise auspicious. Brothers, wives and the rest with regions and villages are each auspicious.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।